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बहुत जरुरी है भारत पाकिस्तान युद्ध​!

विश्वव्यवस्था कायम रखने के लिए बहुत जरूरी है भारत पाकिस्तान युद्ध​! हम यह कोई पहली बार बोल या लिख नहीं रहे हैं। पहले खाड़ी युद्ध के तुरंत बाद लिखे अपने धारावाहिक उपन्यास `अमेरिका से सावधान' में ​​लगातार इस पर लिखा है। तेल युद्ध के समय से सोवियत अवसान के बाद खासकर वैश्विक व्यवस्था के स्थायित्व के लिए युद्धस्थल इस ​​उपमहादेश में, हिंद महासागर के शांति क्षेत्र में स्थानातंरित होता रहा। मुक्त बाजार की अर्थ व्यवस्था दरअसल विकासशील और ​​अविकसित देशों के प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट की व्यवस्था है, जो बाकायदा बहिष्कार और रंगभेद के साथ साथ जलसंहार संस्कृति और मस्तिष्क नियंत्रण के बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित है।

विश्वव्यवस्था कायम रखने के लिए बहुत जरूरी है भारत पाकिस्तान युद्ध​! हम यह कोई पहली बार बोल या लिख नहीं रहे हैं। पहले खाड़ी युद्ध के तुरंत बाद लिखे अपने धारावाहिक उपन्यास `अमेरिका से सावधान' में ​​लगातार इस पर लिखा है। तेल युद्ध के समय से सोवियत अवसान के बाद खासकर वैश्विक व्यवस्था के स्थायित्व के लिए युद्धस्थल इस ​​उपमहादेश में, हिंद महासागर के शांति क्षेत्र में स्थानातंरित होता रहा। मुक्त बाजार की अर्थ व्यवस्था दरअसल विकासशील और ​​अविकसित देशों के प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट की व्यवस्था है, जो बाकायदा बहिष्कार और रंगभेद के साथ साथ जलसंहार संस्कृति और मस्तिष्क नियंत्रण के बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित है।

अबाध पूंजी निवेश के अर्थशास्त्र के मातहत सत्तावर्ग के क्रयसंपन्न अति ​​अल्पसंख्यक तबके के शिकंजे में फंसे राष्ट्र ने तब से बहुसंख्यक जनता के खिलाफ युद्ध जरी रखा है। इस अभ्यंतरीन युद्ध को वैधता देने के​​ लिए सीमा पर युद्ध भी जरूरी है। साठ के दशक को याद करें, जब हरित क्रांति के माध्यम से पूंजी की घुसपैठ होने ही वाली थी और भारतीय अर्थ व्यवस्था का आधार कृषि परंपरागत तौर पर बहुसंख्यक जनता की आजीविका बनी हुई थी! तब हम बचपन में थे। टीवी, कंप्यूटर, शेयर बाजार और तकनीक से सर्वथा अनजान। तब बलात्कार परिदृश्य क्या किसी को याद है? तब अनाज और तेल के भाव क्या थे?

महंगाई के लिए अक्सर १९७१ की लड़ाई और शरणार्थी समस्या को मुख्य कारक बताने का रिवाज है। पर दरअसल १९६२ और १९६५ की ​​लड़ाई के बाद से ही अर्थ व्यवस्था चरमराने लगी थी। हरित क्रांति के बाद से प्राथमिकताएं बदलने लगी थीं। हिंदुत्व राजनीति का खुला खेल शुरू हो गया था। इसी हिंदु राष्ट्रवाद का चरमोत्कर्ष बांग्लादेश युद्ध में देखने को मिला, जब इंदिरा गांधी को मां दुर्गा का अवतार बना दिया गया और ​​भारतीय राजनीति संघ परिवार के सिद्धांतों के मुताबिक चलने लगी। रक्षा सौदों का सिलसिला चल पड़ा और नवधनाढ्य वर्ग के कारण ईंधन की खपत बढ़ने लगी। पर आज भी अर्थ व्यवस्था की बदहाली के प्रसंग में रक्षा व्यय और राष्ट्र के सैन्यीकरण की चर्चा नहीं होती। १९७१ में याद करें कि कैसे भारतीय सेना बांगालादेश को मुक्त कराने में लगी थी एक ओर तो दूसरी ओर मुख्यतः भूमि सुधार की मांग लेकर शुरू हुए कृषक विद्रोह को कुचलने के लिए देश में सेना का इस्तेमाल हो रहा था।

दरअसल १९७१ का युद्ध ही विलंबित इसलिए हुआ कि तब पश्चिम बंगाल में ईस्टर्न कमान नक्सलियों से निपटने में लगी हुई थी। यहीं नहीं, अस्सी के दशक में आपरेशन ब्लू स्टार और सिख निधन के लिए सिख उग्रवाद को जो जिम्मेवार बताया जाता है, उसके पीछे भी पंजाब में हरित क्रांति की वजह से कृषि उत्पादन लागत अचानक बढ़ जाने और देहात में बेरोजगारी की पृष्ठ भूमि है, जिसे धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की राजनीति ने हिंदुत्व के पुनरुत्थान के वास्ते बखूब इस्तेमाल किया। १९९१ में डा. मनमोहन सिंह के अवतार से पहले तेलयुद्ध में बुरी तरह फंस गयी थी अमेरिकी युद्धक अर्थ व्यवस्था, जिस वजह से २००८ में मंदी आयी और अब फिर फिस्कल क्लिफ है।

भारत के कायाकल्प के लिए नहीं बल्कि अमेरिकी युद्धक अर्थ व्यवस्था की जमानत के लिए विश्वबैंक और अंतरराट्रीय मुद्राकोष के चाकरों ने ग्लोबल हिंदुत्व और जायनवादी ​​ग्लोबल आर्थिक ताकतों की मदद से भारत को मुक्त बाजार में बदलना शुरु किया। इससे पहले इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने सूचना माध्यमों में न केवल कब्जा किया, बल्कि छद्म समाजवादी नारों के साथ अर्थ व्यवस्था की प्रथमिकताएं ही सर्विस और तकनीक को बनाकर भारतीय कृषि और देहात को पलीता लगाना शुरु कर दिया था। इसकी सबसे ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया कृषि प्रधान पंजाबी संस्कृति में हुई। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि नवउदारवादी अर्थ व्यवस्था के प्रस्थानबिंदु और आरक्षणविरोधी आंदोलन व रामजन्मभूमि आदोलन के तार कैसे जुड़े हुए थे। भारत के खुला बाजार बन जाने के बाद बाबरी विध्वंस, भोपाल गैस त्रासदी और गुजरात नरसंहार जैसी घटनाएं हिंदुत्व के ग्लोबीकरण की ही तार्किक परिणति रहीं। अब यह महज संयोग नहीं कि गुजरात नरसंहार के इंद्रदेव इस वक्त मनमोहन का कार्यभार अपने हाथों में लें, इसके लिए बाजार, कारपोरेट​ ​मीडिया, अर्थ शास्त्रियों और अमेरिका, इजराइल व ब्रिटेन में उन्हें विकास पुरुष और उदित भारत के भाग्य विधाता बतौर पेश करने की​  होड़ मची हुई है।​
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​भूमि सुधार का मुद्दा जस का तस है। इसे संबोधित किये बिना कारपोरेट हित में एक मुश्त भूमि अधिग्रहण बिल, खनन अधिनियम, वन ​​अधिनियम, पर्यावरण अधिनियम जैसे तमाम कानून बदलकर प्राकृतिक संसाधनों पर कारपोरेट कब्जा कायम करने के लिए बहुसंख्यक जनता को जल जंगल जमीन और आजीविका से बेदखल किया जा रहा है। अगर संविधान की पांचवीं और छठीं अनुसूचियों के तहत आदिवासियों और भूमिपुत्रों को सारे अधिकार मिल जायें, अगर भूमि सुधार ईमानदारी से पूरे देश में लागू हो जाये तो इस देश मे नक्सलवादी माओवादी आंदोलन के लिए ​​कोई जमीन ही नहीं बचती और न सलवा जुड़ुमम और तरह तरह के रंग बिरंगे अभियानों के तहत आंतरिक सुरक्षा सीआईए और मोसाद के हवाले करने की जुगत लगानी होगी और न सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून और आतंकनिरोधक कानून की कोई प्रासंगिकता रह जायेगी। इसके उलट भारत अमेरिकी परमाणु समझौते के तहत न केवल भारत देश को परमामु भट्टी में बदल दिया गया, बल्कि हमेशा के लिए इस देश को अमेरिकी युद्धक व्यवस्था से नत्थी कर दिया गया।

अमेरिका के आतंकविरोधी युद्ध में शामिल होकर भारतीय राजनय ऐसी हो गयी कि भारत अब इस महाद्वीप में एक अकेला द्वीप है और अपने पड़ोसियों से सीमा विवाद के अलावा उसके कोई संबंध ही नहीं है। बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों को तिलांजलि देकर वर्चस्ववादी उग्रतम कारपोरेट हिंदू राष्ट्रवाद के युद्धोन्मादी आत्मघाती इंतजामात के बीच हम हमेशा के लिए अमन चैन को अलविदा कह चुके है! इस प्रसंग में यह भी याद रखने लायक है कि अमेरिका और इजराइल के साथ सैन्य गठबंधन हो या फिर भारत अमेरिका परमाणु संधि, पहल संघ परिवार ने ही की। जैसे आर्थिक सुधारों के लिए जरूरी तमाम काम को अंजाम देने में संघी पहल निर्णायक साबित होती रही। खुदरा में विदेशी​​ निवेश का विरोध कर रही भाजपा ने अपनी केंद्र सरकार में बाकायदा विनिवेश मंत्रालय खोल रखा था। तब विनिवेश का जो रोडमैप बनाया ​​गया था, आज भी उसी पर अमल हो रहा है। यही नहीं, जल जंगल जमीन और नागरिक मानव अधिकारों से बेदखली के लिए नागरिकता संशोधन कानून और असंवैधानिक आधार कार्ड योजना के तहत डिजिटल बायोमैट्रिक नागरिकता के जरिये एथनिक क्लींजिंग की शुरुआत भी संघ परिवार ने ​​ही की।

अब भी केंद्र सरकार एक से बढ़कर एक जनविरोधी नीति अमल में लाने का दुस्साहस सिर्फ इसलिे कर रही है क्योंकि संसद में मुख्य प्रतिपक्ष संघ परिवार है और जो सीधे अमेरिका और इजराइल के हितों से जुड़ा हुआ है। क्योंकि इसी पर ग्लोबल हिंदुत्व और उग्रतम हिंदू राष्ट्रवाद का वर्तमान और भविष्य निर्भर है। जैसे एक के बाद एक फर्जी मुद्दे और आंदोलन गढ़कर कारपोरेट मीडिया के खुले सहयोग से हिंदुत्ववादियों ने अल्पमत सरकारों को पिछले दो दशक से विश्व व्यवस्था के हित में संसद, संविधान और लोकतंत्र की हत्या में पूरी मदद की, उसके बिना न आर्थिक सुधार संभव थे और न वैश्विक कारपोरेट व्यवस्था के हित सध सकते थे।

किसी भी धर्म राष्ट्रवाद के उत्थान के पीछे विधर्मियों के खिलाफ निरंतर घृणा अभियान अनिवार्य शर्त है। मनुस्मृति व्यवस्था में जाति के तहत बंटे हुए हिंदू सामाज के एकीकरण के लिए सबसे बड़ी पूंजी यह घृणा है। जो समय समय पर तमाम अल्पसंख्यकों, भाषायी और धार्मिक के विरुद्ध देश के कोने कोने में अभिव्यक्त होती रही है। महाराष्ट्र और असम में संघ परिवार के निशाने पर भाषाई अल्पसंख्यक हैं, देश भर में अनुसूचित शरणार्थी हैं और तमाम तरह के धार्मिक अल्पसंख्यक। उग्रतम हिंदू राष्ट्रवाद से न मुसलमान बचे और न ईसाई, हिंदुत्व से निकले सिख और बौद्ध भी नहीं। इस घृणा के सबसे बड़े प्रतीक हैं बांग्लादेश और पाकिस्तान। हर बंगाली को बंगाल से बाहर और हर शरणार्थी को दशभर में बांग्लादेशी बताकर उनके खिलाफ​ आंदोलन चलाने का संघ परिवार का लंबा इतिहास रहा है। कम से कम सिखों को तो याद होना ही चाहिए कि कैसे अस्सी के दशक में हर ​​सिख को आतंकवादी कहा जाता था। भारत पाक तनाव के परिवेश में तमाम मुसलमानों को पाक समर्थक या आतंकवादी करार देना बांए हाथ का खेल है, जैसे हर आदिवासी इस देश में या तो नक्सली है या फिर माओवादी। हर वामपंथी रूस या चीन का दलाल।

संघ परिवार के लिए हिंदू राष्ट्र के एजेंडा को अंजाम तक पहुंचाना जिस तरह अनिवार्य है, उतना ही अनिवार्य है विधर्मियों के विरूद्ध घृणा अभियान, जिससे अनुसूचित, आदिवासी और पिछड़े अंध देशभक्ति से निष्मात गुजरात की तर्ज पर पूरे देश में हिंदुत्व की पैदल सेना में शामिल हो​​ जायें और समता व सामाजिक न्याय की मांगें भूल जायें, आर्थिक सशक्तीकरण का सपना न देखें और लोकतंत्र का सर्वनाश करते हुए मनुस्मृति व्यवस्था का गुलाम हो जायें हजारों साल के लिए और इसके अलावा भारत अमेरिका परमाणु संधि का जो मुख्य मकसद है, अमेरिकी कंपनियों का भारतीय प्रतिरक्षा आंतरिक सुरक्षा बाजार में एकाधिकार का, वह भारत पाकिस्तान या भारत चीन युद्ध के मार्फत ही पूरा हो सकता है। ​​अमेरिकी पिट्ठू चो चीन के खिलाफ अरसे से छायायुद्ध चला रहे हैं, पर चीनी प्राथमिकताओं में इस गैर जरूरी युद्ध के लिए कोई गुंजाइश ​​नहीं है। दूसरी ओर, पाकिस्तानी सत्तावर्ग भी अंध धर्म राष्ट्रवाद की शरण में हैं। वह भी अमेरिकी गुलाम है। वहां आंतरिक समस्याएं और​ ​ संगीन हैं। इसी समीकरण पर कारगिल युद्ध संपन्न हो ही गया। अब चूंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिस्कल क्लिफ के जरिये फिर मंदी के ​​चंगुल में है, भारत और पाकिस्तान दोनों देशों पर काबिज धर्म राष्ट्रवाद के लिए वैश्विक व्यवस्था के प्रति अमोघ प्रतिबद्धता साबित करने ​​और घरेलू संकट, आर्थिक सुधारों के एजंडे को अमल में लाने के लिए भारत पाकिस्तान युद्ध से बेहतर कोई विकल्प है ही नहीं।

अब ग्लोबल हिंदुत्व और वैश्विक कारपोरेट मनुस्मृति व्यवस्था के इस फौरी एजंडे को अंजाम देने में लगा है कारपोरेट मीडिया। ​इलेक्ट्रानिक मीडिया तो बड़ी बेशर्मी से धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का रश्मीरथी बना ही हुआ है, सोशल माडिया भी हिंदुत्ववादियों के कब्जे में हैं। ​जनपक्षधधर अभिव्यक्ति के लिए कहीं कोई स्पेस नहीं बचा तो कोई क्या कर लेगा सबसे बड़ी शर्म की बात तो यह है कि वे श्रमजीवी​ ​​ बहुसंख्य पत्रकार जिन्हें न बाजार तरह तरह के उपहार और पुरस्कारों से नवाजता है और न वे बड़े ओहदों पर हैं, जिन्हें हिंदुत्ववादी सत्तावर्ग​​ ने वाजिब वेतन और तमाम सुविधाओं से ही नहीं, मनुष्योचित जीवन यापन से भी वंचित कर रखा है, जिनका वेतन बोर्ड सर्वदलीय सहमति से वर्षों से लटका हुआ है, वे भी सुधार और हिंदुराष्ट्रवाद के एजेंडा को लागू करने के लिए निष्ठापूर्वक युद्धोन्माद भड़काने का पवित्र कर्म कर रहे हैं।

लेखक पलाश विश्‍वास वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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