: अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम मौन व्रत : प्रशांत भूषण के साथ हुए हालिया घटनाक्रम के बाद अन्ना हजारे का मौन अनशन पर चले जाने का असली निहितार्थ यूं तो अन्ना ही बता सकते हैं, लेकिन जितना उन्होंने मौन पर जाने से पहले कहा वो भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम वाणी की उच्छृंखलता का फर्क करने को काफी है. अन्ना ने कहा कि ‘कुछ दिन मौन रहकर हम उर्जा ग्रहण कर सकते हैं.’ यानी मौन भी अभिव्यक्ति का चरम ही है. शायद उनका इशारा यही रहा हो कि बात-बात मुंह खोलने या जहर उगलने से ज्यादा बेहतर मौन है. जब रहीम ‘निजमन की व्यथा मन ही राखो गोय, सुन अठिलैहे लोग सब बांट न लईहे कोई’ कहते हैं तो वे भी बोलने की आज़ादी को प्रतिबंधित नहीं करते बल्कि आशय यह होता है कि निजी कुंठाओं को सार्वजनिक प्रदर्शन की वस्तु बना देना उचित नहीं. ऐसा दुःख जो वास्तव में दुःख हो और जिसे सुना कर तकलीफ को बांटा जा सके उसे ही व्यक्त करने की तरफ इशारा किया होगा रहीम ने भी.
निश्चय ही यह कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता के इतिहास में बोलने की आजादी से पुनीत कुछ भी नहीं हुआ है. यही वो आज़ादी है जो हमें बेजुबानों से अलग करता है. व्यक्त करने जी आज़ादी ही हमें ‘व्यक्ति’ बनाती है. लेकिन इस आज़ादी को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (2) तहत वर्णित युक्ति-युक्त निर्बंधन के आईने में भी व्याख्यायित करने की ज़रूरत है. अगर सुप्रीम कोर्ट का कोई वरिष्ठ अधिवक्ता संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति के इस अधिकार की अधूरी व्याख्या कर कुछ भी बोलते रहने को संविधान की ओट दे तो यह जान-बूझ कर झूठ की खेती करना ही माना जाना चाहिए. निश्चय ही प्रशांत भूषन एक वकील होने के कारण बेहतर जानते होंगे कि संविधान का जो अनुच्छेद (19) हमें वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है वही अनुच्छेद इस आज़ादी पर युक्ति-युक्त निर्बंधन भी लगाता है. अनुच्छेद 19 (2) स्पष्ट रूप से ऐसे किसी भी वक्तव्य पर प्रतिबंध लगाता है जो राज्य की लोक व्यवस्था, शिष्टाचार और सदाचार के खिलाफ हो या भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुचाने वाला हो. न केवल प्रतिबंध बल्कि ऐसे अभिव्यक्ति को अपराध घोषित किया गया है. और वह अपराध किसी को पीट देने से ज्यादा गंभीर है.
लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए लेकिन सामान्यतः मार-पीट को कानूनन ज़मानातीय अपराध ही निरूपित किया गया है जबकि राष्ट्र की अखंडता पर सवाल पैदा करने वाले बयान को उससे कहीं ज्यादा गंभीर माना गया है. ‘संतोष सिंह बनाम दिल्ली प्रशासन’ मामले में न्यायालय का स्पष्ट मत था कि ‘ऐसे प्रत्येक भाषण को जिसमें राष्ट्र को नष्ट-भ्रष्ट कर देने की प्रवृति हो दंडनीय बनाया जा सकता है.’ संविधान के 16 वें संशोधन द्वारा यह स्थापित किया गया है कि आप ‘भारत की एकता और अखंडता को चुनौती नहीं दे सकते.’
भारतीय परंपराओं या पौराणिक आख्यानों में भी मनीषियों ने अभिव्यक्ति पर काफी चर्चा की है. मानस में तुलसी ने ‘व्यक्त करने की आज़ादी’ को व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार बताते हुए भी उस पर कुछ तो प्रतिबन्ध आरोपित किया ही है. जैसे भगवान राम के मुंह से गोस्वामी जी कहलवाते हैं ‘कहेहि ते कछु दुःख घटि होई, काह कहौं यह जान न कोई, तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा, जानत प्रिया एक मन मोरा’ यानी कहने से दुःख ज़रूर कम हो जाता है लेकिन कहूँ किसको ये समझ नहीं आ रहा है.’ भावार्थ ये भी कि जो प्रेम का तत्व समझ सके उसको ही कुछ कहना उचित होता है. बहरहाल.
जहां तक प्रशांत भूषण के हालिया उस बयान का सवाल है जिसमें उन्होंने ‘अगर कश्मीरी चाहें तो देश से उन्हें अलग कर दिया जाना चाहिए’ जैसी खतरनाक बात कही थी तो अव्वल तो यह कि उनका बयान ही बिलकुल अप्रासंगिक है. देश उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता होने के साथ फिलहाल टीम अन्ना के सदस्य के रूप में ही जानता है जिन्हें आज भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण देश में काफी ख्याति मिली है. लेकिन बयान देते हुए अन्य बातों के अलावा भूषण यह भी भूल गए कि कुछ दिन पहले ही अन्ना ने ये बयान दिया था कि अफजल-कसाब को सरेआम चौराहे पर फांसी पर लटका देना चाहिए. तो ऐसे समय में जब संसद पर हमला कर भारत के मर्म पर प्रहार करने वाले अफजल को मुक्त कर देने के प्रस्ताव पर कश्मीर विधान सभा में चर्चा हो रहा हो. सारी दुनिया की नज़र इस प्रस्ताव के बहाने कश्मीर पर हो, वैसे में इस तरह देश का पक्ष कमज़ोर करने वाला बयान देने को कौन उचित तो नहीं कहा जा सकता है.
अमेरिका में ‘फाई’ के गिरफ्तार होने के बाद यह खुलासा हुआ है कि भारत के बुद्धीजीवी और प्रतिष्ठित स्तंभकार आदि बकायदा देश विरोधी सेमिनारों में जा भुगतान पाते रहे हैं. तो ऐसे में आप लोकपाल के मुद्दे पर प्रतिष्ठा हासिल करें और उसका उपयोग पाकिस्तान का पक्ष मज़बूत करने में करें, इसे कौन जायज़ ठहरा सकता है? यह तथ्य है कि जहां सरदार पटेल के प्रयासों के कारण आज सैकड़ों पूर्व रियासत भारत के अभिन्न अंग बने हुए हैं वहां देश, कश्मीर पर पंडित नेहरू द्वारा किये गए एक भूल का खामियाजा आज तक भुगत रहा है. यह सच है पं. नेहरु ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य मंचों पर यह वादा किया था कि कश्मीरी अवाम का मत जानने के लिए जनमत संग्रह कराया जाएगा. लेकिन तब से अब तक झेलम चिनाब और रावी में न केवल काफी पानी बल्कि देशभक्तों का खून भी काफी बह चुका है. भारतीय संसद भी तब से लेकर अब तक एकाधिक बार कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा होने से संबंधित प्रस्ताव पास कर चुका है. और आखिरकार दुनिया में सबसे ज्यादा साख प्राप्त भारतीय चुनाव प्रणाली के अंतर्गत हुए चुनाव भी तो जनमत संग्रह ही हुआ करता है.
आजादी के बाद से अब तक जम्मू-कश्मीर में हुए दर्ज़नों चुनावों में वोट चाहे जिस भारतीय उम्मीदवार के पक्ष में पड़ा हो लेकिन जीता तो अंततः वहां बार-बार भारतीय लोकतंत्र ही है. तब से अब तक पड़े हर वोट अंततः भारत के पाले में ही तो आये हैं. तो ऐसे में सत्तर साल पुराने किसी सन्दर्भ कि ओट ले कर केवल प्रसिद्धि के लोभ में या ‘फाई काम्प्लेक्स’ का शिकार होकर देश को अस्थिर करने वालों पर कारवाई तो किया ही जाना चाहिए. संविधान में वर्णित अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगे युक्ति-युक्त प्रतिबन्ध के आलोक में सीधे तौर पर देश द्रोह मान कर इस अभिव्यक्ति को दण्डित कर ही अपनी ही ज़मीन से खदेडे गए कश्मीरी अवाम, मारे-पीटे-बलात्कृत किये गए कश्मीरी पंडितों के अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा होना संभव है.
सवाल ये नहीं है कि ऐसे किसी जनमत संग्रह में परिणाम क्या आ सकता है. बार-बार वहां हुए स्वतंत्र सर्वेक्षणों में भी यह बात सामने आयी है कि बहुसंख्य कश्मीरी भारत में ही अपना भविष्य सुरक्षित देखते हैं. लेकिन अगर एक बार ऐसे किसी जनमत संग्रह को मंज़ूर कर लिया गया तब देश के हर कोने में ऐसी मांग उठाने वाले फाई के पे-रोल पर काम करने वालों की तो लंबी ज़मात है. जहां भी थोड़े भी असंतोष की स्थित है बस वहां ये जनमत का राग अलापना शुरू कर देंगे. हाल में यह बात अधिकृत रूप से सामने आयी कि भारत को चीन के रणनीतिकार तीस टुकड़े में बांटना चाहते हैं. पाकिस्तान तो हज़ार टुकड़े से कम पर मानने को तैयार ही नहीं है. पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे राज्य आतंकवाद और अलगाववाद के शिकार हैं. भारत के ह्रदय क्षेत्र में आज आंतरिक सुरक्षा पर गंभीर चुनौती बन नक्सली मौजूद हैं जो घोषित रूप से देश में लोकतंत्र का खात्मा चाहते हैं. हाल ही में एक नक्सली रणनीतिकार विनायक सेन को छत्तीसगढ़ में देश द्रोह के अपराध में उम्र कैद की सज़ा भी सुनायी गयी है. लेकिन विडंबना ही है कि अफजल-कसाब को बिरयानी खिलाने वाली केन्द्र सरकार ने सेन को सजायाफ्ता होते हुए भी योजना आयोग जैसे प्रतिष्ठित संस्था की कमिटी में सदस्य नामज़द कर दिया है.
तो आज ज़रूरत इस बात का है कि केन्द्र सरकार अपना ढुलमुल रवैया छोड़ सीधे तौर पर कड़े कदम उठाये. संविधान और भारतीय क़ानून में भोंडी अभिव्यक्ति को दंडित करने के पर्याप्त प्रावधान हैं, उसका उपयोग नहीं करने का खामियाजा देश को उसी तरह लंबे समय तक भुगतना पड़ सकता है जैसे सत्तर साल से हम पं. नेहरु की उस एक जनमत संग्रह कराने की बात कहने की गलती का भुगत रहे हैं.
लेखक पंकज झा भाजपा की छत्तीसगढ़ राज्य इकाई के मुखपत्र का संपादन करते हैं.






