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मनमोहन सिंह को बंदर कैसे कह सकते हैं गड़करी?

नितिन गड़करी नहीं सुधरेंगे। सुधरेंगे तो अजित पवार भी नहीं। पवार चाहे पेशाब से नदियां भरने की बात कहें या कुछ और…। लेकिन अजित पवार और उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से कमसे कम देश को तो कोई बहुत उम्मीद नहीं है। पवार अकड़ू टाइप के आदमी हैं, और वे कुछ भी बोलें तो उनके बोलने के कोई बहुत बड़े राजनीतिक अर्थ नहीं होते। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से जिस भी तरीके से घर आने को मजबूर हुए हों, फिर भी नितिन गड़करी से कुछ उम्मीद अब भी बाकी है। मगर लग रहा है कि बोलने के मामले में उनसे भी उम्मीद पालना किसी बेवकूफी से कम नहीं है।

नितिन गड़करी नहीं सुधरेंगे। सुधरेंगे तो अजित पवार भी नहीं। पवार चाहे पेशाब से नदियां भरने की बात कहें या कुछ और…। लेकिन अजित पवार और उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से कमसे कम देश को तो कोई बहुत उम्मीद नहीं है। पवार अकड़ू टाइप के आदमी हैं, और वे कुछ भी बोलें तो उनके बोलने के कोई बहुत बड़े राजनीतिक अर्थ नहीं होते। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से जिस भी तरीके से घर आने को मजबूर हुए हों, फिर भी नितिन गड़करी से कुछ उम्मीद अब भी बाकी है। मगर लग रहा है कि बोलने के मामले में उनसे भी उम्मीद पालना किसी बेवकूफी से कम नहीं है।

वैसे भी बोलने के मामले में नितिन गड़करी का रिकॉर्ड कोई खास अच्छा नहीं है। गड़करी के बोलने की बात करें तो बोलने को मिलते ही बोलते बोलते पता नहीं क्या क्या बोलने लग जाएंगे, कोई बोल नहीं सकता। बीजेपी के ये पूर्व अध्यक्ष महोदय पिछले दिनों उज्जैन में थे। वहां कार्यकर्ता सम्मेलन में गड़करी जब बोलने लगे, तो बहुत कुछ बोले और बोलते बोलते हमारे सरदारजी पर चढ़ बैठे। गड़करी ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के पीएम पद पर लगातार नौ सालों से बिराजमान होने का रिकॉर्ड कायम करनेवाले हमारे माननीय प्रधानमंत्री सरदार श्री मनमोहन सिंह साहब पर खूब फब्तियां कसीं। यहां तक कि उनको गूंगा बंदर तक कह डाला।

अरे भैया, हमारे पीएम  भले ही कुछ भी हैं… पर वे सरदार हैं और आदमी हैं। लेकिन बंदर तो कम से कम नहीं हैं। किसी भी देश का पीएम बंदर नहीं हो सकता। आप और हम जैसे सवा सौ करोड़ लोगों के देश का पीएम कोई बंदर कैसे हो सकता है। इतने साल हो गए, हमारे सरदारजी को अपन भी कई बार मिले। मुरली देवड़ा की मेहरबानी से अपन सबसे पहले उनसे तब मिले थे, जब वे रिजर्व बैंक के गवर्नर से रिटायर हो रहे थे। उसके बाद दूसरी मेहरबानी भी मुरली देवड़ा की ही थी, जो उनने सरदारजी के साथ खाना खाने के लिए अपने को होटल रिट्ज बुलाया था। उस दिन सरदारजी से खूब सारी बातें भी की थी। उसके बाद भी कमसे कम दो दफा सरदारजी के साथ कुछ घंटे बिताने का अवसर मुरली देवड़ा के सौजन्य से ही मिला। लेकिन अपने को तो वे कहीं से भी बंदर नहीं लगे। हां, दाढ़ी होने और पगड़ी पहने सरदार जरूर लगे। लेकिन बंदर तो बिल्कुल भी नहीं।

नीतिन गड़करी पता नहीं कौनसा चश्मा पहनते हैं कि उनको कोई अच्छा खासा मनुष्य भी बंदर दिखने लगता है। अपन नहीं जानते कि नीतिन गड़करी कब विदेश गए और वहां जाकर उनको सरदारजी की छवि खोजने की जरूरत क्यों पड़ी। लेकिन गड़करी बोले कि विदेशों में भी हमारे पीएम मनमोहन सिंह की गूंगे बंदर की ही छवि है। वैसे कहा जा रहा है कि यह जुबान फिसलने का मामला है। लेकिन गड़करी कोई बच्चे तो है नहीं कि बार बार फिसल जाएं। वे विषय से सरक जाते हैं और अप्रांसंगिक बोलने लग जाते हैं। कभी महिलाओं के सम्मेलन में, बीजेपी जिनके आदर्शों पर चलती है, वे उन महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद की तुलना दाऊद इब्राहिम जैसे कुख्यात अपराधी से कर कर बैठते हैं। तो कभी कॉमनवेल्थ घोटाले पर बोलते हुए हमारे सरदारजी को गांधीजी का बंदर बता देते हैं। और कभी दिल्ली में कार्यकर्ताओं की बैठक में बोलते बोलते चोरों, पॉकेटमारों को पार्टी में शामिल होने का न्यौता भी दे देते हैं।

इससे पहले अपने उवाच में गड़करी ने कांग्रेस के सारे नेताओं को सोनिया गांधी का नौकर तक कह डाला था। राजनीति में तीखी से तीखी बात भी बहुत शालीन और बेहद सुसंस्कृत भाषा में कहने का रिवाज रहा है। लेकिन नितिन गड़करी को यह नहीं आता। गड़करी को अगर अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे राष्ट्रीय नेताओं से भाषा और भाषण वगैरह सीखने में शर्म आ रही हो तो हमारे राजस्थान के गुलाबचंद कटारिया और वसुंधरा राजे जैसे उनकी पार्टी के शानदार बोलने वाले उनकी बराबरी के लोगों से ही सीख सकते हैं। किसी को कई दिक्कत नहीं होगी। कुछ सीखिए गड़करी महाराज!

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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