नई दिल्ली। पाकिस्तान की मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई पर हमले के लिए क्या बीबीसी की उर्दू सेवा जिम्मेदार है? यह सवाल इन दिनों पाकिस्तान में बहस का मुद्दा बना हुआ है। दरअसल, बीबीसी की उर्दू सेवा के लिए डायरी लिखने को मलाला पर हमले का प्रमुख कारण माना जा रहा है। लड़कियों की शिक्षा की वकालत करती यह डायरी उसने 2009 में लिखी थी जब स्वात घाटी तालिबान के नियंत्रण में थी।
उस समय मलाला कक्षा चार की छात्रा थी और उसने गुल मकाई के नाम से तालिबान के शासन में जिंदगी को लेकर डायरी लिखना शुरू किया था। उस समय तालिबान ने लड़कियों की शिक्षा को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया था। मलाला से डायरी लिखवाने के फैसले पर कहा जा रहा है कि बीबीसी ने जानबूझ कर मलाला, उसके परिजनों और स्कूल जाने वाली कई लड़कियों की जान को जोखिम में डाला। बीबीसी से पूछा जा रहा है कि उसने पाकिस्तान के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन के खिलाफ डायरी लिखवाने के लिए एक बच्ची को क्यों चुना? क्या बीबीसी का यह फैसला पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों के अनुरूप था? क्या उसने बच्ची से डायरी लिखवाने के लिए उसके माता-पिता से इजाजत ली थी? क्या बीबीसी ने उसका नाम सार्वजनिक न करने का आश्वासन दिया था?
संभव है कि उस समय 12 साल की मलाला ने डायरी लिखने की बात अपनी सहेलियों के साथ साझा की हो। क्या बीबीसी ने इस ओर ध्यान दिया था? ब्लॉग लिखवाने के लिए बीबीसी ने किसी वयस्क टीचर से संपर्क क्यों नहीं किया? बीबीसी ने मलाला पर हमले के बाद उसकी लिखी डायरियों को उसके वास्तविक नाम से क्यों प्रकाशित किया? इन जैसे ढेरों सवाल इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए है। वहीं मलाला को मीडिया में मिल रहे कवरेज के बाद तालिबान ने मीडिया कर्मियों को निशाना बनाने की धमकी दी है। इसमें पाकिस्तान में कार्यरत बीबीसी के कर्मचारी मुख्य रूप से निशाने पर होंगे। इस धमकी से पाकिस्तानी पत्रकारों में डर व्याप्त है। पाकिस्तान में पिछले एक दशक में 80 पत्रकार मारे जा चुके हैं। (जागरण)