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महिलाओं की लड़ाई लड़ने के लिए इस अखबार को निकालती हैं महिलाएं

आर्थिक रूप से पिछड़े हुए तबके की महिला होने के नाते ग्रामीण इलाके में एक समाचार पत्र स्थापित करना कितना मुश्किल था? 'खबर लहरिया' की 40 वर्षीय प्रधान संपादक मीरा से मैंने यही सवाल किया। उन्होंने एक शिक्षक की तरह जवाब दिया, 'उतना ही मुश्किल जितना दुनिया में कहीं भी किसी भी अन्य पत्रकार के लिए हो सकता है। फिर भी कहा जाता है कि पत्रकारिता आसान है।' लेकिन यह उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित बुंदेलखंड है जो देश के सबसे पिछड़े  इलाकों में से है। यहां का समाज बिलकुल अलग है, राजनीतिक और आर्थिक शक्तियां भी ऐसी हैं कि यहां किसी संवाददाता के लिए काम करना आसान नहीं है। इस इलाके से खबर निकालने का मतलब है शक्तिशाली राजनीतिज्ञों से लोहा लेना।

आर्थिक रूप से पिछड़े हुए तबके की महिला होने के नाते ग्रामीण इलाके में एक समाचार पत्र स्थापित करना कितना मुश्किल था? 'खबर लहरिया' की 40 वर्षीय प्रधान संपादक मीरा से मैंने यही सवाल किया। उन्होंने एक शिक्षक की तरह जवाब दिया, 'उतना ही मुश्किल जितना दुनिया में कहीं भी किसी भी अन्य पत्रकार के लिए हो सकता है। फिर भी कहा जाता है कि पत्रकारिता आसान है।' लेकिन यह उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित बुंदेलखंड है जो देश के सबसे पिछड़े  इलाकों में से है। यहां का समाज बिलकुल अलग है, राजनीतिक और आर्थिक शक्तियां भी ऐसी हैं कि यहां किसी संवाददाता के लिए काम करना आसान नहीं है। इस इलाके से खबर निकालने का मतलब है शक्तिशाली राजनीतिज्ञों से लोहा लेना।

जाहिर है ऐसे अखबार के लिए बहुत कम गुंजाइश बनती है जो पूरी तरह दलित, मुस्लिम और आदिवासी समुदाय की महिलाएं चलाती हैं। अखबार की एक क्षेत्रीय संपादक ने कहा, 'हमने खुद के लिए एक अलग तरह का अखबार शुरू किया। इसकी शुरुआत वर्ष 2002 में की गई थी। आप यकीन करें, हम 'पेड न्यूज' के बिलकुल खिलाफ हैं। हम ऐसे विज्ञापन लेने से भी मना कर देते हैं, जिनकी सामग्री हमारी नीतियों के खिलाफ होती हैं।' जब एक स्थानीय गुंडे ने अपनी हथियारों की दुकान का विज्ञापन देने के लिए खबर लहरिया से संपर्क किया तो हमने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। आठ पृष्ठों वाली साप्ताहिक पत्रिका 'बुंदेली फॉर न्यूज वेव्स' दिल्ली स्थित जेंडर एवं शिक्षा केंद्र 'निरंतर' के दिमाग की उपज है, जिसकी शुरुआत क्षेत्र में साक्षरता के प्रयोग के तौर पर की गई थी।

निरंतर की परियोजना समन्वयक दिशा मलिक कहती हैं, 'हमने महसूस किया कि यहां की महिलाएं साक्षर हैं, लेकिन उनके पास पढऩे लायक सामग्री कम है।' वे राष्ट्रीय अखबारों के क्षेत्रीय संस्करणों के साथ भी खुद को नहीं जोड़ सकती थीं क्योंकि भाषाई दिक्कत आती है। ऐसे अखबारों में उनकी समस्याओं पर भी कम ध्यान दिया जाता था। इन नव साक्षरों की जरूरतें पूरी करने का बुंदेली और बज्जिका जैसी स्थानीय भाषाओं में निकलने वाला अखबार एकमात्र उपाय नजर आया। इसकी शुरुआत आठ महिलाओं ने मिलकर की थी, लेकिन अब वे बढ़कर 29 हो गई हैं। ये महिलाएं खबरें लिखने समेत अखबार के सभी काम करती हैं।

उन्हें कंप्यूटर की बुनियादी जानकारी दी गई है, वे लेआउट बनाने, डिजाइन तैयार करने और तस्वीरों को जरूरत के हिसाब से तैयार करने के लिए एडोबी पेजमेकर और फोटोशॉप का इस्तेमाल करती हैं। कंप्यूटर पर तैयार अखबार के पन्ने प्रिंट के लिए चले जाने के बाद ये महिलाएं ही विपणन एजेंट का काम भी करती हैं। वे उत्तर प्रदेश के चित्रकूट, बांदा एवं महोबा और बिहार के सीतामढ़ी जिले के 700 गांवों के लगभग 30,000 पाठकों तक अखबार पहुंचाने की व्यवस्था करती हैं। काम यहीं खत्म नहीं होता, संवाददाताओं को विज्ञापन भी लाना होता है और डिजाइन भी तैयार करना होता है। इसमें राष्ट्रीय राजनीति को बहुत कम तरजीह दी जाती है।

पहले चार पृष्ठों पर भी स्थानीय गांवों और जिलों से संबंधित खबरों की प्रमुखता रहती है। इन खबरों का जोर मनरेगा और मिड डे मिल जैसे कार्यक्रमों पर रहता है। ज्यादातर छोटे प्रकाशनों के संवाददाताओं पर हल्के-फुल्के फायदे के लिए काम करने के आरोप लगते रहते हैं, लेकिन खबर लहरिया के वरिष्ठ पत्रकार यह सुनिश्चित करती हैं कि ऐसी शिकायत न आए। इन दलित महिलाओं को अखबार की नौकरी से खुद को सशक्त बनाने और अपने तरीके से जीने में मदद मिली है। संवाददाताओं को 4,000-12,000 रुपये वेतन मिलता है। शिवदेवी दो वर्ष पहले शादी के हिंसक बंधन से मुक्त होने के बाद इस अखबार से जुड़ी थीं। अखबार की सबसे युवा संवाददाता 19 वर्षीय सुनीता पहले पत्थर खदान में काम करती थीं। पति से अलग रहने वाली लक्ष्मी कहती हैं, 'रिपोर्टिंग करने से हमारा आत्मविश्वास बढ़ा है।' उन्होंने अपने दो बच्चों को मायके भेज दिया है, ताकि काम पर ध्यान दे सकें।

शुरुआत में 'निरंतर' ऐसी महिलाओं की मदद करता था, घरेलू प्रताडऩा सहती थीं। उनके पति नहीं चाहते थे कि बीवियां देर रात तक काम करें। दिशा कहती हैं, 'लेकिन कई ऐसी संवाददाता भी हैं, जो परिवार की एकमात्र कमाऊ हैं और ज्यादातर के पति उनका साथ देते हैं।' अखबार की कीमत 2 रुपये है, जिससे मुनाफा नहीं होता और विज्ञापन भी नहीं मिलता है। स्थानीय ब्रांड भी विज्ञापन नहीं देते हैं। ज्यादातर विज्ञापन गांव के प्रधान, ब्लॉक स्तर के अधिकारियों, छोटे दुकानदारों और व्यापारियों की तरफ से दिए जाते हैं, जिनके लिए 200 रुपये से लेकर 5,000 रुपये तक भुगतान किया जाता है। इससे खबर लहरिया के अस्तित्व को गंभीर चुनौती आई है। अखबार के हर संस्करण पर सालाना 20 लाख रुपये का खर्च आता है और वितरण और विज्ञापन राजस्व से लगभग 96,000 रुपये की ही आमदनी होती है। लेकिन इसके संवाददाताओं को वर्ष 2004 में चमेली देवी जैन पुरस्कार मिला था और वर्ष 2008 में खबर लहरिया स्वतंत्र महिलाओं के सामूहिक मीडिया के तौर पर पंजीकृत हुआ। निरंतर ने संयुक्त राष्ट्र लोकतंत्र कोष और दोराबजी टाटा फंड से करार किया है, ताकि अखबार निकालने के लिए अगले दो वर्ष तक की वित्तीय जरूरतें पूरी की जा सकें। लेकिन इसकी विस्तार योजना (लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी में अवधी और भोजपुरी संस्करण) को देखते हुए इसे ऐसा मॉडल अपनाना पड़ेगा, जिसकी बदौलत यह आत्म निर्भर बन सके।

बीएस के लिए मनीषा पांडेय की रिपोर्ट.

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