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मीडिया के खिलाफ एकजुट दिखे सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद

मीडिया के खिलाफ जनप्रतिनिधियों और नेताओं के मन में कितना मलाल है यह यूपी विधानसभा की कार्रवाई के दौरान देखने को मिला. आज तक चैनल पर मुजफ्फरनगर दंगों पर किए गए स्टिंग के जांच के लिए बनाई गई समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सदन के समक्ष पेश की. इसमें चैनल को रा फुटेज न देने तथा अन्‍य आरोप लगाते हुए अवमानना का आरोपी बताया गया. सदन ने इसे स्‍वीकार करते हुए आजतक, हेडलाइंस टुडे, सुप्रिय प्रसाद तथा चैनल के लिए स्टिंग करने वाले चैनल के रिपोर्टर तथा कैमरामैन को अवमानना के तहत दोषी पाया तथा कार्रवाई का प्रस्‍ताव पास किया.

मीडिया के खिलाफ जनप्रतिनिधियों और नेताओं के मन में कितना मलाल है यह यूपी विधानसभा की कार्रवाई के दौरान देखने को मिला. आज तक चैनल पर मुजफ्फरनगर दंगों पर किए गए स्टिंग के जांच के लिए बनाई गई समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सदन के समक्ष पेश की. इसमें चैनल को रा फुटेज न देने तथा अन्‍य आरोप लगाते हुए अवमानना का आरोपी बताया गया. सदन ने इसे स्‍वीकार करते हुए आजतक, हेडलाइंस टुडे, सुप्रिय प्रसाद तथा चैनल के लिए स्टिंग करने वाले चैनल के रिपोर्टर तथा कैमरामैन को अवमानना के तहत दोषी पाया तथा कार्रवाई का प्रस्‍ताव पास किया.

खैर, यह तो रहा स्टिंग के बारे में सदन की कार्रवाई. पर दूसरा पक्ष यह रहा कि इस मामले पर भाजपा को छोड़कर सारा पक्ष-विपक्ष एकजुट दिखा. बसपा, कांग्रेस, रालोद समेत सभी दल सदन में चौथे स्‍तंभ के खिलाफ नजर आए. सपा के सबसे बड़े विरोधी बसपा के नेता स्‍वामी प्रसाद मौर्य का गुस्‍सा मीडिया के खिलाफ पूरी तरह झलका. वे स्टिंग में दोषी बनाए गए आजम खान के पक्ष में खुलकर बोलते दिखे. कांग्रेस के नेता प्रदीप माथुर एवं रालोद के नेता ठाकुर दलबीर सिंह ने भी मीडिया को अपने हद में रहने की नसीहतें दीं.

हां, इस दौरान इस मामले का भाजपा ने खुलकर विरोध किया. भाजपा विधायक दल के नेता हुकुम सिंह एवं प्रदेश अध्‍यक्ष डा.लक्ष्‍मीकांत बाजपेयी ने इसे एकतरफा कार्रवाई मानते हुए संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट आने तक इंतजार करने की बात कही. उन्‍होंने जांच समिति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें भाजपा का सदस्‍य नहीं था, इसके बावजूद समिति अंतरिम रिपोर्ट पेश कर रही है. भाजपाई वेल में आकर अपना विरोध भी दर्ज कराया, लेकिन बहुमत साथ नहीं होने के चलते उनकी मांग दब गई.

मंत्री अंबिका चौधरी तो स्टिंग को ही फर्जी बता दिया. इस मामले से साफ दिखा कि हर प्रकार के गलत सही काम करने वाले नेता मीडिया से कितने खफा हैं. वे मीडिया को किस हद तक पालतू बनाकर रखना चाहते हैं. कुछ चाटूकार टाइप के पत्रकार स्‍वलाभ के लिए ज्‍यादातर भ्रष्‍ट नेताओं की दल्‍लागिरी करते हैं. इसके चलते भी मीडिया की गरिमा गिरी है. खासकर मीडिया में दबदबा रखने वाले एक खास जाति के दल्‍ले पत्रकारों ने पत्रकारिता को यूपी में बेच डाला है. लखनऊ में ही पत्रकारों के कई ऐसे नाम हैं जो सियासी हलकों में दल्‍लों के रूप में पहचाने जाते हैं. इनकी हर सरकार से बनती है. इन्‍हीं दल्‍लों की वजह से पत्रकारिता की गरिमा कम हो रही है और पत्रकार और मीडिया नेताओं के निशाने पर आ रही है. 

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