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मीडिया को अभिनेत्रियों के कम कपड़े की चिंता है, उन महिलाओं की फिक्र नहीं जिनके पास तन ढंकने को कपड़े नहीं

अगर मुझसे पूछा जाए कि अमृत और स्याही में से तुम क्या लेना पसंद करोगे तो मैं हर बार स्याही को ही चुनूंगा, ताकि यह कलम के जरिए उजाले की ताकत बन सके। उजाले से मेरा मतलब दुनिया को अच्छाई से रोशन करने वाली सभी कोशिशों से है। मेरा जन्म राजस्थान के झुंझुनूं जिले के एक छोटे-से गांव कोलसिया में हुआ। बुजुर्गों से मालूम हुआ कि वह साल 1987 था। भयंकर अकाल का साल। सही वक्त मुझे याद नहीं, तब मैं बहुत छोटा था और बड़ों ने जानने की कोशिश नहीं कि क्योंकि घड़ी रखने का सौभाग्य तब हर किसी को नहीं मिलता था। तारीख थी 6 अगस्त, हिरोशिमा बम कांड की बरसी।

अगर मुझसे पूछा जाए कि अमृत और स्याही में से तुम क्या लेना पसंद करोगे तो मैं हर बार स्याही को ही चुनूंगा, ताकि यह कलम के जरिए उजाले की ताकत बन सके। उजाले से मेरा मतलब दुनिया को अच्छाई से रोशन करने वाली सभी कोशिशों से है। मेरा जन्म राजस्थान के झुंझुनूं जिले के एक छोटे-से गांव कोलसिया में हुआ। बुजुर्गों से मालूम हुआ कि वह साल 1987 था। भयंकर अकाल का साल। सही वक्त मुझे याद नहीं, तब मैं बहुत छोटा था और बड़ों ने जानने की कोशिश नहीं कि क्योंकि घड़ी रखने का सौभाग्य तब हर किसी को नहीं मिलता था। तारीख थी 6 अगस्त, हिरोशिमा बम कांड की बरसी।

मेरी पढ़ाई की शुरुआत गांव के सरकारी स्कूल से हुई। उन दिनों अध्यापकों की ‘मदर इंडिया’ फिल्म के इस संवाद में गहरी आस्था थी कि – बिना मुर्गा बने विद्या नहीं आती, लेकिन मुर्गा बनने और मास्टर जी की छड़ी का स्वाद चखने के अवसर मेरे जीवन में न के बराबर आए, फिर भी उनका खौफ बराबर बना रहा। स्कूल में मेरे एक शिक्षक श्रवण कुमार जी ने एक दिन मुझसे कहा – तुम पढ़ाई में अच्छे हो, लिखने में भी बुरे नहीं हो। आज से तुम प्रार्थना सभा में अखबार पढ़कर सुनाया करो। उनका यह हुक्म मेरे लिए किसी सुनामी से कम नहीं था। मैंने कोई बहाना याद करना चाहा, पर अक्ल साथ नहीं दे रही थी। लिहाजा ठीक आधा घंटे बाद मेरी पेशी हुई और मैंने राजस्थान पत्रिका से खबरें पढ़कर सुनाई।

फिर एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि तुम इस अखबार के संपादक के नाम चिट्ठी लिखकर भेजा करो। बात मुझे ठीक लगी, मैंने लिखी और वह प्रकाशित हुई। मैं मेरे गांव का पहला व्यक्ति हूं जिसका कोई पत्र अखबार में छपा था। सर्दियों के दिन थे, इसलिए मैंने मित्रों को गुड़ की दावत दी। उन दिनों मेरे दिमाग में एक विचार आया कि हमारे गांव में ताश खेलने वालों के लिए निर्धारित जगह है, शराब पीने वालों के लिए भी इंतजाम हैं, लेकिन विद्यार्थियों के लिए ऐसी कोई जगह नहीं जहां वे स्कूल के अलावा बैठकर पढ़ाई कर सकें। मैंने इसका समाधान तलाशा और कुछ दिनों बाद ही एक लायब्रेरी शुरू की। समझदार और बड़े लोगों ने हमारी इस कोशिश की खिल्ली उड़ाई, लेकिन हमें नहीं मानना था, इसलिए नहीं माने। लायब्रेरी का नियम यह था कि कोई भी, उसका इंसान होना अनिवार्य है, वह सदस्य बन सकता है। अगर चाहे तो अपनी कुछ किताबें दे सकता है और न चाहे तो कोई पाबंदी नहीं। हमारी लायब्रेरी चल निकली। उधर विरोध में कुछ नरमी आई।

कुछ दिन बीते। दिन महीने और साल बने। पढ़ाई के सिलसिले में मुझे जयपुर आना पड़ा। मैं नेचुरोपैथी का कोर्स कर रहा था। इस दौरान लिखने का सिलसिला बदस्तूर जाती रहा। मेरे कई पत्र छप चुके थे और एक बड़ा लेख गीता प्रेस की कल्याण पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ। गांव से सैकड़ों मील दूर आने के बाद भी यह मेरे सपनों में हमेशा जिंदा रहा। लायब्रेरी, जिसमें हजारों किताबें थीं, अब उसे संभालने वाला कोई नहीं था। मैं रोज रात को डायरी में लिखी बातों को पढ़ता और गांवों के बारे में कई योजनाएं बनाता। मैं जानता था कि इस काम में पैसों की भी जरूरत होगी लेकिन मैंने फैसला किया कि किसी से भी आर्थिक मदद नहीं लूंगा और पैसों का इंतजाम खुद ही करूंगा। उन दिनों मैं नेचुरोपैथी की ट्रेनिंग कर रहा थ। बता दूं कि यह कोर्स मुझे एक हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद करना पड़ा। पहले मैंने इससे इलाज कराया था। योजनाएं कई थीं लेकिन आर्थिक जरिया कोई नहीं। जितने पैसे घर से मिलते उनसे किसी तरह पेट पूरा हो सकता था, सपने नहीं। एक दिन मालूम हुआ कि एक नामी अखबार में भर्ती निकली है। आर्थिक जरूरतों के लिए मैं यह काम करना चाहता था। मैंने आवेदन किया, परीक्षा दी और चुन लिया गया।

करीब दो साल तक वहां काम किया। इस दौरान मैंने ग्रामीण भारत की जरूरतों और युवाओं की समस्याओं पर काफी जानकारी हासिल की। मैंने पाया कि गांवों की सभी समस्याओं की वजह है जानकारी का अभाव। युवाओं को नहीं मालूम कि उन्हें क्या पढ़कर क्या करना चाहिए, इसीलिए वे बेरोजगार हैं और गांव के आम लोगों को नहीं मालूम कि देश के कानून ने उन्हें क्या हक दिए हैं, इसीलिए वे भ्रष्टाचार के शिकार हैं और सरकारी बाबू उनसे ठीक तरह से बात भी नहीं करते। यही गरीबी की सबसे बड़ी वजह है जिससे दूसरी समस्याएं पैदा होती हैं और यही भेदभाव का कारण है।

मैं मेरी लायब्रेरी को शिक्षा का एक अहम जरिया बनाना चाहता था, इसलिए मैंने तय किया कि अब इसे नए सिरे से शुरू करना चाहिए। अब तक कुछ तकनीकी बातें भी सीख चुका था। मैंने इसे ऑनलाइन शुरू करने का फैसला किया और नया नाम रखा – लाइट हाउस लायब्रेरी। मैंने इंटरनेट के जरिए मेरी बात रखी तो कई लोगों ने इसमें दिलचस्पी ली। मैंने एक ऑनलाइन न्यूज लेटर भी शुरू किया जिसमें सकारात्मक जीवन की कहानियां और सेहत के बारे में जानकारी दी जाती है। मैं पूर्व में बता चुका हूं कि एक दुर्घटना के बाद मेरी सेहत काफी खराब हो चुकी थी। दवाइयों के असर से मेरे बाल लगभग उड़ चुके थे। मैंने नेचुरोपैथी में खुद के स्तर पर कई प्रयोग किए। कई नुस्खों पर गौर किया और उनसे कुछ उत्पाद बनाए। उनमें से एक केश तेल भी था, जिससे मेरे काफी बाल वापिस आ गए। बाद में मैंने यह उत्पाद अफगानिस्तान तक भेजा। मैं सुबह अखबार के दफ्तर में काम करता और देर रात को मेरे प्रयोग करता। मैंने चर्म रोग, कफ रोग, दमा और मधुमेह पर प्रयोग किए और उनमें काफी हद तक कामयाबी भी मिली। मैं दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिका कंस्यूमर वॉयस की संपादक रूपा वाजपेयी जी का अत्यंत आभारी हूं, जिन्होंने अपनी पत्रिका में मेरा कॉलम शुरू किया और वह निरंतर प्रकाशित हो रहा है। नेचुरोपैथी पर मेरा एक लेख अफगानिस्तान के काबुल से प्रकाशित होने वाले मशहूर आउटलुक अफगानिस्तान में भी संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ।

मेरा विचार अब एक ऐसा लघु उद्योग शुरू करने का है, जो सिर्फ पैसे कमाने के बजाय गांवों की ताकत बन सके। इसमें इंटरनेट की अहम भूमिका होगी। अगले चरण में मैं लायब्रेरी के जरिए स्कूलों पर आधारित एक न्यूज लेटर शुरू करना चाहता हूं। इसके लिए मैं स्कूलों और शिक्षकों से संपर्क करूंगा। अगर जरूरी हुआ तो बच्चों को इंटरनेट और ईमेल का उपयोग करना भी सिखाऊंगा। अक्सर देश की आर्थिक ताकत का जायजा लेने के लिए शेयर बाजार के आंकड़ों की उड़ान, शहरों में ऊंची होती इमारतों के कद, जहरीला होता धुआं, आयात-निर्यात के बोझिल समीकरणों पर बहस और फैशन समारोह में जुटी फिल्मी हस्तियों की बात की जाती है, लेकिन देश के छह लाख से ज्यादा गांव इससे गायब रहते हैं। हमारे मीडिया को उन अभिनेत्रियों की बेहद चिंता है, जिनके जिस्म पर बेहद कम कपड़े हैं, लेकिन उन महिलाओं की कोई फिक्र नहीं जिनके पास तन ढंकने के लिए कपड़े नहीं। मीडिया को किसी खिलाड़ी के शतक का इंतजार है लेकिन वह आदमी उनकी सुर्खियों से हमेशा गायब रहता है जो दिनभर में सौ रुपए भी नहीं कमा पाता और एक दिन आत्म हत्या करता है। यही वजह है कि 2013 का भारत 1913 की समस्याओं से जूझ रहा है और इसके लिए मीडिया अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता। दूसरों को आईना दिखाने से पहले खुद तो देख लीजिए, यकीन कीजिए, हमारे चेहरे पर भी इतने दाग हैं जिन्हें धोने को शायद गंगा भी मना कर दे।

लेखक राजीव शर्मा पत्रकार एवं एक्‍टीविस्‍ट हैं. उनसे संपर्क ईमेल [email protected] या मो. नं. 07737-224641 पर संपर्क कर सकते हैं.

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