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लखनऊ में जनता से ज्‍यादा हो चुकी है पत्रकारों की आबादी!

कुकुरमुत्‍तों की तरह उग आए छोटे-मोटे चैनलों ने लखनऊ की पत्रकारिता की वाट लगा डाली है. किसी भी राजनीतिक दल की पीसी हो, ऐसे ऐसे चैनल और अखबार के कथित पत्रकार पहुंच जाते हैं, जिनके संस्‍थानों का कोई अस्तित्‍व नहीं दिखता है.

कुकुरमुत्‍तों की तरह उग आए छोटे-मोटे चैनलों ने लखनऊ की पत्रकारिता की वाट लगा डाली है. किसी भी राजनीतिक दल की पीसी हो, ऐसे ऐसे चैनल और अखबार के कथित पत्रकार पहुंच जाते हैं, जिनके संस्‍थानों का कोई अस्तित्‍व नहीं दिखता है.

मंगलवार को भी इसी तरह का घटनाक्रम मारपीट का सबब बना. चैनल वन, साधना न्‍यूज, हमार टीवी, आजाद न्‍यूज, यूपी न्‍यूज, नेटवर्क10 जैसे तमाम चैनल हैं, जो कुछ महीनों में ही पैसों के लेन-देन में अपने पत्रकार या फिर फ्रेंचाइजी बदल डालते हैं. इसके बाद भी इन चैनलों के पुराने लोग माइक आईडी लेकर घूमते मिलते हैं. नए लोग जब देखते हैं तो भाजपा मुख्‍यालय पर हुई मारपीट की तरह भिड़ंत की पटकथा तैयार हो जाती है.

इन चैनलों के अलावा उसका खबर, इसका खबर, हई न्‍यूज, हऊ न्‍यूज, औना न्‍यूज, पौना न्‍यूज जैसे तमाम आईडी बड़े दलों की पीसी में दिखते रहते हैं. कई तो केवल कैमरा लेकर ही पत्रकार बने घूमते नजर आते हैं. ऐसे ही लोगों को पार्टी के नेता भी तव्‍वजो देते फिरते हैं. कहीं से किसी पीसी की सूचना मिली नहीं कि ये तथाकथित पत्रकार और चैनल कुकुरमुत्‍तों की तरह उग आते हैं. ऐसे लोगों के चलते इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के असली पत्रकार भी परेशान रहते हैं. पर मजबूरी है कि वे खुलकर विरोध नहीं करते कि बिना वजह नौटंकी होगी. 

बीजेपी में मोबाइल पत्रकारिता का एक दृश्‍य

इतना ही नहीं पीसी खतम होने के बाद ये लोग पहले तो आदमखोर कुत्‍तों की तरह नेताओं की बाइट लेने के लिए भौं-भौं करते हैं. यहां से छुटकरा मिलता है तो भूखे कौवों की तरह पीसी के बाद मिलने वाले डिब्‍बे को लेकर कांव-कांव करते हैं. नजारा ऐसा होता है जैसे भिखारियों की भीड़ बहुत दिन बाद मिले खाने के लिए टूट पड़ी हो. यहां को अखबारों तथा इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के जो वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, वे या तो किनारे हो जाते हैं या फिर बिना डिब्‍बा लिए निकल जाते हैं. ऐसी घटनाएं कांग्रेस, सपा, भाजपा की प्रेस कांफ्रेंस में अक्‍सर देखने को मिलती हैं. हां, बसपा नेता इन पत्रकारों को घास नहीं डालते हैं, लिहाजा उनके यहां तथाकथित पत्रकारों की कम भीड़ इकट्ठी होती है.  
 
किसी मंत्री, विधायक या सांसद की पीसी के बारे में पता चल जाए तो यह मधुमक्खियों का झुंड बिना बुलाए भनभनाते हुए वहां पहुंच जाता है. कई पत्रकार ऐसे होते हैं जो मोबाइल से वीडियो बनाते, टैबलेट से फोटो खिंचते नजर आते हैं. नेताओं का ध्‍यान भी बकायदे इन कथित बड़े पत्रकारों पर होता है. आगे से वे इन्‍हें असली और बड़ा पत्रकार मानते हुए भाव देना शुरू कर देते हैं. इसके बाद ये अपने लोगों को लाना शुरू करते हैं, इसके बाद कोई भी प्रेस कांफ्रेंस छोटी-मोटी सभा नजर आने है।

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