दुखी होता हूं जब कोई पत्रकार कहता है मुझे. परंतु बचपन में एक पत्रकार से मुलाकात हुई थी तब से अन्तःकरण में पत्रकार बनने का सपना पाले जीवन के अनेक उतार चढ़ाव को पार करते हुए बन गया पत्रकार. जब पत्रकार बना तो लगा कि मैं समाज के सारे कचरे के बारे में अपने लेखनी से लिख कर भूचाल ला दूंगा, परंतु सच्चाई कुछ और ही निकली. मैं हजार में नहीं बिकने को तैयार हुआ तो हम से उपर वाले का दाम लगा कर खररद लिया गया.
नहीं बिकने के कारण कुछ पत्रकार मेरे पीछे पड़ गये और एक दिन हो गयी तू तू-मैं मैं उनसे. मामला थाने पहुंच गया. आरोप लगा रंगदारी, लूट पाट का, जब थाने पहुंचा अपनी सफाई देने तो थानेदार ने कहा कि आपकी हम क्यों मदद करें, आप तो सच्चाई लिखते हैं और कमाई भी नहीं कराते, जबकि हमने आपसे कितनी बार कहा कि पार्टी को सीधे मुझसे मिलायें. आपने तो कभी मेरा कहा माना नहीं, उल्टे मेरे खिलाफ खबर हमेशा छापते रहे हैं. वो तो खबर भी नहीं छापते और कमाई भी कराते हैं.
एक पत्रकार द्वारा भेजा गए पत्र पर आधारित.






