: कानाफूसी : खोल सकते हैं जबरिया हस्ताक्षर के खिलाफ मुंह : न्याय नहीं मिला तो पीडि़त कर्मचारी भी कोर्ट जाने को तैयार : गत 29 अक्टूबर (सोमवार) को दैनिक जागरण (पटना) के ‘पाठकनामा’ स्तंभ में गांधी परिवार के संबंध में प्रकाशित आपत्तिजनक पत्र का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। अखबार के खिलाफ प्रदर्शन व पुतला दहन के बाद कांग्रेस ने तो चुप्पी साध ली है, लेकिन जिन कर्मचारियों पर गाज गिरी है, वे इसके लिए अपने को निर्दोष बताया है। अनेक जागरण कर्मी व्यवस्था बनाने वाले वरीय लोगों को दोषी करार दे रहे हैं। वे इस मामले को जागरण के शीर्ष प्रबंधन से लेकर अदालत तक में ले जा रहे हैं। साथ ही कांग्रेस आलाकमान को भी पत्र लिखकर यह बताया जा रहा है कि किस तरह वरीय लोगों ने खुद को बचाने के लिए निर्दोष लोगों की बलि ली है।
आपत्तिजनक पत्र के प्रकाशन के लिए प्रादेशिक प्रभारी रवीन्द्र पांडेय, यूनिट कोआर्डिनेटर अमित आलोक एवं फोरमैन व कंपोजीटर की जिम्मेदारी तय की गई है। 29 अक्टूबर को प्रकाशित आपत्तिजनक पत्र को लेकर उक्त कर्मियों से 'अनकंडीशनल इस्तीफा' मांगा गया था। लेकिन, प्रबंधन इसे लेने में नाकामयाब रहा। इन कर्मियों ने खुद को निर्दोष बताते हुए जांचोपरांत निर्दोष पाए जाने पर इस्तीफा पत्र अस्वीकृत करने की बात लिखते हुए अपना 'स्पष्टीकरण सह कंडीशनल इस्तीफा पत्र' सौंपा। सूत्र बताते हैं कि एक कर्मचारी से इस्तीफा लेने के लिए प्रबंधन के एक वरीय अधिकारी ने जबरदस्ती तक करने का प्रयास किया।
सूत्र बताते हैं कि इसके बाद इसके बाद एसोसिएट एडीटर सह स्टेट हेड शैलेंद्र दीक्षित एवं वरीय मुख्य महाप्रबंधक आनंद त्रिपाठी ने समाचार संपादक कमलेश त्रिपाठी को पाठकनामा के लिए कोई तकनीकी सिस्टम नहीं बनाने तथा सबकुछ मौखिक चलाने के लिए कड़ी फटकार लगाई। इस बीच कर्मियों के 'कंडीशनल' इस्तीफा पत्र को जागरण के नोयडा कार्यालय ने मंगवा लिया। इधर, पटना में जांच के नाम पर खानापूरी शुरू हुई। सूत्रों की मानें तो प्रबंधन द्वारा सौंपी गई जांच रिपोर्ट के अनुसार पत्र को 21 अक्टूबर को कंपोजिंग के लिए रवीन्द्र पांडेय ने बिना देखे दे दिया, जिसे कंप्यूटर आपरेटर ने भी बिना देखे कंपोज किया। यह फाइल 27 अक्टूबर को अमित आलोक के पास आई, जिन्होंने उसमें से केवल दो पत्रों को संपादित किया और शेष के ऊपर ‘असंपादित’ की नोटिंग लगाई। अगले दिन अमित आलोक का साप्ताहिक अवकाश था, जिस दिन रवीन्द्र पांडेय को फोरमैन ने कोई और फाइल पढ़ने के लिए दिया। फिर 28 अक्टूबर को फोरमैन ने बिना संपादन के लिए दिए असंपादित फाइल को ही पेज पर लगवा दिया।
इस बाबत जागरण के कुछ कर्मियों ने नाम नहीं बताने की शर्त पर जानकारी दी कि जिस दिन पाठकनामा के पत्रों को कंपोजिंग के लिए दिया गया, अमित आलोक अवकाश पर थे। पत्रों को कंपोजिंग के लिए रवीन्द्र पांडेय ने जरूर दिया, लेकिन यह दायित्व काम के बोझ से लदे प्रादेशिक डेस्क प्रभारी और मुख्य उपसंपादक स्तर के वरीय कर्मी से कराना तर्कसंगत नहीं था। इस फाइल की कंपोजिंग के बाद पाठकनामा की दूसरी फाइलें भी कंपोज की गईं। कोई क्रमबद्ध काम नहीं हुआ। 28 अक्टूबर को अमित आलोक ने पाठकनामा की दूसरी फाइल संपादन के लिए फोरमैन ने दी, जिसमें दो पत्र कम पड़ गए। इसके बाद यह फाइल उन्हें फारमैन ने यह कहकर दी कि केवल दो पत्रों को संपादित कर दें। उन्होंने दो पत्रों को संपादित कर शेष पत्रों के ऊपर ‘असंपादित’ की नोटिंग भी लगा दी। अगले दिन उनका साप्ताहिक अवकाश था।
जागरण सूत्रों के अनुसार क्रमबद्ध तरीके से काम नहीं होने के कारण संभवत: अगले दिन श्री रवीन्द्र पांडेय या किसी अन्य को फोरमैन ने दूसरी फाइल संपादन के लिए दिया। पाठकनामा के पत्रों की कंपोज की गई फाइल फोरमैन संपादन के लिए देता था। 28 अक्टूबर को अमित आलोक को संपादन के लिए यह फाइल नहीं दी गई। उस दिन अमित आलोक ने कुछ अन्य पत्रों को छांटकर कंपोजिंग वास्ते फोरमैन को दिया था। पाठकनामा की फाइल को कंपेाज करने के लिए लॉग-इन पर काम पटना यूनिट में नहीं होता था। पाठकनामा को पेज पर लगवाने की जिम्मेदारी भी तय नहीं थी। इसे पेज पर फोरमैन या आपरेटर के स्तर पर फाइल उठाकर पेज पर लगाते थे। पेज का फाइनल प्रिंट कोई नहीं देखता था। इसके लिए जिम्मेदारी तय नहीं थी। इसके लिए सिस्टम की इन खामियों के लिए कार्रवाई की जद में आए कर्मी जिम्मेदार नहीं हैं। कुछ कर्मियों के अनुसार इसके लिए जिम्मेदार सिस्टम बनाने व उसका अनुपालन सुनिश्चित कराने वाले लोग हैं। शीर्ष जागरण प्रबंधन यह समझ रहा है। इस कारण उसने पटना के कई वरीय लोगों से भी इस्तीफा व माफीनामा मांगा है। अर्थात् शीर्ष प्रबंधन की नजर में सिस्टम की खामियों के लिए वे दोषी हैं। इसके बावजूद उन्हें ही जांच का जिम्मा सौंपा गया, जिनसे न्याय की उम्मीद नहीं की सकती। पूरे मामले से स्तब्ध जागरण कर्मियों में प्रबंधन के प्रति अविश्वास का माहौल पैदा हो गया है। उनके अनुसार, यह जांच शीर्ष प्रबंधन को अपने स्तर से करना चाहिए।
अनेक संपादकीय कर्मचारियों ने रवीन्द्र पांडेय व अमित आलोक को निर्दोष करार देते हुए कहा कि दोनों दैनिक जागरण के बड़े स्तंभ रहे हैं। इसे प्रबंधन भी मानता है। अमित आलोक ने दैनिक जागरण के ऑल इंडिया टेस्ट को क्वालीफाइ कर मुख्य उपसंपादक के पद पर अपने बूते पदोन्नति ली। पूरे बिहार व झारखंड में इस टेस्ट को उन्होंने अकेले क्वालीफाई किया। जागरण के पटना यूनिट के करीब-करीब सभी संपादकीय प्रशासी कार्य वे ही करते थे। रवीन्द्र पांडेय प्रादेशिक डेस्क को बखूबी संभाल रहे थे। वे जागरण में कभी संपादकीय प्रभारी के प्रभारी में भी रहे थे। सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस की प्रदेश शाखा का एक गुट पीडि़त कर्मियों के संपर्क में है। वह उन्हें कांग्रेस आलाकमान को पत्र लिखने के लिए प्रेरित कर रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि इस मामले में निर्दोष लोगों पर कार्रवाई कर कुछ बड़े लोगों को बचाया जा रहा है। कांग्रेस ऐसा नहीं चाहेगी, क्योंकि यह उसका भी मामला है। कांग्रेस असली दोषियों पर कार्रवाई चाहती है, न कि निर्दोष लोगों की बलि।
इस मामले को लेकर पटना यूनिट में बिहार-उत्तर पदेश डिवाइड पैदा कर प्रबंधन अपना उल्लू सीधा करना चाह रहा है। जागरण के ही कुछ कर्मचारी इसे हवा देकर माहौल बिगाड़ रहे हैं। लेकिन, अधिकांश कर्मचारी इस मामले को कर्मचारी एकता से जोड़कर अपने हितों से जुड़ा मान रहे हैं। उधर, नोयडा के कुछ वरीय संपादकीय अधिकारी पटना में पदस्थापित स्टेट हेड शैलेंद्र दीक्षित के खिलाफ अपनी पुरानी रंजिश निकालने के लिए भी इस मामले को हथियार बनाकर पूरी ताकत से खड़े हो गए हैं। वे पीडि़त कर्मियों से भी संपर्क में हैं।
बहरहाल, कर्मियों के बीच काम के अधिक घंटों व अत्यधिक वर्कलोड, काम का बंटवारा ठीक नहीं रहने, कम वेतन, कर्मचारियों की बेवजह छंटनी आदि को लेकर अंदर सुलगती चिंगारी को एक बार फिर हवा मिल गई है। पीडि़त कर्मचारियों को अभी तक जांच रिपोर्ट व कार्रवाई से अवगत नहीं कराया गया है। कर्मिचारियों से लिए गए ‘कंडीशनल’ इस्तीफा पत्र पर जांच रिपोर्ट से बिना अवगत कराए इकतरफा कार्रवाई के कानूनी पहलू भी गंभीर होंगे, यह तय है। बीते दिनों वेतन बोर्ड के फैसले को नहीं मानने के लिए जागरण कर्मियों से करवाए गए जबरिया हस्ताक्षर के खिलाफ भी ये पीडि़त कर्मी मुंह खोल सकते हैं। ऐसे में जागरण प्रबंधन मुश्किल में पड़ेगा। आगे-आगे देखिए होता है क्या।
एक जागरण कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.