दाज्यू बोले:.. खुशनसीबी थी हमारी कि हमें रवीश भाई, कॉर्बेट पार्क से आगे मर्चुला में मिल गए. हमेशा की तरह वही बेबाक अंदाज़, उनके ज़मीन से जुड़े होने का व्यवहार, साथ साथ चाय पीने के दौरान उत्तराखंड के जनांदोलन, चंडी प्रसाद भट्ट, राधा बहिन से लेकर अपने सचिदानंद भारती तक की चर्चा हुई. मेरे साथ गणेश रावत, [सहारा समय] खुशाल रावत [जी न्यूज़], गोविन्द पाटनी [इटीवी], सुरेन्द्र पाल [मेरे दोस्त], सुमान्था घोष [वन्यजीव विशेषज्ञ] भी थे.
रामगंगा नदी किनारे बैठे पर्यावरण, बाघ की भी बातें हुईं. कुछ वक्त बाद हम निकल पड़े जंगल में पैदल ट्रैक पर, मंजिल थी सुमान्था घोष का जंगल कैंप वनघट. करीब एक घंटे की पैदल यात्रा के दौरान रवीश भाई और हम सभी मीडिया साथी चर्चा करते हुए आगे बढ़े. बकौल रविश भाई.. देश में चल रहे हालात मीडिया की भी जवाबदेही तय कर रहे हैं. हम खुश नसीब हैं कि हम देश में हो रहे सामाजिक परिवर्तन, राजनितिक परिवर्तन के गवाह बन रहे हैं. रवीश कहते हैं कि आजकल मीडिया से जुड़े लोग भी नेताओ, उद्योगपतियों की चाय पीने से पहले दस बार सोचते हैं कि हम वहां जाये या नहीं?

मेरा भी यही मानना था कि अन्ना, केजरीवाल ने देश कीदिशा और सोच को बदल दिया. भ्रष्टाचार मुद्दा बन गया. जनजागरण तो हो गया, आगे अभी और बहुत होना बाकी है. गणेश रावत कहते हैं कि राष्ट्रीय चैनल भी अब खबरों पर लौट रहे हैं. सलमान खुर्शीद को मीडिया ने धूल चटा दी. मीडिया से कैसे घबराते हैं मंत्री उस प्रेस वार्ता के दिन साफ़ दिखा. गोविन्द पाटनी, खुशाल रावत भी चर्चा के बीच अपनी बात रखते रहे हैं. हम आगे बढ़ते रहे बीच में सुरेन्द्र पाल ने ये पूछा कि देश का आगे क्या भविष्य है. रवीश भाई बोले – ये समाज में, मंथन, चर्चा, परिवर्तन का दौर है. हर देश में ऐसा होता है. हमारे यहाँ जो हो रहा है वो अच्छा है देश इससे और मज़बूत होगा.
इसी बीच सुमान्था घोष अपने ट्रैक की जानकारी देते रहे कि कैसे आसपास के गाँव के लोग यहाँ महाशीर मछली और गाँव में होम स्टे के जरिये रोज़ी रोटी कमा रहे हैं. मंजिल वनघट तक पहुँचने लिए नदी रामगंगा को टयूब और बांस की बने जुगाढ़ से पार करना बेहद रोमांचकारी था. घोष साहब के वनघट परिसर में पांच हट्स हैं और घने जंगल के बीचों बीच ये जगह किसी लेखक के लिए सबसे बेहतर. यहाँ कोई फोन नहीं है और ना आपका फोन बजेगा. हाँ, आसपास पक्षियों, जंगली जानवरों की आवाज़ आसपास डोलते सांप आपको डरा सकते हैं. रवीश कहने लगे कि किताब जब भी लिखूंगा यहीं आऊंगा.. फेसबुक, ट्विटर, फोन से बचने की इससे बेहतर जगह कोई नहीं हो सकती.
करीब एक घंटा बिताने के बाद हम वापिस चले. रामगंगा पर करते समय जूता पतलून सब गीला हो गया. वापसी पर मुझे रवीश भाई ने बताया कि जब वो प्राइम टाइम पर होते हैं तो वो मोबाइल पर आये एसमएस या मेल पर आई प्रतिक्रिया से भी सवाल निकाल लेते हैं. एक व्यापक बुद्धिजीवी वर्ग उनके साथ पीछे मौजूद रहने का अहसास कराता है. हमें भी ये लगा शायद उनके एनडी टीवी इंडिया के प्राइम टाइम की सफलता का राज भी यही है कि वो आम आदमी के सवाल भी एक खास चर्चा मंच पर रख देते हैं. हम वापिस पहुँच गए, अभी झूला पुल पार करना है. फोटो खिंचवाने का दौर ..और उनके साथ वक्त बिताने का सौभाग्य अब पीछे छूट रहा है. हम वापिस आ गये और वो भी आज वापिस चले जायेंगे. थकान मिटाने के बाद, खबर और बहस की दुनिया में. देश के बदलते हालात के गवाह बनने.. शुक्रिया रवीश भाई समय देने के लिए.
लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा एनडीटीवी से जुड़े हुए हैं.