सूचना और संचार के इस बेहद प्रगतिशील वक्त में वस्तुत: उन चीजों को प्राय: हाशिए पर पाया गया है, जिन्हें अपनी बेदाग और विश्वसनीय सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण केंद्र में होना था, लेकिन गुजरे कुछ वक्त में सूचना और संचार के इन प्रचलित नियमों और जरूरतों के विरुद्ध जाकर लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र जनसंदेश टाइम्स ने जिस तरह से इस हाशिए का विस्तार किया है, वह हमारी सामाजिक निष्ठा को प्रदर्शित करता है।
साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है, इस तरह से देखें तो जनसंदेश टाइम्स ने अपनी शुरुआत से ही साहित्य को सम्मान के साथ प्रमुखता से स्थान दिया है। कस्बों, शहरों और राजधानी में होने वाली साहित्यिक, सांस्कृतिक गोष्ठियों से लेकर सामाजिक परिष्कार और आम जन को उनके अधिकार दिलाने वाली गतिविधियों को इस समाचार पत्र ने लगातार तरजीह दी। लखनऊ में हुए प्रगतिशील लेखकों के दो दिनी सम्मेलन की विस्तृत आलोचनात्मक कवरेज की देश भर के रचनात्मक क्षेत्र में चर्चा हुई।
इस सिलसिले में अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को संयुक्त रूप से ज्ञानपीठ मिलने की खबर को न सिर्फ पहले पृष्ठ पर मुख्य खबर का स्थान दिया गया, बल्कि भीतरी पृष्ठों पर भी इस खबर से जुड़ी हुई सामग्री को सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया गया। साहित्य की दुनिया की किसी खबर को किसी समाचार पत्र द्वारा प्रथम पृष्ठ पर मुख्य खबर की तरह प्रकाशित किये जाने का व्यापक स्वागत किया गया। स्तंभकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी ने न केवल इसकी चर्चा अपने ब्लाग पर की बल्कि फेसबुक पर भी लगाया। साहित्य की दुनिया में यह बड़ी चर्चा का विषय बना।
पिछले शुक्रवार को जब ‘राग दरबारी’ के बहुचर्चित रचनाकार श्रीलाल शुक्ल का देहांत हुआ, तब भी जनसन्देश टाइम्स ने इसे साहित्य और समाज को प्रभावित करने वाली एक बड़ी घटना की तरह दर्ज किया। इस दुखद घटना का व्यापक कवरेज करते हुए श्रीलाल जी और उनके साहित्य, रचना कर्म से जुड़े प्रत्येक पहलू को पाठकों के सामने लाने की कोशिश की। प्रयाग विश्वविद्यालय के दृश्य कला विभाग के अध्यक्ष और प्रख्यात कलाकार अजय जेटली के हाथों बना श्रीलाल जी का स्केच इस समाचार पत्र ने पहले पृष्ठ पर उनके निधन की खबर के साथ प्रकाशित किया। श्रीलाल जी के साथ ही ज्ञानपीठ सम्मान पाने वाले प्रसिद्ध कथाकार अमरकांत की टिप्पणी भी प्रथम पेज पर छपी। इसी के साथ प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय, सुपरिचित लेखक लीलाधर मंडलोई के आलेखों के साथ ही श्रीलाल जी की रचनाओं के अंश भी प्रकाशित किये।
जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय का कहना है कि यह आज के समाज की जरूरत है। लोग कुछ बेहतर, सकारात्मक और कुछ रचनात्मक पढ़ना चाहते हैं पर अख़बारों में उन्हें वैसी सामग्री नहीं मिलती। जन सन्देश टाइम्स के प्रयास को बहुत कम समय में पाठकों और लेखकों, साहित्यकारों, चिंतकों का उत्साहवर्धक समर्थन मिला है।
लेखक अविनाश जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ से जुड़े हुए हैं.






