श्रीलाल जी कहा करते थे कि कोई काम करना हो तो यह समझ कर करो कि मृत्यु तुम्हारे सिर पर खड़ी है और कोई विद्या सीखनी हो तो यह समझकर सीखो कि तुम अजर-अमर हो। यह शायद उनके जीवन का मंत्र था और हर किसी के लिए यह सफलता का महामंत्र बन सकता है। मंत्र वही दे सकता है, जो स्वयं सिद्ध हो, असिद्ध का मंत्र फलता नहीं, काम नहीं करता। कौन अस्वीकार कर सकता है इस बात से कि वे साहित्य के संत थे, अपनी कला के सिद्ध थे।
एक लंबी, दीप्त और प्रखर साधना में तपकर वे जिस ऊंचाई पर पहुंचे, वह असाधारण थी। लेकिन असाधारण होकर भी अत्यंत साधारण की तरह प्रस्तुत होना उनकी सिद्धि थी। बेशक यह बहुत कठिन है लेकिन जो कठिन चुनौतियों को साध सकता है वही बड़ा हो पाता है। कठिनाइयां हमेशा कद बढ़ाती हैं, बशर्ते उन्हें पार करने की जिद हो, जिजीविषा हो।
जब कोई अपने शिखर को पा लेता है, चोटी पर पहुंच जाता है तो चाहे-अनचाहे ऊंचाई का दर्प उसकी धमनियों में उतर ही आता है, लेकिन कोई विरला होता है जो इससे अपने को बचा ले जाता है। श्रीलाल जी को ऐसे लोगों में ही गिना जाना चाहिए। वे एक बड़े लेखक थे, इससे पहले वे एक सच्चे मनुष्य थे। अगर आप मनुष्य नहीं हैं, तो आप लोगों की पीड़ा, उनके दर्द को नहीं समझ सकते, उनकी दिक्कतों, कठिनाइयों को नहीं समझ सकते। संवेदनशीलता लेखक होने की पहली शर्त है और यह संवेदनशीलता ही आदमी की पशुता का परिष्कार करती है, उसे मनुष्य बनाती है, उसे इस लायक बनाती है कि वह दूसरों के दर्द को महसूस कर सके। लेखन के नाम पर अनुभवातीत काल्पनिक मनोराज्य की रचना करना और कुछ कागज काला कर खुद को लेखक घोषित कर देना बहुत आसान काम है, बहुत सारे लोग ऐसा कर भी रहे हैं। यह भी कठिन नहीं है कि किसी आलोचक से बड़ा लेखक होने का सर्टिफिकेट लेने में भी कामयाबी मिल जाय, लेकिन किसी भी लेखक को बड़ा न तो उसका बहुत लिखना बनाता है, न ही किसी महान आलोचक का फतवा।
लेखक को बड़ा बनाते हैं, उसके पाठक। पाठक किसी भी रचना के सबसे महत्वपूर्ण आलोचक होते हैं। उनकी पसंद-नापसंद ही किसी रचनाकार को स्थापित करती या खारिज करती है। श्रीलाल शुक्ल अगर बड़े लेखक हैं, बड़े व्यंग्यकार हैं तो इसलिए नहीं कि कुछ मूर्धन्य साहित्यालोचक ऐसा मानते हैं बल्कि इसलिए कि बड़ा पाठक वर्ग ऐसा मानता है, ऐसा स्वीकार करता है। वैसे तो उन्होंने कई उपन्यास लिखे लेकिन राग-दरबारी जैसी रचना अकेले उन्हें एक शीर्ष उपन्यासकार, व्यंग्यकार के रुप में स्थापित कर देने के लिए पर्याप्त है। वे रचते रहे और सिर्फ रचते रहे। इसके बदले उन्होंने कुछ चाहा नहीं। जिस तरह के तिकड़म आजकल साहित्य में चल रहे हैं और जिस तरह लोग कुछ जिल्दें बंधवाकर पुरस्कार पाने वालों की लाइन में खड़े हो जाते हैं, उसे हासिल करने के लिए जमीन-आसमान एक कर देते हैं, उससे श्रीलाल जी अनजान नहीं थे लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। सम्मान उनके पीछे आते रहे। उन्होंने अपने रचना कर्म को तरजीह दी, कभी सम्मान के मोह में नहीं फंसे। उन्हें बहुत सारे सम्मान मिले लेकिन इससे गौरव उन सम्मानों का बढ़ा। वे किसी भी पुरस्कार, सम्मान से बड़े थे।
जब उन्हें ज्ञानपीठ दिया गया तब उनके प्रशंसकों को बहुत खुशी नहीं हुई, सबने महसूस किया कि हिंदी लेखकों को सम्मानित-पुरस्कृत करने वाली बड़ी संस्थाएं बहुत देर करती हैं, लेखकों की उपेक्षा होती है लेकिन तब भी श्रीलाल जी ने यह कहकर अपने बड़प्पन का संकेत दिया कि देर से ही सही लेकिन उन्होंने मुझे भुलाया नहीं। जिसे लाखों पाठकों, प्रशंसकों ने अपने हृदय में बिठा रखा हो, उसके लिए अपने पाठकों के प्यार से बड़ा सम्मान और क्या हो सकता है। श्रीलाल जी ने आम, मध्यमवर्गीय जीवन के संघर्ष को अपनी रचनाओं में स्वर दिया, उन्होंने जितने भी पात्र गढ़े, वे आज भी गांवों, कस्बों और शहरों में लड़ते और झुकने से इनकार करते मिल जायेंगे।
जीवन इतना विद्रूप हो चुका है कि सच उपहास रचता सा लगता है। कोई सिर्फ सचाई बयान करे तो वह तंज जैसी चोट करती है। ऐसे समय में भी कुछ लोग सच के साथ जीने की हिम्मत करते हैं, यह बहुत बड़ा जोखिम है। श्रीलाल जी के उपन्यासों में ऐसे पात्र देखे जा सकते हैं। सामाजिक, राजनीतिक जीवन की जटिल विद्रूपता को भेदकर दिखाने की कोशिश उनके लेखन में आर-पार दिखायी पड़ती है। उनके उपन्यासों में असल जीवन है। उन्हें पढ़ते हुए आम आदमी खुद को वहां मौजूद पा सकता है। इसी नाते श्रीलाल शुक्ल श्रीलाल शुक्ल हैं और इसी नाते वे पार्थिवत्व त्यागकर भी हमारे बीच हमेशा मौजूद रहेंगे। उन्हें प्रणाम।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 08853002001 के जरिए किया जा सकता है.






