वर्धा : भारतीय साहित्य को ‘राग दरबारी’ जैसी कालजयी रचना देने वाले पद्मभूषण व ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार एवं व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल के निधन पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में वैचारिक विमर्श कर श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। विवि के साहित्य विद्यापीठ द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में श्रीलाल शुक्ल की 86 वर्ष की आयु में निधन होने पर विवि के कुलपति विभूति नारायण राय ने शोक संदेश में कहा कि उनका निधन साहित्य जगत व भारतीय समाज के लिए अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपायी शायद ही हो पाएगी।
श्री राय ने करीब 30 वर्षों से मैं उन्हें जानता हूं तथा पिछली मुलाकात करीब 3 महीने पूर्व हुई थी, का उल्लेख करते हुए बताया कि श्रीलाल शुक्ल ने आजादी के बाद भारतीय समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, पाखंड, अंतर्विरोध और विसंगतियों पर गहरा प्रहार किया था। वे समाज के वंचितों और हाशिए के लोगों को न्याय दिलाने के पक्षधर थे। महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के बाद वे हिंदी के बड़े व्यंग्यकार माने जाते थे। ग़मगीन माहौल में सभी वक्ता उनसे हुए मुलाकात और उनके साथ बिताए पलों को साझा कर रहे थे। प्रतिकुलपति प्रो.ए.अरविंदाक्षन ने निजी संस्मरणों के हवाले से कहा कि हम गैर-हिंदी भाषी लेखकों को भी उन्होंने बड़ा स्नेह दिया।
वरिष्ठ पत्रकार प्रो.रामशरण जोशी बोले, श्रीलाल शुक्ल और राग दरबारी एक-दूसरे के पर्याय हैं, इसका नतीजा ये हुआ कि उनकी दूसरी कृतियां ढंक गयीं। पीपली लाइव एक तरह से राग दरबारी का सिनेमाई विस्तार है, का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राग दरबारी संक्रमणकालीन ग्रामीण भारत (विशेषकर उत्तर भारत) का एक ऐसा महाड्रामा है, जिसमें ‘अनुपस्थित’ नायक है लेकिन विदूषक दृश्यमान है, प्रत्येक विदूषक पात्र की अपनी एक गाथा है और सबों की साझी गाथा विराट ड्रामा को जन्म देती है। साहित्य विद्यापीठ के प्रो.के.के. सिंह ने श्री लाल शुक्ल के साहित्यिक अवदानों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राग दरबारी आधुनिक हिंदी साहित्य का क्लासिक उपन्यास बन गया है। उन्होंने बताया कि यह उपन्यास आजाद हिंदुस्तान के सामाजिक जीवन के अत्यन्त प्रामाणिक और जीवंत दस्तावेज है। शुक्ल जी ने इसमें भारतीय बुर्जुआ लोकतंत्र की विफलता और विद्रूपताओं को परत दर परत उघाड़ कर सामने रखा है।
संचालन करते हुए साहित्य विद्यापीठ की रीडर डॉ.प्रीति सागर ने श्रीलाल शुक्ल के कृतित्व की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उपस्थितों ने दो मिनट का मौन रखकर श्रीलाल शुक्ल को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। इस दौरान मॉरीशस, श्रीलंका, हंगरी, न्यूजीलैण्ड, रूस, बेल्जियम, चीन, जर्मनी, क्रोशिया से आए हिंदी के अध्यापक सहित विवि के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
वर्धा से अमित कुमार विश्वास की रिपोर्ट.





