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श्रीलाल होने का अर्थ

श्रीलाल शुक्ल के निधन से पूरा साहित्य जगत स्तब्ध है, क्योंकि वह जिस स्तर के रचनाकार थे, वैसे रचनाकार विरले ही होते हैं। हमारे साथ उनकी कृतियां हैं, जो हमें उनके होने की महत्ता की याद दिलाती रहेंगी। मैं उनसे बहुत घनिष्ठ रूप से नहीं जुड़ा था, लेकिन अकसर हम लोग विभिन्न गोष्ठियों वगैरह में मिलते रहते थे। उनके साथ जिए कुछ पलों के बड़े ही बेहतर संस्मरण हैं।

श्रीलाल शुक्ल के निधन से पूरा साहित्य जगत स्तब्ध है, क्योंकि वह जिस स्तर के रचनाकार थे, वैसे रचनाकार विरले ही होते हैं। हमारे साथ उनकी कृतियां हैं, जो हमें उनके होने की महत्ता की याद दिलाती रहेंगी। मैं उनसे बहुत घनिष्ठ रूप से नहीं जुड़ा था, लेकिन अकसर हम लोग विभिन्न गोष्ठियों वगैरह में मिलते रहते थे। उनके साथ जिए कुछ पलों के बड़े ही बेहतर संस्मरण हैं।

श्रीलाल शुक्ल का लेखन आज पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक है। उन्होंने अपने बहुचर्चित उपन्यास राग दरबारी में जिस व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और ग्रामीण विसंगति को बहुत ही व्यंग्यात्मक शैली में लिखा है, वह उससे भी भ्रष्टतम रूप में आज हमारे सामने है। उस समय राजनीति व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के जिस दलदल में फंसी थी, वह आज और गहरा गया है। ग्रामीण जीवन की विसंगतियों को भी उन्होंने राग दरबारी में कलात्मक तरीके से दर्शाया है। राग दरबारी को प्रेमचंद के गोदान और फणीश्वरनाथ रेणु के मैला आंचल की तरह क्लासिकल का दरजा हासिल है।

उत्तर प्रदेश के गांव के लोगों के चरित्र, उनके पाखंड, विसंगतियां, कमचोरी, आलस्य, काइयांपन आदि सब कुछ को उन्होंने निर्ममतापूर्वक पाठकों के सामने परोसा है। लेकिन तब भी श्रीलाल जी ने प्रेमचंद की तरह ग्रामीण जीवन को बहुत ज्यादा अपनी रचनाओं में नहीं लिया है। इसलिए इस मामले में प्रेमचंद से उनकी तुलना नहीं हो सकती। बेशक दोनों ने ग्रामीण जीवन के यथार्थ को उकेरा।

हालांकि दोनों हिंदी साहित्य के महान रचनाकार हैं, लेकिन उनके लेखन के विषय, शैली और एप्रोच अलग-अलग हैं। श्रीलाल जी ने व्यवस्थागत विसंगतियों और हमारी संस्थाओं और लोगों में बढ़ती मूल्यहीनता को बहुत बारीकी से दर्ज किया है। राग दरबारी में आजादी के बाद के ग्रामीण भारत की मूल्यहीनता को उन्होंने जिस तरह परत दर परत उघाड़कर हमारे सामने उद्घाटित किया है, उससे व्यवस्था के मारे आम लोगों का सहज ही तादात्म्य बन जाता है। यही कारण है कि प्रकाशन के इतने वर्षों बाद भी वह उपन्यास काफी लोकप्रिय है।

मैं श्रीलाल जी के लेखन की शैली और उनके विषयों को चुनाव का घोर प्रशंसक रहा हूं। उन्होंने कथ्य के अनुरूप लेखन के लिए शिल्प को अपनाया और उसी तरह की भाषा चुनी। इस लिहाज से कहें, तो विषयों के चुनाव, क्लीनिकल परीक्षण शैली और चीजों को देखने की बारीकी उन्हें एक बड़ा उपन्यासकार बनाती है।

ऐसी अपेक्षा रखना तो शायद ठीक नहीं होगा कि उनकी हर रचना राग दरबारी की तरह लोकप्रिय क्यों नहीं हुई या वह उससे बेहतर आगे क्यों नहीं लिख सके। दरअसल हर लेखक की हर रचना महान नहीं होती। लेकिन श्रीलाल शुक्ल के अन्य उपन्यास भी काफी अच्छे और महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जहां मध्यवर्गीय जीवन को कथ्य बानाकर विश्रामपुर का संत जैसा उपन्यास लिखा, वहीं आदमी का जहर जैसा जासूसी उपन्यास भी लिखा। अब विश्रामपुर का संत की ही बात ले लीजिए, इसमें उन्होंने जयंती प्रसाद नाम के एक मध्यवर्गीय व्यक्ति की यातना-कथा को जिस अद्भुत बारीकी, संवेदना और क्लीनिकल परीक्षण की ईमानदारी से लिखा है, वह अन्यत्र विरल है।

एक तरह से कहें, तो मुझे विश्रामपुर का संत स्वतंत्र भारत के सत्ता खेल का सार्थक रूपक लगता है-लगभग कनफेशन की उदात्तता लिए हुए। दरअसल विश्रामपुर का संत मध्यवर्ग की अपनी संस्कृति की आत्महंता गाथा है, जो अपने ही छद्म के बोझ तले दम तोड़ रही है। यहां श्रीलाल जी की भाषा भी अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में है। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उनकी अन्य रचनाएं कमजोर हैं। इसी तरह सिर्फ यह भी नहीं कहा जा सकता कि श्रीलाल शुक्ल मूलतः राग दरबारी के कारण ही जाने जाएंगे। हां, यह जरूर है कि राग दरबारी उन्हें एक विशिष्ट पहचान देती है।

अकसर एक सवाल यह उठाया जाता है कि अगर श्रीलाल शुक्ल ने व्यंग्य के फॉर्म में राग दरबारी नहीं लिखा होता, तो क्या वह इतना ही लोकप्रिय या महान होता। दरअसल फॉर्म तो लेखक की अपनी शैली होता है, जो वह कथावस्तु के अनुरूप चुनता है। यह संयोग ही है कि श्रीलाल जी ने राग दरबारी के लिए हास्य-व्यंग्य की चुभने वाली शैली चुनी। अलबत्ता इसमें संदेह है कि सपाट रूप से लिखने पर राग दरबारी इतना महत्वपूर्ण होता भी या नहीं।

इतने महान साहित्यकार को ज्ञानपीठ पुरस्कार पिछले दिनों दिया गया। उन्हें यह सम्मान बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। दरअसल हमारे यहां पुरस्कारों की संस्कृति बहुत अजीब है। लेखकों-कलाकारों को सम्मानित तब किया जाता है, जब उनकी उम्र अधिक हो जाती है। हमारे यहां युवावस्था में सम्मानित करने की परंपरा क्यों नहीं है, यह एक अलग सवाल है। पता नहीं, हमारे यहां पुरस्कारों की संस्कृति कब बदलेगी।

लेखक राजेंद्र यादव वरिष्‍ठ साहित्‍यकार और हंस पत्रिका के संपादक हैं. यह लेख अमर उजाला से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

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