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”श्री न्‍यूज में मारपीट, जूतम-पैजार नहीं, गर्मा-गर्मी हुई थी ”

यशवंत भाई नमस्कार, आप मीडिया से जुड़े चंद लोगों में हैं, जिनका मैं सम्मान करता हूं। आप भड़ास के सर्वेसर्वा हैं, उसपर कुछ भी लिख और छाप सकते हैं। लेकिन झूठी और हवाई बातों पर आधारित किसी ख़बर को छापने से पहले दूसरा पक्ष जानना आपकी पेशेवर जिम्मेदारी है। कुछ दिन पहले भड़ास पर श्री न्यूज चैनल के ऑफिस में जूतम-पैजार की खबर पढ़ी। खबर सच्चाई से परे थी। मेरे समेत तीस-चालीस लोग उस वक्त न्यूजरूम में उपस्थित थे। 

यशवंत भाई नमस्कार, आप मीडिया से जुड़े चंद लोगों में हैं, जिनका मैं सम्मान करता हूं। आप भड़ास के सर्वेसर्वा हैं, उसपर कुछ भी लिख और छाप सकते हैं। लेकिन झूठी और हवाई बातों पर आधारित किसी ख़बर को छापने से पहले दूसरा पक्ष जानना आपकी पेशेवर जिम्मेदारी है। कुछ दिन पहले भड़ास पर श्री न्यूज चैनल के ऑफिस में जूतम-पैजार की खबर पढ़ी। खबर सच्चाई से परे थी। मेरे समेत तीस-चालीस लोग उस वक्त न्यूजरूम में उपस्थित थे। 

सच ये है, कि किसी ने किसी को नहीं पीटा, हां दो लोगों में थोड़ी गर्मागर्मी जरूर हुई। जिस प्रेशर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पत्रकार काम करते हैं, वहां कभी कभी-कभी ऐसा हो जाता है। रही बात ड्राइवर को पीटने की, तो आपको बता दूं, कि उस रात कार में बैठे तीन लोगों ने ड्राइवर को सिर्फ धीरे गाड़ी चलाने की हिदायत दी थी। वो भी इसलिए क्योंकि एक हफ्ते के अंदर ड्रॉपिंग में लगे ड्राइवरों ने तीन एक्सिडेंट किए थे। उनमें एक ऐक्सिडेंट ऐसा था, जिसमें चैनल की एंकर जसप्रीत बुरी तरह घायल हुई थीं और डेढ़ महीने बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिली थी।

आपके पास ये खबर उन लोगों ने भेजी है, जिन्हें कुछ दिन पहले उनकी अक्षमता की वजह से चैनल से लात मारकर निकाला गया था। खुद को दिग्गज और वरिष्ठ पत्रकार बताने वाले ये वो लोग हैं, जो जनसंदेश से निकाले जाने के बाद तीन साल तक खाली थे। ये वो शेर हैं, जिनका ध्यान वहां भी कमाने पर था और श्री न्यूज में भी इन्होंने सिर्फ पैसा कमाया। इनमें एक आदरणीय, मैनेजिंग एडिटर थे, जिनका भाषा-ज्ञान बेहद कमजोर था और आत्मविश्वास ऐसा, कि नई टीम के आने के बाद किसी भी ख़बर को आगे बढ़कर चलाने की उन्होंने हिम्मत नहीं की। दूसरे सज्जन आउटपुट हेड थे। कम बोलते थे, कम काम करते थे और ऑफिस भी कम आते थे। महीने में पंद्रह दिन की छुट्टी उनके लिए मामूली बात थी। छह-छह महीने में चैनल बदलने का कीर्तिमान भी उनके नाम है। तीसरे तो बिरले थे, उनकी रंगीनमिजाजी का कोई मुकाबला नहीं। महिला अधिकारों के ऐसे समर्थक, कि बड़े-बड़े नारीवादी शर्मा जाएं। वो पीसीआर-एमसीआर के हेड हुआ करते थे। उनके समय में श्री न्यूज के एमसीआर में दस लोग काम करते थे, जिनमें नौ लड़कियां थीं।

छह महीने से ज्यादा समय तक इन नमूनों ने चैनल के मालिक और प्रबंधन को बेवकूफ बनाया। मोटी सैलरी उठाई और उन्हें भ्रम में रखा, कि बहुत जल्द चैनल ऑन एयर होगा। लेकिन डमरू बजाने से हारमोनियम की आवाज नहीं निकलती और ना ही फूंक मारने से हेलिकॉप्टर उड़ा करते हैं। वो वादे, वादे ही रह गए। राजेंद्र प्रसाद मिश्रा उर्फ आरपीएम जी को जब यहां लाया गया, तो उन्होंने मेहनती और काबिल लोगों की टीम खड़ी की। उनकी कोशिशों और संकल्प का ही नतीजा था, कि जिस जगह का आउटपुट दिन भर में चार पैकेज नहीं बनवा पा रहा था, वो चैनल डेढ़ महीने में ऑन एयर हुआ। आज हालात ये हैं, कि नए चैनलों में सबसे तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है, श्री न्यूज। यूपी, उत्तराखंड और हिमाचल के सभी जिलों में इसका प्रसारण हो रहा है। कई प्रदेशों में ब्यूरो ऑफिस बनाए गए हैं, चैनल को विज्ञापन भी खूब मिल रहे हैं।

आरपीएम सर और चैनल प्रबंधन के बीच मनमुटाव की खबर कोरी बकवास है। चैनल कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रहा है, इसलिए प्रबंधन उनसे खुश है। प्रबंधन की तरफ से चैनल के किसी भी कर्मचारी पर कोई दबाव नहीं है। श्री न्यूज में काम करने का अच्छा माहौल है। आउटपुट-इनपुट में समझदारी भरा तालमेल है, चैनल के पास बेहतरीन वीडियो एडिटर हैं, बाक़ी टेक्निकल टीम भी अच्छा काम कर रही है। चाहे कोई पहले आया हो या बाद में, पुरानी टीम के जरिए लाया गया हो, या बाद में आया हो, हर कोई एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा है। अगले कुछ महीनों में श्री न्यूज़ सफलता की नई मंजिलें तय करेगा।

श्री न्यूज का एक पत्रकार

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