संतोष वर्मा जी के निधन की खबर मुझे शनिवार को दिन में करीब 11 बजे मिली। मुझे जैसे ही यह खबर मिली कि उनके शव को कोई लेने वाला नहीं है। वे देहरादून के दून अस्पताल में पड़े हैं, मुझे बडा ही आश्चर्य हुआ कि इस नेक दिल इंसान के साथ ऐसे कैसे हो सकता है। मैंने तुरंत देहरादून के कई लोगों से संपर्क किया जो संतोष वर्मा जी को जानते थे। सभी ने मुझे बताया कि उनके परिवार की तरफ से कोई उनकी डेडबाडी लेने को तैयार नहीं है। सभी ने उनको पहचानने से इनकार कर दिया है। मुझे इतना दुख कभी नहीं हुआ था जितना इस घटना ने दुखी कर दिया है। वाह रे दुनिया।
मैं बताना चाहूंगा कि साल 2010 में मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। दुखद की बात यह है कि जिन्होंने उनसे मेरी मुलाकात कराई वे भी कुछ महीने पहले गुजर गये। वो थे दुर्गाप्रसाद पाण्डेय, जो दिल्ली के एक न्यूज पेपर महामेधा दैनिक में फीचर एडिटर थे। संतोष जी के साथ मैं एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में रात भर लगा रहा। उस समय देहरादून के सीएम निशंक पोखरियाल थे जो उस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। उस कार्यक्रम में मैंने उनको काम करते हुए देखा था। उस समय मैं उनके कमरे पर गया तो देखा इतना बड़ा पत्रकार इतने छोटे से कमरे में रह रहे हैं। जहां सही से रोशनी भी नहीं आती। मैंने उनसे पूछा कैसे रहते है भाई साहब उन्होंने बताया कि ऐसे ही जीवन कट जाएगा। क्या करेंगे बड़े कमरे में रहकर।
लेकिन उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि उनके साथ मरने के बाद ऐसा होगा। मैं तो केवल एक साल, जब तक देहरादून में था, उनसे मिलता रहा। उन्होंने ही मुझे क्वार्क एक्सप्रेस के बारे में जानकारी दी थी, समझाया था अपने लैपटॉप पर। वह हमेशा बताते थे कि जब वह बरेली में दैनिक जागरण में हुआ करते थे तो क्या पत्रकारिता थी। आज की पत्रकारिता कैसी हो गई है। उन्होंने एक बार मुझे बरेली में अपने माध्यम से इन्टरव्यू के लिए भेजा था। हालांकि मैंने ज्वाइन नहीं किया। जब उन्होंने जाना कि मैंने ज्वाइन करने से इनकार कर दिया है। तब वह मुझे बहुत समझाये। देहरादून के घण्टाघर पर स्थित एक प्रसिद्ध मिठाई की दुकान पर हम दोनों लोग काफी समय तक बैठ रहे।
लेखक संतोष पांडेय जनसंदेश टाइम्स से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नम्बर 8410765753 के जरिए किया जा सकता है.






