Om Thanvi : जितने अखबार घर में आते हैं, आज अकेला टाइम्स ऑफ इंडिया है जिसमें पहला पन्ना अखबार का है ही नहीं। वह पूरा पन्ना विज्ञापन के लिए बेच दिया गया है। इसे आजकल जैकेट कहते हैं। इसे सभी 'पहनते' हैं। कभी-कभार हम भी। लेकिन राष्ट्र में छाए अपूर्व शोक की घड़ी में, जब ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने पर कोई दूसरी खबर ही न हो, एक पूरे अखबार का विज्ञापन के पन्ने के पीछे दुबक जाना क्या जाहिर करता है? अकारण नहीं है कि हाल में टाइम्स समूह के मालिक जैन बंधुओं में एक विनीत जैन ने अमेरिकी पत्रिका 'द न्यू योर्कर' को कहा था: " हम अखबारों का धंधा नहीं कर रहे हैं। हमें 90 फीसद आमदनी अगर विज्ञापनों से होती है, इसलिए हम विज्ञापनों के धंधे में हैं।"
सच बोला महाराज! प्रादेशिक अखबारों में तो वैसे ही खबरों पर विज्ञापनों का बोलबाला रहता है। शोक में बाजार की ऐसी कद्र कर आपने उन अख़बारों को भी नई राह दिखाई है। आगे-आगे देखिए होता है क्या।
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.






