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सरकार की भी नहीं सुन रही यूपी की नौकरशाही

: खामियों का पुतला बने अधिकारी : उत्तर प्रदेश की नौकरशाही निरंकुश और स्वेच्छाचारी है। यह आरोप समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने विधान परिषद में लगा कर कोई नई बात नहीं कही है। ब्यूरोक्रेसी निरंकुश और स्वेच्छाचारी ही नहीं भ्रष्ट और मौकापरस्त भी हो गई है। बेलगाम नौकरशाही की हालत यह है कि उसका अधिकांश समय अब अब शासन-प्रशासन चलाने से अधिक ‘राजनीति’ करने और और राजनैतिज्ञों के इर्दगिर्द मंडरा कर अपना मकसद पूरा करने में जाता है। बसपा सरकार के समय में भी नौकरशाहों ने अपनी बेढंगी चाल के लिए खूब नाम कमाया था, लेकिन तब उनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि मायावती के आदेश की वह अवहेलना कर पाते, वह सहमें हुए रहते थे, लेकिन बसपा सरकार की अन्य कई मंत्रियों की स्थिति ऐसी नहीं थी, उन्हें अपना काम कराने के लिए नौकरशाहों के कमरों तक में जाना पड़ जाता था। समाजवादी सरकार के सत्ता में आते ही नौकरशाहों के ऊपर से सत्ता का डर बिल्कुल ही जाता रहा।

: खामियों का पुतला बने अधिकारी : उत्तर प्रदेश की नौकरशाही निरंकुश और स्वेच्छाचारी है। यह आरोप समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने विधान परिषद में लगा कर कोई नई बात नहीं कही है। ब्यूरोक्रेसी निरंकुश और स्वेच्छाचारी ही नहीं भ्रष्ट और मौकापरस्त भी हो गई है। बेलगाम नौकरशाही की हालत यह है कि उसका अधिकांश समय अब अब शासन-प्रशासन चलाने से अधिक ‘राजनीति’ करने और और राजनैतिज्ञों के इर्दगिर्द मंडरा कर अपना मकसद पूरा करने में जाता है। बसपा सरकार के समय में भी नौकरशाहों ने अपनी बेढंगी चाल के लिए खूब नाम कमाया था, लेकिन तब उनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि मायावती के आदेश की वह अवहेलना कर पाते, वह सहमें हुए रहते थे, लेकिन बसपा सरकार की अन्य कई मंत्रियों की स्थिति ऐसी नहीं थी, उन्हें अपना काम कराने के लिए नौकरशाहों के कमरों तक में जाना पड़ जाता था। समाजवादी सरकार के सत्ता में आते ही नौकरशाहों के ऊपर से सत्ता का डर बिल्कुल ही जाता रहा।

अब तो वह मंत्रियों की बात तो दूर है मुख्यमंत्री तक की नहीं सुनते हैं। यह वो ही नौकरशाही है जिसे कभी मुख्यमंत्री कल्याण सिंह अपने हिसाब से हॉकते थे। 24 जून 1991 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तत्काल बाद उन्होंने पत्रकार वार्ता में नौकरशाही की तुलना घोड़े से करते हुए कहा था ‘नौकरशाही एक बेलगाम घोड़े की तरह है। यदि घुड़सवार (मुख्यमंत्री) की रानों (जाघों) में ‘घोड़े‘ को काबू में रखने की कूबत (ताकत) नहीं है तो वह (नौकरशाही) और भी बेलगाम होती जायेगी।‘ कल्याण ने यह बात सिर्फ कही नहीं थी, बल्कि इसे कर के  भी दिखाया था। आज की तारीख में अपवाद को छोड़कर करीब-करीब सभी नौकरशाह खामियों का पुतला बन गये हैं।

नौकरशाहों की नकेल अगर इस समय थोड़ी बहुत कस पा रहा है तो वह है हमारी न्यायपालिका, जिसके आगे ब्यूरोक्रेट्स की एक नहीं चलती है। वह डरती है तो अदालत से ही। 1971 बैच की आईएएस और यूपी की पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव (अब सेवानिवृत) और 1983 बैच के आईएएस तथा मौजूदा प्रमुख सचिव (नियुक्ति) राजीव कुमार को सीबीआई अदालत ने नोयडा आवंटन घोटाले में तीन-तीन वर्ष की कठोर सजा सुनाकर नौकरशाहों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह भले ही राजनैतिज्ञों को अपने हिसाब से समझाते रहें, लेकिन अदालत की पैनी नजर के चलते उनकी मनमानी करने के दिन लद गए हैं, सब जानते हैं कि अगर नीरा यादव और राजीव जैसे दर्जनों नौकरशाहों के घोटालों की जांचे बरसों से दबाई नहीं जा रही होती तो कई और नौकरशाह भी जेल की सलाखों के पीछे होते। नौकरशाह ही इन जांचों पर कुंडली मारे बैठे हैं। इसमें से कई भ्रष्ट आईएएस अधिकारियों को तो महत्वपूर्ण और मलाईदार पदों पर तैनाती तक मिली हुई है। अपने समय की चर्चित आईएएस अधिकारी और कई ‘सरकारों’ की विश्वासपात्र रहीं नीरा यादव को सजा सुनाएं जाने से ब्यूरोक्रेसी में हड़कम्प मचा है। वैसे तो नीरा यादव से पूर्व उत्तर प्रदेश के एक और नौकरशाह अखंड प्रताप सिंह को भी मुख्य सचिव के पद पर रहते जेल जाना पड़ा था, लेकिन उन्हें अभी सजा नहीं सुनाई गई है।

यहां यह बताना भी जरूरी होगा की यूपी आईएएस एसोसियेशन भी इन नौकरशाहों के भ्रष्टाचार से तंग थी और 1997 में एक नई परम्परा डालते हुए एसोसियेशन ने जिन तीन महाभ्रष्ट नौकरशाहों का चुनाव मतदान से किया था उसके भी अखंड प्रताप सिंह पहले, नीरा यादव दूसरे और बृजेन्द्र यादव तीसरे स्थान पर रहे थे। नीरा यादव को पहली बार सजा नहीं सुनाई गई है, इससे पूर्व भी उन्हें 2010 में नोयडा भूखंड आवंटन के एक अन्य मामले फ्लैक्स जमीन घोटाले में चार साल की सजा हुई थी और जेल भी जाना पड़ा था। करीब 15 वर्ष पूर्व नोयडा घोटाले का जब खुलासा हुआ तो इस पर सीबीआई के तत्कालीन निदेशक विजय रामाराव ने कैबिनेट सचिव तथा यूपी के राज्यपाल को लिखित तौर पर बताया था कि आईएएस नीरा यादव ने नोयडा के सीईओ तथा अध्यक्ष पद पर रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग किया और करोड़ों की जमीन रिश्तेदारों को आवंटित कर दी। इस पर तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने मामले की जांच के लिए 1997 में जस्टिस मुर्तजा हुसैन की अध्यक्षता में कमेटी बना दी, जिसने भी उन्हें दोषी करार दिया गया, लेकिन तत्कालीन कल्याण सरकार ने इस मामले में कुछ नहीं किया। सीबीआई ने जांच की अनुमति मांगी तो सरकार ने इसे गैर जरूरी बता कर पल्ला मामला रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन अदालत के हस्तक्षेप के चलते मामला दब नहीं पाया।

सीबीआई की गाजियाबाद अदालत में यह मामला चल रहा था, जिस पर 20 नवंबर 2012 को विशेष न्यायाधीश एस लाल ने तीन-तीन वर्ष की कैद और एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगया। नीरा यादव जब तक सेवा में रहीं उनकी तूती बोलती थी, वह यूपी आईएएस एसोसियेशन की अध्यक्ष भी रह चुकी थीं। 1997 में मुर्तजा हसन आयोग ने भी उन्हें भ्रष्टाचार का दोषी करार दिया था, इतना ही नहीं वह देश की पहली आईएएस अधिकारी भी थीं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते यूपी के मुख्य सचिव पद से हटाया था। इसी तरह से 1981 जिस प्रदीप शुक्ला ने आईएएस सेवा में टॉप किया था, वह 2012 आते-आते भ्रष्टाचार के चलते (एनआरएचएम घोटाला) जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गये थे। नीरा यादव जब भ्रष्टाचार के दलदल में फंस गई तो अपना दामन बचाने के लिए उन्होंने राजनीति का सहारा लिया और भारतीय जनता पार्टी में शामिल भी हो गईं, लेकिन सजा मिलने के बाद यहां भी उनकी महत्वाकांक्षा को विराम लग गया।

उक्त के अलावा भी उत्तर प्रदेश के करीब दर्जन भर नौकरशाह ऐसे हैं जिनके दामन दागदार है। इसमें से कुछ मामले अदालत में साबित हो चुके हैं तो कुछ को फैसले का इंतजार है। आईएएस नीरा यादव, अखंड प्रताप सिंह, प्रदीप शुक्ला और राजीव कुमार की तरह ही 1980 बैच के भ्रष्टाचार के अरोपों से घिरे आईएएस तुलसी गौड़ पर भी निर्यात निगम के एमडी के पद पर रहते, पद के दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप लगा था। इस कारण उनकी प्रोन्नति भी प्रभावित हुई थी। वह सचिव पद पर रहते ही रिटायर्ड हो गए थे। आईएएस बीएस लाल, सिद्धार्थ बेहुरा, के धनलक्ष्मी, विजय शंकर पांडेय, शशि भूषण, महेश गुप्ता भी विवादों में फंसते रहे हैं।

बहरहाल, नौकरशाहों की छवि आम जनता के बीच ही नहीं समाजवादी सरकार की नजरों में भी अच्छी नहीं है। इस बात का खुलासा सपा सरकार के मुखिया अखिलेश यादव और उनके मंत्रियों द्वारा समय-समय पर दिए गए बयानों से साफ हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि ब्यूरोक्रेट्स अपनी छवि सुधारने के लिए स्वयं पहल करें। समाजवादी पार्टी के विधान परिषद सदस्य देवेन्द्र प्रताप ने विधान परिषद में नौकरशाही की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करके उन तमाज जनप्रतिनिधियों की भी वाहवाही लूट ली जो ब्यूरोक्रेसी से त्रस्त चल रही है। सरकार ने अपने विधायक के इस आरोप पर कोई प्रश्न चिन्‍ह लगाने के बजाये यह कहकर बेचैनी और भी बढ़ा दी कि यह कार्यसंस्कृति लंबे समय से बिगड़ी है। कई मंत्रियों को भी यह कहते सुना गया कि नौकरशाही के समय उनकी भी नहीं चलती। उम्मीद करना चाहिए सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने मुख्यमंत्रित्व काल के अनुभव का फायदा मुख्यमंत्री अखिलेश को भी देंगे ताकि वह नौकरशाही पर नियंत्रण करके प्रदेश को तरक्की के मार्ग पर ले जा सकें।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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