जिस तरह आज दुनिया भर में ऑस्ट्रेलियाई मीडिया मुग़ल रुपर्ट मर्डोक़ को जाना जाता है, उसी तरह इस सदी की शुरुआत में अमेरिकी मीडिया किंग विलियम रैंडॉल्फ हर्स्ट की तूती बोलती थी। 1863 में जन्मे हर्स्ट ने महज़ 24 साल की उम्र में अपने पिता से 'द सन फ्रांसिस्को एक्ज़ामिनर' नाम के अखबार का कार्यभार संभाला था। बाद के दिनों में उसने न्यूयॉर्क के अख़बार 'द न्यूयॉर्क जर्नल' का भी अधिग्रहण कर लिया और उसने अपने प्रतिद्वंदी अखबारों से सर्कुलेशन को लेकर बेहद निचले स्तर की लड़ाई लड़ी थी। उसने अमेरिका के लगभग सभी प्रमुख शहरों में करीब 30 अखबारों और पत्रिकाओं का एक प्रकाशन समूह खड़ा किया जो उन दिनों दुनिया में सबसे विशाल था।
हर्स्ट ने मानवीय मूल्यों और पत्रकारिता के सिद्धांतों की कभी परवाह नहीं की। कहते हैं यलो जर्नलिज्म यानी पीत पत्रकारिता की शुरुआत उसने ने ही की थी। मर्डोक की तरह ही हर्स्ट भी हमेशा विवादों में घिरे रहना पसंद करता था और इसका उसने फायदा भी उठाया। वो दो बार अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव चुना गया और कई और चुनावों में खड़ा हुआ। एक मीडिया हाउस के मालिक के तौर पर हर्स्ट ने समाज की कभी कोई परवाह नहीं की, लेकिन हमेशा मुनाफे में रहा। उसने दौलत, शोहरत और महत्वपूर्ण पद खूब हासिल किया।
कैलिफोर्निया की पहाड़ियों पर उसका महल 'हर्स्ट कैसल' आज भी राष्ट्रीय स्मारक है जिसे उसकी मौत के बाद उसकी संस्था ने सरकार को सौंप दिया था। रंगीन मिज़ाज हर्स्ट के संबंध कई खूबसूरत महिलाओं से बताए जाते थे और बाद के दिनों में तो वो एक अभिनेत्री के साथ लिव-इन रिलेशन में भी रहने लगा था। कहते हैं हर्स्ट ने अपने प्रभाव के लिए मीडिया का जिस कदर दुरुपयोग किया वो आज भी एक मिसाल है और मर्डोक उनके सामने आज भी बौने साबित होते हैं। हर्स्ट की तिकड़म भरी जिंदगी को 1941 में बनी एक मशहूर फिल्म 'सिटिजन केन' में बेहद करीब से दिखाया गया है। फिल्म के निर्देशक और अभिनेता ऑर्सन वेलेस ने इस फिल्म में एक काल्पनिक पात्र 'चार्ल्स फोस्टर केन' की किसी भी कीमत पर पाई सफलता की कहानी बयां की है जो काफी हद तक हर्स्ट की जिंदगी पर आधारित है।
फिल्म में दिखलाया गया है कि किस तरह अपनी मूल्यविहीन नीतियों और गैर मानवीय प्रयासों के दम पर केन एक समय शोहरत, दौलत, साथी और परिवार यानी सबकुछ हासिल कर लेता है, लेकिन अंत में उसके पास सिर्फ दौलत रह जाती है। इस फिल्म को नौ कैटेगरी में ऑस्कर के लिेए नॉमिनेट किया गया था और इसकी पटकथा को अवार्ड भी मिला। बताया जाता है कि ऑस्कर के जजों को इस फिल्म को अवार्ड न देने के लिए प्रभावित करने की हर्स्ट ने जी-तोड़ कोशिश की थी। हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ये फिल्म युरोप के कई देशों में कुछ साल बाद प्रदर्शित हुई, लेकिन इसे अच्छी-खासी लेकप्रियता मिली। जब ऑस्कर पुरस्कार देने वाली अकादमी ने सदी की सौ सबसे बेहतरीन फिल्मों की सूची बनाई तो सिटिजन केन को पहले स्थान पर रखा।
जैसी कि उम्मीद थी, हर्स्ट ने इस फिल्म का जोरदार विरोध किया। उसने इस फिल्म का अपने अखबारों से पूरी तरह बायकॉट किया और यहां तक कि उसके विज्ञापन भी छापने से मना कर दिया। कहते हैं उसने फिल्म को उस समय आठ लाख पाउंड में

धीरज भारद्वाज
खरीदने का ऑफर रखा था, लेकिन वेलेस ने इसे ठुकरा दिया। सिटिजन केन एक ऐसा आइना था जिसने हर्स्ट को पूरी तरह
बेनकाब करके रख दिया था। इस फिल्म और इसके नायक का ज़िक्र इसलिए जरूरी था कि अमेरिकी मीडिया विश्लेषक केन ऑलेट्टा ने इसी फिल्म के नाम से प्रेरणा लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिकों पर 'सिटिजन्स जैन' शीर्षक का आलेख लिखा है। क्या पता, कल कोई हॉलीवुड या बॉलीवुड फिल्मकार इनपर भी फिल्म बना डाले..? वैसे भी जैन बंधुओं की कहानी पूरी तौर पर फिल्मी ही है।
लेखक धीरज भारद्वाज कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. न्यू मीडिया के सक्रिय जर्नलिस्ट हैं. कई न्यूज वेबसाइटों में संपादक का दायित्व निभाते हुए कई बड़ी खबरें इन्होंने ब्रेक की हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.