नौकरशाहों ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर दबाव बना लिया है यह बात अब सामान्य लोग भी कहने लगे हैं। मगर नौकरशाह इतनी मनमानी पर उतर आयेंगे कि वह मुख्यमंत्री के आदेशों की लगातार अवहेलना करेंगे ऐसा किसी ने नहीं सोचा था, मगर अफसोस कि ऐसा हो रहा है। लगातार हो रहा है। अब तक तो सामान्य सरकारी कामकाज को टालने की बात थी मगर अब अफसर सरकार और मीडिया के बीच दूरी बनाने में जुट गये हैं। मुख्यमंत्री के पत्रकारों के संबंध में दिये गये निर्देशों पर महीनों तक कोई कार्रवाई न करके अफसरशाही ने इसे साबित भी कर दिया है।
पत्रकारों की लंबे समय से मांग रही है कि राज्य स्तर के मान्यता प्राप्त पत्रकारों एवं उनके परिजनों को पीजीआई में नि:शुल्क चिकित्सा उपलब्ध करवायी जाये। राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने सरकार बनते ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर इसकी मांग की थी। बाद में राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सदस्यों ने पुन: मुख्यमंत्री निवास पर जाकर उनसे पत्रकारों की इस मांग को पूरा करने का वायदा याद दिलाया।
सरकार के छह माह पूरे होने पर मुख्यमंत्री ने प्रेस वार्ता बुलाई थी। इसमें फिर यह मुद्दा उठा। इस दिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बेहद खुश थे। पत्रकारों के याद दिलाने पर उन्होंने मुख्य सचिव जावेद उस्मानी से माइक पर हाथ रखकर इस संबंध में पूछा और तत्काल घोषणा कर दी कि राज्य स्तर के मान्यता प्राप्त पत्रकारों की पीजीआई में निरूशुल्क चिकित्सा व्यवस्था लागू की जायेगी। उत्साही मुख्यमंत्री ने यहां तक कह दिया कि इस आदेश को तत्काल लागू मानिये।
पत्रकारों के खेमे में इस बात को लेकर खुशी की लहर दौड़ गयी। कई पत्रकारों ने मुख्यमंत्री को इसके लिए धन्यवाद भी दे दिया। मगर नौकरशाहों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो नही चाहता था कि मीडिया और मुख्यमंत्री के संबंध बेहतर हो। इन अफसरों को लगता है कि अगर मुख्यमंत्री मीडिया के ज्यादा करीब हो जायेंगे तो उनके कारनामों की जानकारी मुख्यमंत्री तक पहुंचने लगेगी। लिहाजा इस वर्ग ने कोशिशें तेज कर दीं कि किसी भी तरह मुख्यमंत्री का यह आदेश अमल में न आ सके। वह कामयाब भी हो गये। मुख्यमंत्री की घोषणा के तीन महीने बीतने पर भी इसके आदेश नहीं हो सके।
सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री के आदेश के बाद कार्रवाई शुरू तो की गयी मगर वह एक विभाग से दूसरे विभाग के बीच ही गुम होकर रह गयी। अफसरों ने समझाया कि मीडिया अभी काबू में नहीं आ रहा। अगर इनको अभी से सुविधायें देना शुरू कर देंगे तो यह और बेकाबू हो जायेंगे। लिहाजा बेहतर यही है कि अगर पत्रकारों को यह सुविधा देनी भी है तो उन्हें लोकसभा चुनाव के समय ही दी जाये। जिससे पत्रकारों की सोच सरकार के प्रति सार्थक बने और लोकसभा चुनाव में मीडिया समाजवादी पार्टी का बेहतर सहयोग कर सके। लगता है कि अफसर मुख्यमंत्री को इस गलतफहमी में रखने में कामयाब भी हो गये। जिसके कारण पत्रकारों के हित की यह घोषणा लागू नहीं हो सकी।
मगर इस घटनाक्रम से पत्रकारों में गहरी नाराजगी है। राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के पूर्व अध्यक्ष और पीटीआई के ब्यूरो चीफ प्रमोद गोस्वामी का कहना है कि अब तक समाजवादी पार्टी की कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता था। पत्रकारों में अब इस बात की चर्चा हो रही है कि सपा में यह बदलाव क्यों? श्री गोस्वामी ने कहा कि मुलायम सिंह के विरोधी भी कहते थे कि एक बार उन्होंने जो कह दिया फिर उस बात से वह पलटते नहीं थे। सभी को उनके पुत्र अखिलेश यादव से भी इसी आचरण की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को चिकित्सा सुविधा देने की घोषणा कर दी तो इसे तत्काल लागू किया जाना चाहिए।
आईबीएन7 के ब्यूरो चीफ शलभ मणि का कहना है कि सपा के लोग हमेशा कहते थे कि बसपा की सरकार तानाशाही तरीके से चलती है। मगर अफसर इस सरकार को भी उसी दिशा में धकेलने का काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार की रफ्तार सुस्त है, जो काम तीन महीने में हो जाना चाहिए वह छह महीने में पूरा हो रहा है। अफसर कभी नहीं चाहेंगे कि सरकार और मीडिया के संबंध बेहतर हों। मगर मुख्यमंत्री को खुद यह बात समझ लेनी चाहिए।
राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी का कहना है कि वह खुद इस संबंध में एक दर्जन से अधिक बार मुख्यमंत्री से कह चुके हैं। ऐसी स्थिति में सिर्फ दो ही बातें हो सकती हैं पहली यह कि या तो अफसर मुख्यमंत्री की सुनते नहीं है या फिर खुद अपनी कही बातों को टालना मुख्यमंत्री की अदा बन गयी है। जब मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से सौ से अधिक पत्रकारों के बीच पत्रकारों को पीजीआई में नि:शुल्क चिकित्सा की बात करते हों तो यह मुख्यमंत्री की घोषणा सेल का दायित्व है कि वह इसे लागू करने की सार्थक पहल करे।
रायटर के ब्यूरो चीफ वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का भी मानना है कि यह साफ संदेश जा रहा है कि मुख्यमंत्री अपनी बात को प्रभावी ढंग से लागू नहीं करवा पाते। यह उनके लिए तथा उनकी पार्टी के लिए शुभ संदेश नहीं है। राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सचिव और बिजनेस स्टैडर्ड के यूपी के ब्यूरो चीफ सिद्धार्थ कालहंस के तेवर इस मामले में और कटु हैं। उनका कहना है कि अगर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को यह नहीं समझ में आ रहा कि इन्हीं अफसरों ने मायावती का बेड़ा गर्क किया था तो यह उनका दुर्भाग्य है। उन्होंने कहा कि समिति के पदाधिकारी एक बार फिर मुख्यमंत्री से मिलकर मांग करेंगे कि पत्रकारों को उनका हक दिया जाये।
जाहिर है मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का जो फैसला मीडिया में उन्हें लोकप्रिय बना सकता था उस फैसले को नौकरशाही नहीं पूरा होने दे रही। नौकरशाही के जलवे का नमूना बीते सप्ताह उस समय देखने को मिला जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने घर पर पत्रकारों को बुलाया था। मौका था किसानों के ऋण को माफ करने की योजना भी घोषणा का। मंच पर मुख्यमंत्री अपने कई और मंत्रियों और मुख्य सचिव जावेद उस्मानी के साथ बैठे थे। इसी बीच काबीना मंत्री बलराम यादव वहां पहुंचे, होना यह चाहिए था कि मुख्य सचिव अपनी कुर्सी छोड़कर साइड में आते। मगर मुख्य सचिव ने कुर्सी छोड़ना तो दूर कुर्सी से खड़े भी नहीं हुए।
इससे पहले भी वह मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से बुके देने से इनकार करके अपना जलवा दिखा चुके हैं। जाहिर है कि जब सूबे में नौकरशाही का यह जलवा हो कि काबीना मंत्री को ही कुछ न समझा जा रहा हो तब यह मानना कि मीडिया से जुड़े लोगों के हित में कुछ काम हो पायेंगे बेमानी ही लगता है।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.






