सहारा समूह की कंपनियों को उच्चतम न्यायालय ने अतिरिक्त समय देने से आज इनकार कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को इस बात की अनुमति दे दी कि अगर ये कंपनियां तकरीबन तीन करोड़ निवेशकों से जुटाई गई 24,000 करोड़ रुपये के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं देतीं हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
उच्चतम न्यायालय ने इस साल 31 अगस्त को अपने फैसले में सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन को आदेश दिया था कि आम लोगों जुटाई गई रकम वह सेबी के पास जमा कराए और उसे निवेशकों से संबंधित मूल दस्तावेज भी सौंपे। सहारा समूह ने यह कहते हुए दस्तावेज जमा कराने के लिए अतिरिक्त समय मांगा था कि इसके लिए उसे काफी आंकड़े जुटाने होंगे। सहारा समूह 10 सितंबर की निर्धारित तरीख तक आंकड़े उपलब्ध कराने में विफल रहा, जिसके बाद सेबी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
जब सहारा ने आज एक बार फिर अदालत का रुख किया तो न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाले पीठ ने वकील से कहा कि इस मामले का निपटारा कर दिया गया है। अब इस आदेश का अनुपालन होना चाहिए। यदि कंपनियां ऐसा करने में विफल रहती हैं, तो उनकी संपत्ति कुर्क की जा सकती है और बैंक खाते सील किए जा सकते हैं।
सहारा ने पहले प्रतिबद्घता जताई थी कि वह नवंबर के अंत तक सभी दस्तावेज सौंप देगा। समूह ने उस फैसले के खिलाफ पहले से ही पुनर्विचार याचिका दायर कर रखी है, जिसमें कहा गया था कि वैकल्पिक रूप से पूरी तरह परिवर्तनीय डिबेंचर (ओएफसीडी) योजना अवैध है, जिसके जरिये रकम जुटाई गई है। अदालत ने अपने आदेश के अनुपालन की निगरानी के लिए सेवानिवृत न्यायाधीश बी एन अग्रवाल की नियुक्ति की थी। उन्होंने कथित तौर पर कहा है कि सहारा समूह सेबी को दस्तावेज सौंपने में विफल रहा है। (बीएस)