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सैलरी को लेकर जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में पेजीनेटरों का हंगामा

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में फिर एक बार सैलरी को लेकर बवाल देखने को मिला. प्रबंधन ने अपने उन कर्मचारियों की सैलरी तो दे दी, जिनकी सैलरी खाते में जाती है, परन्‍तु नगद पैसा पाने वालों को सैलरी नहीं मिल पाई. बताया जा रहा है कि यहां पर दो तरह की व्‍यवस्‍था लागू है. कुछ कर्मचारियों की सैलरी सीधे उनके खाते में जाती है, जबकि तमाम को नकद पैसा दिया जाता है. हालांकि इसके बारे में आरोप लगाया जाता है कि यह ब्‍लैकमनी को सफेद करने की कोशिश में होता है. खैर.

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में फिर एक बार सैलरी को लेकर बवाल देखने को मिला. प्रबंधन ने अपने उन कर्मचारियों की सैलरी तो दे दी, जिनकी सैलरी खाते में जाती है, परन्‍तु नगद पैसा पाने वालों को सैलरी नहीं मिल पाई. बताया जा रहा है कि यहां पर दो तरह की व्‍यवस्‍था लागू है. कुछ कर्मचारियों की सैलरी सीधे उनके खाते में जाती है, जबकि तमाम को नकद पैसा दिया जाता है. हालांकि इसके बारे में आरोप लगाया जाता है कि यह ब्‍लैकमनी को सफेद करने की कोशिश में होता है. खैर.

अभी मामला ये है कि सोमवार को नगद सैलरी पाने वाले पेजीनेटर अमन कुमार कुमार को नवम्‍बर की सैलरी नहीं मिली. नाराज अमन ने सोमवार को कार्यालय में सैलरी के लिए हंगामा कर दिया, जिससे काम प्रभावित होने लगा. जिसके बाद विजय विनीत ने अपने पास से अमन को पैसा देकर मामले को बिगड़ने से बचाया, जिसके बाद किसी तरह अखबार का काम पूरा हुआ.

मंगलवार की रात फिर बवाल हो गया. सात पेजीनेटरों ने सैलरी को लेकर हड़ताल कर दिया. उन लोगों ने काम करने से इनकार कर दिया. प्रबंधन के हाथ-पांव फूल गए. सातों पेजीनेटर किसी भी तरीके से बिना सैलरी के मानने को तैयार नहीं थे. वे विजय विनीत की भी बात मानने को तैयार नहीं थे. सूत्रों का कहना है कि बाद में सीजीएम के हस्‍तक्षेप के बाद किसी तरह मामला सलटा. इन लोगों ने किसी तरह पैसे का जुगाड़ कर सभी सातों पेजीनेटरों को उपलब्‍ध करवाया, जिसके बाद अखबार का फिर से काम शुरू हो सका.

वैसे भी सूत्रों का कहना है कि जिस तरह से अखबार की आंतरिक स्थिति है तथा अखबार में जूनियर लेबल के लोगों का हस्‍तक्षेप बढ़ा है, उससे अखबार को चला पाना बहुत ही मुश्किल है. पेज का लेआउट का एबीसी नहीं जानने वाले लोग इसमें हस्‍तक्षेप करने लगे हैं तभी से इस तरह की स्थिति पैदा हुई है. सूत्र यह भी बताते हैं कि प्रबंधन ने अब इस अखबार को घाटे की स्थिति में चलाने के मामले में हाथ खड़ा कर लिया है. कहा जा रहा है कि मार्च तक इस अखबार को ''पैसे लाओ और अखबार चलाओ'' की स्थिति में लाए जाने का निर्देश दे दिया गया है. अगर मार्च तक स्थिति नहीं सुधरी तो संभव प्रबंधन अपने इस सफेद हाथी पर ताला जड़ देगा. 

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