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सोशल मीडिया के जरिए खड़े आंदोलन क्‍या वास्‍तव में जन आंदोलन है?

सोशल मीडिया अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का एक अच्छा माध्यम है। इसमें अपनी बात कहने के लिए न तो धन या संसाधन की जरूरत है, न ही स्थापित मीडिया संस्थानों की सेवा लेने की। लोकतंत्र में मुद्दे पहचानना, उन पर जन-मानस को शिक्षित करना व इस प्रक्रिया से उभरी जन-भावना के जरिये सिस्टम पर दबाव डालना लोकतंत्र की गुणवत्ता के लिए बेहद जरूरी होता है। सोशल मीडिया इस काम को ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकता है, फिर मुनाफा कमाने के लिए चल रहे मीडिया को लेकर कुछ आशंकाएं भी बनी रहती हैं।

सोशल मीडिया अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का एक अच्छा माध्यम है। इसमें अपनी बात कहने के लिए न तो धन या संसाधन की जरूरत है, न ही स्थापित मीडिया संस्थानों की सेवा लेने की। लोकतंत्र में मुद्दे पहचानना, उन पर जन-मानस को शिक्षित करना व इस प्रक्रिया से उभरी जन-भावना के जरिये सिस्टम पर दबाव डालना लोकतंत्र की गुणवत्ता के लिए बेहद जरूरी होता है। सोशल मीडिया इस काम को ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकता है, फिर मुनाफा कमाने के लिए चल रहे मीडिया को लेकर कुछ आशंकाएं भी बनी रहती हैं।

पिछले दिनों देश में हुए विभिन्न आंदोलनों में सोशल मीडिया की भूमिका जबर्दस्त थी। लेकिन क्या सोशल मीडिया के जरिये खड़े किए गए आंदोलन को वास्तव में जन-आंदोलन माना जा सकता है? और इसमें जोखिम क्या हैं? तथ्यों की अल्प जानकारी, तर्क-शास्त्र की कमजोर समझ और भावनात्मक अतिरेक में बहने की आदत कई बार सोशल मीडिया के इस्तेमाल में भयंकर गलती का सबब बन जाते हैं। मई महीने में बुलंदशहर के एक युवा ने फेसबुक पर किसी संप्रदाय विशेष के बारे में कुछ लिख दिया, नतीजा यह हुआ कि अगले दिन मेरठ में सांप्रदायिक दंगे की नौबत पैदा हो गई।

अमूर्त और गैर-जिम्मेदार सोशल मीडिया का एक पहलू तो बेहद खतरनाक है। इस मीडिया के सहारे दुनिया भर में कहीं भी बैठा कोई भी एजेंट किसी भी देश में दंगे भड़काने का काम कर सकता है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोगों को बहकाने और भरमाने के लिए हो सकता है। पारंपरिक मीडिया भले ही मुनाफा कमाने के लिए काम कर रहा हो, मगर सत्य से हटने या न दिखाने अथवा असत्य दिखाने से दर्शकों-पाठकों द्वारा वह अंत में खारिज कर दिया जाता है। खारिज होने के बाद न तो उसे विज्ञापनदाता पूछता है, न ही सरकार उसका संज्ञान लेती है। बाजार के सिद्धांत के तहत भी उसे जाने-अनजाने जन उपयोगी बनना ही पड़ता है। फिर औपचारिक मीडिया स्थूल है।

टेलीकास्ट लाइसेंस या अखबार का रजिस्ट्रेशन व्यक्ति के नाम होता है और वह देश के तमाम कानूनों से बंधा होता है। जो कुछ भी कहा, लिखा या दिखाया जा रहा है, उसकी पूरी-पूरी जिम्मेदारी संपादक पर होती है। सोशल मीडिया पर इस तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। वह न तो मूर्त होता है, और न ही उस पर अंकुश लगाए जा सकते हैं। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में बलात्कार की घटना को पूरी तरह सोशल मीडिया ने ही उठाया। पहले इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया ने अपनी सार्थकता और प्रतिबद्धता दिखाते हुए इसे दो दिनों  तक जबर्दस्त रूप से छापा और दिखाया। तब जाकर सोशल मीडिया के जरिये इस पर प्रतिक्रियाएं आने लगीं। लेकिन जिस तरह सोशल मीडिया के जरिये एक इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ उससे अब और ज्यादा सतर्क होने की जरूरत महसूस होने लगी है।  

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लेख हिंदुस्‍तान में प्रकाशित हो चुका है.

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