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स्व-नियंत्रण की सुविधा केवल मीडिया को ही क्यों?

जिस तरह किसी आतंकी पर किये गए कार्रवाई को मज़हब विशेष के लिए खतरा निरूपित कर दिया जाता है, जैसे किसी अनुशासनहीन सरकारी कर्मचारी के अनुशासनहीनता के खिलाफ लिए गये निर्णय को (सन्दर्भ : बिहार विधान परिषद के दो अधिकारियों का निलंबन) उसके जाति के आधार पर दलित या पिछड़ा उत्पीड़न घोषित कर दिया जाता है, उसी तरह अगर आपने समाचार माध्यमों खास कर इलेक्ट्रानिक मीडिया पर कोई भी सवाल उठाया नहीं कि बस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे में होने का राग अलापना शुरू कर दिया जाता है. मानो इस संवैधानिक आज़ादी का सारा कापीराइट केवल मीडिया के पास ही है.

जिस तरह किसी आतंकी पर किये गए कार्रवाई को मज़हब विशेष के लिए खतरा निरूपित कर दिया जाता है, जैसे किसी अनुशासनहीन सरकारी कर्मचारी के अनुशासनहीनता के खिलाफ लिए गये निर्णय को (सन्दर्भ : बिहार विधान परिषद के दो अधिकारियों का निलंबन) उसके जाति के आधार पर दलित या पिछड़ा उत्पीड़न घोषित कर दिया जाता है, उसी तरह अगर आपने समाचार माध्यमों खास कर इलेक्ट्रानिक मीडिया पर कोई भी सवाल उठाया नहीं कि बस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे में होने का राग अलापना शुरू कर दिया जाता है. मानो इस संवैधानिक आज़ादी का सारा कापीराइट केवल मीडिया के पास ही है.

मोटे तौर पर मीडिया के लिए यह आज़ादी एक अफीम के सामान ही हो गया है, जिसके उन्माद में उन्हें खुद पर किसी तरह का सवाल उठाया जाना गंवारा नहीं. अभी प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू के इलेक्ट्रानिक मीडिया संबंधित मंतव्य पर जिस तरह से सभी मीडिया संगठन और संपादक टूट पड़े हैं, उससे तो यही लगता है कि खुद सारे देश की अभिव्यक्ति संबंधी आज़ादी का उपभोग करने वाले इस माध्यम के पास किसी अन्य को ऐसी आज़ादी का उपयोग करने देना रत्ती भर भी गंवारा नहीं.

प्रेस द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी का उपयोग करने के संबंध में दो बातें बार-बार दोहराने की ज़रूरत है. पहला ये कि यह आज़ादी अलग से केवल समाचार माध्यमों को नहीं दिया गया है. वह आम आदमियों को संविधान द्वारा प्रदान की गयी आज़ादी है, पत्रकार-संपादक भी जिसका उपयोग एक आम नागरिक के बतौर ही कर सकते है. उन्हें पत्रकार होने के कारण संविधान ने कोई विशिष्ट दर्ज़ा नहीं दिया है. दूसरी बात यह कि यह आज़ादी भी बिना किसी शर्त के और स्वछंदता से उपयोग करने के लिए नहीं है. संविधान के जिस अनुच्छेद (19) के द्वारा नागरिक को यह आज़ादी दी गयी है उसी अनुच्छेद में इस आज़ादी पर युक्ति-युक्त निबंधन भी लगाया गया है. संविधान के सोलहवें संशोधन के द्वारा खास तौर पर ‘राज्य की लोक व्यवस्था, शिष्टाचार और सदाचार के खिलाफ या भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुचाने वाले’ किसी भी अभिव्यक्ति को साफ़ तौर पर प्रतिबंधित किया गया है. न्यायालयों ने संतोष सिंह बनाम दिल्ली सरकार, शैलबाला बनाम बिहार सरकार समेत कई मामलों में बार-बार यह व्यवस्था दी है कि ऐसे किसी प्रतिबन्ध के उल्लंघन दंडनीय भी होंगे. 

अभी तक अक्सर यह देखा गया है कि जब भी आप मीडिया को किसी भी तरह के संवैधानिक नियमन के अंतर्गत लाने का प्रयास करेंगे तो संबंधित पक्षों के साथ-साथ दबाव में सरकार भी स्व-नियंत्रण का राग अलापना शुरू कर देती है. सवाल यह है कि लोकतंत्र या समाज के किसी भी अनुषंग को अगर ऐसी सुविधा नहीं दी गयी है तो केवल मीडिया को ही क्यूं खुद ही नियंत्रित हो जाने दें. तुलसी ने कहा है ‘समरथ को नहि दोष गुसाईं’ यानी अगर आप सामर्थ्यवान होंगे तो खुद का दोष देखेंगे ही नहीं. अगर प्रसार माध्यमों की ही बात करें तो सिनेमा का उदाहरण लिया जा सकता है. इस विशुद्ध कथात्मक माध्यम के बारे में हर देखने वाला यह जानता है कि वह वह इसे केवल मनोरंजन के लिए ही देख रहा है. निर्माता-निर्देशक भी सामान्यतः कभी सच्चाई दिखाने का दावा नहीं करते. फिर भी उसे प्री-सेंसरशिप से गुजरना होता है. करोड़ों खर्च कर देने के बाद भी फ्रेम-दर-फ्रेम का हिसाब फिल्म प्रमाणन बोर्ड को देकर ही, उसके मंतव्य अनुसार फिल्मों की श्रेणी लेकर ही वह जनता के लिए उपलब्ध होता है. ऐसे में सच हर कीमत पर दिखाने का दावा करने वाले मीडिया जो साफ़ तौर गैर कथात्मक माध्यम है आखिर उसके नियमन के लिए, शिकायत मिलने पर कम से कम प्रसारण के पश्चात ही उसके परीक्षण के लिए कोई व्यवस्था होने देने में दर्ज़नों अन्य रेगुलेटरों की तरह मीडिया के नियमन के लिए एक अलग से निकाय बनाए जाने के विचार में आखिर बुराई क्या है?

जस्टिस काटजू ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र और एक अखबार को लिखे आलेख के माध्यम से मीडिया का सबसे बड़ा दोष यह बताया है कि वह अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों से अ-वास्तविक मुद्दों की ओर भटकाता है. आप याद कीजिये. रामलीला मैदान में बाबा रामदेव समेत शांतिपूर्ण धरना दे रहे हज़ारों नागरिकों पर हुए बर्बर अत्याचार के अगले दिन मुख्य विपक्षी दल द्वारा राजघाट पर धरने का आयोजन था. लेकिन सरकारी दल द्वारा एक शिगूफा छोड़ देने के बाद अगले दिन बड़े और जिम्मेदार कहे जाने वाले चैनलों में घंटों चलने वाले बहस का केवल एक बिंदु था कि राजघाट पर नेत्री को नाचना चाहिए या नहीं. इससे पहले छत्तीसगढ़ में नक्सल हमले में पुलिस अधीक्षक समेत तीस जवान शहीद हो गए थे तब भी बाबी डार्लिंग का एक बयान इलेक्ट्रानिक चैनलों की सुर्खियां थी या जब वहां के बस्तर में ही नक्सलियों ने टावर गिरा कर बिजली आपूर्ति पूरी तरह से बाधित कर सत्ताइस लाख से अधिक आदिवासियों को हफ़्तों अँधेरे में रहने को मजबूर किया था, उस समय भी केवल आरुषी को ‘न्याय’ दिलाने में सारे चैनल लगे हुए थे.

जैसा कि उस लेख में काटजू ने वर्णित किया है कि जब मुंबई में एक फैशन वीक को कवर करने के लिए पांच सौ से अधिक पत्रकार एकत्रित थे वहीं उसी महाराष्ट्र में उस कपडे़ को पैदा करने वाले कपास उत्पादक किसानों द्वारा किया जाने आत्महत्या की सुध लेने वाला एक-दो स्थानीय पत्रकारों के अलावा कोई नहीं था. बात चाहे चुनावों में खबरे बेचने का हो, अंधविश्वासों को महिमामंडित करने, सांप-सापिन-सावंत बेचने का. पिछले दशकों में बार-बार मीडिया ने इस तरह के दर्ज़नों नजीरों से यह साबित किया है कि उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी ‘बाजार’ के प्रति है. तो जब मीडिया की नज़र में दर्शक केवल उपभोक्ता बन जाय और उनके लिए खबर जब एक उत्पाद से ज्यादा कुछ न हो तो ऐसे में यह तंत्र के लिए यह आवश्यक है कि व्यवसायों के सारे विधि-निषेध मीडिया पर भी लागू किया जाय.

एक प्रख्यात विद्वान एवं कानूनविद, सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत जज एवं संप्रति प्रेस काउंसिल के चेयरमैन होने के नाते जस्टिस काटजू को मीडिया के बारे में अपना विचार रखने का पूरा अधिकार है. जब प्रेस परिषद का गठन हुआ था तब चूंकि टेलीविजन चैनलों का अस्तित्व ही नहीं था. तो ज़ाहिर है केवल मुद्रित माध्यमों को ही इसके दायरे में लाया गया. नयी-नयी मिली आज़ादी में प्रशंसनीय भूमिका अदा करने के कारण तब प्रेस का एक आभा मंडल निर्मित हुआ था. अतः परिषद को किसी भी तरह से दंड देने का अधिकार भी नहीं दिया गया था. लेकिन तब कौंसिल द्वारा केवल निंदा कर दिया जाना ही किसी भी प्रेस के लिए बड़ी लज्जाजनक बात हुआ करती थी. कुछ-कुछ उस कहानी की तरह जिसमें अपराधी को बादशाह द्वारा भरी सभा में फटकार लगा दिया जाना ही उसके लिए आत्महत्या का सबब बन गया था.

आज नए मीडिया के रूप में वेब माध्यम भी तेज़ी से स्थान बनाते जा रहे हैं. उनको रेगुलेट करने के लिए भी आईटी एक्ट में ढेर सारे प्रावधान किये गए हैं. तो बदली हुई परिस्थितियों में यह ज़रूरी है कि सभी सामाचार माध्यमों को न केवल प्रेस कांसिल के दायरे में लाया जाय बल्कि नख-दंत विहीन संस्था के रूप में सहानुभूति या उपहास का पात्र बन रहे उस परिषद के अधिकार क्षेत्र में विस्तार कर, ज़रूरत होने पर उसे दंड देने का न्यायिक अधिकार भी दिया जाय. कोई भी व्यक्ति या संस्था अपने आप में कमजोरियों का पुतला ही होता है. यहां स्व-नियंत्रण जैसी कोई चीज़ होती नहीं. एक विचारक ने कहा भी है कि अगर आपके पास खुद के लिए चयन का विकल्प हो तो आप हमेशा गलत विकल्प ही चुनेंगे.

लेखक पंकज झा छत्‍तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

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