भारत और पाकिस्तान के ब्रिगेडियरों की ‘फ्लैग-मीटिंग’ से कुछ आशा बंधी थी, लेकिन वह बेकार सिद्ध हुई। यदि पाकिस्तानी ब्रिगेडियर को उसी की जुगाली करनी थी, जो उनका फौजी प्रवक्ता कहता रहा है तो यह फ्लैग-मीटिंग आखिर बुलाई ही क्यों? शायद इसलिए बुला ली हो कि हमारे सेनाध्यक्ष और वायुसेनाध्यक्ष, दोनों के बयानों में वह तुर्शी थी, जो युद्ध जैसे माहौल में दिखाई पड़ती है। पाकिस्तानी सरकार को भारतीय जनता के गुस्से का भी थोड़ा-बहुत अंदाजा रहा होगा। पाकिस्तान का कहना है कि भारत के दो जवानों की हत्या किसने की, कब की, कहां की; इसका उसे कुछ पता नहीं। यानी ये हत्याएं भारत ने करवाई हैं?
भारत को ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी है कि वह यह खतरनाक खेल खेलेगा? भारत सरकार इतना दुस्साहस इस मौके पर कर ही नहीं सकती। वह तो पहले से ही बड़ी सांसत में है। लोकपाल, कालाधन, ‘निर्भया’ आदि मामलों ने भारत की जनता को पहले ही इतना भड़का रखा है कि वह यह नई बला मोल क्यों लेने लगी? और फिर यह न भूलें कि यह भारत है। यह पाकिस्तान या चीन नहीं है। यहां सरकार के हर दांव को उजागर करने की क्षमता हमारे पत्रकारों और नेताओं में है। यदि नियंत्रण-रेखा पर यह काम सरकार ने करवाया है, ऐसा शक भी हो जाए तो यह सरकार एक मिनट भी सत्ता में नहीं रह सकती। इसीलिए भारत सरकार के मत्थे मढ़ने की पाकिस्तानी कोशिश बिल्कुल बेजा है।
हां, पाकिस्तान की सरकार इन हत्याओं के लिए जरूर जिम्मेदार हो सकती है। यहां सरकार से मेरा मतलब जरदारी सरकार से नहीं है। पाकिस्तान की असली सरकार से है। वह है, फौज। पाकिस्तान की फौज भयंकर दुविधा में फंसी है। कुछ दिन पूर्व ही पाक सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज कयानी ने बयान दिया था कि पाकिस्तान का असली दुश्मन बाहरी नहीं है, यानी भारत नहीं है। अंदरूनी है, यानी उनके मुल्क में पसरे दहशतगर्द हैं। लेकिन उनकी फौज ने एक सप्ताह में ही हवा बिगाड़ दी।
इसका क्या अर्थ लगाया जाए? पाकिस्तान की फौज भी बेकाबू है? सेनाध्यक्ष के अलावा भी कई जिहादी और मजहबी तत्व हैं, जो उनकी फौज पर गहरा प्रभाव रखते हैं? या फिर कयानी का बयान सिर्फ दिखावटी था? जो भी हो, इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान भारत के प्रति दुश्मनी का भाव रखता है। यदि ऐसा नहीं होता तो फ्लैग-मीटिंग के नतीजे कुछ और ही होते। पाकिस्तान अपनी ‘भूल’(अपराध) स्वीकार कर लेता तो सद्भाव की नींव मजबूत होती। भारत क्रोधित तो होता, लेकिन वह इसे बर्दाश्त कर लेता। मगर पाकिस्तान ने अपनी गलती स्वीकार करने की बजाय एक पूर्व-निर्धारित पैंतरा मार दिया। उसने कह दिया कि संयुक्त राष्ट्र संघ से जांच करवा लें। यानी जले पर हम नमक छिड़कवा लें। मुझे तो डर लगता है कि यह सारा नाटक कहीं कयानी के उस बयान को धोने के लिए तो नहीं किया गया है, जो भारत से निरापद होने की घोषणा कर रहा था? संयुक्त राष्ट्र संघ को बीच में लाकर कहीं कश्मीर के गड़े मुर्दे को उखाड़ने की कोशिश तो नहीं है?
यह भी हो सकता है कि यह पाकिस्तानी विदेश नीति के नवीनतम अध्याय का आरंभ हो। वैसे पाकिस्तान में विदेश नीति नाम की कोई चीज नहीं है। वह अपनी भारत नीति को ही विदेश नीति कहता है। वह भारत-भय से ग्रस्त है। उधर वॉशिंगटन में अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई से बराक ओबामा अफगानिस्तान खाली करने की बात दोहरा रहे हैं और इधर कयानी भारत पर खम ठोक रहे हैं। खाली अफगानिस्तान को कौन भरेगा? पाकिस्तान भरेगा। पहले वह तालिबान को भेजेगा और फिर खुद पहुंच जाएगा। इस मनोरथ की सबसे बड़ी बाधा भारत ही है। भारत ने अपना माल, फौज और रसद पहुंचाने के लिए देलाराम-जरंज सड़क बना ही ली है। उसे पाकिस्तान के भरोसे रहने की अब जरूरत नहीं है। वह ईरान होकर आसानी से काबुल पहुंच सकता है। इस आशंका को निमरूल करने का एक तरीका यह भी है कि कश्मीर का तवा फिर से गर्म कर दो।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सारे जिहादी तत्वों को अभी से कश्मीर में भिड़ा दो। भारत अपनी ही उलझन में इतना फंस जाएगा कि अफगानिस्तान के बारे में सोच भी नहीं पाएगा। अब तक मुंबई हमले जैसी घटनाओं के लिए भी पाकिस्तान फौज व सरकार ‘गैर-सरकारी तत्वों’ को दोष देकर अपना पल्ला झाड़ लेती थी, लेकिन नियंत्रण-रेखा पर हुए इस कांड के लिए सीधे फौज ही जिम्मेदार है। यूं तो दुनिया की किसी भी नियंत्रण रेखा पर फौजी झड़पें होती रहती हैं और जवान हताहत भी होते हैं, लेकिन इस घटना में से दूर की घंटियों की आवाज सुनाई दे रही है।
अब क्या किया जाए? हमारे शीर्ष कहे जाने वाले नेताओं की चुप्पी पर सब चकित हैं। फौजियों के बयान हाथी दांत की तरह सिर्फ दिखावे भर के लगते हैं। सख्त बयान का मतलब युद्ध का शंखनाद नहीं है। सिर्फ अपनी जनता के घाव पर मरहम रखना है। लेकिन वे क्यों रखें? वे जहां हैं, वहां क्या उन्हें जनता ने बिठाया है? संयम रखें, यह जरूरी है, लेकिन वे तो अन्ना हजारे के उलट-रूप दिखाई पड़ रहे हैं। एक युद्ध की दहाड़ लगा रहा है और दूसरा मौन की दहाड़ मार रहा है। देश हतप्रभ है। जाहिर है कि इस मुद्दे ने पाकिस्तान को उतना नहीं झकझोरा है, जितना हिंदुस्तान को। शहीद जवानों के परिजनों ने यहां भारी जनाक्रोश पैदा कर दिया है। वहां १२ शिया हजाराओं की हत्या और ताहिर-उल-कादरी के अभियान सुर्खियों में हैं। पाकिस्तान के संकटग्रस्त नेताओं से सीधी बात करने की हिम्मत हमारे नेता क्यों नहीं करते? यदि पाकिस्तानी नेताओं के दिल में हम कुछ लिहाजदारी पैदा कर पाते तो शायद वे अपने फौजी नेताओं से भी बात करते। हमारी पहल की इस कमी ने अब तक हुई भारत-पाक सद्भाव यात्रा में रोड़े अटका दिए हैं। मेरी समझ में नहीं आता कि हम दो-टूक बात क्यों नहीं करते?
लेखक वेद प्रकाश वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह लेख दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है.






