न्यायालय से सज़ा पा चुके व्यक्ति को चुनाव में भाग लेने के अधिकार को लेकर बहस चल रही है। वाकई, गंभीर मुद्दा है, जिस पर न्यापालिका को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। देर-सवेर इस तरह का स्पष्ट क़ानून आ भी जाएगा, जिससे राजनीति में सुधार होने की संभावनाएं बढ़ जायेंगी, लेकिन फिलहाल नैतिकता के स्वयं-भू ठेकेदार मीडिया की बात करते हैं। दुनिया को आईना दिखाने वाले मीडिया ने खुद के लिए कोई लाइन नहीं बनाई है। जातिवाद, भ्रष्टाचार और शोषण यहाँ भी चरम पर ही है। हालांकि सोशल मीडिया ने लगाम लगाई है, लेकिन अभी सुधार की दिशा में संकेत तक नहीं मिल रहे हैं।
बात हिन्दुस्तान अखबार की करते हैं। जनपद बदायूं के इस्लामनगर में कार्यरत संवाददाता सुनील मिश्र को एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषी पाए जाने पर विशेष न्यायाधीश द्वारा 20 अप्रैल 2007 को तीन वर्ष और पांच हजार रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई जा चुकी है। हाईकोर्ट में अपील के चलते जेल से बाहर है, लेकिन सवाल उठता है कि ऐसे व्यक्ति को रिपोर्टर बनाना चाहिए या नहीं? सूत्रों का कहना है कि हिन्दुस्तान की बरेली में लॉचिंग के समय उस समय के संपादक के संज्ञान में यह जानकारी थी, लेकिन जातिवाद और सेटिंग के चलते सुनील मिश्र को संवादददाता नियुक्त कर दिया गया था।








