11 पारिवारिक कहानियां : रिश्‍तों के जाल में उलझे कुछ किस्‍से

दुनिया और समाज चाहे जितने बदल जाएं परिवार और परिवार की बुनियाद कभी बदलने वाली नहीं है। माहेश्वर तिवारी का एक गीत है, 'धूप में जब भी जले हैं पांव, घर की याद आई !' सार्वभौमिक सच यही है। भौतिकता की अगवानी में आदमी चाहे जितना आगे बढ़ जाए, जितना बदल जाए परिवार के बिना वह रह नहीं सकता और परिवार उस के बिना नहीं रह सकता। कहा ही जाता है कि कोई भी घर छत, दीवार और दरवाजे से नहीं बनता। घर बनता है आपसी रिश्तों से।

बहुत पुराना फ़िल्मी गाना है, ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर तो मुझ से आ के मांग ले तेरी नज़र, मेरी नज़र! घर की तफ़सील की इबारतें और भी कई हैं। बस देखने की अपनी-अपनी नज़र है। इस संग्रह में संग्रहित ग्यारह कहानियों में भी परिवार का यह उतार-चढ़ाव, यह बुनावट, यह संवेदना आप को निरंतर मथती मिलेगी। बड़की दी का यक्ष प्रश्न संयुक्त परिवार की भावनाओं और ज़िम्मेदारियों की ही कहानी है। बाल विधवा बड़की दी की यातना सारे परिवार की यातना बन जाती है। चाहे मायका हो, चाहे ससुराल ! हर कोई बड़की दी का तलबगार है। सब के सब बड़की दी में अपना आसरा ढूंढ़ते हैं। लेकिन यही बड़की दी जब वृद्ध होती है तो अपना आसरा, अपनी इकलौती बेटी में ढूंढ़ती है। अपनी बेटी के प्रति वह इतनी आशक्त हो जाती है, इतनी पजेसिव हो जाती है कि उस के बिना रह नहीं पाती। उस के साथ रहने चली जाती है। तो जैसे कोहराम मच जाता है। परिवार का बना-बनाया ढांचा टूट जाता है। लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। क्या मायका, क्या ससुराल। हर कहीं बड़की दी की थू-थू होने लगती है।

और जब बड़की दी अपना सब कुछ बेटी के नाम लिख देती है तो जैसे तूफान-सा आ जाता है। और बड़की दी अकेली पड़ जाती है। बेटी को कैंसर हो जाता है। बड़की दी असहाय हो जाती है। बड़की दी का यक्ष प्रश्न में बड़की दी की यातना को बांचना किसी भी भारतीय विधवा स्त्री की यातना को बांचना है। सुमि का स्पेस कहानी में कैरियर और विवाह के बीच झूलती एक लड़की की कहानी है। सुमि कैसे तो अपने कैरियर के फेर में पड़ कर विवाह को टालती जाती है, यह परिवार के नित बदलने और युवाओं की छटपटाहट की अद्भुत कहानी है। सुमि अंततः अपना कैरियर चुनती है। न सिर्फ अपना कैरियर चुनती है बल्कि अपनी बहन को भी खींच लाती है। इस कैरियर की दौड़ में। यह सुमि का अपना स्पेस है जहां परिवार भौचक हो कर खड़ा ताकता रहता है और वह आगे बढ़ जाती है। संगम के शहर की लड़की भी शादी के छल-कपट की मारी हुई है।

दहेज और पुरुष के दूसरे विवाह की यातना की मारी यह लड़की पारिवारिक अदालत में चक्कर लगाने को मजबूर हो जाती है। सिंदूर लगाते ही तलाक के दंश का दाहक विवरण अगर पढ़ना हो तो संगम के शहर की लड़की को पढ़ा जा सकता है। सूर्यनाथ की मौत कहानी में संयुक्त परिवार जैसे एक बार फिर लौटता है। परिवार के बच्चे एक साथ दिल्ली घूम रहे हैं सूर्यनाथ के साथ। सूर्यनाथ की प्राथमिकताएं गांधी की हत्या की जगह बिरला भवन, राष्ट्रपति भवन, नेशनल म्यूजियम आदि हैं तो बच्चों की प्राथमिकता पर मेट्रो और माल हैं। परिवार के मुखिया और बच्चों की सोच में बदलाव और प्राथमिकता की जो धड़कन है, बाज़ार और मूल्यों की जो मार है वह एक साथ सूर्यनाथ की मौत में उपस्थित हैं। घोड़े वाले बाऊ साहब एक निःसंतान दंपति की कथा तो है ही, सामंती अवशेष और उस की ऐंठ की पड़ताल भी इस कहानी में दिलचस्प है।

मन्ना जल्दी आना परिवार की ऐसी त्रासदी में डूबी कहानी है जो सरहदें लांघती मिलती है। अब्दुल मन्नान देश-दर- देश बदलते हैं एक साज़िश का शिकार हो कर लेकिन अगर वह भारत देश से फिर भी जुड़े रहते हैं तो वह परिवार और पारिवारिक विरासत के ही चलते। यहां तक कि तोता भी उन के परिवार का अटूट हिस्सा बन जाता है। मन्ना जल्दी आना में तमाम यातनाओं और मुश्किलों के बावजूद परिवार कैसे तो एकजुट रहता है। यह देखना अविरल अनुभव है। संवाद कहानी में पिता, पुत्र और विमाता के अर्तंसंघर्ष की कड़वी टकराहट है। कैसे दो पीढ़ियों का टकराव जिसे हम जनेरेशन गैप भी कह सकते हैं संवाद में हमारे रु-ब-रु है। तो भूचाल कहानी में एक मां और बेटे का संघर्ष, महत्वाकांक्षा, अपेक्षा और कुढ़न की अजीब कैफियत है।

जब मां कहती है कि बलात्कार से पैदा हुआ बेटा, बेटा नहीं होता ! तो उस मां की यातना, उस की तड़प का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। लेकिन परिवार तो परिवार है। वह टूटता है तो जुड़ता भी है। हर परिवार की यही कहानी है। राम अवतार बाबू कहानी में तो जीव-जंतु भी कैसे तो परिवार के अभिन्न सदस्य बन जाते हैं, देख कर कौतूहल होता है, आश्चर्य होता है। कन्हई लाल की मुश्किलें और हैं तो मेड़ की दूब की जिजीविषा और संघर्ष का ताना-बाना और है। सूखे का मारा पूरा गांव और परिवार का जीवन इस कहानी की इस इबारत में बांचा जा सकता है, ‘हम तो मेड़ की दूब हैं, काकी ! कितनी बार सूख कर फिर हरे हो गए। सूखना और फिर हरा होना, यही तो जिंदगानी है। और यह बज्जर सूखा सदा थोड़े ही रहेगा। इन ग्यारह पारिवारिक कहानियों के सारे रेशे, सारे तनाव और सारी भावनाएं परिवार की खुशियों, परिवार की अनिवार्यता और उसके तनाव से ही जुड़े हुए हैं। आमीन !

 -अब की पुस्तक मेले में मेरी तीन नई किताबें –

१-ग्यारह पारिवारिक कहानियां
[कहानी-संग्रह]
२-सात प्रेम कहानियां
[कहानी-संग्रह]
३-सिनेमा-सिनेमा
[सिनेमा से संबंधित लेखों और इंटरव्यू का संग्रह]

यह सभी किताबें जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित

दनपा
पुस्तक मेले में जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली के स्टाल पर आप को यह किताबें मिल सकती हैं।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *