धारा 377 आईपीसी पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर विचार

Amitabh Thakur : आज अप्राकृतिक सेक्स से सम्बंधित धारा 377 आईपीसी के विषय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्णय पर दिन भर काफी शोर-शराबा होता रहा. कई लोग जिनकी व्यक्तिगत अलग प्रकार की व्यक्तिगत पसंद है द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश की काफी खुली निंदा की गयी है. 
 
लेकिन यह उचित होता कि इस आदेश की आलोचना करने के पूर्व इसे पढ़ा गया होता और इसे इसकी सम्पूर्णता में देखा गया होता. 
 
इस आदेश को पढने के बाद मैं धारा 377 आईपीसी के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करता हूँ क्योंकि निर्णय में साफ़ कहा गया है कि पुलिस और कोर्ट के सामने मामले तभी आते हैं जब बिना मर्जी के बलपूर्वक अप्राकृतिक कृत्य किया जाता है जिन मामलों में कोर्ट स्वाभाविक तौर पर पीड़ित, चाहे वे बच्चे हों या महिलायें, को न्याय दिलाने को कृत-संकल्प होते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वे नहीं समझते कि कोर्ट सहमति से किये अप्राकृतिक कृत्य के मामलों में भी ऐसा ही कठोर रुख अख्तियार करेंगी. 
 
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि धारा 377 आईपीसी किसी समूह को आपराधिक नहीं घोषित करता है बल्कि यह मात्र कुछ कार्यों को अपराध बताता है. 
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मात्र उसके द्वारा जोर-जबरदस्ती से बिना मर्जी किये गए अप्राकृतिक कृत्य पर कड़ी कार्यवाही कराये जाने का प्रयास है और यह स्वागत योग्य है. 
 
अतः यह शायद उचित होता कि वे सारे लोग जो विधिक रूप से “अप्राकृतिक कृत्य” कहलाने वाले कार्य सहमति से कर रहे हैं इस आदेश को मानवाधिकार हनन का मामला बताते हुए इसकी निंदा करने की जगह इसे तमाम अन्य लोगों के मानवाधिकार रक्षा का निर्णय बताते क्योंकि ऐसे कानून के अभाव में तमाम लोगों पर यौन अपराध की संभावना बढ़ेगी ही. 
 
इस निर्णय को इसकी पूर्णता में देखने पर यह ज्ञात होगा कि यह आदेश तमाम पुरुषों, बच्चों और महिलाओं को अवांछनीय तथा अनुचित अप्राकृतिक यौन आक्रमण से बचाने का कार्य करेगा, अतः इस तरह के कार्यों से जुड़े लोगों को आत्मकेंद्रित होने के स्थान पर वृहत्तर सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सोचने की भी जरूरत है.
 
पुलिस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वाल से

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