झा जी कहिन (4) : क्‍या भैंस किसी चैनल मालिक के स्‍वीमिंग पूल में नाज नखरे दिखाएगी?

कुछ दिनों पहले एक खबरिया पोर्टल पर एक बहुत ही तेज-तर्रार खबरिया चैनल की भैंस भरी दोपहर में ही डूबते देखक लगा कि वाकई सहाफत एक भद्दा मजाक सा बनकर रह गया है। न्यूज रूम के चंडूखाने से लेकर आसातरीन अफसरान भी राई का पहाड़ बनाने में लगे हुए हैं। एंकर के लफ्ज़ थे कि ‘भैंस बेरहमी से डूब रही है बिल्कुल शीशे की तरह कान में जा घुसा’ अरे भाई भैंस अगर पानी में नहीं डूबेगी और उतराएगी तो क्या किसी चैनल मालिक के स्वीमिंग पूल में अपनी अदाएं या नाज़ नखरे दिखाएगी? और वैसे भी भैंस जब बाढ़ में भी कई कोस तैर कर अपना थन झाड़ लेती है तो ससुरी तालाब में अपना प्राण क्यों गंवायेगी?

उस पर से तुर्रा ये कि ‘भैंस को बचाना है आंदोलन’ का चीखता हुआ बैंड और एंकर का ये फरमान कि ‘मैं अपने कैमरामैन से दर्खास्त करूंगी कि वो भैंस की जद्दो-जहद हमारे दर्शकों को दिखाए’। फिर जिज्ञासा एक और बिच्छू डंक एंकर का सवाल कि भैंस को बचाने की जिम्मेदारी किस विभाग की है। ‘पर तो दिमाग भन्नाया‘ मगर उसके भी दिमागी दिवालियापन पर छक्का मारा रिपोर्टर महाशय ने ये कहते हुए कि हम आपको बता दें कि सरकार पूरी तरह से जिम्मेदार है… वगैरह वगैरह… और बाकी खबरें सूखने के बाद…।

अरे भाई ये क्या है? ‘क्या ये वाकई चैनल की भैंस या चैनलवालों की अक्ल की’ क्या भैंस डूबी या फिर रिपोर्टर और एंकर सहित न्यूज रूम के ठेकेदारों की आबरू भी? न्यूज चैनल खबरों का जखीरा हैं या फिर मसखरेपन का अड्डा बन गया है? खबरों की दुनिया क्या इतनी मुफलिस हो गई है? खबर्ची इतने जाहिल और ग़ाफिल हो गए हैं? या फिर सहाफत ही यतीम हो गया है? या फिर बदअखलाकी आसमान छू गई है?

एक नक्कारा और माजूर सहाफी ने अपनी चमड़ी बचाने के लिये पूरे चैनल के जमीर के उपर कब्जा कर लिया। और बाकी लोग इस नाकाबिले-बर्दाश्त बेवकूफी की जमकर मजम्मत करने के बदले अपनी अक्ल बेचकर उसी तमाशे में जलसे की तरह शरीक हो गए? मगर खबरिया चैनलों की नई सच्चाई ये भी है। संगीन या जदीद खबरों से रगब़त अब कम दिखाई देने लगी है। 123 करोड़ की आबादी वाले इस मुल्क में खबरों की भरमार है मगर हम आज भी यही दलील देते हैं कि हम वही दिखाते हैं जो जनता चाहती हैं इल्म की कमी का नज़ारा तो तभी से दिखना शुरू हो गया था, जब एक टीवी रिपोर्टर ने तत्कालीन गृह मंत्री स्वर्गीय इंद्रजीत गुप्ता से साक्षात्कार खत्म करने के बाद उनका नाम और विभाग पूछ लिया और मंत्रीजी सर पकड़कर बैठ गए थे।

जब जामियानगर में आतंकवादियों से मुठभेड़ के बाद पुलिस कमिश्नर एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे तो एक रिपोर्टर ने सवाल दागा कि आतंकवादियों को एके 47 राइफल का लाइसेंस किसने दिया था?

अब ऐसे में खबरिया चैलनों की फौज अपनी बेवकूफी और बेतुकेपन से आम जनता के उपहास का पात्र न बने तो और क्या बने? खबरिया चैनल मज़ाक का मुअम्मा बनने लगे हैं तो इसमें हैरत की क्या बात है? जब ऐसी महारत वाले रिपोर्टरों को अपराध से संबंधित संगीन खबरों पर रिपोर्ट करने के लिए भेजा जाता है तो उस रिपोर्टर से ज्यादा तौहीन उस चैनल की होती है जिसके लिए वो काम करता है। ये ही वजह है कि कुछ लोगों की निगाह में रिपोर्टर बनना सबसे आसान काम बन गया है। इसके लिए किसी विशेष योग्यता की आवश्कता नहीं है, बस थोड़ी सी शक्ल ठीक हो, एक दो नेताओं का वरदहस्त प्राप्त हो लंबे समय तक कैमरे के सामने जोरदार तरीके से अखण्ड बकवास करने की क्षमता और माइक का इस्तेमाल ‘शमशीर’ की तरह करना आता हो तो आपकी नौकरी पक्की।

कहा जाता है कि टेलीविजन न्यूज सेंकेंड्स का खेल है जो बड़ी से बड़ी खबर को 90 सेंकेंड में खत्म कर दें वहीं बाज़ीगर है, मगर ये बात लंबीचौड़ी फीस देकर कुछ खबरिया चैलनों द्वारा चलाए गए पत्रकारिता संस्थान की खान से निकले ‘कोहनूर‘ नहीं समझ पाते हैं। उनका सबसे बड़ा मकसद ये होता है कि किसी तरह चैनल पर शक्ल दिखाई दे जाए उसके बाद तो पूरा बाजार मुट्ठी में है। पत्रकारिता की इस पौध को खबर के आगे या पीछे की ज्यादा जानकारी इसलिए नहीं हो पाती और सबसे बड़ी त्रासदी तब होती है जब किसी एंकर को रिपोर्टिंग करने भेज दिया जाता है, जिसने कभी डेस्क पर काम नहीं किया खबर की चौहद्दी की बारीकी नहीं सीखी, जिसे माया, ममता और जयललिता के बीच फर्क नहीं मालूम ऐसे में लाइव रिपोर्टिंग में अगर वो सीबीआई और सीआईडी के बीच फर्क नहीं कर पातीं तो उनका क्या कसूर?

उससे से भी हैरतअंगेज है एसाइनमेंट डेस्क जो अब तक चैनल का दिल और धमनी माना जाता था मगर आज उसका गुर्दा बन गया है। ऐसे कई ‘न्यूजरूम’ जाकर देखिए तो वहां बैठे कई लोगों को देश का इतिहास-भूगोल का पता नहीं होता। उनके लिए कानपुर-नागपुर या मैसूर-बैंगलौर, दिल्ली के सरोजनीनगर-नौरोजीनगर जैसे लगते हैं। और जब उनके मुंह से हर दिन हैरतअंगेज फरमान जारी होता है तो हैरानी होती है।

मैं इसका कई बार भुक्तभोगी रहा हूं। एक वाकया याद आता है आजतक के दिनों का मैं किसी खबर खोजी के सिलसिले में मैसूर गया था कि एसाइनमेंट से फोन आया, आप मैसूर से फौरन निकले, सीधे कोयंबटूर जाएं। वहां दंगा हो गया है वो खबर शूट कर आप फौरन बैंगलौर वापस आकर अपलिंक करें। इसके पहले कि मैं कुछ कह सकता कि वो चिल्लाए ‘सुन रहे हैं कि नहीं आपको ये करना हैं और आगे में कुछ नहीं सुनना चाहता’। पता नहीं क्या हुआ जैसे तन बदन में आग लग गई फिर मैंने फोन उठाया और उन साहब को समझाया कि उनके पास हिंदुस्तान का नक्शा सामने हो तो वो देख लें कि 5 घंटे में क्या उनके हुक्म की तामील होने की गुंजाइश है या नहीं।

मगर उनके मुंह से निकला एक और लफ्ज़ ने मेरे सब्र का बांध तोड़ दिया। और मैंने उनके साथ वो सलूक किया जो शायद वो आज भी याद रखते हैं और सामने दिख भी गए तो उनकी रूह फना होने लगती है। मैंने उनसे सिर्फ यही अर्ज किया था कि मैसूर से कोयंबटूर की दूरी सिर्फ 478 किलोमीटर है और वहां से बैंगलौर 594 किलोमीटर है। मैं ना तो अंजनी पुत्र हूं कि उड़ कर पहुंच जाऊं और पलक झपकते ही सारा कार्य संपन्न कर 5 घंटे में बैंगलौर आ जाऊं। बैंगलौर दूरदर्शन मेरे ससुर का तो है नहीं कि अपना ट्रासमीशन ब्रेक कर वो मुझे अपलिंक करने देगा।

मेरा आखिरी वाक्य यही था ‘अगर ये ही जाहिलों जैसी दोबारा हरकत की तो फोन से बाहर निकलकर मुंह पर थप्पड़ मारूंगा‘। मगर दिल्ली ऑफिस में तो बवाल हो गया। वो मोहतरम एसपी सिंह के सामने ऐसे रोए जैसे उनका शील भंग हो गया। बाद में एसपी सिंह को पूरी बात समझ में आई। वो फोन पर हंसते हुए बोले ‘बच्चों से मुंह न लगा करो। नालायक हैं ये लोग। पता नहीं कब सीखेंगे। खैर, कल ये खबर अपलिंक कर देना।'

मैंने जान पर खेल कर वो खबर तो कर दी मगर बदनाम भी हो गया। मेरा नाम डॉबरमैन रख दिया गया जो एक ही आदमी की कमांड सुनता था। जब भी बड़ी खबर होती थी या तो खुद एसपी सिंह बोले देते थे या मेरे हम नाम दोस्त स्वर्गीय अजय चौधरी जो मेरे बड़े अच्छे मित्र थे। वो फोन पर बोलते थे ‘अरे बाबा, ये खबर दमदार होनी चाहिए पर पीटीसी भेजना मत भूलना’। मगर कोई दूसरा आदमी मुझसे बात करने से पहले दो बार सोचता जरूर था।

इस घटना को कई साल हो गये मगर कमोवेश तकरीबन हर चैनल के न्यूज रूम की सोच और अख्सरियत अब भी वैसी है बल्कि कई जगहों पर तो रिपोर्टरों की हालत और भी पतली है और हर रोज गालियां प्रात: स्मरणीय मंत्र की तरह मिलती हैं और उसी की घुटन कश्मकश में पूरा दिन कब बीत जाता है ये उन्हें भी मालूम नहीं पड़ता। जैसे वो कह रहे हो कि मजबूरी मुलाज़मत का नाम है…

सुबह होती है, शाम होती है।
उम्र यूं ही तमाम होती है…  


लेखक अजय एन झा वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इससे पहले का पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें – झा जी कहिन सीरिज

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