पत्रकारिता के नटवरलाल (एक) : सुमेश दोषी

पर्ल ग्रुप की मैग्जीन 'शुक्रवार' के पत्रकार नरेंद्र कुमार वर्मा की एक किताब आई है. नाम है- 'पत्रकारिता के नटवरलाल'. इसमें दर्जनों पत्रकारों की सच्ची कहानियों को मिलते-जुलते नामों के साथ पेश किया गया है. कहानी का शीर्षक संबंधित पत्रकार के मिलते-जुलते नाम पर ही है. लिखने का अंदाज सरल, सहज और बातचीत वाला. पढ़ेंगे तो पढ़ते जाएंगे. ईमानदार और संवेदनशील लोग अगर इन कहानियों को पढ़ेंगे तो पढ़ते-पढ़ते उन्हें उबकाई आने लगेगी. संभव है पूरी पत्रकारिता और सारे पत्रकारों से घृणा होने लगे.

16 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय नरेंद्र कुमार वर्मा ने ये कहानियां अपने अनुभवों और शोध के आधार लिखी हैं. पत्रकारों की कहानी बताती इस किताब का प्रकाशन किया है प्रतिमा प्रकाशन ने. इस कहानी संग्रह से एक कहानी यहां प्रकाशित कर रहे हैं जिसका नाम है- 'सुमेश दोषी'. इस कहानी के सभी चरित्रों के बारे में दिल्ली-एनसीआर के ज्यादातर पत्रकार बहुत कुछ जानते रहे हैं पर पहली बार किसी ने इसे लिखकर प्रकाशित किया है. लीजिए, पढ़िए कहानी. -यशवंत, भड़ास4मीडिया


सुमेश दोषी

सुमेश दोषी ने अस्सी के दशक में देहरादून से दिल्ली आकर पत्रकारिता की शुरुआत की थी। दिल्ली में उन दिनों आंचलिक पत्रकारों की खूब पूछ थी। सुमेश दोषी ने भी हाथ-पैर मारने शुरू किए, लेकिन किसी ने हाथ नहीं रखने दिया। एक बड़े अंग्रेजी दैनिक के मालिकान ने उन्हीं दिनों अपना हिंदी अखबार शुरू किया। हिंदी अखबार में सुमेश दोषी को रख लिया गया। यह बात अलग है कि जिन संपादक ने उन पर कृपा की, उन्हें सुमेश दोषी बाद में गालियां देते रहे।

दरअसल, सुमेश दोषी की फितरत ही ऐसी थी कि जो भी उन पर अहसान करता, वह उसे ही काट खाने को दौड़ते। नए-नए शुरू हुए हिंदी अखबार ने अपनी पकड़ बनानी शुरू की और जल्द ही सारे बाजार को अपनी गिरफ्त में ले लिया। सुमेश दोषी की गाड़ी चल निकली। वह एक पैंट-शर्ट झोले में रखकर दिल्ली आए थे। अखबार की नौकरी मिलते ही उनके पर लग गए। दिल्ली से निकलने वाले अखबार में काम करने का उन्हें पहला अनुभव था। वह हर वक्त गर्व से चूर-चूर रहते। अपनी फितरत के अनुसार सुमेश दोषी ने काम करना शुरू कर दिया और एक साल के भीतर ही अखबार में पत्रकारों के दो गुट पैदा करवा दिए। बात संपादक तक पहुंची, तो उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि काम करना है, तो करो, वरना पहाड़ की राह पकड़ो। अगर काम के वक्त ज्यादा गुटबाजी की, तो ठीक नहीं होगा।

लेकिन सुमेश जी कहां मानने वाले थे। सो, उन्होंने अपनी गुटबाजी जारी रखी और एक दिन एक गुट के नेता को पहाड़ के एक नेता से मिलवाकर उनसे पत्रकारों की मीटिंग के नाम पर चंदा ले लिया। चंदे की रकम इतनी थी कि कोई छोटा-मोटा प्रोग्राम करने के बाद भी काफी पैसा बच सकता था। लेकिन भाई लोगों ने प्रोग्राम नहीं किया, बल्कि चंदा आपस में आधा-आधा बांट लिया। सुमेश दोषी डेस्क पर काम करते थे और फील्ड में काम करने वाले लोगों की हर वक्त कमियां निकालते रहते। संपादक के पास अक्सर उनकी शिकायतें पहुंचतीं कि वह बिना किसी आधार के खबरों को काट देते हैं। संपादक कब तक बर्दाश्त करते! शायद ही ऐसा कोई दिन बीतता होगा, जब उन्हें बुलाकर झाड़ न पिलाई जाती हो, लेकिन थेथरों पर जिस तरह कोई असर नहीं पड़ता, वैसा ही हाल दोषी का भी था।

वहां काम करते हुए सुमेश दोषी ने कई पत्रकारों के बीच घुसपैठ कर ली थी। किसी तरह वह एक दूसरे अखबार से जुड़ गए। वहां उन्हें उनका मन-पसंद काम रिपोर्टिंग मिला। दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों की बीट उन्हें हासिल हो गई। बस, सुमेश दोषी ने खेल शुरू कर दिया। उन्होंने सबसे पहले अपनी बीट की पार्टियों के छोटे नेताओं को पकड़ा। उनसे संबंधित खबरों को छापना शुरू किया। फॉर्मूला काम कर गया। सुमेश दोषी को नए नेता पहचानने लगे। जान-पहचान जब बढ़ी, तो दोषी छुटभैये टाइप के नेताओं की गाड़ियों में भी बैठने लगे। सिलसिला आगे बढ़ा और सुमेश दोषी छोटे नेताओं के सबसे पसंदीदा पत्रकारों में शुमार हो गए। नए अखबार में उन्होंने हाथ-पैर तो मारने शुरू कर ही दिए थे, जल्दी ही उन्होंने दूसरे कई लोगों को भी यह गणित समझा दिया।

अखबार की कैंटीन में एक दिन दोषी किसी नेता के साथ बैठे थे कि किसी ने टिप्पणी कर दी- 'अब तो चोर भी अखबारों के दफ्तर में आने लगे हैं…!' टिप्पणी करने वाला क्राइम बीट का रिपोर्टर था। दोषी ने उसे टोका, तो वह बोला- 'ज्यादा बोला, तो छठी मंजिल से नीचे धक्का दे दूंगा।' नेता जी के सामने दोषी पानी-पानी हो गए, लेकिन कुछ बोले नहीं। अलबत्ता नेता उठकर चला गया और दोषी से बोला- 'कोई बात नहीं यार, अखबार वालों की बातों का मैं बुरा नहीं मानता।' दोषी को लगा कि अब इस अखबार में ज्यादा दिन का खर्चा-पानी निकालना मुश्किल है, तो उन्होंने जुगाड़ भिड़ाकर किसी तरह दूरदर्शन में काम हासिल कर लिया। दूरदर्शन उन दिनों फ्री-लांसर पत्रकारों से खबरें लिखवाता था। दोषी की लाटरी लग गई। वह दो बजे के करीब दूरदर्शन के दफ्तर जाते, दो खबरें लिखते और बाकी वक्त में वहां काम करने वाली लड़कियों से गप्पें लड़ाते।

दूरदर्शन में काम करने के दौरान दोषी ने दो अखबारों में अपने स्वजातीय संपादकों से जुगाड़ भिड़ाकर अपने लिए साप्ताहिक तौर पर काम भी हासिल कर लिया। उन्हीं दिनों राजीव गांधी ने दूरदर्शन का विस्तार करना शुरू किया था। जिस कांग्रेसी नेता को उनके पुराने दफ्तर में क्राइम रिपोर्टर ने बेइज्जत किया था, वह नेता अब कांग्रेस में काफी दम रखता था। उसकी मार्फत दोषी ने ऐसा जुगाड़ भिड़ाया कि वह दूरदर्शन पर खबरें पढ़ते दिखाई देने लगे।

अब दोषी के अंदर गजब का आत्मविश्वास आ गया था। वह अपने से आधी उम्र की लड़कियों को साथ लेकर अक्सर कई बड़े नेताओं से बातचीत करने जाते और उनके बारे में दूरदर्शन स्तुति की तरह खबरें दिखाता। टीवी पर चेहरा दिखाने के बाद दोषी के अंदर चमक-दमक और काफी स्फूर्ति आ गई थी। उन्हीं दिनों आईआईएमसी के कुछ छात्र इंटर्नशिप करने दूरदर्शन आए थे। उन्हीं में से एक छात्र ने उनसे पूछ लिया कि सर आपकी उम्र क्या है? बस, दोषी का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। उन्होंने आईआईएमसी के सभी छात्रों को रात की शिफ्ट में काम पर लगवा दिया। चूंकि दोषी का सिक्का दूरदर्शन में चल रहा था, लिहाजा वहां काम करने वाले दूसरे लोग उनसे डरकर रहते थे। दूरदर्शन में दोषी ने जमकर काम किया और इसी दरमियान वहां उन्होंने कई ऐसी लड़कियों और महिलाओं को भी कांट्रेक्ट पर रखवा दिया, जिन्हें न तो खबरों के बारे में पता था और न ही टीवी के बारे में।

सुमेश दोषी को दिल्ली में दस साल हो गए। इन दस वर्षों में दोषी के पास घर, गाड़ी-घोड़ा सब पैदा हो गया था। दिल्ली के उन पत्रकारों के बीच भी दोषी ने पहचान बना ली थी, जो शाम ढलते ही किसी क्लाइंट को खोजते रहते हैं। एनडीए सरकार के आने के बाद दोषी की दूरदर्शन से विदाई हो गई। लेकिन तब तक दोषी को सब दांव-पेंच आ चुके थे। वह जान चुके थे कि अगर कोई जानकारी नहीं है, तो भी ऐसा दर्शाओ कि सामने वाले को लगे कि अगला तो गुरु है। दोषी के अंदर एक और प्रवृत्ति थी। वह छोटे लोगों से बात करते हुए खूब हल्ला मचाते और उनकी गलतियों को निकालते रहते। राजनीतिक खबरों की बात छोड़िए, उन्हें लोकल खबरों तक की तमीज नहीं थी और क्राइम की खबरों से तो उनका कभी वास्ता भी नहीं पड़ा था।

खबरों की समझ न होने के बावजूद भी दोषी की गाड़ी सुपर फास्ट तरीके से दौड़ रही थी। दोषी को अपनी बात मनवाने का हुनर आता था। दूरदर्शन से विदाई के बाद दोषी ने दिल्ली के एक मीडिया स्कूल का रुख किया और वहां बच्चों को पत्रकारिता की शिक्षा देने का काम शुरू कर दिया। लेकिन पत्रकारिता की एबीसीडी भी उन्हें नहीं आती थी। हालांकि इसके बावजूद दोषी हार मानने वाला शख्स नहीं था। उसने पत्रकारिता की दो-तीन किताबें खरीदीं और छात्रों को इंट्रो से लेकर एंकर और बाई-लाइन से लेकर सिंगल कॉलम तक के बारे में बताने लगे। मीडिया स्कूल के कर्ताधर्ताओं को उन्होंने समझा दिया था कि वह साल के अंत में वहां के सारे बच्चों को दूरदर्शन में रखवा देंगे। लेकिन साल आखिर आने से पहले ही दोषी वहां से कट लिए।

इसके बाद दिल्ली में बिताए अपने पत्रकारिता जीवन पर उन्होंने एक किताब लिखना शुरू किया। लेकिन उससे पहले ही दिल्ली के एक छोटे टीवी चैनल से जुड़ गए। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि दोषी अपनी पुत्री के साथ चैनल के दफ्तर गए थे, वहां चैनल के सीईओ को दोषी कम और उनकी पुत्री ज्यादा पसंद आई। दिल्ली के पत्रकारिता इतिहास में ऐसा शायद पहली बार ही हुआ होगा कि पिता-पुत्री को एक ही दिन और एक ही दफ्तर में नौकरी मिली हो। टीवी चैनल में दोषी को ज्योतिष के प्रोग्राम का जिम्मा मिला। उन्होंने दो-चार ज्योतिषियों को सेट किया और उनसे तय कर लिया कि आपका कार्यक्रम मैं दिखाऊंगा, बताओ क्या दोगे? कई ज्योतिषियों ने दोषी के साथ पैक्ट किया और कई महीनों तक लोगों को बेवकूफ बनाते रहे। दोषी जी की लड़की भी उसी चैनल में काम करती थी। मजेदार बात यह कि दोनों अलग-अलग घर जाते। लड़की को बॉस की कार में लिफ्ट मिलती और दोषी जी दूसरी महिला सहकर्मी को लिफ्ट देते।

उक्त चैनल से दोषी जी की गाड़ी फिर से पटरी पर लौट आई। किस वजह से लौटी, इस बारे में लोग अपने-अपने तरीके से व्याख्या करते हैं। खैर, सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि उस चैनल में देहरादून की एक लड़की एंकर की पोस्ट पर आई। दोषी जी ने उसे एंकरिंग के गुर बताए और उस लड़की के साथ नजदीकियां बढ़ाईं। लोगों का तो यह भी कहना है कि यह लड़की अक्सर दोषी के साथ उनकी कार से जाती थी। एक दिन खबर आई कि उस लड़की ने आत्महत्या कर ली और मौके पर जो सुसाइड नोट छोड़ा, वह सीधा दोषी की तरफ इशारा करता था।

इस बारे में अखबारों में खूब खबरें छपीं। मीडिया बिरादरी के लोगों ने भी अपने तरीके से सच्चाई पर गुफ्तगू की, लेकिन कमाल देखिए, दोषी जी का बाल भी बांका नहीं हुआ। रो-धोकर लड़की के मां-बाप दिल्ली से विदा हो गए। दोषी जी इस हादसे के बाद फिर फॉर्म में आ गए और पूरी उर्जा से चैनल में काम करने लगे। वह अक्सर न्यूज रूम में काम करने वाले बच्चों पर चीखते-चिल्लाते रहते। दो-चार महीने बीते होंगे कि एक रात दोषी जी अपने चिरपरिचित अंदाज में बुलेटिन पढ़ रहे थे, उसी वक्त न्यूज रूम में हल्ला मचना शुरू हुआ। लोगों ने देखा, दोषी जी की बेटी बॉस के साथ लड़खड़ाती हुई न्यूज रूम में घुसी, वह अंग्रेजी में किसी को गाली बक रही थी। दोषी जी बुलेटिन खत्म करके न्यूज रूम में आए, लेकिन उन्होंने अपनी पुत्री को कुछ नहीं कहा और चुपचाप निकल लिए।

दोषी जी की लड़की ने कुछ दिनों बाद चैनल छोड़ दिया और एक दूसरे चैनल में पहले से शादीशुदा व्यक्ति के संग ब्याह रचा लिया। लोगों ने जब पूछा कि तुम 24 की और पति 52 का? इस पर वह बोली- तो क्या हुआ, डैड भी तो 60 के हैं और इस उम्र में उनका स्टेमिना इतना है कि 25 साल की लड़की के साथ घूमते हैं…इसमें हर्ज क्या है…पसंद अपनी-अपनी।

दोषी जी आज भी उसी चैनल में काम कर रहे हैं। वह अक्सर राजनीतिक खबरों की रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टरों को खबरों का एंगल समझाते हुए देखे जा सकते हैं। लोग कहते हैं कि उनका काम क्या है और उन्हें रखा क्यों गया है? लोग अब दोषी जी के सामने ही उन पर कटाक्ष कर देते हैं, लेकिन वह सब जानते हुए भी कुछ नहीं बोलते। चैनल की एक शादीशुदा महिला रिपोर्टर की स्टोरी अक्सर दोषी जी रोक देते और कहते- इस स्टोरी में कोई दम नहीं है और बिना एंगल की स्टोरी को वह क्यों चलने दें? महिला रिपोर्टर उनसे बहुत परेशान रहती थी। इत्तेफाक से एक दिन लिफ्ट में दोषी जी उस महिला रिपोर्टर से टकरा गए। लिफ्ट में जाने क्या हुआ, उसके बाद उस रिपोर्टर की कभी कोई स्टोरी नहीं रुकी, बल्कि दोषी जी की कृपा उस महिला पर कुछ ज्यादा ही होने लगी।

सुमेश दोषी कभी-कभी राजनीतिक बातें करते-करते अध्यात्म की तरफ मुखातिब हो जाते हैं। लोग कहते हैं कि देर रात तक चलने वाली पार्टियों में जब वह गिलास हाथ में लेकर अध्यात्म की बातें करते हैं, तो सामने वाला सोच में पड़ जाता है कि अगला पत्रकार है या कोई बाबा? वैसे उनके साथ काम कर चुकी और करने वाली महिलाएं उन्हें बाबा ही कहती हैं। कुछ महिलाएं कहती हैं कि सुमेश दोषी दरअसल अपने आपको विश्वामित्र कहते हैं। बकौल उनके- जिस तरह मेनका ने विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दी थी, उसी तरह टीवी चैनलों में काम करने वाली युवतियां उनका भी ध्यान भंग कर देती हैं। एक तेज-तर्रार महिला ने एक बार उन्हें सार्वजनिक तौर पर लताड़ लगाई और सलाह दी कि इस उम्र में अब ज्यादा उछल-कूद मत करो…जाओ, अब किसी पहाड़ पर जाकर तपस्या करके पत्रकारिता जीवन में किए गए पापों की माफी मांगो। वैसे लोगों का कहना है कि दोषी जी को काफी पहले पहाड़ पर लौट जाना चाहिए था, तपस्या करने या फिर चाहे कोई दूसरा धंधा चलाने।

कहानी लेखक परिचय…

अगर आप इस किताब को मंगाना चाहते हैं तो pratimaprakashan2004@gmail.com पर मेल कर सकते हैं या फिर 09350887815 या 09968482820 पर काल कर सकते हैं. प्रतिमा प्रकाशन का पता है: आर-2/29, गुरुद्वारा रोड, रमेश पार्क, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-110092.

अमर उजाला से सौरभ का इस्तीफा और बिपिन का ट्रांसफर, फारवर्ड प्रेस से सोहन व जतिन्‍द्र जुड़े

अमर उजाला, गाजियाबाद से खबर है कि सौरभ पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर जूनियर रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे. सौरभ ने अपनी नई पारी गाजियाबाद में ही हिंदुस्‍तान के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां क्राइम रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. हाल के दिनों में सौरभ सातवें मीडियाकर्मी हैं, जिन्‍होंने अमर उजाला से इस्‍तीफा दिया है. वे करीब ढाई सालों से अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे थे. बताया जा रहा है कि सौरभ प्रमोशन ना होने से नाराज थे. विनीत सक्‍सेना के संपादक बनकर आने के बाद से अमर उजाला, गाजियाबाद का यह नौवां विकेट गिरा है. इसके पहले पांच लोग ए‍क साथ अमर उजाला छोड़कर हिंदुस्‍तान चले गए थे.  

बिपिन शुक्ल को अमर उजाला, उन्नाव के ब्यूरो चीफ पद से हटाकर कानपुर आफिस बुला लिया गया है. उन्हें कांपैक्ट में काम करने को कहा गया है. उन्नाव के ब्यूरो चीफ पद पर अनुराग त्रिपाठी को नियुक्त किया गया है जो पहले इसी ब्यूरो में क्राइम रिपोर्टर के रूप में सेवारत थे. सूत्रों का कहना था कि उन्नाव जिले के ही निवासी बिपिन शुक्ला के खिलाफ जिले के कई लोगों ने नोएडा और कानपुर आफिस में शिकायतें की थीं.

फारवर्ड प्रेस मैग्जीन से सूचना मिली है कि इसमें जतिंदर शर्मा और सोहन सिंह को दिल्ली में जूनियर रिपोर्टर की जिम्मेदारी दी गयी है. विज्ञापन विभाग में सूरज को विज्ञापन हेड की जिम्मेदारी दी गयी है. सर्कुलेशन में देवेंदर शर्मा को नियुक्त किया गया है.

‘Because chastity is very important for Indian women’

बचपन में मेरी जिन आदतों और हरकतों से दादी की जान जलती थी, उनमें से एक था मेरा घुमक्‍कड़ी स्‍वभाव। घर में मेरे पैर कभी टिके नहीं। मुझे हर समय घूमने को चाहिए। अब जितना मौका था, उतना ही घूमती थी। ऐसा तो नहीं कि मुंह उठाया और इलाहाबाद से बनारस पहुंच गई, बनारस से मुंह उठाया और लखीमपुर खीरी पहुंच गई। एक मुहल्‍ले से दूसरे मुहल्‍ले में ही तो जाती थी। फिर भी इतनी तकलीफ। दादी समेत तकरीबन सभी पारंपरिक परिवारों को इतिहास, मनुस्‍मृति और धर्मग्रंथों से मिला ज्ञान ये कहता है, जिसे वह पैदा होने के साथ ही पोलियो के टीके की तरह अपनी लड़कियों के खून में इंजेक्‍ट कर देते हैं कि-

 1- लड़कियों को ज्‍यादा घूमना-फिरना नहीं चाहिए।
2- उन्‍हें घर में रहना चाहिए और सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, पाक कला आदि में महारत हासिल करनी चाहिए।
3- ज्‍यादा घूमने-फिरने की इच्‍छा करना अच्‍छी लड़की के लक्षण नहीं हैं।
4- जिस स्‍त्री के पांव घर में न टिकें, उसका चरित्र ठीक नहीं है।
5- अच्‍छी लड़कियां घूमने तो खैर नहीं ही जातीं, घर की छत पर, खिड़की-दरवाजे पर भी ज्‍यादा नहीं जातीं। (इसका विरोध कृपया न करें। हिंदुस्‍तान के छोटे शहरों के बहुसंख्‍यक परिवारों में आज भी यही होता है।)

हर संभव तरीके से ये बताने की कोशिश कि लड़कियों के लिए घूमना-फिरना अच्‍छी बात नहीं है और ऐसा करने वाली लड़कियों का चरित्र शक के दायरे में रहता है।

अब इस आइडिया के बड़े निहितार्थ क्‍या हैं ?

बेसिकली मूवमेंट को सिर्फ घर तक सीमित करने और घूमने-फिरने पर रोक लगाने का अर्थ है एक बड़ी दुनिया, अनुभव, एक्‍सपोजर, ज्ञान, विचार आदि से लड़कियों को पूरी तरह काट देना और उन्‍हें डंब बना देना।

किसी भी प्रजाति को सिर्फ दस साल तक घर के अंदर बंद करके देखिए। उसके मानसिक विकास का क्‍या होता है। स्त्रियां तो हजारों साल से बंद हैं। उनका मानसिक विकास तो जनरेशंस से अवरुद्ध हो गया है।

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पूरी मानव सभ्‍यता की शुरुआत में ज्ञान हासिल करने के टूल और स्रोत क्‍या क्‍या थे। कोई किताब नहीं, कोई सिनेमा नहीं। सिर्फ घुमक्‍कड़ी और उससे अर्जित अनुभवों और ज्ञान ने किताब, दर्शन, विज्ञान आदि की शक्‍ल अख्तियार की। मनुष्‍य ने ऐसे ही ज्ञान हासिल किया। एक घुमक्‍कड़ अपना जहाज तैयार कर निकला हिंदुस्‍तान की खोज में। उसे पता नहीं था कि ग्‍लोब में नॉर्थ अमेरिका भी कोई चीज है। वह इंडिया समझकर उस जमीन पर उतरा और अमेरिका की खोज कर ली। वह कोलंबस था।

एक और घुमक्‍कड़ पुर्तगाल से चला और समुद्री रास्‍ते से खोजता हुआ हिंदुस्‍तान पहुंच गया। हमने बचपन में उसके बारे में किताबों में पढ़ाया गया। वह वास्‍कोडिगामा था। और भी ऐसे जाने कितने थे घुमक्‍कड़, यायावर, संसार की खोज करने वाले। भूगोल, इतिहास, विज्ञान, दर्शन के दरवाजे खोलने वाले। मार्को पोलो, मेगस्‍थनीज, फाह्यान, इब्‍नबतूता वगैरह-वगैरह।

लेकिन संसार के अब तक के समूचे इतिहास में अब तक कोई स्‍त्री घुमक्‍कड़, Traveller नहीं हुई। वह कभी इस तरह अपना जहाज बांधकर बस किसी भी दिशा में संसार की खोज में नहीं निकली। उसने पूरे ग्‍लोब पर जमीन कोई नया टुकड़ा नहीं ढूंढा। आखिर क्‍यों औरतें कभी भी Traveller नहीं हुईं। एक समूची प्रजाति को Travelling से काट देने का अर्थ था, उसे ज्ञान और अनुभवों के स्रोत से काट देना। ज्ञान और अनुभव के बुनियादी स्रोत से कट जाने के कारण स्त्रियों का मानसिक, बौद्धिक और व्‍यक्तित्‍वगत विकास अवरुद्ध हो गया।

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घूमने का अर्थ है ज्ञान हासिल करना। घूमने का अर्थ है अनुभवों का विस्‍तार। घूमने का अर्थ है आजादी। घूमने का अर्थ है अपने दिल-दिमाग और अपने शरीर पर हक। घूमने का अर्थ है एक तयशुदा घेरे से आजाद हो जाना और फिर अपनी मर्जी, खुशी और आजादी से विभिन्‍न तरह के समाजों, संस्‍कृतियों, लोगों और परिस्थितियों के बीच रहना, जीना और व्‍यवहार करना। घूमने का अर्थ है नियंत्रणों से मुक्‍त होना। घूमने का अर्थ है जो अच्‍छा लगे, उससे प्रेम करना और इच्‍छा हो तो उसके साथ सोना भी। घमने का अर्थ है हमेशा नई जिज्ञासाओं और सवालों से भरे रहना। उनके उत्‍तर तलाशना। घूमने का अर्थ है अपने अस्तित्‍व को संसार और प्रकृति के बड़े समूह के साथ जोड़कर देखना।

घूमने के ये बहुत सारे अर्थ है। और इन सारे अर्थों से समूचे इतिहास में स्त्रियों का जीवन हमेशा कटा रहा। उनके पास न ज्ञान था, न अनुभव, न अपनी देह पर हक। अपनी मर्जी का पुरुष चुनने और उसके साथ सोने की आजादी नहीं। वो एक पुरुष विशेष की निजी संपत्ति थीं। और उन्‍हें अपना जहाज बांधकर हिंदुस्‍तान की खोज करने के लिए छोड़ देने का मतलब था उनकी देह को आजाद कर देना। औरत के शरीर पर से आदमी का Control खत्‍म। इसलिए इतिहास में औरतें कभी घुमक्‍कड़ नहीं हुईं। कोई कोलंबस नहीं, कोई वास्‍कोडिगामा नहीं।

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एक नए पैदा हुए बच्‍चे को लगता है कि मां की गोद ही पूरा संसार है। फिर जब वह गोद से उतरकर घर में चलने-फिरने लगता है तो उसे पता चलता है कि संसार ये चार कमरे, रसोई, आंगन, बगीचा, बालकनी और छत भी है। फिर जब वह स्‍कूल जाना शुरू करता है कि समझता है कि संसार में स्‍कूल है, स्‍कूल के ढेर सारे बच्‍चे हैं, टीचर हैं, मोहल्‍ले के दोस्‍त हैं, स्‍कूल के रास्‍ते में दिखने वाले लोग हैं, मकान हैं, दुकानें हैं। फिर बच्‍चा बड़ा होता जाता है और पता चलता है कि संसार एक बहुत बड़ा सा शहर है, जहां तरह-तरह की चीजें हैं। फिर वो सारे शहर उसके संसार का हिस्‍सा होते जाते हैं, जहां नानी, चाची, बुआ, ताऊ और तमाम रिश्‍तेदारों के यहां शादी-ब्‍याह, जन्‍म और मरण में जाना होता है। या वो शहर, जहां वह नौकरी करने जाता है। जीवन आगे बढ़ता है और अपनी जाति, अपने धर्म, अपने कुटुंब के वही परिचित, दोस्‍त, रिश्‍तेदार और पट्टीदार ही एक मनुष्‍य का सारा संसार होकर रह जाते हैं। बाकी की दुनिया सिर्फ ग्‍लोब पर बारीक अक्षरों में लिखा हुआ कोई नाम भर है।

– अब अपनी जाति, अपने धर्म, अपने कुटुंब, अपने परिवार और रिश्‍तेदार के संकरे कुएं में पूरा जीवन बिता देने वाला इंसान ये कैसे जानेगा कि संसार बहुत बड़ा है, संस्‍कृतियां बहुत सारी। अनगिनत लोग, विचार, जीवन और अनुभवों का विराट संसार। और जीवन का मकसद दुबेजी-तिवारी-चौबेजी की दुनिया में सुरक्षित होकर रहना नहीं, जीवन का मकसद अनुभवों के उस विराट संसार की सैर है।

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मुझे अकसर दिल्‍ली Metro में ऐसी लड़कियां मिलती हैं, जो हिंदुस्‍तान घूमने आई हैं। 18 साल से लेकर 22-25 साल तक की लड़कियां अपने कंधे पर एक बैग टांगकर दुनिया देखने निकल पड़ती हैं। एक बार जयपुर में एक डच लड़की मिली, जो 25 दिनों से अपने ब्‍वॉयफ्रेंड के साथ इंडिया घूम रही थी। वो क्‍यों घूमती है, का सीधा सा जवाब उसके पास था, "I want to see the world." उसका ऑब्‍जर्वेशन कहता था कि हिंदुस्‍तानी लड़कियों को एक निश्चित दायरे के बाहर अकेले घूमने की इजाजत नहीं है। और इसकी वजह जो उसकी समझ में आई, वो तो और भी कमाल थी, "Because chastity is very important for Indian women." घूमने-फिरने पर नियंत्रण के पीछे ये चेस्टिटी ही है। शरीर की पवित्रता, शुद्धता और कौमार्य की रक्षा।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से साभार.


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दैनिक ‘हिकीज गजेट’ और ‘संवाद प्रभाकर’ के स्मारिका का लोकार्पण किया राष्ट्रपति ने

: तथ्यों की पवित्रता को बनाए रखे प्रेस- प्रणब : कोलकाता : राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि प्रेस को तथ्यों की पवित्रता बनाए रखना चाहिए और पत्रकारों को सच्चाई तथा विश्वसनीयता के उसूलों पर टिकना चाहिए। मुखर्जी ने भारतीय पत्रकार संघ (आईजेए) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा, ‘पत्रकारिता के बहुत से दिग्गज इन उसूलों पर सख्ती से टिके हैं कि मैं अपने विचार देने के लिए आजाद हूं लेकिन मैं तथ्यों के साथ स्वच्छंदता नहीं बरत सकता। तथ्यों को उसी रूप में फिर से पेश किया जाना चाहिए जिस रूप में वे हैं।’

राष्ट्रपति ने कहा, ‘कुछ मूलभूत चीजों को दिमाग में रखना होगा, यह है सच्चाई, विश्वसनीयता, तथ्यों को पेश करना और सच्चाई का पता लगाने के लिए प्रयास करना।’ प्रणब ने बंगाल के दो पहले दैनिक ‘हिकीज गजेट’ और ‘संवाद प्रभाकर’ के एक स्मारिका का लोकार्पण भी किया। राष्ट्रपति ने पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच के रिश्ते की तुलना मछली और पानी के बीच के रिश्तों से की। प्रणब ने कहा, ‘जिस तरह मछली पानी के बाहर नहीं जी सकती, उसी तरह पत्रकार भी नहीं जी सकते अगर उनका संपर्क राजनेताओं से नहीं हो।’

फोटोग्राफर जगदीश माली सड़क पर मिले, बेटी अंतरा माली ने मुंह फेरा, सलमान खान ने की मदद

नई दिल्ली : बीते जमाने के जाने-माने फोटोग्राफर जगदीश माली सड़क पर पाए गए। इसकी सूचना जब उनकी बेटी और एक्ट्रेस अंतरा माली को दी गई तो उसने पिता की मदद करने व खबर लेने से इनकार कर दिया। ऐसे में सलमान खान ने जगदीश माली की पूरी मदद की। बॉलीवुड के 1980-1990 के दशक के मशहूर फोटोग्राफर जगदीश माली ने कई एक्ट्रेसेस की खूबसूरती की बेहतरीन तस्वीरों को कैद किया है। जगदीश माली को हाल में ही में मुंबई की सड़कों पर पाया गया।

रियलिटी शो बिग बॉस-6 में शिरकत करने वाली मॉडल मिंक बरार को जगदीश माली मुंबई की सड़क पर बड़ी दयनीय स्थिति में मिले। उनकी बेटी और बॉलीवुड अदाकारा अंतरा माली को जब इस बारे में बताया गया तो उन्होंने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि वह हाल ही में मां बनी है और इस वक्त कुछ नहीं कर सकती है। फिर मिंक ने सलमान खान को फोन कर उनसे मदद मांगी। सलमान ने तुरंत ही अपनी गाड़ी और अपने स्टाफ को भेजकर जगदीश माली को अपने घर बुलाया और उनकी मदद की। जगदीश माली की इस हालत को देखकर खुद सलमान खान भी सकते में थे। उन्होंने जगदीश के लिए खाना और नये कपड़ों का इंतजाम किया।

जगदीश माली गहरे अवसाद का शिकार हो गए है। कुछ समय पहले उन्हें दिल का दौर भी पड़ा था। उसके बाद हालात इस कदर खराब हुए कि उन्होंने अपने आपको दुनिया से अलग-थलग कर लिया। सूत्रों के मुताबिक जगदीश माली को डायबिटीज है और जब वह इंसुलिन का इंजेक्शन लेना भूल जाते हैं तब उनकी सेहत और खराब हो जाती है।

जगदीश माली के बारे में सलमान खान ने उनकी बेटी अंतरा माली से बातचीत की है। सलमान ने गुरुवार को अंतरा को फोन कर कहा कि उनके पिता जगदीश माली बेहद तंगहाल हालात में सड़क पर पाए गए और आप कह रही हैं कि उन्हें मदद की जरूरत ही नहीं है। आप मुझे बताइए कि फिर मदद की जरूरत आखिर किसे हैं।

सलमान ने यह भी कहा कि जब मुझे उनके (जगदीश माली) बारे में पता चला तो मैंने कई लोगों से उनकी मदद को लेकर बातचीत की और बात अगर मदद की है तो यह एक बड़ा ही आसान है। सलमान ने अपने एनजीओ बीइंग ह्यूमन के एक स्टोर लॉन्च के मौके पर कहा कि जगदीश माली एक जानेमाने फोटोग्राफर है और उन्होंने उस वक्त मेरे फोटोशूट में भी मदद की है जिन दिनों मैं संघर्ष कर रहा था।

अन्ना, केजरीवाल, रामदेव समेत देश के 56 समूहों का महा गठबंधन मार्च में : गोविन्दाचार्य

: गोविंदाचार्य ने काशी में भरी हुंकार… : देंगे देश को नया राजनीतिक विकल्प  : सोनिया प्रकरण पर पूर्व राष्ट्रपति देश को सच बताएं : अब्दुल कलाम साहब का लेखन अनैतिक :  धूर्त नौकरशाहों ने राहुल की राह आसान की : न्यायिक सुधार के लिए 7 हजार करोड़ नहीं, ड्रीम लाइनर के लिए हैं ३० हजार करोड़ :  केन्द्रीय बजट का ७ प्रतिशत पंचायतों को मिले : सत्ता नहीं, व्यवस्था परिवर्तन है समाधान : पाकिस्तान शत्रु देश घोषित हो : सभी नीतियां माँ गंगा के परिप्रेक्ष्य में बने :

 

गोविन्दजी एक बार फिर आधुनिक भारत के चाणक्य की मुखर भूमिका में आ गए हैं. देश की जिस युवा शक्ति ने वर्तमान सियासत को चुनौती दी है, उसे गोविन्दाचार्य ने स्वीकार करते हुए नया राजनीतिक विकल्प देने की हुंकार भरी. शुक्रवार को स्थानीय पटेल धर्मशाला संपन्न राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के काशी-गोरखपुर के कार्यकर्ता सम्मलेन में किसी गुरुकुल के आचार्य सरीखी मुद्रा में राष्ट्र विकास-सुशासन के प्रत्येक पहलू पर एक के बाद एक प्रकाश डालते हुए आन्दोलन के संस्थापक संयोजक गोविन्दाचार्य ने कहा कि वह खामोश नहीं बैठे हैं. क्या अन्ना, क्या अरविन्द और क्या रामदेव सभी समान विचारधारा के लोग संपर्क में हैं. ऐसे कुल 56 समूहों का एक महा गठबंधन मार्च में आकार ले लेगा और व्यवस्था परिवर्तन के सम्पूर्ण ब्लूप्रिंट के साथ ही नए राजनीतिक विकल्प का खाका भी देश के सामने इसी मंच से रखा जाएगा. विश्वसनीयता खो चुके वर्तमान राजनीतिक दलों से हुई ऊब ने ही देश के भविष्य को सड़कों पर उतारा है. यह महागठबंधन उसे नेतृत्व देने का प्रयास करेगा.

देश का विकास-सुशासन ही एकमात्र संकल्प होगा. इस बार लक्ष्य सत्ता नहीं व्यवस्था परिवर्तन होगा और विकास आम आदमी का कैसे हो, कैसे ग्राम पंचायतों से इसकी शुरुआत की जाए, इसका भी गोविन्दजी ने खाका रखा. सोनिया गाँधी के प्रकरण पर एक सवाल के जवाब में गोविन्दजी ने बताया कि पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम साहब ने अपनी पुस्तक में सच्चाई छुपाई. उनका लेखन मै अनैतिक मानता हूँ. २००४ में सर्कार गठन के समय उस दिन ११ बजे से शाम आठ बजे तक उनसे  किन-किन लोगों ने मुलाकात की और उनसे क्या बात हुई, बस इतना भर बता दें, सच सामने आ जाएगा कि श्रीमती सोनिया गाँधी ने प्रधान मंत्री पद का त्याग नहीं किया था, बल्कि उन्हें इस पद के लिए संवैधानिक दृष्टि से अयोग्य ठहरा दिया था तत्कालीन राष्ट्रपति जी ने.यह पूछे जाने पर कि राहुल क्या इस पद के योग्य हो चुके हैं, गोविन्दाचार्य का कहना था, ” हाँ भी और ना भी. असल में इटली के संविधान में यह प्रावधान है कि यदि उसके देश में जन्मा दुसरे देश की नागरिकता ले लेता है, तब भी वह उस देश के प्रधानमंत्री पद के योग्य नहीं है. लेकिन हुआ क्या कि सन २००३ में कुछ अफसरशाहों की धूर्तता से एक ऐसा विधेयक पारित हो गया जिसमे राहुल इस पद के योग्य हो सकते हैं. यह अंश अफसरों ने गृहमंत्री से छिपा लिया था.

गोविन्द जी ने वर्तमान हालातों पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि आज जो परिदृश्य है, वह वर्तमान व्यवस्था की ही तो देन है. सभी राजनीतिक दल लूट में आकंठ डूबे हैं. आप देखिये कि न्यायिक सुधर के लिए सिर्फ सात हज़ार करोड़ की जरूरत है लेकिन सरकार के पास नहीं है. हाँ आलीशान विमान ड्रीम लाइनर खरीदने के लिए ३० हज़ार करोड़ हैं. नए राजनीतिक  विकल्प की वरीयता आम आदमी के लिए तो होगी मगर सभी नीतियां गौ और गंगा माता के परिप्रेक्ष्य में ही बनेगी.”हिंदुस्तान गाँवों में बसता है” …..इस कोरे नारे को यथार्थ के धरातल पर लाना है और यह तब संभव होगा जब देश के केन्द्रीय बज़ट का सात फीसदी सीधे पंचायतों को पहुंचे और जो लगभग ४० लाख के आसपास की राशि होगी.

पड़ोसियों के साथ व्यावहारिक संबंधो पर गोविन्दजी कुछ ज्यादा ही मुखर थे. उनका मानना है कि पाकिस्तान से अभी तक देश को धोखा ही तो मिला है. हम उनसे प्यार की पींग बढ़ाते हैं और वे हम पर पीछे से वार करते हैं, हमने दस साल पहले उन्हें ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ यानी सबसे चहेते राष्ट्र का दर्ज दिया. क्यों,,,? समय आ गया है कि हम पाकिस्तान को शत्रु राष्ट्र घोषित करें और ऐसा अभी तक क्यों नहीं किया गया, यह आश्चर्य का विषय है. कभी भाजपा के थिंक टैक माने जाने वाले चिन्तक-विचारक गोविन्दाचार्य ने महा गठबंधन की अवधारणा से नयी उम्मीद जगाई है. देश भी चाहता है असली लोकशाही के लिए संघर्षरत सभी समूह एक मंच से अपनी आवाज़ बुलंद करें. हम सभी को बेसब्री से इंतजार रहेगा मार्च का.      

लेखक पदमपति शर्मा जाने-माने खेल पत्रकार हैं. वे कई चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों बनारस में रहकर वह विभिन्न मोर्चों पर सक्रिय हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

‘उत्तराखंड लॉयन्स’ गोल्फ टीम ने डेरिन क्लॉर्क को खरीदा

देश में गोल्फ को नई उंचाइंयों तक पहुंचाने के मकसद से शुरू हो रहे गोल्फ प्रीमियर लीग 2013 में ‘उत्तराखंड लॉयन्स’ ने झंडे गाड़ दिए हैं। 9 टीमों वाले अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इस टूर्नामेंट में ‘उत्तराखंड लॉयन्स’ ने सबसे महंगे खिलाड़ी डेरिन क्लार्क को रेकॉर्ड 55 हज़ार अमेरिकी डॉलर में खरीद लिया है। डेरिन क्लार्क दुनिया के शानदार गोल्फरों में से एक हैं और मौजूदा ब्रिटिश ओपन चैंपियन भी हैं। इंटरनेशनल सर्किट में क्लार्क ने वर्ल्ड नंबर वन रहे टाइगर वुड्स को भी हराया था।

इसके अलावा थाइलैंड के गोल्फर चाप चई निरात को भी उत्तराखंड लॉयन्स ने खरीदा है। इसके लिए 37 हज़ार डॉलर की कीमत अदा की गई है। निरात अभी तक का सबसे लोअस्ट शॉट मार कर, वर्ल्ड रेकॉर्डधारी हैं, जो अभी तक कायम है। 13 हज़ार डॉलर देकर नेशनल चैंपियन शंकर दास को भी उत्तराखंड लॉयन्स ने अपनी टीम में शामिल कर लिया है।

इससे पहले टीमों की नीलामी प्रक्रिया में अलग-अलग कॉर्पोरेट ग्रुप्स ने अलग-अलग टीमों को खरीदा था मगर इस दौरान किसी भी टीम के ओनर अथवा फ्रेंन्चाइज़ी ने उत्तराखंड की टीम के लिए कोई भी बोली नहीं लगाई थी। यानि उत्तराखंड की टीम को कोई खरीदार ही नहीं मिला था। जैसे ही ये शर्मनाक ख़बर देहरादून निवासी न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया, एन.एन.आई. के सीईओ उमेश कुमार को मिली, उन्होने उत्तराखंड के मान को खंडित ना होने देने का फैसला किया। उन्होने आनन-फानन में ‘उत्तराखंड लॉयन्स’ की टीम को खरीद लिया। न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया, एन.एन.आई. ने सूबे की प्रतिष्ठित रियल इस्टेट कंपनी जीटीएम बिल्डर्स के साथ मिल कर प्रदेश में गोल्फ को बेहतर विकल्प के रूप में डेवलप करने का संकल्प भी लिया।

मुंबई के एक पांच सितारा होटल स्टार सहारा में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उमेश कुमार ने कहा कि “मैं उत्तराखंड का रहने वाला हूं। मेरे खून में उत्तराखंड बसता है। जैसे ही मुझे पता चला कि हमारे उत्तराखंड की टीम के लिए कोई फ्रेंचाइज़ी आगे ही नहीं आया और मेरे प्रदेश का अपमान हो रहा है, मुझसे रहा नहीं गया। मैंने अपने सहयोगियों से कहा कि चाहे कुछ भी क्यों ना हो जाए, मुझे ‘उत्तराखंड लॉयन्स’ की टीम चाहिए और मै बेहद खुश हूं कि मैनें ‘उत्तराखंड लॉयन्स’ की टीम को ओन किया है।” उमेश कुमार ने आगे कहा कि “हम अच्छा प्रदर्शन करेंगे। हमारे पास खोने को कुछ भी नहीं है और पाने को सारा जहां है। हम उत्तराखंड के बहादुर लोगों की नुमाइंदगी कर रहे हैं और बेहतरीन प्रदर्शन कर दिखाएंगे। हमारी तैयारियां पूरे ज़ोर-शोर से चल रही हैं।“

पुणे स्थित सहारा इंडिया एम्बी वैली में होने वाली गोल्फ प्रीमियर लीग 2013 में जिन कुल 9 टीमों में खिताबी टक्कर होनी हैं, वो इस तरह से हैं…

1.     उत्तराखंड लॉयन्स
2.     गुजरात अंडरडॉग्स
3.     कर्नाटक वॉरियर्स
4.     महाराष्ट्र 59अर्स
5.     शुभकामना यूपी ईगल्स
6.     तमिलनाडू पुल्लीस
7.     विटालसी पंजाब लांसर्स
8.     कोलंबो सिक्स
9.     डेहली डॉर्ट्स

इन 9 टीमों में दुनिया के चार-चार बेहतरीन गोल्फर्स हिस्सा लेंगें, जिन्हे नीलामी के ज़रिए खरीदा जा चुका है। इस इंटरनेशनल लीग में देश और विदेश के नामी-गिरामी खिलाड़ियों के साथ ही साथ, एशियन टूअर प्लेयर्स और प्रोफेशनल गोल्फ टूर ऑफ इंडिया, PGTI के प्लेयर्स को भी शामिल किया गया है। अंडरडॉग मानी जा रही ‘उत्तराखंड लॉयन्स’ में अंतर्राष्ट्रीय धुरंधर गोल्फरों के जुड़ने के बाद से प्रदेश के लोगों को टीम से काफी ज्यादा उम्मीदें हैं।

उत्तराखंड लॉयन्स के को-ओनर GTM बिल्डर्स के MD तुषार कुमार मानते हैं कि ‘उत्तराखंड लॉयन्स’ ने ऐसे खिलाड़ियों को खरीदा है जो बेहतरीन फॉर्म में हैं और दमदार प्रदर्शन करने में कामयाब होंगें। हमने बड़े नामों के बजाय, अच्छा खेल दिखाने वाले गोल्फर्स पर दांव आज़माया है। इंशाअल्लाह, जीत हमारी ही होगी। इससे हमारे प्रदेश में गोल्फ एक बेहतरीन विकल्प के तौर पर उभरेगा।”

गोल्फ प्रीमियर लीग का पहला संस्करण तीन दिनों तक चलेगा, जो 7 से 10 फरवरी के बीच पुणे के एंबी वैली सिटी गोल्फ कोर्स में खेला जाएगा। इसके लिए यूरोपियन टूअर, एशियन टूअर और PGTI ने खिलाड़ियों को रीलीज़ भी कर दिया है। GPL 2013 में सभी की निगाहें जहां शॉन मिचेल, डैरिन क्लार्क, एंजेल कैबरेरा, माइकल कैंपबेल और रिच बीम जैसे बड़े खिलाड़ियों पर होगी, वहीं भारत के स्टार गोल्फर गगनजीत भुल्लर भी अपना जादू बिखेरते नज़र आएंगे। ‘उत्तराखंड लॉयन्स’ की टीम अपनी गोल्फ स्टिक से करामात करने को तैयार है। ऐसे में ‘उत्तराखंड लॉयन्स’ की चुनौती को हल्के में लेना बाकी टीमों के लिए खासा सिरदर्द साबित हो सकता है।

प्रेस विज्ञप्ति

विष्णु खरे की धारणाएं कुंठित व्यक्ति के तर्कहीन और अविश्वसनीय विचार लगते हैं

वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे ने कवि चंद्रकांत देवताले को अकादेमी पुरस्कार मिलने पर एक टिप्पणी लिखी थी. उस टिप्पणी में उन्होंने कहा कि लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल और अरुण कमल को 'निर्लज्ज षड्‌यंत्रों' से अकादमी पुरस्कार दिया गया जिसे उन्होंने 'मैचिंग बेशर्मी' से स्वीकार कर लिया और यह 'अक्षम्य' है. इसका प्रतिवाद वरिष्ठ कवियों लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल के हस्ताक्षर से जारी किया गया है, जो इस प्रकार है-

विष्णु खरे की धारणाएं कुंठित व्यक्ति के तर्कहीन और अविश्वसनीय विचार लगते हैं

कोलकाता से प्रकाशित दैनिक  ‘प्रभात वार्ता' और फिर ‘जानकीपुल’ ब्लॉग में पिछले दिनों कवि-आलोचक विष्णु खरे की एक टिप्पणी दिखाई दी, जो उन्होंने चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादेमी पुरस्कार को दिये जाने की घोषणा का अभिनंदन करते हुए लिखी है। टिप्पणी में उन्होंने हमारे एक प्रिय और सम्मानित कवि की प्रशंसा के साथ-साथ एक तिरस्कार भाव दिखाते हुए यह भी कहा कि लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल और अरुण कमल को "निर्लज्ज षड्‌यंत्रों' से अकादेमी पुरस्कार दिया गया जिसे उन्होंने "मैचिंग बेशर्मी' से स्वीकार कर लिया और यह कि वे इसे "अक्षम्य' मानते हैं।

हम चंद्रकांत देवताले को पुरस्कार दिये जाने पर गहरी प्रसन्नता व्यक्त करने के साथ विष्णु खरे की इस अपमानजनक, मनगढ़ंत, अवांछित और कुंठाग्रस्त टिप्पणी पर गहरी आपत्ति दर्ज करते हैं। विष्णु खरे ने इस टिप्पणी में कवियों को आपस में मिला-जुलाकर देवताले और विनोद कुमार शुक्ल से कहीं बराबर तो कहीं कमतर भी बतलाने की कवायद की है जिसे हास्यास्पद मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन आश्चर्य यह है कि "षड्‌यंत्र' और "बेशर्मी' से संबंधित अपनी धारणा का कोई कारण या औचित्य उन्होंने नहीं बताया।

इस सिलसिले में उनसे संपर्क करने पर सिर्फ यह जवाब मिला कि  ‘यह एक लंबी बहस है। उपर्युक्त सभी कवि अकादेमी पुरस्कार के हकदार थे, लेकिन विनोद कुमार शुक्ल और चंद्रकांत देवताले के बाद।' इस कथन से ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि हमें अकादेमी पुरस्कार दिये जाने के पीछे कोई "साजिश' या उसे ग्रहण करने के पीछे कोई "बेशर्मी' थी। विनोद कुमार शुक्ल और चंद्रकांत देवताले हमारे अत्यंत प्रिय और सम्मानित कवि हैं, लेकिन उनकी कविता की सार्थकता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि उन्हें अकादेमी पुरस्कार कब मिलता है।

विष्णु खरे जिस हड़बड़ी में त्वरित फैसले देना चाहते हैं, साहित्य में वह भी काम नहीं आता। विष्णु खरे शायद विस्मरण के शिकार भी हैं, इसलिए हम उन्हें याद दिलाना चाहते हैं कि जब वीरेन डंगवाल को पुरस्कार मिलने पर कुछ लोगों ने जबरन एक अनावश्यक विवाद करने की कोशिश की तो उन्होंने अपने जर्मनी प्रवास से ही वीरेन के भरपूर और उत्साहवर्धक समर्थन का एक वक्तव्य भेजा था जो "समयांतर' पत्रिका के पन्नों में दर्ज है।

जगूड़ी, मंगलेश और राजेश के पुरस्कार के समय भी उन्होंने ऐसे कोई सवाल नहीं उठाये। ऐसे में विष्णु खरे की धारणाएं कुंठित व्यक्ति के तर्कहीन और अविश्वसनीय विचार लगते हैं। विष्णु खरे को या तो अपनी राय के पक्ष में ठोस प्रमाण देने चाहिए या फिर एक गैर -जिम्मेदार और असत्य वक्तव्य के लिए खेद प्रकट करना चाहिए।

द्वारा जारी….

लीलाधर जगूड़ी

राजेश जोशी

वीरेन डंगवाल

मंगलेश डबराल


वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे ने चंद्रकांत देवताले के साहित्य अकादेमी सम्मान पर जो टिप्पणी की है, वह इस प्रकार है…

जो न फरेब खाते हैं न फरेब देते हैं

विष्णु खरे

अब जबकि मेरे दोनों प्रिय वरिष्ठ कवियों विनोदकुमार शुक्ल और चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है, भले ही विनोदजी को उपन्यास के लिए मिला हो – मैं उन्हें हिन्दी का सबसे बड़ा जीवित उपन्यासकार भी मानता हूँ – तो हिन्दी-पुरस्कारों के इतिहास के एक शर्मनाक परिच्छेद का अंत भी हुआ लगता है। अशोक वाजपेयी जब केन्द्रीय सरकारी अफसर के रूप में अकादमी की कार्यकारिणी के नामजद सदस्य थे तो उन्होंने उससे अस्थायी इस्तीफ़े की अंजीर की पत्ती लगाकर अन्यथा नग्नता से पुरस्कार लिया था। इसे मैं अशोक के चरित्र पर एक अमेट दाग़ मानता हूँ लेकिन उसके बाद भी जिन निर्लज्ज षड्यंत्रों से मंगलेश डबराल, लीलाधर जगूड़ी, वीरेन डंगवाल, अरुण कमल और राजेश जोशी को अकादमी पुरस्कार दिया गया और वैसी ही मैचिग बेशर्मी से उन्होंने लिया भी, उसे मैंने हमेशा अक्षम्य माना है। यदि इन छहों की अब तक की कविता को जोड़ भी दिया जाए तो वह विनोदकुमार शुक्ल और चंद्रकांत देवताले की सम्मिलित कविता के आसपास भी नहीं ठहरती – हाँ, मंगलेश डबराल, लीलाधर जगूड़ी, वीरेन डंगवाल और राजेश जोशी को मिला दिया जाए तो वे शायद अलग-अलग विनोदजी और चंद्रकांत के समतुल्य हो सकें।

अशोक वाजपेयी और अरुण कमल तो शुरूआती कुछ चमक के बाद, जिसे अंग्रेजी में 'फ़्लैश इन द पैन’ कहा जाता है, लगता है पिछले कई वर्षों से अपने ही खिलाफ खराब कविता लिखने की बेरहम साज़िश कर रहे हैं और हैरतअंगेज़ कामयाबी हासिल कर चुके हैं। हिन्दी जगत पिछली अर्द्धशती से भी अधिक से चंद्रकान्त देवताले की कविता से परिचित है। सच तो यह है कि वे उस ज़माने से ही चर्चित और पठित हैं जब रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और कैलाश वाजपेयी जैसे कवि परिदृश्य पर सक्रिय और सृजनरत थे। देवताले की एक प्रारंभिक सर्वोपरि उपलब्धि यह है कि उन्होंने मालवा जैसे इलाक़े में रहते हुए, जहाँ दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस आदि जैसी साहित्यिक आबोहवा नहीं थी और शुक्र है कि न अब है, अपने एक निजी लहजे और कथ्य को अर्जित किया। वे हिन्दी साहित्य के एक प्रखर एम.ए. थे और मुक्तिबोध सहित मालवा के अन्य तार-सप्तकियों से परिचित थे, मुक्तिबोध के कुछ अत्यंत प्रारंभिक युवा प्रशंसकों में से थे, लेकिन मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, प्रभाकर माचवे, प्रभागचंद्र शर्मा या वरिष्ठतर माखनलाल चतुर्वेदी आदि का प्रभाव उनपर नगण्य है। दरअसल मैं अब तक खोज-समझ नहीं पाया हूँ कि 196० के दशक के युवा देवताले को अपनी-जैसी कविता कहाँ-कैसे मिली।

यूं चंद्रकांत की संवेदनात्मक जड़ें मध्यप्रदेश के गोंडवाना-महाकोसल के उस अंचल में हैं जिसमें बैतूल जिले का उनका गाँव जौलखेड़ा पड़ता है और जहाँ से स्वयं मेरा जिला और कस्बा छिन्दवाड़ा बहुत दूर नहीं है लेकिन उनका गाँव ठेठ गाँव है जो कि छिन्दवाड़ा सरीखा जिला-मुख्यालय पूरी तरह कभी हो नहीं सकता। चंद्रकांत का परिवार हम अधिकांशों की तरह निम्न-मध्यवर्गीय ही था यानी जिसमें एक नंगे-भूखे सोने या वक़्त-ज़रुरत लगभग भीख मांगने को छोड़कर हर महीने सब कुछ संभव था। गोर्की के मुहाविरे में कहें तो जो भी इस किडरगार्टन या प्राइमरी में दाखिल होता था उसे वामपंथी-सरीखा कुछ होकर ही ट्रांसफर-सर्टिफिकेट हासिल होता था। देवताले की कविता में यदि भूखंड तपता है तो उसके अंतर्तम क्रोड़ में अभाव, अन्याय, भुगते हुए निर्ममतम यथार्थ और क्रोध का लावा ही है लेकिन स्नेह और संबंधों की याद दिलाने के लिए पूरे गाँव का थूक भी कवि की हथेली पर है। किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते चंद्रकांत को जौलखेड़ा छोड़कर इंदौर के तत्कालीन रियासती-अर्द्ध-महानगरीय-औद्योगिक माहौल में बसना पड़ा जहाँ पिता ने एक किताबों की दुकान खोली। इस सब के स्थायी, दूरगामी परिणाम हुए।

इंदौर पुस्तकों, प्रसिद्ध स्कूलों-कॉलेजों, अखबारों, कपड़ा-मिलों, ट्रेड-यूनियनों, होमी दाजी सरीखे वामपंथी नेताओं की सुन्दर, उत्तेजक, सक्रिय नगरी थी। चंद्रकांत ने कुछ राजनीतिक आन्दोलनों में भी वानर-सेना जैसा हिस्सा लिया। किताबों, ''नई दुनिया’’ जैसे अखबार, ''वीणा’’ जैसी पत्रिका, होलकर कॉलेज जैसे शिक्षण-संस्थान आदि ने किशोर चंद्रकांत को प्रारंभ में गीतकार और बाद में आधुनिक कवि चंद्रकांत देवताले के रूप में विकसित किया। तभी कवि ने अपनी सहपाठिनी कमल यादव से प्रेम-विवाह भी किया। यह अनायास नहीं है कि चंद्रकांत की कविता में स्त्री, (दाम्पत्य-)प्रेम, ऐंद्रिकता की वह उपस्थिति है जो आज के किसी अन्य हिन्दी कवि में नहीं है। दो बेटियों का पिता होने के कारण वात्सल्य और मार्मिकता भी कम नहीं है। देवताले की कविता में सामाजिक और राजनीतिक सरोकार इसीलिए केंद्र में हैं क्योंकि उनके यहाँ भारतीय आदमी, परिवार और मानवता अपने पूरे संघर्ष के साथ मौजूद है। यदि आप अपने लोगों को नहीं चाहते तो समाज को नहीं चाह सकते और यदि समाज आपकी चिताओं के केंद्र में नहीं है तो संकटग्रस्त व्यक्ति भी वहाँ नहीं होगा। और समाज की चिताएं अपने आप नहीं मिट जातीं – उनके लिए आपको राजनीतिक होना ही पड़ता है। ''पर्सनल इज़ पोलिटिकल’’ का अर्थ ही यह है।

देवताले ने हमारे समय की कुछ तीक्ष्णतम, साहसिकतम, स्पष्टतम राजनीतिक कविताएँ लिखी हैं। उन्होंने कभी महानगरों के जीवन का वरण नहीं किया और हम जानते हैं कि जिन कस्बों या शहरों में उन्होंने अपना और अपने परिवार का जीवन बिताया है और बिता रहे हैं वहाँ प्रतिक्रियावादी, फासिस्ट राजनीति अपने भयावहतम रूप में घटित हो रही है। आज मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ या गुजरात जैसे राज्यों में देवताले-जैसी कविता लिखना या उन कविताओं जैसी बातें करना वास्तविक, जानलेवा खतरे से भरा हुआ है। और यह नहीं है कि देवताले की कविता सिर्फ फासिस्ट ताक़तों पर प्रहार करती है – उसने कांग्रेस तथा अन्य ऐसे ''सेकुलर’’ दलों की, साम्यवादी विचारधारा की भी, दोमुंही, पाखंडी, मानवद्रोही नीतियों पर लगातार प्रहार किया है किन्तु एक मौलिक वामपंथ से कभी विश्वासघात नहीं किया। आज देवताले हिन्दी के सर्वाधिक प्रतिबद्ध कवियों में अग्रगण्य हैं। उनकी कविताओं का फलक और आबादी विस्तीर्ण है। उसमें जंगलों, गाँव-खेड़े, कस्बे, महानगरों के बाशिदे हैं। आदिवासियों की उपस्थिति आधुनिक हिन्दी कविता में पहली बार इतनी असलियत से शायद चंद्रकांत के यहाँ ही दर्ज हुई है। बच्चों, स्त्रियों के जितने चित्र चंद्रकांत के यहाँ हैं हिन्दी में शायद किसी और के पास नहीं।निर्दोष भारतीयों से लेकर माफिया सरगनाओं की मौजूदगी भी उनमें देखी जा सकती है। हर स्तर के राजनीतिक धन्धेबाज़ वहाँ पाए जा सकते हैं। देवताले हिन्दी के उन विरले कवियों में से हैं जो न फरेब खाते हैं न फरेब देते हैं। छद्म भोलापन और गीतात्मकता तो उनके आसपास फटक नहीं पाते।

वे शिनाख्त के ख़तरे उठानेवाले कवि हैं। चंद्रकांत की भाषा और शैली में एक विरल सादगी, ऋजुता और संप्रेषणीयता है। उन्होंने अपनी लोक-अंतरंगता को कभी नहीं भुनाया लेकिन उनकी कविताओं में गोंडवाना, मालवा और महाराष्ट्र भी अपनी भाषा तथा संस्कृति सहित बसते हैं। उनसे कविता सुनना एक रोमांचक अनुभव होता है लेकिन हिन्दी में इतनी कमीनगी भी है कि एक मूर्खतापूर्ण, बौद्धिक रूप से दिवालिया पत्रिका के कथित लॉन्ग नाइंटीज़ पर हाल में  निकले एक हास्यास्पद अंक में चंद्रकांत देवताले और विनोदकुमार शुक्ल सरीखे असंदिग्ध बड़े कवियों का उल्लेख भी नहीं है। ऊपर लिखा जा चुका है कि साहित्य अकादमी पुरस्कार कितने कमतर कवियों को लिया-दिया गया है कि यदि वह देवताले को न भी मिलता तो उनके शीर्षस्थ होने पर कोई फर्क न पड़ता लेकिन बेशक इससे कुछ नए पाठक उनकी कविता को खोज-सराह पाएँगे। दु:ख यही है कि दो लोग, जिन्हें इस पुरस्कार से सबसे ज्यादा खुशी और गर्व होते, कविपत्नी कमल देवताले और चंद्रकांत के अनन्य शिष्य, प्रशंसक और मित्र सुदीप बनर्जी, अब इस संसार में नहीं हैं। कई तरह से यह पुरस्कार उनका ही है।

मयंक गुप्ता साधना न्‍यूज के ग्रुप मैनेजिंग एडिटर नियुक्त

साधना न्यूज के सभी चैनलों की कमान अब चेयरमैन दिनश गुप्ता के पुत्र मयंक गुप्ता को सौंप दी गई है. मयंक को ग्रुप मैनेजिंग एडिटर बना दिया गया है. हिंदी पट्टी के छह राज्य मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़, बिहार-झारखण्ड और उत्तर प्रदेश–उत्तराखण्ड में चैनल संचालन के बाद प्रभातम ग्रुप साधना न्यूज का विस्तार राजस्थान में करने जा रहा है.

राजस्थान में चैनल शुरू करने का काम भी मयंक गुप्ता के नेतृत्व में होगा. साधना न्यूज के मैनेजिंग एडिटर के पद पर उनकी ये नियुक्ति प्रभातम समूह के चेयरमैन दिनेश गुप्ता ने की है. नए प्रावधानों के मुताबिक साधना न्यूज चैनल के सभी हेड्स अब सीधे मयंक गुप्ता को रिपोर्ट करेंगे. मयंक गुप्ता ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के डीपीएस से की है. उन्होंने बिजनेस मैनेजमेंट में डिग्री मानचेस्टर यूनिवर्सिटी से हासिल की है. मयंक गुप्ता के प्रोफाइल के बारे में बाकी जानकारी इस विज्ञप्ति से पा सकते हैं…

MAYANK GUPTA – A DYNAMIC BUSINESS BARON IN MAKING

Mayank Gupta is setting a new pace in the business race fuelled with matchless dynamism and gritty determination to add a new global touch to the entire Prabhatam Group. Born in a business family to a great business tycoon and industrialist Mr. Dinesh Gupta, Chairman Prabhatam Group, Mayank Gupta has got his education from Delhi Pubic School and has studied Bachelor’s Degree Program in Business Management from University of Manchester, UK in 2012.

Since joined Prabhatam Group as Director in June, 2012.

On the one hand Mayank Gupta is serving Prabhatam Aviation in mobilizing the purchase of flight schedule for new tourist destination in Helicopter Charter business has also been one of his business passions.  While on the other hand he is actively engaged and single manages the Sadhna News TV Network for enhancing the quality of fix programming chart taking all day-to-day and policy related decisions .apart from shuttling between the real estate divison and company's e-vehicles venture promoting the eco-friendly and battery operated vehicles like E-Bikes, E-Rickshaws, E-Cargo, E-Cleaning Vehicles.

Some key result areas of Maynak Gupta are Corporate Identity Management, Business Development Management, Customer Relations Management, Administrative Governance and Corporate Social Responsibilities where he is playing a pivotal role with an indomitable spirit and unflinching sincerity to make the entire group scale the new heights in the corporate world.

जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर के सिटी चीफ राजीव हिंदी दिवस पर कनाडा में होंगे सम्मानित

कनाडा की साहित्यिक संस्था ‘हमारी हिन्दी’ ने जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर के सिटी चीफ राजीव रंजन तिवारी को सम्मानित करने का निर्णय लिया है। उन्हें संस्था का यह सम्मान 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के अवसर पर कनाडा में दिया जाएगा। राजीव रंजन तिवारी लंबे समय तक दैनिक जागरण मेरठ और देहरादून यूनिट से संबद्ध कार्यालयों में कार्यरत रहे हैं।

उन्होंने राजनीतिक, घोटाले, सामाजिक आदि से संबंधित दर्जनों खबरें ब्रेक की हैं। इन दिनों वे जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर में बतौर सिटी चीफ कार्यरत हैं। वे देश-विदेश के प्रमुख हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन का काम करते रहे हैं। मूल रूप से मैरवा, सीवान (बिहार) के रहने वाले राजीव रंजन तिवारी को इस उपलब्धि के लिए उनके परिचितों ने उन्हें बधाई दी है।

शुभ और कौशलेंद्र की वजह से डिबेट में माखनलाल नंबर वन

भोपाल। गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर में आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता में लगातार दूसरी बार माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के छात्रों ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। विश्वविद्यालय के शुभ तिवारी और कौशलेंद्र सिंह की टीम को पुरस्कार स्वरूप एक ट्रॉफी प्राप्त हुई है। इस प्रतियोगिता में व्यक्तिगत कौशल के लिए कौशलेंद्र सिंह को तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

इस बार 14 और 15 जनवरी को आयोजित प्रतियोगिता का विषय था- “क्या वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समाजसेवा के लिए समर्पित युवाओं के निर्माण का स्वप्न अव्यावहारिक है”। शुभ तिवारी ने विषय के पक्ष में और कौशलेंद्र सिंह ने विपक्ष में अपने विचार व्यक्त किये। गत वर्ष भी इसी विश्वविद्यालय के पराक्रम सिंह और सुरभि मालू की टीम ने इस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने विजेता टीम को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी है।
 

भास्‍कर बठिंडा से विजय अरोड़ा का इस्‍तीफा, अखिलेश पाठक अमर उजाला में बने रिपोर्टर

दैनिक भास्‍कर, बठिंडा में पिछले 5 वर्ष से कार्यरत विजय अरोड़ा ने इस्तीफा दे दिया है. बताया जा रहा है कि इसके पीछे वजह आफिस की अंदरुनी राजनीति है. भास्‍कर में चेतन शारदा के संपादक रहते विजय की खूब तूती बोलती थी. विजय को सिटी इंचार्ज नरिंदर शर्मा का काफी नजदीकी माना जाता है. चेतन शारदा के भास्‍कर छोड़ने के बाद आफिस के अंदर हालात कुछ ऐसे हुए कि विजय को इस्तीफा देना पड़ा.

अमर उजाला, बदायूं की तहसील बिसौली में अखिलेश पाठक को रिपोर्टिंग करने का काम दे दिया गया है. अखिलेश इंटर कॉलेज में टीचर हैं. ऐसा माना जा रहा था कि रिपोर्टिंग के लिए पंकज शर्मा को चुना जाएगा. पर सेलेक्शन हुआ अखिलेश पाठक का. गौरतलब है कि यहां कार्यरत सुधाकर शर्मा को अमर उजाला ने पिछले दिनों बर्खास्त कर दिया था. बदायूं के ब्यूरो चीफ संजीव पाठक की संस्तुति पर अखिलेश पाठक को अभी ट्रायल पर रखा गया है.

अमरेंद्र ‘फारवर्ड प्रेस’ के हरियाणा ब्यूरो चीफ बने, शरद शंखधर का अमर उजाला जम्‍मू तबादला

अमरेन्द्र कुमार आर्य ने लोकमत समाचार से इस्तीफा देकर फारवर्ड प्रेस ज्वाइन कर लिया है. अमरेन्द्र कुमार आर्य पहले लोकमत समाचार के जलगांव संस्करण में सब एडिटर के तौर पर नियुक्त थे. अब वे फारवर्ड प्रेस के हरियाणा ब्यूरो प्रमुख के रूप में नियुक्त हुए हैं. फारवर्ड प्रेस ने हरियाणा के हिसार में ब्यूरो कार्यालय शूरू किया है. इससे पहले अमरेन्द्र कुमार आर्य राष्ट्रीय सहारा, प्रभात खबर, जागृति टाइम्स और दैनिक हिन्दूस्तान में रिपोर्टर के तौर पर कार्य कर चुके हैं.

अमर उजाला प्रबंधन ने पिछले दिनों तमाम आरोपों में संलिप्‍त पाए जाने पर बदायूं कार्यालय के पूरे स्‍टाफ को बर्खास्‍त कर दिया था. इस कार्रवाई के लपेटे में मैनपुरी के ब्‍यूरोचीफ शरद शंखधार भी आ गए थे. लेकिन प्रबंधन को स्‍पष्‍टीकरण देकर उन्‍होंने संतुष्‍ट कर लिया. बताया जा रहा है कि अब उन्‍हें सीनियर सब एडिटर बनाकर प्रबंधन ने जम्‍मू भेज दिया है. शरद ने वहां ज्‍वाइनिंग ले ली है.

साधना न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर चैनल वन में पॉलिटिकल एडिटर बनीं अग्निमा

साधना न्‍यूज से अग्निमा का संबंध खत्म हो गया है. वे यहां पर पॉलिटिकल एडिटर थीं. अग्निमा ने अपनी नई पारी चैनल वन के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी पॉलिटिकल एडिटर बनाया गया है. अग्निमा पिछले दो सालों से साधना न्‍यूज के साथ जुड़ी हुई थीं. उन्‍होंने लखनऊ में भी साधना न्‍यूज की जिम्‍मेदारी संभाली. अग्निमा पिछले दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. वे लगभग डेढ़ दशक तक दिल्‍ली में दैनिक भास्‍कर को अपनी सेवाएं दे चुकी हैं.

मीडिया से जुड़ी सूचनाएं खबरें भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

एसएनबी भंग, अनिल राय कारपोरेट रिलेशन में भेजे गए, मनोज मनु के भी पर कतरे

सहारा समूह से खबर है कि एसएनबी को तात्‍कालिक तौर पर भंग कर दिया गया है. अब तक इसकी जिम्‍मेदारी अनिल राय के जिम्‍मे थी. बताया जा रहा है कि उपेंद्र राय के नजदीकी माने जाने वाले अनिल राय से यह जिम्‍मेदारी ले ली गई है. उन्‍हें एसएनबी से हटाकर कारपोरेट रिलेशन में भेज दिया गया है. हालांकि इस बारे में जब अनिल राय से बात की गई तो उन्‍होंने बताया कि न तो एसएनबी को भंग किया गया है और ना ही वे अपने पद से हटे हैं.

एक अन्य सूचना के मुताबिक मनोज मनु से ग्रुप एंकर्स हेड का काम लेकर इसे संबंधित चैनलों के हेड को दे दिया गया है. अभी तक मनोज मनु ग्रुप के सभी चैनलों के एंकर्स की ड्यूटी लगाया करते थे और छुट्टी आदि के काम को देखते थे. पर यह काम उनसे लेकर संबंधित चैनलों के हेड को दे दिया गया है. मनोज मनु सहारा के मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ़ चैनल के हेड हैं. इस फैसले को अच्छा फैसला माना जा रहा है.

उधर, खबर है कि राव वीरेंद्र सिंह से भले ही सहारा समय यूपी और उत्तारखंड का प्रभार लेकर स्वतंत्र मिश्रा को दे दिया गया हो लेकिन उनके पॉवर में कटौती नहीं हुई है बल्कि वृद्धि कर दी गई है. उन्हें सहारा मीडिया को हैंडल करने का फुल टाइम का काम दे दिया गया है. संदीप वाधवा के बिहाफ पर वह सहारा मीडिया के दिन-प्रतिदिन के कामों व नीतिगत निर्णयों को देख कर रहे हैं. इसके तहत राव वीरेंद्र सिंह चुन-चुन कर उपेंद्र राय के लोगों को निशाना बना रहे हैं. उपेंद्र राय ने भी अपने कार्यकाल में पूरे ग्रुप में राय लोगों को खूब तवज्जो दी थी.

उपेंद्र को जहां जहां भूमिहार दिखा, उसे तुरंत प्रमोट किया. पटना से लेकर दिल्ली तक का हाल यही है. इस एकपक्षीय कृत्य से सहारा मीडिया के आम कर्मियों में भी रोष था. वैसे सहारा का यह इतिहास रहा है कि जो भी सत्ता में आता है, अपनी लाबी को मजबूत करने के लिए ऐसे ऐसे कदम उठाता है कि कुछ ही समय बाद उसका असली चेहरा एक्सपोज हो जाता है और प्रबंधन को अंततः उसे फिर साइडलाइन करना पड़ता है. संभव है, कल को फिर कोई नई लाबी सत्ता में आए और संदीप वाधवा व राव बीरेंद्र के निर्णयों को पलटने का काम शुरू कर दे. फिलहाल तो चांदी का सिक्का बाधवा और राव बीरेंद्र का चल रहा है.

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर के प्रेस वार्ता पर रोक

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के एसपी गोंडा कार्यकाल (2003-2004) में एक शस्त्र जांच प्रकरण में कुछ पुलिस अधिकारियों द्वारा उन्हें फर्जी तरीके से गंभीर आपराधिक मुकदमे में फंसाने के लिए एक जांच आख्या उत्तर प्रदेश शासन को भेजी गयी थी. जांचकर्ता अधिकारी ने बिना साक्ष्य के स्वतः यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि ठाकुर की सीधे-सीधे शस्त्र रैकेट में संलिप्तता है. यह जांच आख्या कई समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई.

बाद में इस सम्बन्ध में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एके बिश्नोई ने जांच की और 28 जुलाई 2005 की अपनी आख्या में ठाकुर को किसी भी प्रकार दोषी नहीं पाया. ठाकुर पिछले कई सालों से उन्हें गलत ढंग से फंसाने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्यवाही की मांग कर रहे हैं पर डीजीपी, उत्तर प्रदेश कोई जांच नहीं करा रहे हैं. हाल में उन्होंने इस प्रकरण के सम्बन्ध में अपनी सेवा नियमावली के तहत मीडिया के माध्यम से लोगों तक अपनी बात रखने की अनुमति मांगी और इस लिए 18 जनवरी 2013 तय किया, लेकिन 17 जनवरी को अचानक यह आदेश जारी कर दिया गया कि वे प्रेस वार्ता नहीं करेंगे.

नियुक्ति विभाग ने शशांक शेखर सिंह के खिलाफ जांच शुरू की

नियुक्ति विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार ने सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर द्वारा पूर्व कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के सेवा अभिलेख सम्बंधित मामले में की गयी शिकायत को संज्ञान में लेते हुए नागरिक उड्डयन विभाग को अग्रेतर कार्रवाई करने के निर्देश दिये हैं. शिकायत में ठाकुर ने शशांक शेखर सिंह की जन्मतिथि, शैक्षिक योग्यताओं, तकनीकी योग्यताओं तथा उनकी प्रथम नियुक्ति से अंत तक की चरित्र पंजिका जैसी कई जानकारियों के सम्बन्ध में कोई शासकीय अभिलेख नहीं होने के बावजूद पूरी नौकरी करने की जांच कराने की मांग की थी.

सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत देवेन्द्र कुमार दीक्षित द्वारा सिंह से सम्बंधित कई जानकारियाँ मांगी गयी थी. इस सम्बन्ध में नागरिक उड्डयन निदेशालय के पत्र दिनांक 17 मई 2012 द्वारा बताया गया कि इनमें से कोई भी सूचना निदेशालय में उपलब्ध नहीं है. नियुक्ति विभाग भी कोई सूचना उपलब्ध नहीं करा सका. इसके अलावा 19 अप्रैल 1990 का एक शासकीय अभिलेख सामने आया जिसमे लिखा है- “कैप्टन शशांक शेखर सिंह से अभी तक उनका बायोडाटा तथा चरित्र पंजिका प्राप्त नहीं हुई है. श्री सिंह को अनुस्मारक करने के लिए आलेख सचिव महोदया के अनुमोदनार्थ प्रस्तुत है” जिस पर तत्कालीन नियुक्ति सचिव नीरा यादव का नोट दिनांक 20 अप्रैल 1990 अंकित है- “मैंने श्री सिंह से पुनः व्यक्तिगत रूप से अनुरोध कर उनको रिमाइन्ड करा दिया है.”

शशांक शेखर सिंह के सम्बन्ध में कोई शासकीय अभिलेख नहीं उपलब्ध होने के आधार पर नूतन ठाकुर ने मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश और मुख्य सचिव को पत्र लिख कर प्रकरण की तत्काल जांच करा कर उचित कार्रवाई किये जाने की मांग की थी और हाई कोर्ट में भी याचिका दायर की थी, जिसके बाद शशांक शेखर के विरुद्ध कार्रवाई शुरू हुई है. 

वरिष्‍ठ पत्रकार रजत अमरनाथ की राष्ट्रपति पर किताब- ‘पोल्‍टू टू प्रेसिडेंट : प्रणब मुखर्जी’

सीनियर जर्नलिस्‍ट एवं न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल में कार्यरत रजत अमरनाथ ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पर किताब लिख दिया है. रजत ने राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बचपन से लेकर राष्‍ट्रपति बनने तक की कहानी को अपनी किताब में समेटा है. 'पोल्‍टू टू प्रेसिडेंट : प्रणब मुखर्जी' नामक इस किताब में प्रणब मुखर्जी से जुड़े कई छुए-अनछुए पहलुओं की जानकारी है. इस किताब का प्रकाशन मानस पब्लिकेशन ने किया है. किताब का मूल्‍य 695 रुपये है.

रजत अमरनाथ पिछले दो दशक से खोजी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. उन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत लगभग बीस साल पहले दूरदर्शन के साथ की थी. वे डीडी टू के लिए कार्यक्रम बनाते थे. इसके बाद वे जी न्‍यूज से जुड़ गए. जी न्‍यूज के लांचिंग टीम के सदस्‍य रहे. जी पर प्रसारित होने वाली इनसाइड स्‍टोरी के शुरुआत का श्रेय रजत अमरनाथ को जाता है. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे 2002 में सहारा चले आए जहां लांचिंग टीम के हिस्‍सा रहे.

यहां से इस्‍तीफा देने के बाद स्‍टार न्‍यूज ज्‍वाइन कर लिया था. यहां भी खोजी पत्रकारिता पर आधारित कई खबरें कीं. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद द संडे इंडियन चले गए थे. संडे इंडियन के बाद वे न्‍यूज एक्‍सप्रेस से जुड़ गए. यहां से भी इस्‍तीफा देकर किताब लिखने में जुटे और अब फिर न्‍यूज एक्‍सप्रेस ज्‍वाइन कर लिया है. रजत ने फूलन देवी, जेसिका लाल, क्रिकेट सट्टेबाजी समेत कई विषयों पर खोजी पत्रकारिता की. आतंकवाद, लिट्टे, लश्‍कर-ए-तैयबा समेत कई खतरनाक संगठनों के काम करने, फंड जुटाने के तरीकों पर खबरें ब्रेक कीं.

पंकज मुकाती पर क्‍यों नाराज हुए ‘दबंग दुनिया’ के क्रिएटिव हेड दीपक बुड़ाना?

: कानाफूसी : गुटका किंग कहे जाने वाले इंदौर के व्यापारी किशोर वाधवानी के अखबार दबंग दुनिया में आजकल हलचल बहुत तेज है. आतंरिक विवादों के बीच कीर्ति राणा ने इस्‍तीफा दे दिया. अब खबर है कि लेआउट को लेकर भी बवाल हुआ. इस पर क्रिएटिव हेड दीपक बुड़ाना के नाराजगी की बात भी सामने आ रही है, पर उन्‍होंने इस तरह की किसी बात से इनकार किया है. सूत्रों का कहना है कि 17 जनवरी को प्रधान संपादक पंकज मुकाती ने अखबार का लेआउट चेंज करवा दिया. यह सारा काम क्रिएटिव हेड दीपक बुड़ाना की जानकारी के बिना किया गया, जबकि क्रिएटिव हेड होने के कारण इस तरह का कोई बदलाव उनके निर्देशन में ही होना चाहिए था.

बताया जा रहा है कि इससे नाराज दीपक ने इस्‍तीफा देने की पेशकश कर दी. सूत्रों का कहना है कि दीपक के इस्‍तीफा देने की सूचना मिलते ही प्रबधंन सक्रिय हो गया. वाधवानी ने इस बात को लेकर पंकज पर भी अपनी नाराजगी जताई. इसके बाद पुन: पुराने लेआउट में ही अखबार का प्रकाशन किया गया. हालांकि इस संदर्भ में जब भड़ास4मीडिया ने दीपक बुड़ाना से सम्‍पर्क किया तो उन्‍होंने इस तरह की किसी बात से इनकार किया. साथ ही ये भी कहा कि सारे चेंज उनकी जानकारी में हुए थे. उनके पास समय नहीं था लिहाजा उन्‍होंने ही कहा था कि वो बाद में आकर बाकी लेआउट चेंज करा देंगे.

‘न्यूज प्लस’ के हेड बनाए गए इरफान शेख, आफिस नोएडा सेक्टर 110 में

'न्यूज प्लस' नामक चैनल नोएडा के सेक्टर 110 से संचालित होगा. यहां आफिस खोल दिया गया है. चैनल का हेड इरफान शेख को बनाया गया है. यह चैनल ब्रजेश कुमार राय नामक एक रीयल इस्टेट उद्यमी लांच करा रहे हैं. इनका रीयल इस्टेट का कारोबार पुणे में है. इस नेशनल चैनल को मार्च तक लांच कर दिए जाने की संभावना है. उसके बाद तीन रीजनल चैनल शुरू करने की योजना है. नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

चैनल हेड इरफान शेख जी न्यूज, सहारा समय, सीएनईबी में काम कर चुके हैं. ये वही इरफान शेख हैं जिन्होंने राहुल गांधी पर हिंदी और उर्दू में किताब लिख डाला है. सूत्रों का कहना है कि इस चैनल के सफल होने में संदेह इसलिए है क्योंकि जो लोग इसके लांचिंग के सूत्रधार और सलाहकार बनने जा रहे हैं, उनके पास चैनलों को कंटेंट वाइज हिट कराने का कोई अनुभव नहीं है और न ही वे अच्छी टीम बनाने के लिए जाने जाते हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि यह चैनल भी करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद कुछ वर्षों में आखिरकार गुमानाम चैनलों की भीड़ में शामिल हो जाएगा.

सूत्र कहते हैं कि अभी कुछ कहना जल्दबाजी तो है लेकिन पूत के पांव पालने में नजर आते हैं वाली कहावत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह चैनल जिन जिन हाथों दिमागों के जरिए अस्तित्व में आ रहा है, उससे साफ नजर आ रहा है कि चैनल का भविष्य उज्जवल नहीं है.

ब्राह्मणवादी गुलामी में सिसकती आधी आबादी और मल्टीनेशनल नौटंकी

कल एक कार्यक्रम में महिलाओं को समझने का अवसर मिला। स्थानीय एएन सिन्हा सामाजिक अध्ययन शोध संस्थान में एक मल्टीनेशनल एनजीओ के सहयोग से एक मल्टीनेशनल संगठन ने कार्यक्रम का आयोजन किया था। चूंकि कार्यक्रम महिलाओं पर केंद्रित था और इसे बिहार के नजरिए से देखने की बात कही गयी थी। इसलिए मेरी दिलचस्पी अधिक थी। चूंकि सारा मामला मल्टीनेशनल था तो सब कुछ मल्टीनेशनल के जैसा ही था। दिल्ली से पत्रकारों की टीम किराये पर लायी गयी थी। ठीक वैसे ही जैसे शादी-विवाह में भाड़े पर लोग लाये जाते हैं।

जब मैं कार्यक्रम में पहुंचा तब एक स्थानीय महिला नेता जो एक राजनीतिक दल के विशेष संगठन का राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करती हैं, बोल रही थीं। फ़ूल और मालाओं से गुलजार सजाया गया मंच किसी विवाह के मंडप के जैसा प्रतीत हो रहा था। खैर, वह बोल रही थीं कि महिलाओं के संघर्ष का इतिहास रहा है। आजादी की लड़ाई से लेकर जमीन की लड़ाई तक में महिलाओं ने अपनी भागीदारी निभायी। इतिहासकारों ने महिलाओं के साथ सौतेलापन व्यवहार किया। यह आरोप भी लगाया गया। कार्यक्रम चल रहा था। एक के बाद एक वक्ता मंच पर आयीं और बोल रही थीं। कोई यह संदेश देती नजर आयीं कि महिलाओं को अपने अंदर मुक्ति की भावना जगानी चाहिए। जबतक यह भावना जाग्रत नहीं होगी तबतक कुछ भी नहीं होगा। फ़िर दिल्ली से बुलायी गयीं बिहार की पूर्व महिला राजनीतिज्ञ ने अपने अनुभव साझा किये। बताया कि उन्होंने कैसे संघर्ष किया। कितना लिखा और कितना पढा। सब कुछ बताया। फ़िर जब मैंने उनसे विशेष साक्षात्कार किया तब उन्होंने कहा कि पालिटिक्स में भी महिलाओं का यौन शोषण होता है। ठीक वैसे ही जैसे फ़िल्म जगत, खेल या कारपोरेट घरानों में हुआ करता है। मुझ जैसे अबुझ के लिए यह वाकई एक बड़ी बात थी। पहली बार किसी महिला ने अधिकारिक तौर पर इस सच को स्वीकारा था। बाद में जानकारी मिली कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में यह सारा किस्सा सुनाया है कि कैसे उन्हें एमएलसी बनाया गया।

खैर, कार्यक्रम का दूसरा सत्र शुरु होना था। जानकारी मिली कि दूसरे सत्र में पत्रकार भाग लेंगे। मेरी दिलचस्पी का पारा चढ़ने लगा। लेकिन जल्द ही सारा जोश ठंडा पड़ गया जब जानकारी मिली कि अब इसका उद्घाटन सत्र शुरु होगा। मैं सोच में पड़ गया। हैरानी भी हुई। मालूम हुआ कि डिप्टी सीएम सुशील मोदी 4 बजे आने वाले थे, वे अभी आ रहे हैं। इसलिए पत्रकारों के सत्र को बाद में शुरु किया जायेगा। मेरे बगल में बैठे एक बड़े पत्रकार जिन्हें वक्ता की भूमिका निभानी थी, उठकर चले गये। मैं भी चला जाना चाहता था। लेकिन फ़िर यह सोचकर कि यदि डिप्टी सीएम का भाषण नहीं सुनूंगा फ़िर न्यूज कैसे लिखूंगा। इसलिए रुक गया। तब तक अपने महिला मित्रों से विचार साझा करता रहा। फ़िर डिप्टी सीएम आये। फ़िर उद्घाटन की नौटंकी की गयी। फ़िर परंपरा के अनुसार भाषणबाजी भी हुई। मोदी जी बोलने लगे। तमाम तरह की बातें कहीं उन्होंने। आरक्षण से लेकर दिल्ली गैंगरेप तक की बातें। खास बात यह रही कि उन्होंने आरक्षण को पाजिटिव डिस्क्रीमिनेशन कहा। यानी न्याय के साथ शोषण। जब वे यह बात कह रहे थे तब निश्चित तौर पर उनके चेहरे का रंग सामान्य नहीं था। फ़िर फ़ुले ताई का जिक्र करना यह साबित कर रहा था कि देश में दलित और पिछड़ा साहित्य अब असर दिखा रहा है। वैसे इसकी भी राजनीतिक मजबूरी ही रही, वर्ना दुर्गा और सरस्वती के नाम की कसमें खाने वाले लोग यूं ही फ़ुले ताई की वंदना नहीं कर सकते। ऐसा मैं दावे के साथ कह सकता हूं।

खैर, उद्घाटन सत्र के बाद खाने का दौर चला। खाना स्वादिष्ट और भीड़ बहुत अधिक थी। एक आयोजक प्रतिनिधि ने बताया कि उन्होंने 200 लोगों को बुलावा भेजा था, सब के सब चले आये। अमूमन ऐसा नहीं होता है। वैसे भीड़ के चरित्र के हिसाब से उनका यह कथन वाजिब ही था। भूख मुझे भी लगी थी, इसलिए थोड़ी मशक्कत की तब 4 पूरियां और चिकन के मजे लेने के बाद वापिस सभागार में प्रेस रिलीज लेने पहुंचा। जानकारी मिली कि प्रेस रिलीज टाइप हो रही है। मैं बिहार के बाहर से आये मेहमानों की सूची चाहता था ताकि न्यूज में उनका नाम जोड़ सकूं। इसलिए रुकना पड़ा। कार्यक्रम शुरु हुआ और एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय बोलने लगे। मुझे उनमें और सुशील मोदी के भाषण में कोई अंतर नहीं सुनने को मिला। लगा जैसे मोदी जी ही अभी भी बोल रहे हों एक नये टोन में। बात-बात में “ठीक है” कहने का उनका अंदाज निराला है। इसलिए कभी-कभी भ्रम टूटता भी था।

मेरे सब्र का बांध टूट चुका था। मैं निकल पड़ा। बाइक स्टार्ट की तो देखा वही वरिष्ठ पत्रकार महोदय खड़े थे। शायद उन्हें भी जल्दी थी। मैंने अनुरोध किया कि सर आप कहें तो मैं आपको पहुंचा दूं। वैचारिक मतभेद होने के बावजूद मैं उनका सम्मान करता हूं। उन्होंने मेरा निवेदन स्वीकार किया और बैठ गये। रास्ते में उन्होंने अपने भाषण के बारे में पूछा। वे खुद को संतुष्ट होना चाहते थे कि उन्होंने दस मिनट की दिये गये अवधि में जो कुछ कहा, वह पर्याप्त था। मैंने पूरी ईमानदारी से हां कहा। फ़िर कोतवाली के पास वे उतर गये और मैं आगे निकल पड़ा।

कोतवाली से मेरे आफ़िस की दूरी बमुश्किल एक किलोमीटर की है, लेकिन जाम के कारण मुझे सोचने का पर्याप्त समय मिल गया कि आधी आबादी की गुलामी की मुख्य वजह कुछ और नहीं केवल ब्राह्मणवाद है। आधी आबादी यानी महिलाओं के लिए गुलामी कोई नई बात नहीं है। पश्चिम के देशों में महिलाओं ने जंजीरों को तोड़ने में सफ़लता जरुर हासिल की है, लेकिन मध्य एशियाई देशों में अभी भी यह दिवास्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं। देवी-देवताओं के देश भारत में आधी आबादी की हालत आज भी गुलाम से अधिक कुछ भी नहीं। असलियत तो यही है कि भारत की महिलायें आज भी ब्राह्म्णवादी मानसिकता की गुलाम हैं। फ़िर चाहे वह उच्च वर्ग की महिला हो या मध्यम वर्ग या फ़िर वंचित वर्ग की। कहीं कोई खास अंतर नहीं है। वैसे पुरुष भी इसी मानसिकता के गुलाम हैं। लेकिन बलशाली होने के कारण उन्हें इस गुलामी का दंश कम झेलना पड़ता है।

लेखक नवल किशोर बिहार के पत्रकार हैं. अपना बिहार नामक पोर्टल का संचालन करते हैं.

‘प्रिंटलाइन’ बनाम रद्दी बेचने का कारोबार

: ‘‘प्रिंट लाइन के भीतर के लोग प्रिंट लाइन का संयम तोड़कर बाहर आ गये हैं। उसके बाहर ढेर सारे अपनों के बीच यह पहचानना मुश्किल हो गया है कि कौन मीडिया से है और कौन नहीं’’ : जाहिर है कि वह जमाना अब चला गया जब ‘प्रिंट लाइन’ के भीतर के लोग प्रिंटलाइन की मर्यादा को न केवल समझते थे बल्कि इसका सम्मान करते हुए कभी भी ‘लक्ष्मण-रेखा’ को लांघने की कोशिश नहीं करते थे। अब तो लोग ‘प्रिंट लाइन’ के भीतर दाखिल ही इसलिये होते हैं कि उन्हें ‘प्रिंट लाइन’ के बाहर आने का कोई बढ़िया-सा अवसर हासिल हो सके। पिछले लगभग चार दशकों में हिंदी पत्रकारिता के उतार (चढ़ाव तो शायद ही हो! ) की पूरी कथा परितोष चक्रवर्ती के नवीनतम उपन्यास प्रिंट लाइन’ में पढ़ी जा सकती है, जिसे हाल ही में ‘ज्ञानपीठ’ ने प्रकाशित किया है।

किताब का लोकार्पण पिछले दिनों रायपुर में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने किया व इस समारोह में देशभर के लेखक, पत्रकार, आलोचक-चिंतकों ने भागीदारी की। छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की।

‘धर्मयुग’ में नहीं जाने से लेकर ‘रविवार’ को छोड़ने तक परितोष के पास पत्रकारिता का एक लंबा अनुभव है पर उनके पाँवों में ‘भँवरी’ (चकरी) लगी हुई है इसलिये वे किसी एक जगह टिककर नहीं रह पाते। नौकरियाँ छोड़ने का रोग उन्हें खाज की तरह रहा है जो उन्हें कोई 15-16 जगह घुमाता रहा और इसी सिलसिले में अनेकानेक लोग उनके संपर्क में आए जो इस उपन्यास के पात्र हैं – कई वास्तविक नामों से और कुछ काल्पनिक। लगभग हकीकत और थोड़े फसाने को लेकर रचा गया यह उपन्यास एक ओर तो विगत् चार दशकों की हिंदी पत्रकारिता का लेखा-जोखा है तो दूसरी ओर नायक ‘अमर’ की जीवनी भी जो इस समस्त घटनाक्रम में सक्रिय रूप से सम्मिलित है।

उपन्यास का एक किरदार ‘कप्पू’ भी है, जिसके साथ काम करने का अवसर इन पंक्तियों के लेखक को भी हासिल हुआ, इसलिये उपन्यास व लोकार्पण कार्यक्रम के विस्तार में जाने से पहले -निश्चय ही क्षमायाचना के साथ- कुछ निजी अनुभव। उन दिनों अखबार में साहित्यिक पत्रकारिता का अवसान पूरी तरह नहीं हुआ था और अखबार में नया होने के कारण मैं हरेक पत्रकार को ‘साहित्यकार’ समझते हुए उन्हें बड़ी श्रद्धा व आदर के साथ देखा करता था।

परितोष, दीवाकर मुक्तिबोध (गजानन माधव मुक्तिबोध जी के सुपुत्र व रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार ) व कप्पू उर्फ निर्भीक वर्मा उसी अखबार में काम करते थे। मैंने पहले भी कहीं जिक्र किया है कि अखबार का माहौल दमघोंटू था और हर वक्त कर्फ्यू जैसा लगा रहता था, जहाँ किसी को भी हँसते-बोलते देख लिये जाने पर फौरन गोली मार दिये जाने का अंदेशा बना रहता था। दीवाकर स्वाभाव से ही गंभीर थे और मैंने उन्हें प्रायः चुपचाप अपना काम करते हुए ही देखा था। ‘कर्फ्यू’ तोड़ने का काम या तो परितोष करते या कप्पू और इसलिये ही हम नये ‘रंगरूटों’ के हीरो थे। एक बार प्रधान संपादक जी ने कप्पू को समय पर अखबार के दफ्तर में आने की सलाह दी तो ‘‘टाइम पर आना और टाइम पर जाना’’ के मौन नारे के साथ कप्पू घर से एक बड़ी -सी अलार्म घड़ी लेकर आने लगे जो टेबल में उनके ठीक सामने रखी रहती, ताकि समय पर जाने में चूक न हो। लेकिन असल किस्सा कुछ और है।

मैंने अर्ज किया कि तब साहित्यिक व ‘मिशन वाली पत्रकारिता’ का अंत तो नहीं हुआ था लेकिन नयी तकनीक के आगमन के साथ बाजारवाद की पदचाप सुनाई पड़ने लगी थी, जो इतनी महीन थी कि कम से कम हम जैसे नये रंगरूटों की पकड़ से बाहर थी। कोई नया आदमी मिलता और कप्पू से परिचय कराया जाता तो काम के बारे में कप्पू का कहना होता, ‘‘जी मैं रद्दी बेचने का काम करता हूँ।’’ परितोष इस पर मुस्कुराते रहते और मैं आहत होता कि पत्रकारिता जैसे ‘महान’ व ‘पवित्र’ कार्य को कप्पू इस तरह लांछित कर रहे हैं और उन्हें परितोष का मूक समर्थन हासिल है। बहुत बाद में जब दिल्ली में एक ट्रेड यूनियन के दफ्तर में काफी दिनों तक अपना डेरा रहा तो उन दिनों अंग्रेजी के दो बड़े अखबारों में कीमत घटाकर ज्यादा पन्ने देने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। एक दिन बातों ही बातों में अखबार के हॉकर ने बताया कि ‘‘लंबे समय की मजबूरी है, वरना अखबार को बाँटने के बदले यदि उसे रद्दी में बेच दिया तब भी उतने ही पैसे मिल जायेंगे।’’ मुझे उसी क्षण कप्पू व परितोष की याद आयी और दरअसल ‘प्रिंट लाइन’ की समस्त कथा उस पूरे दौर कथा है जिसमें सरोकारी पत्रकारिता रद्दी बेचने के कारोबार में बदल गयी।

छत्तीसगढ़ के छोटे-से गाँव से उपन्याय का नायक अखबारी लेखन की शुरूआत करता है और रायपुर के एक अखबार से सक्रिय पत्रकारिता में प्रवेश करते हुए अंततः देश की राजधानी दिल्ली में पहुँचता है जहाँ उसकी नियति बाजारू हथकंडों द्वारा छले जाने के लिये अभिशप्त है। लेकिन मजे की बात यह है कि ‘मिशन’ के खाज का मारा नायक अब भी ‘‘सब कुछ लुटाकर होश में आये तो क्या किया’’ कहने के बजाय ‘‘जो घर फूँके आपना’’ के मंत्र का जाप करता दिखाई पड़ता है। इसलिये लक-दक गाड़ियों में घूमने व लाखों की सैलरी लेने वाले आज के पत्रकारों के लिये यह पत्रकार किसी अजूबे से कम नहीं है जो संपादक-प्रबंधक द्वारा छूट दिये जाने पर भी अपने लिये न्यूनतम वेतन तय करता है और एक डूबती हुई पत्रिका को बचाने और चलाने के लिये अपना वेतन व खर्च कम कर लेता है।

लेकिन इस आत्मकथात्मक उपन्यास में केवल पत्रकारिता की कथा नहीं है। बहुस-सी और भी कथायें हैं जो साथ-साथ चलती रहती हैं। छत्तीसगढ़ के गाँवों कस्बों में वर्ण-व्यवस्था, गाँवों से मजदूरों का पलायन, आपातकाल के काले दिन, पृथक छत्तीसगढ़ का आंदोलन -आदि अनेक प्रसंग कथा में बार-बार में आते हैं ओर इस कथा को अत्यंत रोचकता के साथ इतिहास की तरह भी पढ़ा जा सकता है। छत्तीसगढ़ की कथा यहाँ की प्रमुख पैदावार धान के उल्लेख के बगैर पूरी नहीं हो सकती सो कुछ पन्नों पर आप धान की विभिन्न किस्मों से भी रू-ब-रू हो सकते है। सबसे बड़ी बात यह है कि किताब को पढ़ने के लिये प्रयास की जरूरत नहीं है, किताब स्वयं को पढ़ाती चलती है। यह रोचकता मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भी नजर में आयी और उन्होंने कहा कि  इस किताब को पढ़े बगैर मुझे चैन नहीं आयेगा, अभी थोड़ी पढ़ी तो बेचैन हूँ। इसे पढ़ते हुए बहुत आनंद आ रहा है।  आलोचकों पर चुटकी लेते हुए उन्होंने कहा कि आप विद्वानों को तो और भी अधिक आनंद आयेगा।

दिल्ली के वरिष्ठ समीक्षक व मुख्य वक्ता डॉ. अजय तिवारी ने  इसे दांपत्य-प्रेम का अद्भुत उपन्यास बताया जो प्रेमचंद के यहाँ दिखाई पड़ता है। उन्होंने कहा कि सिर्फ इसी वजह से उपन्यास की कुछ कमियों को -जो उपन्यासकार की हड़बड़ी की वजह से उत्पन हुई हैं -खारिज किया जा सकता है। दिल्ली के ही कवि व समीक्षक डॉ. जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि यह किसी निष्कर्ष में पहुँचने की जल्दबाजी वाला उपन्यास नहीं है बल्कि यहाँ पर अर्थ की अनेक सभावनायें हैं। यह प्रश्न पूछने वाली, प्रश्न पूछने का शऊर पैदा करने वाली, बेचैनी उत्पन्न करने वाली व सच को सच की तरह कहने का साहस प्रदान करने वाली रचना है। अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि उन्हें इस बात का फख्र हासिल है कि उन्हें इस रचना को ड्राफ्ट दर ड्राफ्ट लेखन -प्रक्रिया के दौरान ही पढ़ने का गौरव हासिल है, ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति अपनी नयी गाड़ी के इंजन को रवां करने के लिये उसे अपने मित्र को सौंप देता है।

चर्चा का सूत्र थमाने के लिये परितोष ने भी संक्षिप्त वक्तव्य दिया। कहते हुए वे थोड़े भावुक हो गये, हालांकि उनका सेंस ऑफ ह्यूमर विपरीत परिस्थितियों में कुछ ज्यादा ही जागृत हो जाता है। जब वे दिल्ली से अपनी पत्रिका निकाल रहे थे और घाटे में चल रहे थे तो अचानक मैंने देखा कि पत्रिका के अंग्रेजी संस्करण के शुभारंभ की घोषणा की गयी है। मैंने तुरंत फोन घनघनाया और इस उलट-बाँसी का आशय पूछा। परितोष ने कहा कि ‘‘तुम नहीं समझोगे। गरीब आदमी ही ज्यादा बच्चे पैदा करता हैं।’’ लेकिन यहाँ पर वे रूआँसे-से हो गये। पता नहीं ऐसा क्यों होता है कि तस्वीर खिंचवाते हुए प्रेमचंद के जूते फटे हुए दिखाई पड़ते हैं और बोलते हुए परितोष का गला रूंध जाता है! हिंदी-समाज अपने लेखकों के साथ ऐसा बर्ताव क्यों करता है?

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं. सरकारी नौकरी से कुछ समय पहले रिटायर हुए. उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. दिनेश के लिखे से साक्षात्कार के लिए यहां क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश

मक़बूल उन पत्रकारों में हैं जिन्हें अपना काम करने पर जेल भेजा गया

श्रीनगर : साहिल मक़बूल अपनी स्नेही मुस्कान के साथ झिझकते हैं, ऐसी अतिसंवेदनशीलता उन लोगों में खासकर देखी जा सकती है, जिन्होंने या तो बहुत ज्यादा सार्वजनिक अपमान सहा हो अथवा निजी त्रासदी। उन्होंने दोनों को बर्दाश्त किया है। 44 वर्षीय कश्मीरी पत्रकार और कवि कहते हैं कि उन्हें उन लोगों ने धोखा दिया, जिन पर यकीन किया, उन्हें 16 सितंबर 2004 को गिरफ्तार किया गया, जेल में डाला गया और उनके मुताबिक, भयंकर यंत्रणा दी गई। श्री मक़बूल भारत के अशांत कश्मीर क्षेत्र में खोजी पत्रकार के तौर पर जीवन निर्वाह कर रहे थे।

“मैंने अपना सब कुछ खो दिया,” श्रीनगर में एक हाउसबोट के प्रतीक्षाकक्ष में बैठे श्री मक़बूल कहते हैं, सुबह का वक्त है और उनके पीछे सूर्योदय की किरणें डल झील पर बिखर रही हैं। “मैंने अपने स्त्रोत, संपर्क खो दिए। आप इन चीजों की कदर समझ सकते हैं। मैंने तो अपना वो पारिवारिक घर तक खो दिया, जिसका मैं सालों से रखरखाव कर रहा था। मेरा कैमरा, लैपटॉप, पासपोर्ट हर चीज़ चली गई।”

श्री मक़बूल उन भारतीय पत्रकारों और संपादकों की फेहरिस्त में शामिल हैं, जिनका दावा है कि उन्हें अपना काम करने की एवज़ में जेल में डाल दिया गया। गत वर्ष राजनीतिक कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को गिरफ्तार किया गया, जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया, लेकिन श्री मक़बूल सरीखों के मामले बामुश्किल सुर्खियां बटोर पाए हैं।

कश्मीर का हरा-भरा पर्वतीय क्षेत्र भारत और पाकिस्तान के दोनों ओर फैला है और दोनों ही देश पूरे क्षेत्र पर अपना-अपना दावा ठोकते हैं। कानून प्रवर्तन प्राधिकारियों और भारतीय हुकूमत से आज़ादी चाहने वाले कश्मीरियों के बीच अकसर तनाव हिंसा में तब्दील होता है। श्री मक़बूल की गिरफ्तारी वाले वर्षों में, खास तौर पर कश्मीर का मुख्य शहर श्रीनगर अशांत था।

एक धर्मपरायण मुस्लिम, श्री मक़बूल कहते हैं कि शुक्रवार जुम्मे की नमाज़ के बाद एक दोपहर उन्हें भारतीय सेना के साहिल मकबूलबादामी बाग़ दफ्तर के बाहर गिरफ्तार कर लिया गया। बादामी बाग भारी सैन्य ठिकानों से आबाद श्रीनगर का एक छावनी इलाका है। श्री मक़बूल कहते हैं कि उर्दू अखबार “चट्टान” में काम करने के दौरान उनका एक सैन्य जनसंपर्क अधिकारी से परिचय था, जिन्होंने श्री मक़बूल को अपने कार्यालय आने का न्योता भेजा था, इस दिखावे के साथ कि आर्मी अखबार में एक विज्ञापन छपवाना चाहती है। “चट्टान” कम स्टाफ वाला एक अखबार है, जो बहु-भूमिकाओं के लिए अपने कर्मचारियों का इस्तेमाल करता है।

भारतीय आर्मी के एक प्रवक्ता ने श्री मक़बूल के दावे के बारे में किसी जानकारी से इन्कार कर दिया। जिस जनसंपर्क अधिकारी की तरफ श्री मक़बूल ने इशारा किया था, उन तक टिप्पणी के लिए नहीं पहुंचा जा सका। चाय की चुस्कियों के बीच कार्यालय में एक घंटा इंतज़ार करने के बाद, श्री मक़बूल कहते हैं कि आखिरकार उन्हें बैरंग लौटा दिया गया। जैसे ही वे छावनी के प्रवेश मार्ग, जिसे राजेन्द्र सिंह गेट कहा जाता है, से आगे बढ़े, उन्हें साधारण कपड़े पहने पांच लोगों ने आंखों पर पट्टी बांधकर एक जीप में फेंक दिया गया। श्री मक़बूल दावा करते हैं कि क्योंकि वो इस इलाके में खोजी पत्रकारिता करते थे, लिहाज़ा उन्होंने पहचान लिया कि ये सेना के जवान थे।

श्री मक़बूल कहते हैं कि इसके बाद उन्हें हरी निवास ले जाया गया। कभी ये स्थानीय महाराजा का निवास हुआ करता था और डल झील के नज़दीक एक सुरम्य स्थान था, मानवाधिकार समूह, जम्मू और कश्मीर नागरिक समाज गठबंधन के कार्यक्रम संयोजक खुर्रम परवेज़ कहते हैं कि आतंकवाद के चरम वर्षों, 1997 से 2007, में ये जगह आर्मी का पूछताछ केन्द्र बन गई थी। सेना उस दौरान हरी निवास का इस्तेमाल संदिग्धों से पूछताछ हेतु करती थी, इस आरोप पर टिप्पणी से सेना ने इन्कार कर दिया।

आर्मी श्री मक़बूल से पूछताछ की जानकारी से इन्कार करती है। आर्मी के एक प्रवक्ता ने कहा कि पूरे इलाके में आतंकवादी गतिविधियों में आई कमी के कारण श्रीनगर के पूछताछ प्रकोष्ठ अब इस्तेमाल नहीं किए जाते। “ये अतीत की बातें हैं, जो अब धीरे-धीरे समाप्त हो गई हैं क्योंकि कश्मीर ने ज्यादा शांत दौर में प्रवेश कर लिया है,” उन्होंने कहा, जब उनसे इन चैंबरों में यंत्रणा के आरोपों पर सवाल किया गया।

इस तरह के पूछताछ प्रकोष्ठ अब भी पूरे श्रीनगर में सक्रिय हैं और इन्हें पर्दे में रखने उद्देश्य से इनकी जगहें लगातार बदली जाती हैं, मानवाधिकारों का ये दावा सेना के वर्णन से पृथक है। उदाहरण के लिए श्री परेवज़ और उनका संगठन फिलहाल जम्मू-कश्मीर में कथित यंत्रणाओं पर एक रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिसमें निजी अनुभव और मेडिकल रिकॉर्ड शामिल हैं।

श्री मकबूल ने एक साक्षात्कार में कहा कि बतौर पत्रकार उन्होंने हरी निवास का दौरा किया था और कहते हैं कि उन्होंने सफेदी की उखड़ी हुई पपड़ियों से जगह को पहचान लिया। वह दावा करते हैं कि औपचारिक तौर पर जासूसी का मामला दर्ज करने से पहले उन्हें सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार अधिनियम, अशांत क्षेत्र में सैनिकों की मानवाधिकार हनन के अभियोगों से हिफाज़त करने वाला कानून, के तहत करीब पंद्रह दिनों तक जेल में रखा गया था।

आर्मी ने श्री मक़बूल पर 2001 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान वहां की खुफिया एजेसीं से मिली-भगत का आरोप लगाया। श्री मक़बूल ये कहते हुए इस बात से इन्कार करते हैं कि उनकी यात्रा का उद्देश्य पाकिस्तान के लिए भारत के कब्ज़े वाले कश्मीर को छोड़ने वाले प्रवासियों के साक्षात्कार करना था। आर्मी के एक प्रवक्ता ने श्री मक़बूल के इन आरोपों पर टिप्पणी से इन्कार कर दिया कि उन्होंने पाकिस्तान की यात्रा साक्षात्कारों के सिलसिले में की थी।

पाकिस्तानी खुफिया एजेसीं आईएसआई, इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस, की एवज़ में जासूसी के आरोपों में गिरफ्तारी के पूरे नौ दिन बाद उन पर अभियोग लगाया गया। जम्मू-कश्मीर सेन्ट्रल जेल में अभियोग के पश्चात भेजे जाने से पहले, शुरुआती पूछताछ के दौरान श्री मक़बूल आरोप लगाते हैं कि उनके साथ मारपीट की गई, उनके हाथ छत पर टांग दिए गए और पैरों की मांस-पेशियों को रोलर से कुचला गया। श्री मक़बूल के मुताबिक, जिस अधिकारी ने पूछताछ की, वो एक आर्मी अफसर था, जिसे वो खोजी पत्रकार के रूप में काम करने के कारण पहचान गए। वह दावा करते हैं कि जब तक उन्हें जेल भेजा गया, तब तक वो चलने-फिरने में अक्षम हो चुके थे।

आर्मी प्रवक्ता ने दावा किया कि आज की तारीख में कश्मीरी जेलों में इतने कठोर ढंग से पूछताछ नहीं की जाती। “मैं किसी विशिष्ट मामले पर टिप्पणी नहीं कर सकता,” अफसर ने कहा, “लेकिन ऐसा केवल खतरनाक आतंकवादियों के साथ ही किया जाता है।”

श्री मक़बूल की कहानी की प्रमाणिकता हेतु किसी तरह के मेडिकल रिकॉर्ड्स प्रस्तुत नहीं किए जा सके। उनका वर्णन इस क्षेत्र में जेल में होने वाले दुर्व्यवहार के उन्हीं मामलों सरीखा है, जिनके बारे में स्थानीय लोग और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार समूह सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, दो स्थानीय मानवाधिकार समूहों (मानवाधिकारों के लिए अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक न्यायालय और भारतीय कश्मीर में न्याय और गायब लोगों के अभिभावकों का संगठन) द्वारा तैयार, “तथाकथित अपराधकर्ता:जम्मू और कश्मीर में दंडाभाव की कहानियां”, नाम की रिपोर्ट में अपहरण, यातना और न्यायिक हिरासत में मौत के करीब 214 मामलों का उल्लेख है, जिन्हें जेलों में नहीं बल्कि अस्थायी थानों अथवा पूछताछ प्रकोष्ठो में अंजाम दिया गया।

ज़मानत मिलने से पहले श्री मक़बूल ने जम्मू-कश्मीर सेन्ट्रल जेल में तीन साल, चार महीने बिताए। गिरफ्तारी के आठ साल बाद भी वो ट्रायल का इंतज़ार कर रहे हैं। श्री मक़बूल को लगता है कि उनकी रिपोर्टिंग की संवेदनशील प्रकृति ही उनकी गिरफ्तारी की वजह रही। “मैं भ्रष्टाचार, हिरासत में मौतों, मुठभेड़ों जैसे मुद्दों पर लिख रहा था,” श्री मक़बूल कहते हैं। “मैं मानवाधिकार हनन, विशेष रूप से, आर्मी द्वारा किए जाने वाले, पर फोकस कर रहा था” उन्होंने आगे जोड़ा। श्री मक़बूल जिस काम का हवाला देते हैं, वो दैनिक उर्दू भाषी अखबार “चट्टान” में प्रकाशित हुआ।

श्री मक़बूल का दावा कि आर्मी पत्रकारों को निशाना बनाती है, पर जब आर्मी प्रवक्ता से सवाल किया गया, तो उन्होंने जवाब में कहा कि स्थानीय प्रेस के साथ संबंध “बहुत प्रगाड़” हैं। उन्होंने इस पर विस्तार से कुछ नहीं कहा। श्री मक़बूल अकेले कश्मीरी पत्रकार नहीं, जिन्हें उक्त आरोपों के चलते जेल हुई। 45 वर्षीय इफ्तिखार गिलानी की “माई डेज़ इन प्रीज़न”; उनके एक सम्मानजनक पत्रकार होने से लेकर कथित जासूसी के आरोप में तिहाड़ जेल में बिताए वक्त का संस्मरण है।

श्री गिलानी, जो फिलहाल “डेली न्यूज़ ऐंड एनालिसिज़” के लिए रिपोर्टिंग करते हैं, 2002 में एक स्थानीय अखबार “कश्मीर टाइम्स” में काम करने के दौरान गिरफ्तार किए गए। श्री मक़बूल की तरह श्री गिलानी भी अर्से से कश्मीर में सैन्य ऑपरेशन को कवर कर रहे थे।

“जब उन्हें एहसास हुआ कि मैं एक पत्रकार हूं और पता चला कि मैं क्या लिखता हूं, उन्होंने मुझपर सख्ती बरतना शुरू कर दिया,” उन्होंने कहा। सेना ने श्री गिलानी की गिरफ्तारी और पूछताछ से जुड़े प्रश्नों पर टिप्पणी से इन्कार कर दिया।

दिल्ली के बाशिंदे श्री गिलानी को आखिरकार शहर के तिहाड़ जेल भेज दिया गया, वो दावा करते हैं कि वहां उनके साथ मारपीट की गई, उन्हें यातनाएं दी गईं और उस कमीज़ से मल साफ करने को कहा गया, जिसे उन्हें लगातार तीन दिनों तक पहनाए रखा गया, ये कुछ एक घटनाएं हैं जिनका उन्होंने अपने संस्मरण में हवाला दिया हैं। “सुधारों को लेकर की जाने वाली बकवास पर यकीन मत कीजिए,” वह कहते हैं। “तिहाड़ दुनिया का सबसे खराब जेल है।”

तिहाड़ जेल के एक प्रवक्ता सुनील गुप्ता ने तिहाड़ दौरे पर कहा था कि व्यक्तिगत मामलों पर बात नहीं की जा सकती, लेकिन तिहाड़ में यातनाएं पूरी तरह निषिद्ध हैं। लेकिन श्री मक़बूल के विपरीत श्री गिलानी आठ महीनों के अंदर-अंदर आरोप खारिज होने के बाद जेल से छूट गए। वो इसके पीछे कश्मीर टाइम्स के सक्रिय समर्थन की बात कहते हैं, जिन्होंने उनकी रिहाई के लिए लॉबी की। अखबार की कार्यकारी संपादक अनुर्ता भसीन ने ये कहते हुए श्री गिलानी के बयान की पुष्टि की कि श्री गिलानी की आज़ादी के लिए कश्मीर टाइम्स से जो बन पड़ता था, उसने किया।

श्री मक़बूल को अपने संगठन से ऐसा समर्थन नहीं मिला। “मैं बदकिस्मत था,” श्री मक़बूल “चट्टान” का हवाला देते हुए याद करते हैं। “सेना के दबाव में, उन्होंने चुप्पी साध ली।”

“चट्टान” के वरिष्ठ संपादक ताहिर मोहिद्दीन ने श्री मक़बूल की पीढ़ा पर दुखी मन और स्वेच्छा से बोला। “उनके खिलाफ आरोप थे, लेकिन उनकी पुष्टि नहीं हुई,” श्री मोहिद्दीन दावे के साथ कहते हैं कि उनकी गिरफ्तारी के वक्त अखबार से जो बन पड़ा, उसने किया।

“हमने विभिन्न अधिकारियों से संपर्क किया और उनकी एवज़ में दलीलें दीं,” वह कहते हैं।

जम्मू-कश्मीर में जेलों के महानिदेशक 51 वर्षीय नवीन अग्रवाल कहते हैं कि अगर ये बात सही है, तो दुखदायी है, श्री मक़बूल पर लगे आरोप कभी सिद्ध नहीं हो पाए। “यंत्रणा के कथित मामले प्रांत की दोनों प्रमुख जेलों में नहीं हुए,” उन्होंने कहा। श्री अग्रवाल संहेदास्पदों पर औपचारिक तौर पर अभियोग अथवा दोषसिद्धि के बाद अथवा ट्रायल का इंतज़ार कर रहे कैदियों के कारावास हेतु उत्तरदायी हैं।

श्री मक़बूल ने अपने वृत्तांत, “द डार्कनेस इनसाइड” में जेल में बिताए वक्त के बारे में लिखा, जो उर्दू में है। एक बार जब वे जम्मू-कश्मीर की सेन्ट्रल जेल में आ गए, जहां यंत्रणा के खिलाफ नियामकों का कठोरता से निरीक्षण किया जाता है, श्री मक़बूल दावा करते हैं कि उन्हें कारावास में ये दौर काफी प्रिय लगा, उन्होंने इस दौरान लेखनी और प्रार्थना पर फोकस किया।

“मैंने जेल को लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया,” वह गर्वोक्ति से कहते हैं।

श्री मकबूल एक बार फिर पत्रकारिता के क्षेत्र में उतर आए हैं, वो उर्दू अखबार “पुकार” में काम करते हैं। श्री मकबूल स्थानीय रेडियो और टेलीविज़न में एक शो की मेज़बानी भी करते हैं। लेकिन उनके लिए घाव भरने की प्रक्रिया काफी धीमी रही है और वो अब भी खुद को बेदाग साबित करने का इंतज़ार कर रहे हैं।

अमेरिकी लेखक माइकल एडीसन हेडन की यह रिपोर्ट दी वाल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित हुई है. माइकल एडीसन हेडन इन दिनों मुंबई में रहते हैं.

कल अशोक वाजपेयी 72 वर्ष के हो गए

Om Thanvi : कल अशोक वाजपेयी 72 वर्ष के हो गए। उम्र के साथ उनकी सक्रियता भी बढ़ती जाती है। उनकी चार किताबों का कल दिल्ली में एक समारोह में लोकार्पण हुआ। इनके अलावा एक किताब उनके नाम निकट के लोगों के 28 लिखे-अनलिखे 'पत्रों' की भी थी, जिनमें कुछ पत्र शरारती किस्म के हैं; मेरा भी! अशोक जी को इस गुप-चुप संकलन के साथ चौंकाने की यह बुनियादी 'शरारत' मेरे मित्र मनीष पुष्कले की रही।

खैर, लोकार्पण के बाद अशोक जी ने नयी कविताओं का पाठ किया। फिर बहाउद्दीन डागर की रुद्रवीणा। फिर अलाव जले और उनके गिर्द एक तम्बू-तले खान-पान। मेजबान सैयद हैदर रज़ा और अनेकानेक लेखकों-कलाकारों का सान्निध्य। एक शानदार शाम।

इस आयोजन की मेरी तस्वीरें Suresh Mahto ने भेजी हैं। उनका आभार। दो आपको दिखा रहा हूँ। एक में मेरे किसी किस्से पर खिलखिलाते अशोक वाजपेयी और ध्रुव शुक्ल। दूसरी में अशोक वाजपेयी, उनके सहयोगी संजीव चौबे, मार्क टली, मैं नाचीज, लंदनवासी कथाकार और राजनेता ज़कीया ज़ुबैरी, मेरी पत्नी प्रेमलता और प्रवासी कथाकार तेजेन्द्र शर्मा। अशोक जी को फिर बधाई। उनकी यह जिन्दादिली, कविताई और रसरंजनी उम्र के सौवें बरस भी ऐसी ही रहे।

ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

97 साल के इन बाबाजी ने कहा- एक तीर्थ बाकी है, चंद्रशेखर आजाद के शहादत स्थल का दर्शन करा दो

Markandey Pandey : ये बाबा जी 97 साल के हैं, मुझसे निवेदन किये कि एक तीर्थ बाकी है मेरा, जहां चंद्रशेखर आजाद शहीद हुए थे, उस तीर्थ का दर्शन करा दो। वे बोलते गए… मैं जेल में था तो अंग्रेजों ने काफी मारा-पीटा, गाली दिया जब देश आजाद हुआ तो मैं जेल से निकल कर घर नहीं गया, साधु बन गया। मैने पूछा- पेंशन मिलती है फ्रीडम फाईटर वाली, तो बोले- मैं नहीं लेता।

मैंने पूछा- यात्रा कैसे करते हैं, तो बोले- महंत या बड़े साधु पैसा दे देते हैं। एक बार सवारी गाड़ी का टिकट लेकर एक्‍सप्रेस में चढ़ गया था तो टीटी ने मेरा झोला फेंक कर उतार दिया था। ये बाबाजी जब आजाद की प्रतिमा के सामने पहुंचे तो वहां लगभग घंटा भर गुमसुम बैठे रहे फिर बोले- पांचवा कुंभ है मेरा इलाहाबाद में। हमेशा यहां आता हूं। इनके (चंद्रशेखर आजाद) बारे में सुनकर ही हम लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ काम करना शुरु किया था। अच्‍छा- अब काली सड़क पर छोड़ दो, वहां एक साधु आलू उबाल कर रखे होंगे मेरे लिये, वही मेरा भोजन है, एक समय का।

Markandey Pandey के फेसबुक वॉल से.

अयोध्या लौट कर आए भगवान राम के प्रेस कांफ्रेंस में पूछे गए कुछ सवाल

aman namra : भगवान राम जब अयोध्या लौट कर आये थे, यदि उस समय हमारी मीडिया रही होती तो प्रेस कांफ्रेंस में कैसे कैसे सवाल करती….. 1- आपके टीम के श्री हनुमान को लंका सन्देश देने भेजा था पर उन्होंने वहाँ आग लगा दी…. क्या आपकी टीम में अंदरूनी तौर पर वैचारिक मतभेद है? 2- क्या हनुमान के ऊपर अशोक वाटिका उजाड़ने के आरोप में वन विभाग द्वारा मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? 3- आपके सहयोगी श्री सुग्रीव पर अपने भाई का राज्य हड़पने का आरोप है| क्या आपने इसकी जांच करवाई ? 4- क्या ये सच है कि सुग्रीव की राज्य हड़पने की साजिश के मास्टर माइंड आप है?

5- आप चौदह साल तक वनवास में रहे… आपको अपने खर्चे चलाने के लिए फंड कहाँ से मिले ? क्या आपने उस फंड का ऑडिट करवाया है ? 6-आपने सिर्फ रावण पर हमला क्यों किया, जबकि राक्षस और भी थे? क्या ये लंका की डेमोक्रेसी को अस्थिर करने की साजिश थी? 7-क्या ये सच नहीं है कि रावण को परेशान करने के मकसद से आपने उनके परिवार के निर्दोष लोगो जैसे कुम्भकरण पर हमला किया? 8-क्या आपकी टीम के हनुमान द्वारा संजीवनी बूटी की जगह पूरा पहाड उखाड़ लेना सरकारी जमीन के साथ छेड़छाड़ नहीं? 9-क्या ये सच नहीं कि आपने हमले से पहले समुद्र पर पुल बनाने का ठेका अपने करीबी नल और नील को नहीं दिया?

10- आपने पुल बनाने के लिए छोटी छोटी गिलहरियों से काम करवाया. क्या इसके लिए आप पर बाल श्रम कानून के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? 11- आपने बिना किसी पद पर रहते हुए युद्ध के समय इन्द्र से सहायता प्राप्त की और उनका रथ लेकर रावण पर हमला किया.. क्या आप इन्द्र की टीम ए है? 12- इस सहायता के बदले में क्या आपने इन्द्र को ये वादा नहीं किया कि अयोध्या का राजा बनने के बाद आप उन्हें अयोध्या के आस पास की जमीन दे देंगे? 13- आपने युद्ध में अयोध्या से रथ न मंगवा कर इन्द्र से रथ लिया क्या ये इन्द्र की कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया?

14- क्या आपने जामवंत को सहायता के बदले राष्ट्रपति बनाने का वादा नहीं किया? 15- विभीषण अपने टीम में शामिल करके आपने दल-बदल क़ानून का सरासर उलंघन नहीं किया ? 16-  और आखिरी सवाल, कि आपने भरत को राजा बनाया … क्या आपको अपनी नेतृत्व क्षमता संदेह था?

aman namra के फेसबुक वॉल से साभार.

कीर्ति राणा को पहले वाधवानी अब मुकाती करने लगे थे अपमानित

: ये है कीर्ति राणा के दबंग दुनिया छोडऩे की कहानी : दंबग दुनिया में आने के तीन महीने बाद से ही किशोर वाधवानी के हाथों लगातार अपमानित हो रहे वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा ने दबंग दुनिया छोडऩे का फैसला दो कारणों से लिया है। वाधवानी राणा को लगातार अपमानित करने के साथ ही उनके खिलाफ षडयंत्र रचते ही रहते थे, लेकिन अब उनके द्वारा समूह संपादक व डायरेक्टर के रूप में लाये गये पंकज मुकाती ने भी कीर्ति राणा का अपमान शुरू कर दिया था। राणा द्वारा दबंग छोडऩे का ताजा कारण भी मुकाती व उनके बीच इलाहबाद कुंभ के कवरेज के मुद्दे पर टकराहट होना बताया जा रहा है।

अमर उजाला के इलाहाबाद संपादक के रूप में काम कर चुके मुकाती ने कुछ दिन पहले राणा की बिना जानकारी के भोपाल में काम कर रहे दंबग के एक रिपोर्टर अमित देशमुख को ताबड़तोड़ इलाहबाद जाकर कुंभ का कवरेज करने को कहा। राणा ने संपादक की हैसियत से इस पर कड़ी आपत्ति जताई और वाधवानी के सामने पूरी स्थिति रखते हुए कहा कि ऐसे समय में जब कुंभ शुरू हो चुका है किसी रिपोर्टर को वहां भेजने का कोई औचित्य नहीं है। वाधवानी ने उनकी बात से सहमति जताते हुए देशमुख को इलाहबाद नहीं भेजने को कहा और राणा से कहा कि वे बड़े खर्च पर कुंभ के कवरेज के बजाय अपने स्रोतों से रोज एक पन्ने पर कुंभ के समाचार व फोटो प्रकाशित करवाये।

वाधवानी व राणा के बीच हुई इस सहमति से मुकाती खिन्न हो गए और उन्होंने दो दिन पहले राणा को फोन पर बेहद आपत्तिजनक लहजे में बात की और कहा कि आपने यह निर्णय किससे पूछकर लिया। राणा ने वाधवानी की जानकारी में सब तय होने की बात कही और इस बात पर भी आपत्ति दर्ज करवायी कि भोपाल एडिशन के एक रिपोर्टर को उनकी जानकारी के बिना आखिर कैसे इलाहबाद भेजने का फैसला ले लिया गया। मुकाती उनकी बातों से सहमत नहीं थे।

इसी दौरान मुकाती कुछ ऐसे शब्द बोल बैठे जिससे राणा ने खुद को अपमानित महसूस किया और चर्चा खत्म होने के कुछ ही मिनट बाद उन्होंने अपना इस्तीफा एक महीने के नोटिस पीरियड के साथ वाधवानी को भेज दिया। अब वाधवानी राणा की मान मनौव्वल में लगे हुए हैं। उनका कहना है कि वे किसी भी हालत में राणा को खोना नहीं चाहते। बड़े लोगों को उंची तनख्वाह पर अपने संस्थान से जोड़ने तथा बाद में अपमानित करने के लिए कुख्यात हो चुके वाधवानी राणा के इस्तीफा के बाद मुकाती से भी बहुत नाराज है।

उपरोक्त बातें मेल के जरिए भड़ास को प्राप्त हुई हैं. अगर इस पर किसी को कोई आपत्ति हो तो वह अपनी बात bhadas4media@gmail.com पर मेल से भेज सकता है.

साक्षी टीवी के मालिक जगन रेड्डी को अब 31 जनवरी तक रहना होगा जेल

हैदराबाद से खबर है कि विशेष सीबीआई अदालत ने आय से अधिक सम्‍पत्ति मामले में गुरुवार को साक्षी टीवी के मालिक एवं वाईएसआर कांग्रेस के अध्‍यक्ष वाईएस जगनमोहन रेड्डी और अन्‍य आरोपियों की न्‍यायिक हिरासत 31 जनवरी तक के लिए बढ़ा दी. जगन को पूर्व मंत्री एम वेंकट रमन राव, बिजनेसमैन एन प्रसाद एवं वरिष्‍ठ अधिकारी केवी ब्रह्मानंद रेड्डी समेत अन्‍य आरोपियों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए अदालत के समक्ष पेश किया गया.

सुनवाई करते हुए अदालत ने सभी आरोपियों की न्‍यायिक हिरासत 14 दिन के लिए बढ़ा दी. सभी आरोपी चंचलगुडा सेंट्रल जेल में बंद हैं. गौरतलब है कि सीबीआई ने आय से अधिक सम्‍पत्ति मामले में जगन मोहन रेड्डी को पिछले साल 27 मई को अरेस्‍ट किया था.

एनबीएसए का निर्देश : डिबेट में भाग लेने वालों की जानकारी सार्वजनिक करे टाइम्‍स नाऊ

नई दिल्ली। द न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टेंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीएसए) ने अपने एक फैसले में न्यूज चैनल टाइम्स नाऊ को निर्देश दिया कि वह चैनल पर चर्चाओं में भाग लेने वाले मेहमानों की संबंधित जानकारी आम लोगों के लिए सार्वजनिक करे। मुंबई के शरद शाह की शिकायत पर टाइम्स नाऊ चैनल के प्रोग्राम न्यूज अवर के विभिन्न एपिसोड्स में टाट्रा ट्रक डील से जुडी बहसों में सामरिक रक्षा विशेषज्ञ मारूफ रजा की मौजूदगी को लेकर यह फैसला दिया गया है।

आठ मई को की गई शिकायत में शाह ने कहा कि पिछले वर्ष अप्रैल के पहले सप्ताह में न्यूज चैनल के न्यूज अवर कार्यक्रम में भाग लेने वाले मारूफ रजा को बतौर विशेषज्ञ बुलाया गया था। वे मारूफ रजा एंड एसोशिएट्स के नाम से कारोबार भी करते हैं और वे विदेशी शस्त्र उत्पादकों, आपूर्तिकर्ताओं और डीलर्स के साथ काम करते हैं। शिकायतकर्ता का कहना था कि चैनल की यह ड्यूटी थी कि वह रजा के कार्यक्रम में भाग लेने से पहले उनके काम और कारोबारी हितों के बारे में लोगों को जानकारी दे क्योंकि इसके अभाव में उनके बतौर विशेषज्ञ के टिप्पणियों और विचारों की तर्कसंगतता और उपयुक्तता के बारे में राय नहीं बनाई जा सकती है। साथ ही, इन विचारों को व्यक्त करते समय कहीं उनके निजी कारोबारी हित तो नहीं जुडे हैं, यह भी सुनिश्चित किया जाना था। इस मामले पर टाइम्स नाऊ के जवाब से असंतुष्ट शाह ने एनबीएसए को इस सबंध में शिकायत दर्ज कराई थी।

इस मामले में दोनों पक्षों के विचार सुनने के बाद संगठन की राय थी कि पारदर्शिता और उद्देश्यपरकता को ध्यान में रखते हुए और न्यूज ब्रॉड कास्टिंग स्टेंडर्ड्स के मद्देनजर यह न्यूज चैनलों के लिए जरूरी है कि वे चैनल पर चर्चाओं में भाग लेने वाले लोगों की संबंधित जानकारी लोगों के लिए सार्वजनिक करें। संगठन का कहना था कि इस मामले में पूरी संभावना थी कि रजा के विचार अपने कारोबारी हितों से भी प्रभावित हो सकते हैं इसलिए सभी चैनल इस तरह की जानकारी सार्वजनिक करें।

इंडिया न्‍यूज के पुराने एंकरों को हटाया जाएगा!

बड़े लोगों के इंडिया न्‍यूज ज्‍वाइन करने के बाद अब इसका चेहरा भी बदलने की कवायद शुरू हो चुकी है. पुराने कर्मचारियों को अब नए तरीके और सलीके के बारे में जानकारी दी जाने वाली है. साथ ही पुराने एंकरों की डीवीडी मंगाकर उनका एंकरिंग इतिहास खंगाला जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि पुराने एंकरों के प्रजेंटेशन को देखने के साथ ही स्‍क्रीन फ्रेंडली चेहरों को ही वरीयता दी जाएगी. कई लोगों को एंकरिंग से हटाया भी जाएगा. इसके साथ ही अब तक नेशनल चैनल पर एंकरिंग कर रहे महिला-पुरुष एंकरों को रीजनल चैनलों में भेज दिया जाएगा.

सूत्रों का कहना है कि इंडिया न्‍यूज के नेशनल चैनल पर आजतक, एबीपी न्‍यूज एवं आईबीएन7 से आए एंकरों को ही मौका मिलेगा. प्रबंधन की कोशिश है इन बड़े चैनलों के साथ काम करने वाले जाने पहचाने चेहरों को इंडिया न्‍यूज पर दिखाकर इसकी विश्‍वसनीयता बढ़ाई जाए. लोगों को चैनल के साथ जोड़ा जाए. इंडिया न्‍यूज के चैनलों में पहले से एंकरिंग करने वाले के सभी एंकरों की डीवीडी मंगवाई गई है. संभावना है कि कुछ लोगों को एंकरिंग से हटाया भी जाएगा.

वहीं दूसरी तरफ खबर है कि नया प्रबंधन कदि र्मचारियों को अप टू डेट करने के लिए 21 से 25 जनवरी तक पांच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन करने जा रहा है. होटल हिल्‍टन में सुबह साढ़े नौ बजे से साढ़े छह बजे तक चलने वाले इस कार्यशाला में सभी कर्मचारियों को उपस्थित रहने का निर्देश दे दिया गया है. बताया जा रहा है कि यहां ज्‍वाइन करने वाले नए एवं वरिष्‍ठ लोग ही इस कार्यशाला में अपने सहकर्मियों को बेहतर प्रजेंटेशन का तरीका सिखाएंगे. (कानाफूसी)

कवरेज कर रहे मीडियाकर्मियों पर भाजपा विधायक के भाइयों ने हमला किया

उधमसिंह नगर जनपद के रुद्रपुर कोतवाली क्षेत्र से बुधवार की शाम करीब आठ बजे अपने घर से बाहर खेल रहे चार साल के एक बच्‍चे को दो बाइक सवार बदमाश अगवा कर ले गए. बच्‍चे का अपहरण होते देख उसके बड़े भाई ने इसकी सूचना अपने परिवार वालों को दी. इसी बीच बच्‍चा मिल गया. इसके बाद क्रेडिट लेने के लिए रुद्रपुर व्‍यापार मंडल के दो गुट आपस में भिड़ गए. इस मामले की कवरेज करने पहुंचे मीडियाकर्मियों की टीम पर भाजपा विधायक राजकुमार ठुकराल के दो भाइयों ने अपने कार्यकर्ताओं के साथ हमला बोल दिया.

विधायक के भाई दीपक ठुकराल, संजय ठुकराल, भाजपा नेता सुनील चौहान समेत तमाम लोगों ने मीडियाकर्मियों को गालियां देने के साथ साथ उनके कैमरे तोड़ने की कोशिश भी की. पत्रकारों से मारपीट करने का प्रयास भी हुआ. यह सब कुछ पुलिस की मौजूदगी में हुआ और पुलिस मूकदर्शक बनकर तमाशा देखती रही. उन लोगों कैमरे को बंद नहीं करने पर जान से मारने की धमकी भी दी. भाजपा विधायक के भाइयों की गुंडई से पत्रकारों में नाराजगी है.

दो पार्ट में क्‍यों दी जा रही है श्री न्‍यूज में सैलरी?

मीडिया जगत में यह एक आम प्रवृत्ति हो चुकी है कि जो लोग किसी संस्‍थान में बड़े पदों पर जाते हैं अपने लोगों को सेट करने की कोशिश करते हैं. इस कड़ी में वे पुराने लोगों को तरह तरह से परेशान करने लगते हैं. इसी तरह के हालात अब श्री मीडिया समूह के चैनल श्री न्‍यूज में देखने को मिलने लगा है. यहां पर ग्रुप एडिटर के रूप में अजय उपाध्‍याय ने ज्‍वाइन किया. उसके बाद वे चैनल में कंसल्टिंग एडिटर के पद पर प्रभात शुंगलू को लेकर आए.

अब खबर आ रही है कि यहां पर कर्मचारियों को सैलरी दो भाग में दी जा रही है. आधी सैलरी हर महीने की दस तारीख के बाद मिलती है, जबकि बाकी की सैलरी पंद्रह तारीख के बाद दी जाती है. सूत्रों का कहना है कि पहले सभी कर्मचारियों की सैलरी एक बार में ही मिल जाती थी, परन्‍तु नए प्रबंधन के आने के बाद इस तरह की स्थिति शुरू हो गई है. वहां काम करने वाले कुछ कर्मचारियों का आरोप है कि यह जानबूझ कर किया जा रहा है ताकि परेशान होकर लोग चैनल छोड़ दें. और ये लोग अपने बंदों को लेकर आएं.

प्रबंधन द्वारा टुकड़ों में सैलरी दिए जाने के कारण को काम करने वाले कर्मचारी समझ नहीं पा रहे हैं. कुछ कर्मचारियों ने बताया कि अगर सैलरी कुछ दिन के अंतराल पर दे ही देनी है तो फिर प्रबंधन इस तरह का रवैया क्‍यों अपना रहा है. वैसे भी नए मैनेजमेंट के ज्‍वाइन करने के बाद से पुराने कर्मचारी अपने लिए दूसरे संस्‍थानों में जगह तलाशने लगे हैं.

लखनऊ के दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान के लिए यह कोई खबर नहीं थी!

मुख्‍यधारा की मीडिया सरकार के भोंपू बनते जा रहे हैं. ये बात एक बार फिर साबित हुई पत्रकार संजय शर्मा द्वारा प्रमुख सचिव नियुक्ति के खिलाफ दाखिल की गई याचिका की खबर में इन अखबारों की भूमिका को देखकर. वीकएंड टाइम्‍स के पत्रकार संजय शर्मा की याचिका पर हाई कोर्ट ने राज्‍य सरकार को नोटिस जारी करके एक सप्‍ताह में जवाब देने का आदेश दिया है. हाई कोर्ट का यह आदेश कम से कम सिंगल कॉलम में ही सही यह खबर तो बनती ही थी, लेकिन आश्‍चर्य है कि लखनऊ में दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान के लिए यह कोई खबर नहीं है.

संजय शर्मा ने बताया कि अन्‍य कई बड़े-छोटे अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया वहीं उक्‍त दोनों अखबारों के लिए इस खबर का कोई महत्‍व नहीं था. उनके अनुसार इन दोनों अखबारों ने इस खबर को सिंगल कॉलम में भी प्रकाशित नहीं किया. इसके पहले याचिका दाखिल होने की खबर को भी दैनिक जागरण और अमर उजाला ने प्रकाशित नहीं किया था. जबकि हिंदुस्‍तान ने सिंगल कॉलम में खबर प्रकाशित की थी. इस बार अमर उजाला ने खबर छापकर अपनी गलती सुधारी तो हिंदुस्‍तान ने खबर ना छापकर अपनी गलती सुधार ली.

बताया जा रहा है कि ये बड़े अखबार तथा इनके मालिक-कर्मचारी सरकार तथा सरकार के बड़े नौकरशाहों से तमाम तरह की सुविधाएं पाते रहते हैं. लिहाजा अपनी सुविधा तथा हितों को देखते हुए ये अक्‍सर पत्रकारिता से समझौता करते रहते हैं, गिरवी रखते रहते हैं. आए दिन इसी तरह से पत्रकारिता की हत्‍या की जाती है. ये तथाकथित बड़े अखबार सरकार की गुणगान वाली खबरों को तानकर-फैलाकर प्रकाशित करते हैं वहीं आलोचनात्‍मक या फिर गड़बड़ी वाली खबरों को घोंटकर पत्रकारिता की हत्‍या कर देते हैं. बड़े अखबार सरकार को आईना दिखाने की बजाय उसकी आंखों पर पट्टी बांधने की कोशिश करते हैं.

नेटवर्क10 के हेड अशोक पांडेय को मैंने गाली नहीं दी : अनुराग बाजपेयी

उन्‍नाव से खबर है कि समाचार प्‍लस चैनल के संवाददाता अनुराग बाजपेयी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपने ऊपर नेटवर्क10 के हेड अशोक पाण्‍डेय को गाली दिए जाने के आरोप लगाए जाने से नाराज थे. अनुराग का कहना है कि उन्‍होंने ऐसा कोई काम नहीं किया, उन्‍होंने किसी को गाली नहीं दी. चैनल के सीईओ को भेजे गए अपने इस्‍तीफे में अनुराग ने इस बात का जिक्र किया है कि गलत सूचनाओं के आधार पर उनकी खबरें रोक दी गईं तो वे इस तरह के संस्‍थान में काम करने के इच्‍छुक नहीं है. नीचे अनुराग द्वारा सीईओ को भेजा गया इस्‍तीफा.

सेवा में,

सीईओ

समाचार प्‍लस न्‍यूज चैनल

माननीय महोदय,

आपको अवगत कराना चाहता हूं कि मैं अनुराग बाजपेयी आपके सम्‍मानित चैनल में बतौर उन्‍नाव रिपोर्टर काम करता हूं. आपके चैनल के इनपुट हेड प्रवीण साहनी जी ने बताया कि मैं ने उत्‍तर प्रदेश के बड़े पत्रकार श्री अशोक पाण्‍डेय को टेलीफोन पर गंदी-गंदी गालियां दी हैं. इस वजह से आपकी खबरें रोक दी गई हैं. जबकि मैंने कभी भी अशोक जी को गाली नहीं दिया है. अब ऐसे में अगर चैनल के अधिकारी भ्रांतियों के चलते मुझे मेरी खबरों के साथ होल्‍ड पर रखने की बात करते हैं तो ऐसे में मैं भी आपके सम्‍मानित चैनल में कतई काम करने का इच्‍छुक नहीं हूं.
 
अत: मेरा इस्‍तीफा तत्‍काल प्रभाव से स्‍वीकार करने की कृपा करें. आपको मैं बड़ी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि आपको मेरे जैसे 20 रिपोर्टर उन्‍नाव में मिल जाएंगे और मुझे भी एक दो इम्‍प्‍लायर मिल जाएंगे. जिस चैनल में बगैर किसी ठोस बात के गाली-ग्‍लौज करने का आरोप लगा दिया जाए, ऐसे में तो इस तरह के संस्‍थान को तत्‍काल छोड़ ही दिया जाए तो मेरे लिए भला होगा. इसी के साथ आपको सादर प्रणाम करते हुए मेरा विनम्र आग्रह है कि मेरा इस्‍तीफा तत्‍काल प्रभाव से स्‍वीकार करने की कृपा करें और मुझे मेरे दायित्‍वों से मुक्‍त करें.

आपका शुभचिंतक

अनुराग बाजपेयी

उन्‍नाव

09044855777

पत्रकारों पर भड़के देवरिया के कोतवाल, देख लेने की धमकी दी

देवरिया। जिले के कोतवाली थाने के कोतवाल सूरज पाल सिंह को मीडिया के लोगों से इस बात की शिकायत है कि कोतवाली थाने में आए किसी भी शिकायतकर्ता अथवा फरियादी से मीडिया के लोग बिना कोतवाल की अनुमति के ही सीधे बात करने लगते हैं तथा चैनल वाले उसकी रिकार्डिंग करने लगते हैं। शुक्रवार को दोपहर बाद करीब तीन बजे इसी बात पर कोतवाल तथा पत्रकारों के बीच जमकर वाद विवाद हो गया। पत्रकारों एवं कोतवाल ने एक दूसरे को देख लेने धमकी दी है।

बाद में अन्य लोगों के बीच बचाव से मामला शान्त हुआ। सबसे मजेदार बात यह रही कि यह सब हुआ समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता के सामने। लेकिन नेताजी ने किसी तरह का हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा। बहरहाल मामला ऊपर तक जाने की प्रबल सम्भावना दिख रही है। विवाद की वजह यह रही कि शहर के मालवीय रोड स्थित एक स्वर्णकार ने दो महिलाओं को पकड़ कर कोतवाली पुलिस के सुपुर्द किया था। देखने में दोनों महिलाएं किसी सभ्य परिवार की लग रही थी। लेकिन स्वर्णकार का आरोप था कि दोनों महिलाएं उसकी दुकान पर आकर सोने का नकली जेवर बेचने का प्रयास कर रही थी। इसके पहले भी वह नकली जेवर बेचकर स्वर्णकार को चूना लगा चुकी थीं।

शुक्रवार को जब वे महिलाएं दुबारा उसकी दुकान पर आईं तो दुकानदार ने महिलाओं के खिलाफ कार्रवाई हेतु पुलिस से शिकायत की। कोतवाली थाने के एक नये दरोगा जी स्वर्णकारों का ही सुन रहे थे और महिलाओं को जेल भेजने की तैयारी कर रहे थे। जब दोनों महिलाएं कोतवाली में बैठे रो रही थी तो उसी समय कुछ पत्रकार वहां पहुंच गए और रोने का कारण पूछा। महिलाओं के अनुसार वे अपना कुछ जेवर बेचने के लिए स्वर्णकार के यहां गई थी। लेकिन स्वर्णकार ने नकली जेवर का आरोप लगाते हुए दोनों महिलाओं को जमकर मारा पीटा तथा उनके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की और इज्जत लूटने का प्रयास किया।

इलेक्ट्रानिक मीडिया के कुछ पत्रकार महिलाओं का बाईट ले रहे थे कि उसी समय संयोगवश कोतवाल सूरज पाल सिंह आ धमके। शुरुआत में उन्होंने कोई खास विरोध नहीं किया लेकिन जब कुछ पत्रकार महिलाओं के सम्बन्ध में कोतवाल का भी वर्जन लेने का प्रयास किया तो कोतवाल एकदम से भड़क गए और पत्रकारों को उल्टा सीधा कहने लगे। करीब आधे घण्टे तक कोतवाली में पत्रकारों और कोतवाल के मध्य वाद विवाद होता रहा और लोग तमाशा देखते रहे। बाद में कोतवाली थाने की पुलिस ने दोनों महिलाओं को जीप बिठाकर महिला थाना भेज दिया।

इसके बाद कोतवाल ने पत्रकारों को सबक सिखाने की धमकी भी दे डाली। घटना के बारे में पत्रकारों ने पुलिस अधीक्षक से वार्ता करने की कोशिश की लेकिन जब पुलिस अधीक्षक का मोबाइन नहीं उठा तो पत्रकारों ने उनके पीआरओ से कोतवाल की शिकायत कर कार्रवाई की मांग की है। कोतवाल के इस व्यवहार से पत्रकारों में काफी रोष व्‍याप्‍त है।

पुण्‍य प्रसून को कार्तिक शर्मा ने न्‍यूज एक्‍स का ऑफिस दिखाया, तान्‍या इंडिया न्‍यूज पहुंचीं

खबर आ रही है कि पुण्‍य प्रूसन बाजपेयी भी जल्‍द ही चैनल ज्‍वाइन कर सकते हैं. सूत्रों ने बताया कि गुरुवार को पुण्‍य एमडी कार्तिक शर्मा के साथ नोएडा के सेक्‍टर तीन स्थित न्‍यूज एक्‍स के कार्यालय पहुंचे थे. कार्तिक ने पुण्‍य को न्‍यूज एक्‍स का कार्यालय दिखाने के अलावा स्‍टूडियो भी दिखाया. इसलिए संभावना जताई जा रही है कि वे जल्‍द ही इंडिया न्‍यूज समूह के साथ जुड़ सकते हैं. लंबे समय से उनके ज्‍वाइनिंग की चर्चाएं चल रही हैं.

इंडिया न्‍यूज से खबर है कि तान्‍या दवे ने चैनल के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍होंने गुरुवार को चैनल ज्‍वाइन कर लिया. तान्‍या को यहां पर एंकर बनाया गया है. संभावना है वे नेशनल चैनल को अपनी सेवाएं देंगी. तान्‍या कुछ समय पहले तक आईबीएन7 के साथ जुड़ी हुई थीं. परन्‍तु व्‍यक्तिगत कारणों से उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था. वे आईबीएन7 से पहले स्‍टार न्‍यूज को भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. संभावना है कि अगले एक दो दिन में और लोग भी इंडिया न्‍यूज ज्‍वाइन करेंगे.

चैनल पर फिल्‍म दिखाने के लिए लेना होगा अलग प्रमाण पत्र

सिनेमाघरों में रिलीज हो रही फिल्म को टीवी पर भी प्रसारित करने के लिए जल्द ही सेंसर बोर्ड से नयी श्रेणियों के तहत एक अलग प्रमाण-पत्र लेना हो सकता है. अभी के नियम-कायदों के मुताबिक सेंसर बोर्ड सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले फिल्मों को चार श्रेणियों- यू,यूए,ए और एस के तहत प्रमाण-पत्र देता है. लेकिन यदि नए नियम लागू किए गए तो टीवी पर फिल्म प्रसारित करने के लिए नए वर्गीकरण के तहत प्रमाण-पत्र लेना होगा.

सूत्रों ने बताया कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और सेंसर बोर्ड इस बाबत गहन चर्चा कर रहे हैं और इस मामले में फिल्म जगत के लोगों की भी राय ली जा रही है. हालांकि, सूत्रों ने यह भी कहा कि जो फिल्में पहले ही टीवी पर दिखायी जा चुकी हैं उन्हें इस प्रक्रिया से नहीं गुजरना होगा. सिनेमेटोग्राफी कानून में संशोधन पर भी विचार किया जा रहा है.

पिछले साल सोनी टेलीविजन की ओर से विद्या बालन अभिनीत फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ दिखाने के फैसले से पैदा हुए विवाद के बाद इस बाबत विचार-विमर्श का दौर शुरू हुआ है. विवाद पैदा होने के बाद सोनी टीवी पर ‘डर्टी पिक्चर’ दिखाए जाने से पहले इसके कई दृश्यों को काटा गया था. सूत्रों ने कहा कि नए कदम उठाने के बारे में इसलिए सोचा जा रहा है ताकि भविष्य में ऐसे विवाद न हों.

महिला नागा साधु की तस्वीर : a rare click… blind click…

फेसबुक पर ललिता पांडेय ने एक तस्वीर अपलोड की है. इसमें एक महिला नागा संन्यासिन दिख रही हैं, जैसा कि ललिता का दावा है. उन्होंने इस दृश्य को कैमरे में कैद कर लिया. वे बता रही हैं कि इस महिला नागा साधु की उम्र 12 से 14 वर्ष के बीच रही होगी. पर किसी ने सवाल किया है कि उसके बाल वैसे नहीं हैं जैसे नागाओं के होते हैं. इस पर ललिता का कहना है कि संभव है यह बच्चा अभी नागा साधु बनने की प्रक्रिया में हो. नीचे तस्वीर और ललिता पांडेय का स्टेटस व उस पर आई प्रतिक्रियाओं का प्रकाशन किया जा रहा है…

Lalita Pandey : a rare click…..blind click…..before I cud see,think,settle,it went away……I heard tht ppl located one or two Female Naga Samnyasini……I tried to visit their cottage,bt it ws strictly prohibited…..(even for females)…………

    Anup Dhir You are a keen photographer… Send this photo to some magazine

    Shubha Pradeep Really awesome that you could click this one…..excellent sweetheart..
    
    Navin Chandra Rare pic………..i seen first time…..just amazzzzing
     
    Partha Sarathy wow
     
    Sujit Kumar Saran i have seen first time in your photo.i doubt
     
    Lalita Pandey Naga cult is amazing,mysterious…………..now i will read more on it
     
    Iti Shree Misra Fabulous click Lalita Pandey….and she's so pretty!!!
     
    Lalita Pandey Doubt….?? wht doubt…?? this is for real
     
    Lalita Pandey Iti Shree Misra…she is .she looks a girl of 12-13 yrs old, not mch……thnxz fr compliment…..
     
    Partha Sarathy Nopes she is much elder….as frm pic…
     
    Iti Shree Misra Yes…but some spunk to be a naga….
     
    Sujit Kumar Saran i had attended Kumbh at Haridwar and not seen any female naga sanyasin.I had met many female Mahamandaleshwaras
 
    Navin Chandra I shared it…….without yr permission…..
 
    Soumesh Pati She looks like that she is around 20
   
    Lalita Pandey No No…..she is vry small…smwhr bet 12-14 yrs,nt mch…i hv seen her.I kno btr ..trust me
    
    Soumesh Pati India is a Country with full of mystery. Hats Off…..
     
    Anurag Tiwari She looks like poonam pandey, look at her hair unlike Naaga sadhus….
     
    Lalita Pandey Navin Chandra…..u don't need permission obv…..
     
    Soumesh Pati Agreed Lalita Ji…
     
    Lalita Pandey Anurag Tiwari…….show sm reverance……!!!
     
    Anurag Tiwari with all due respect ma'am, what I said was not meant to show disrespect. If she is Naga her hair wouldn't have been in such good condition, above all her face resembles to the lady mentioned in above comment.
     
    Sujit Kumar Saran i have full respect but i feel she is not a naga sanyasin as her resebllance is not like nagas
     
    Lalita Pandey I think she is in d process of making a samnyasini……..Anurag Tiwari…n see,comparing her wid Poonam pandey itself is not fair……
    
    Anurag Tiwari and Poonam herself had posted some pics of her Mahakumbh visit.
     
    Lalita Pandey Anurag Tiwari…….I know Poonam Pandey n have seen her in many pics. I m saying this girl is a young girl…I m a witness to dis sight, n u r trying to establish as if she is sm1 else…
     
    Vishan Prakash What I would like to know is how she survives amongst these naked chillum smoking sadhus, although they are supposed to be celibate. There would always be some rogue elements within the group to deal with. And what would her status be ? That of a goddess OR a personal assistant to the head honcho ? It really would be very interesting to know more about the life of these Naga Sadhus.
     
    Anurag Tiwari I am not trying to establish anything, her face resembled, that is the reason I asked. You are right you have witnessed the sight live and its always more authentic than the photographs.
     
    Gender Ssa Tsg I think he is a boy with long hair
     
    Purushottam Bajpai may be ateenager boy alos
     
    Gender Ssa Tsg yeap… i agree wid you
     
    Shankar Ghosh rare and good shot
     
    Chanchal Sanghi Most interesting pic!!
     
    Sanjana Gangolli u r blessed to go to such a holy place
     
    Lalita Pandey Thnxz Shankar Ghosh…………..Purushottam Tripuri….u r wrong.
     
    Pankaj Gupta Lalita ji…iss shot ko share karne k baad aap ke 7 khoon maaf…..
     
    Lalita Pandey Pankaj Gupta….iss tareef ke liye tah-e-dil se shukriya…………
     
    Pankaj Gupta waise u r quite lucky…who could click such rare shot..n came bk..intact…keeping the hostile images of naga sadhus in mind..
     
    Lalita Pandey I saw a glimpse,as I hv no idea tht I wud get to see anythng like this,I kept my eye on it,n jus ws clicking anything coming to frame…I hd no heart to chk right now at tht moment,n ws praying God. Finally whn I downloaded,I felt soooooooooooo happy…I swear….Pankaj Gupta
     
    Pankaj Gupta i hv my doubts…as some ppl said that she might b a boy..but by face she is looking quite mature..n very very much like a beautiful woman….sach hi kaha gaya hai..naga sadhuo ka sansaar tamam chamatkaro …rahasyo se bhara pada hai…
    
    Praphull Singh GREAT SANYASIN….AB MEI BHI NAGA SADHU BANUNGA!!!!!
     
    Samir Srivastava lalita ji sry but i envy with u with u kumbh visit….but one thing i tell u for ur knowledge that there is no thingh like naga sanyasin its just a gimmik if u read about nagas
     
    Lalita Pandey Samir Srivastava…u r not updated then.
     
    Samir Srivastava lalita ji …i m updated…
     
    Samir Srivastava nagas r only devoti of shiv in shamshan bhumi….no female
     
    Lalita Pandey better update
     
    Samir Srivastava ok…i will send the proofs
     
    Lalita Pandey No need…..thnxz
     
    Samir Srivastava welcome…..
     
    Samir Srivastava sry if i hurt ur feeling….sry lalita ji
     
    Devraj Singh anyone can be shiva devotee
     
    Lalita Pandey I'm a Shiva devotee……………..I hv travelled Mansarovar Kailash Parbat…….Jai Bhole Nath…….
     
    Lalita Pandey Samir Srivastava…I'm nt made of glass….n u cn't hurt me…try….!!
     
    Devraj Singh Jai Bhole Nath… Its gr8.. Shiva devotees are made of glass but unbreakable ….!!
     
    Samir Srivastava gud….nice….shva is ultimate
     
    राजू मिश्र कमाल की है आपकी पैनी नजर….जय हो।
   
    Lalita Pandey thnkooo ji……..
    
    Devraj Singh u come come ji
     
    Hemant Kumar Amazing ..movments…nice capture…
     
    Devanshi Seth How interesting! Awesome click!
     
    Lalita Pandey Devanshi Seth……mera paisa vasool ho gaya…..sachchi
     
    Devanshi Seth I can't take my eyes off this picture now. It's also interesting how people can interpret one pic in so many different ways. What you notice in the picture speaks not so much about the picture as it does about you.

उपेक्षा से नाराज शहीद बाबूलाल के परिजन भूख हड़ताल पर बैठे

इलाहाबाद। झारखंड में नक्सलियों की गोलियों से शहीद हुए बाबूलाल पटेल के परिजनों की सरकार से पांच दिनों से की जाने वाली मांग ने गुरुवार को आंदोलन का रूख अख्तियार कर लिया है। जिलाधिकारी को मांग से सम्बन्धित ज्ञापन सौंपने के बाद शाम को शहीद के पिता मुन्नी लाल पटेल, पत्नी रेखा और माता गुजराती देवी के साथ स्थानीय ग्रामीणों ने गांव के सामने स्थित लखनऊ-इलाहाबाद राजमार्ग के किनारे धरना देने के साथ ही भूख हड़ताल भी शुरू कर दी है।

देर शाम तक धरनास्थल पर नेताओं, प्रशासनिक अफसरों और मीडिया का जमावड़ा लग गया है। धरनास्थल पर अपनादल की वरिष्‍ठ नेता अनुप्रिया पटेल, भाजपा के पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय कार्यकर्ताओं के साथ आंदोलन में डंट गए हैं। गुरुवार को सुबह से ही मामले ने तेजी से रंग बदलना शुरू कर दिया। सुबह अपनादल की राष्‍ट्रीय महासचिव व वाराणसी जिले के रोहनिया क्षेत्र की विधायक अनुप्रिया पटेल पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ शहीद बाबूलाल पटेल के घर इलाहाबाद के नवाबगंज क्षेत्र स्थित शिवलाल का पूरा पहुंची। उन्होंने प्रदेश सरकार और केंद सरकार की तरफ से अभी तक कोई मदद न मिलने पर नाराजगी जाहिर करते हुए आंदोलन का ऐलान कर दिया। परिजनों को साथ लेकर कलेक्ट्रट पहुंची। वहां मुख्यमंत्री को संबोधित मांगपत्र का ज्ञापन डीएम राजशेखर को सौंपा।

शाम को परिजनों ने स्थानीय ग्रामीणों के साथ धरना शुरू कर दिया। इसी बीच परिजनों ने हाथों में मांग की तख्तियों को लेकर भूख हड़ताल भी शुरू कर दिया। मामले की जानकारी होने पर जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया है। धरनास्थल पर बैठने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को शहीद के घर अभी तक न पहुंचने पर नाराज हैं। उनको मलाल है कि मुख्यमंत्री मथुरा और बलिया जाकर वहां परिजनों को सांत्वना देने व मदद करने की घोषणा कर सकते हैं पर यहां नहीं आ सकते हैं। प्रदेश और केंद्र सरकार का कोई प्रतिनिधि भी नहीं आ सका। फिलहाल, धरनास्थल पर गहमा गहमी का माहौल है।  

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

चिन्मयानन्द को खुला लाभ पहुंचाने वाले अरुण पाराशरी को ही अमर उजाला ने माना बेस्ट!

अमर उजाला के स्थापना दिवस के अवसर पर बरेली में आयोजित समारोह में शाहजहांपुर को बेस्ट ब्यूरो का खिताब देने से मेरे साथ हजारों लोग स्तब्ध हैं, क्योंकि शाहजहांपुर के ब्यूरो चीफ अरुण पाराशरी से ज्यादा विवादित और इतने गंभीर आरोपों से घिरा ब्यूरो चीफ शायद ही कोई हो। अन्य तमाम आरोपों को नज़र अंदाज़ कर भी दिया जाए, तो इस बात का प्रमाण है कि अरुण पाराशरी गंभीर आरोपों से घिरे चिन्मयानंद के लॉ कॉलेज की प्रबंध समिति में पदाधिकारी हैं।

नजदीकी संबंध होने के कारण ही अरुण पाराशरी ने अमर उजाला में ख़बरें प्रकाशित कर चिन्मयानन्द को खुला लाभ पहुँचाया, वहीं पीड़ित को ही बदनाम किया। इसके अलावा पुलिस के वरिष्ठ अफसरों पर दबाव बना कर विवेचना न होने देने में मदद की। पीड़ित ने विवेचना बदायूं स्थानांतरित करा ली, तो बदायूं के सीओ के पास आकर चिन्मयानंद के पक्ष में सेटिंग की, जिसमें अमर उजाला का खुला दुरुपयोग करते हुए स्थानीय रिपोर्टर की मदद ली। समय-समय पर पाराशरी के कारनामों की मैंने प्रबन्धन से शिकायत भी की, लेकिन बरेली स्तर पर उस समय पाराशरी के साथ पीने वालों पर ही जांच आती थी, जिससे शिकायतों पर कुछ नहीं हुआ।

उक्त आरोपों के साथ अमर उजाला पिछले चुनाव में बसपा और सपा से टिकिट मांगने की व आय की तुलना में संपत्ति की जांच करा ले, तो पाराशरी की असलियत स्वतः सामने आ जायेगी, पर निष्पक्ष जांच और जांच के बाद कार्रवाई करने की जगह बेस्ट ब्यूरो का खिताब देकर प्रबन्धन भी पाराशरी का साथ देता नज़र आ रहा है, जबकि पाराशरी को तत्काल रूहेलखंड क्षेत्र से ही बाहर तैनात करना चाहिए था और जांच के बाद दंड भी देना चाहिए था। पर अब ऐसा लग रहा है कि जैसे चिन्मयानंद की मदद करने को प्रंबंधन ने ही पाराशरी को हरी झंडी दी हो और सही से मदद करने पर पुरस्कार दिया रहा हो।

बीपी गौतम

(चिन्मयानन्द पर तमाम गंभीर आरोप लगाने वाली पीड़ित महिला के पति)

आज समाज और दी हैपनिंग्स आफ इंडिया में पत्रकारों की जरूरत, आवेदन करें

आज समाज अखबार और द हैपनिंग्स आफ इंडिया अखबार में कई सारी वैकेंसीज हैं. आज समाज को अंबाला – चंडीगढ़ के लिए पत्रकारों की जरूरत है जबकि द हैपनिंग्स आफ इंडिया का प्रकाशन मुंबई से होने वाला है और यहां हर तरह के लोग चाहिए. इन दोनों ने विज्ञापन प्रकाशित किया है, जिसे नीचे दिया जा रहा है. इच्छुक लोग आवेदन करें.

आज समाज में प्रकाशित नौकरियों वाले विज्ञापन को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- आज समाज में जॉब


दी हैपनिंग्स आफ इंडिया में प्रकाशित नौकरियों वाले विज्ञापन को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- दी हैपनिंग्स आफ इंडिया में जॉब

जागरण के संपादक आशुतोष को गुस्सा क्यों आया?

बनारस में पिछले दिनों दलाई लामा की प्रेस कांफ्रेंस चल रही था. इसमें बनारस के तमाम अखबार एवं चैनलों के पत्रकार मौजूद थे. दलाई लामा पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे.  पर इस बीच कुछ ऐसा हो गया कि दलाई लामा भी भौचक्‍क रह गए. दलाई लामा पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे और यह लगातार लंबा होता चला जा रहा था. उब रहे दलाई लामा ने कहा कि प्‍लीज लास्‍ट क्‍यूश्‍चन.

इसके बाद एएनआई के वरिष्‍ठ रिपोर्टर गिरीश दुबे ने दलाई लामा से आखिरी सवाल पूछा. वो जवाब दे रहे थे तो बाकी लोग खड़े हो गए. इसी बीच जागरण के संपादक आशुतोष शुक्‍ला भी आगे आकर गिरीश दुबे के कैमरे के सामने आ गए. कवरेज करने की कोशिश में गिरीश ने आशुतोष को प्‍लीज कहते हुए हाथ के सहारे उन्‍हें कैमरे से दूसरी तरफ हटा दिया.

इतना ही करना था कि आशुतोष को गुस्‍सा आ गया. बताया जाता है कि उन्‍होंने दलाई लामा के सामने ही गिरीश दुबे को मारने के लिए हाथ उठा लिया. हालांकि माहौल देखकर वे सयंमित हुए तथा दलाई लामा के साथ-साथ बाहर तक निकल गए. इसके बाद गिरीश भी वहीं लाइब्रेरी में इस फीड को भेजने की कोशिश में जुट गए. दलाई लामा के जाने के बाद आशुतोष शुक्‍ला फिर अपने दो सहयोगियों रिपोर्टर अनिल सिंह एवं फोटोग्राफर पप्‍पू मिश्रा के साथ वापस आए तथा गालियां देते हुए पूछने लगे कि कौन था, जिसने मुझे धक्‍का दिया था. वे लगातार गालियां दिए जा रहे थे.

प्रत्‍यक्षदर्शी पत्रकारों ने बताया कि वे लगातार अभद्र भाषा और गालियों का प्रयोग करते जा रहे थे. इसके बाद उनके सिपाहियों ने गिरीश दुबे की पहचान कराई तो वहां भी वे अपनी असंयमित भाषा में बात करने लगे. जिस पर गिरीश भी थोड़ी नाराज हुए पर उन्‍होंने कहा कि मैंने आपको धक्‍का नहीं दिया, बल्कि कवरेज में दिक्‍कत हो रही थी इसलिए आपको कैमरे के सामने से हटाया था. मुझे पता भी नहीं है कि आप दैनिक जागरण के संपादक हैं. अगर आपको तकलीफ हुई है तो इसके लिए आपको सॉरी बोलता हूं.

गिरीश के सॉरी बोलने के बाद भी आशुतोष का गुस्‍सा शांत नहीं हो रहा था. हालांकि कुछ ने चुटकी लेते हुए कहा कि ये इसलिए नाराज हैं क्‍योंकि ये दैनिक जागरण के संपादक हैं. लगातार गालियों की वजह से गिरीश भी जब तैश में आने लगे और माहौल बिगड़ने की संभावना बनने लगी तो वहां मौजूद पत्रकारों ने किसी तरह बीच बचाव करके मामला शांत कराया.

इस बारे में जब भड़ास4मीडिया ने दैनिक जागरण वाराणसी के संपादक आशुतोष से बात की तो उन्होंने आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि गाली देने और बदतमीजी करने जैसे आरोप बिलकुल गलत हैं. उनके मुताबिक वहां मिस-अंडरस्टैंडिंग हुई, इससे ज्यादा कुछ नहीं. आशुतोष ने बताया कि उन्होंने सबसे प्यार से बात की और किसी को कुछ नहीं कहा. केवल थोड़ी सी आपसी अनबन हुई वह भी अनजाने में, जो कि बाद में सब ठीक हो गया. आशुतोष ने इस छोटी व मामूली बात को तूल न दिए जाने की भी बात कही.

मैं पत्रकारिता करने आया था अपनी डाक्टरी छोड़कर, नौकरी करने नहीं

मेरे आलोचक कहते हैं कि यह बंदा किसी भी अख़बार में एक साल पूरा नहीं कर सका। मुझे तो यह कोई कमी नहीं लगती। सच कह रहा हूँ कि यदि परिवार के पालन की जिम्मेवारी न हो तो शायद ही कोई आदमी आजकल के अख़बारों में काम करे। धन्ना सेठों के ये बड़े-बड़े अख़बार विचारों के मुर्दाघाट हैं। पत्रकार नहीं हैं आज के अख़बारों में, रोटी के लिए संघर्ष कर रहे ऐसे लोग हैं जो कदम -कदम पर अपनी खुद्दारी से समझौता कर रहे हैं।

मेरा जुगाड़ था- दो रोटियों का और सपने पालने की विलासिता का शौक नहीं रहा, इसलिए कहीं 6 तो कहीं 7 महीनों में लात मार दी अख़बारों को। मैं पत्रकारिता करने आया था, अपनी डाक्टरी छोड़कर, नौकरी करने नहीं। नौकरी तो मैंने सरकार की भी नहीं की। 1983 में तो नौकरी आगे-पीछे घूमती थी। अपना अख़बार निकलने का ब्योंत नहीं रहा। कोशिश भी की थी। और अपने पैसे लगाकर कोई दूसरा मुझे क्यों क्रांति करने देगा। भला हो इस फेसबुक का जिसके कारण पागल होने से बच पा रहे अन्यथा, दिमाग फट जाता ।

रोहतक के पत्रकार Satish Tyagi के फेसबुक वॉल से

मुंबई के पत्रकार वाहिद को ‘आन्तरप्रिनर ऑफ दि इयर’ एवार्ड

मुंबई : कई चैनलों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके और इन दिनों सहाना ग्रुप के उभरते मराठी चैनल जय महाराष्ट्रा में कंसल्टिंग एडिटोरियल डायरेक्टर के पद पर कार्यरत वाहिद अली खान को मुंबई में एक समारोह में ‘आन्तरप्रिनर ऑफ दि इयर’एवार्ड से नवाजा गया. उन्हें यह एवार्ड कई चैनलों और कई कंपनियों को स्थापित करने में उनके योगदान और खुद का अपना बिजनेस खड़ा करने के लिए दिया गया. यह एवार्ड मुंबई में लायन्स इंटरनेशनल की तरफ से दिया गया. 

वाहिद का मानना है कि सपने देखो तभी तो उन्हें सच्चाई में उतारा जा सकता है. वाहिद एक सफल मीडियाकर्मी होने के साथ साथ-साथ कामयाब बिजनैस मैन भी हैं। इस मकाम तक पहुँचने के लिये वाहिद अली खान को लगे 14 साल। वाहिद के पास अन्य बिजनैस मैन की तरह कोई बिजनेस की विरासत नही थी। था तो सिर्फ जुनून और हालात से जूझने लड़ने का जज्बा। मेहनत, लगन और हुनर के संगम से वाहिद ने अपना रास्ता बनाया।  
 
एक न्यूज चैनल खड़ा करना कोई आसान बात नहीं. बाहरी दुनिया को ग्लैमरस दिखने वाली ये चीज शून्य से शुरू करनी पड़ती है। ‘लाइव इंडिया’ हिंदी न्यूज चैनल और ‘मी मराठी’ मराठी न्यूज चैनल को खड़ा करने में वाहिद ने बड़ी भूमिका निभाई. पी7 और इंडिया टीवी जैसे चैनलों की सफलता में भी वाहिद अली खान का ठीकठाक योगदान है। वाहिद इन दिनों अपने एक वेब पोर्टल का संचालन करते हैं और सहाना ग्रुप के चैनल जय महाराष्ट्र में कन्सल्टिंग एडिटोरिअल डायरेक्टर के पद पर हैं। एविएशन से लेकर रियल इस्टेट तक हर क्षेत्र में इन्होंने अपने प्रतिभा और परामर्श का लोहा मनवाया.
 
लाइन्स इंटरनैशनल के इस सम्मान को हासिल करते वक्त वाहिद ने कहा- “हर इन्सान मेहनत करता है, अपने लक्ष्य को पाने के लिये, मैंने भी चौदह सालों तक लगन से काम किया। 14 साल की मेहनत आज इस अवॉर्ड के जरिये रंग लायी है। मेरी सफलता का श्रेय मेरे अभिभावकों को जाता है जिनकी परवरिश ने मुझे सच्चाई की राह दिखायी। मैं अपने साथियों और शुभचिंतकों का भी शुक्रगुजार हूं जिनके बिना कुछ भी कर पाना और सफल हो पाना मुमकिन नहीं था.” (विज्ञप्ति)
 
Waahiid Ali Khan, Lion’s favourite Entrepreneur of the Year
 
Mumbai: After making a huge contribution in the field of Journalism and media, prominent business entrepreneur, Mr Waahiid Ali Khan was awarded as Lion’s favourite Entrepreneur of the Year. Mr Waahiid Ali Khan is a big name in the journalism and media since last 14 years. From a media person to a successful businessman, Mr Waahiid Ali Khan’s journey is very inspiring and encouraging.
 
Mr Waahiid Ali Khan till now established many media houses with his intelligence, confidence and sheer knowledge of the industry. He successfully established two media houses Live India news channel in Hindi and Mi Marathi channel in Marathi. And now these two media houses are very prominent name in the field of Journalism and media. He has also made a huge contribution in the success of two other prominent news channels such as P7 Hindi News Channel and India TV Hindi News Channel since its incorporation. From Aviation industry to Real Estate, Mr Waahiid Ali Khan’s Midas touch made him a very successful businessman.
 
Taking a step ahead, this entrepreneur is now Consulting Editorial Director with Sahana group and is spearheading his forthcoming Marathi News Channel & Web Portal Jai Maharashtra.
 
After receiving this prestigious award, Mr Waahiid Ali Khan has exclusively spoken with Jai Maharashtra News. He said that, “There is a struggle for every human being to reach to its ultimate goal. I had struggled in the industry of media since last 14 years.”
 
“In this journey of my struggle I have taken so many experiences, to achieve that ultimate goal, you have to work really hard. When you think big, then you can achieve something big.”
 
He also said that, “I love to see dream. I see a dream in the night and when I wake up in the morning and start working to make that dream come true. I thank my mother and the family, my colleagues and the well wishers, from whom I received so much love, care and blessings.”
 
There is a soft side of Mr Waahiid Ali Khan too. He is a family man and loves spending his prestigious time with his family and friends. His one year old son Shaun is currently occupying his time with his mischievous activities.
 
We, Jai Maharashtra News family congratulate Mr Waahiid Ali Khan for his one of the greatest achievements and we are sure that he will get more of these awards in upcoming years. (Press Release)

 

अर्नब गोस्‍वामी और टाइम्‍स नाऊ युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हैं!

 

Anand Pradhan : आजकल न्यूज मीडिया खासकर चैनलों पर छाए अंध-राष्ट्रवादी युद्धोन्माद को भड़काने में सबसे बड़ी भूमिका ‘टाइम्स नाऊ’ की है जिसपर हर रात प्राइम टाइम में एंकर-संपादक अर्नब गोस्वामी के साथ भारतीय सेना के कुछ रिटायर्ड जनरल और रक्षा विशेषज्ञ पाकिस्तान को सबक सिखाने की हुंकार भरते रहते हैं. उनकी बातचीत से ऐसा लगता है कि जैसे युद्ध के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.
लेकिन क्या आपको मालूम है कि चैनलों और अखबारों में छाए इन जनरलों और रक्षा विशेषज्ञों में से कई के संबंध देशी-विदेशी हथियार निर्माता कंपनियों से हैं? इनमें से कई उनके लिए काम करते हैं और उनके कंसल्टेंट और एजेंट हैं. लेकिन चैनल और अखबार आपको यह सच्चाई कभी नहीं बताते हैं जो साफ़ तौर पर न सिर्फ हितों के टकराव (कनफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट) का मामला है बल्कि दर्शकों-पाठकों के साथ धोखा है.
 
ऐसे ही एक रक्षा विशेषज्ञ मारूफ रज़ा हैं जो ‘टाइम्स नाऊ’ पर लगभग बिना नागा एक स्वतंत्र रक्षा विशेषज्ञ के बतौर मौजूद रहते हैं. लेकिन चैनल उनके बारे में यह नहीं बताता कि वे और उनकी कंपनी मारूफ रज़ा एंड एसोशिएट्स कई हथियार निर्माताओं, आपूर्तिकर्ताओं और डीलरों के लिए कंसल्टेंट या प्रतिनिधि के बतौर काम करते हैं.
 
इस बारे में एक दर्शक ने न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोशियेशन को शिकायत की और एन.बी.ए की जस्टिस जे.एस वर्मा के नेतृत्ववाली एन.बी.एस.ए ने इस शिकायत को सही पाया. जस्टिस वर्मा के फैसले को आप यहाँ पढ़ सकते हैं.
 
जागो दर्शक-पाठक, जागो !!!
 
 
आनंद प्रधान के एफबी वॉल से साभार.

फिर नाम का चक्कर, 26 को भी नहीं लांच हो पाएगा नेशन टुडे!

 

अल्‍फा समूह के चैनल नेशन टुडे की लांचिंग को लेकर लम्‍बे समय से कयासों का दौर चल रहा है. अभी तक सूचना थी कि यह चैनल 26 जनवरी को लांच होने वाला है. पर अब खबर आ रही है कि यह 26 जनवरी को भी लांच नहीं हो पाएगा. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन को चैनल का नाम नेशन टुडे जम नहीं रहा है. यह अलग फील नहीं दे पा रहा है. इसी के चलते इसकी लांचिंग में देरी हो रही है. हालांकि चैनल को लांच करने की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. इसका ड्राई रन भी चलने लगा है, पर नाम ने मामले को अटका रखा है.
बताया जा रहा है कि प्रबंधन इस चैनल का नाम बदलने की तैयारी में है. इसके लिए जरूरी प्रक्रिया भी पूरी की जा रही है. संभावना है कि जल्‍द ही चैनल नए नाम से लांच किया जाएगा. सूत्रों का कहना है कि अगर 26 जनवरी तक नया नाम मिल गया तो चैनल को लांच कर दिया जाएगा अन्‍यथा कुछ और दिन के लिए इसकी लांचिंग टाल दी जाएगी. जिस तरह अल्‍फा समूह के चैनल की लांचिंग में देरी हो रही है, उसको लेकर मीडिया मार्केट में दूसरी तरह की अफवाहें भी शुरू हो गई हैं. 
 
उल्‍लेखनीय है कि आजतक के वरिष्‍ठ पत्रकार शैलेश के नेतृत्‍व में अल्‍फा समूह का नेशनल हिंदी चैनल लांच किया जाना है. पर लम्‍बे समय से अल्‍फा समूह के चैनल की लांचिंग इधर उधर हो रही है. इस बीच कई लोगों ने यहां ज्‍वाइन करने के बाद लांचिंग से पहले ही इस्‍तीफा देकर दूसरे चैनलों का रुख कर लिया. चैनल की लांचिंग जितनी टलती जा रही है लोग इसके भविष्‍य को लेकर उतने ही सशंकित भी होते जा रहे हैं. (कानाफूसी)

पी7 न्‍यूज को मिला बेस्‍ट पॉपुलर चैनल का अवार्ड

 

पर्ल्‍स समूह के चैनल पी7 न्‍यूज को बेस्‍ट पॉपुलर चैनल अवार्ड प्रदान किया गया है. मुंबई में आयोजित लायंस गोल्‍ड अवार्ड कार्यक्रम में चैनल के डाइरेक्‍टर शरद दत्‍त ने यह सम्‍मान ग्रहण किया. चैनल को न्‍यूज कटेगरी में यह अवार्ड प्रदान किया गया है. गौरतलब है कि टीआरपी के पीछे भागने के दौर में भी पी7 न्‍यूज चैनल कंटेंट को लेकर गंभीरता दिखा रहा है. 
शरद दत्‍त के नेतृत्‍व में चैनल लगातार अलग करने की कोशिश कर रहा है. कंटेंट में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है.  इसी का परिणाम है कि पी7 न्यूज की अलग पहचान बनती जा रही है. नए बदलावों से खबरों का असर भी दिखने लगा है. इस बात को लायंस क्‍लब के बेस्‍ट पॉपुलर चैनल के अवार्ड ने पुष्‍ट भी किया है. (विज्ञप्ति)

सुधीर चौधरी की मानहानि की शिकायत पर चार हफ्ते में जांच पूरी करे दिल्ली पुलिस : कोर्ट

नई दिल्ली। एक अदालत ने दिल्ली पुलिस को कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के खिलाफ जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी की मानहानि शिकायत की जांच करने का निर्देश दिया है। चौधरी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि उनकी छवि खराब करने के लिए गलत आरोप लगाए गए थे। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जय थरेजा ने तुगलक रोड थाने के प्रभारी (एसएचओ) को जिंदल और उनकी कंपनी जिंदल स्टील एंड पावर लि. (जेएसपीएल) के उन 16 अधिकारियों की भूमिका की जांच करने का निर्देश दिया है जिनके खिलाफ चौधरी ने आरोप लगाए हैं।

कोर्ट ने जांच चार सप्ताह में पूरी करने को कहा। अदालत ने कहा कि यह ध्यान में रखते हुए कि 17 आरोपियों में से 15 इस न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर रहे हैं, इसलिए अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा के संदर्भ में यह निर्देश दिया जाता है कि पुलिस स्टेशन तुगलक रोड के एसएचओ शिकायत में दर्ज आरोपों की जांच करेंगे। अदालत ने यह भी कहा है कि एसएचओ शिकायत में दर्ज प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका की जांच करेंगे।

उल्‍लेखनीय है कि नवीन जिंदल की कंपनी ने सुधीर चौधरी, समीर आहलूवालिया तथा मालिकद्वय सुभाषचंद्रा एवं पुनीत गोयनका पर ब्‍लैकमेलिंग करने का आरोप लगाया था। उन्‍होंने थाने में मामला भी दर्ज कराया था। नवीन जिंदल ने प्रेस कांफ्रेंस करके एक सीडी भी जारी की थी, जिसमें दोनों संपादकों को पैसे मांगते हुए दिखाया गया था। आरोप सही पाए जाने पर पुलिस ने दोनों संपादकों को गिरफ्तार भी किया था, जो बाद में जमानत पर छूट गए।


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जी न्यूज को झटका, कोर्ट ने अर्जी खारिज की, जिंदल पर मुकदमा दर्ज नहीं होगा

: नवीन जिंदल की कंपनी से जी न्यूज के संपादकों द्वारा कथित सौ करोड़ रुपए की उगाही की कोशिश का मामला : नई दिल्ली । जी न्यूज द्वारा कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल व अन्य के खिलाफ रपट दर्ज करने की मांग वाली एक अर्जी सीबीआई अदालत ने खारिज कर दी। अर्जी में आरोप लगाया गया था कि जिंदल ने कथित उगाही प्रयास मामले की न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैन्डर्डस अथॉरिटी में सुनवायी को कथित रूप से प्रभावित करने की कोशिश की जिसके लिए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। अदालत ने अर्जी को खारिज करते हुए कहा कि अर्जी में उठाए गए बिंदु कानूनी रूप से बहुत कमजोर हैं, ऐसे में किसी तरह की जांच करने का निर्देश देना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

सीबीआई के विशेष न्यायाधीश धम्रेश शर्मा ने अर्जी खारिज करते हुए कहा कि कि जिंदल, उनकी कंपनी जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) व उनके विभिन्न अधिकारियों के खिलाफ जांच हेतु सीबीआई को निर्देश के लिए उठाये गए बिंदु कमजोर हैं। अदालत ने कहा कि अर्जी में लगाए गए आरोप तंग करने वाले और ओछे लगते हैं जिससे साफ है कि उसका एक मात्र उद्देश्य किसी न किसी तरह जांच शुरू कराना है ताकि पक्षकार को परेशानी में डाला जा सके। अदालत ने कहा कि यह साफ तौर पर कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत दायर शिकायती मामले में जी न्यूज की तरफ से आरोप लगाया गया था कि कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने एनबीएसए के अध्यक्ष जेएस वर्मा(पूर्व मुख्य न्यायाधीश) से संपर्क कर सुनवाई को प्रभावित करने की कोशिश की थी जो कि उनके समक्ष लंबित था।

अदालत ने कहा कि कंपनी के खिलाफ बिना आधार के कोई मामला नहीं बनता है। टीवी चैनल का आरोप था कि जिंदल ने इस मामले में टेलीफोन द्वारा संपर्क कर अपनी सांसद के पद का दुरुपयोग किया। इस मामले में आरोप है कि जी न्यूज के दो संपादकों द्वारा जिंदल व उनकी कंपनी से सौ करोड़ रुपए उगाही का प्रयास किया गया। जानकारी हो कि जी न्यूज के वरिष्ठ संपादक सुधीर चौधरी व समीर अहलूवालिया को कथित उगाही की कोशिश के मामले में गत वर्ष 27 नवम्बर को गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ नवीन जिंदल की कंपनी ने रपट दर्ज करायी थी। 20 दिन से अधिक न्यायिक हिरासत में रहने के बाद दोनों वरिष्ठ संपादकों को अदालत से जमानत मिल गई थी। इस मामले में दोनों संपादकों ने नवीन जिंदल व अन्य के खिलाफ अलग से भी मामला दायर कर रखा है।


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खबर भारती चैनल से पंकज शुक्ल का इस्तीफा, प्रज्ञान भट्टाचार्या देख रहे कामधाम

खबर है कि खबर भारती न्यूज चैनल से मैनेजिंग एडिटर पंकज शुक्ल ने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने दो महीने पहले इस चैनल को ज्वाइन किया था. सूत्रों का कहना है कि ढेर सारे घपले-घोटाले-आरोपों में घिरे चैनल के मालिक बघेल से पंकज शुक्ल की अनबन हो गई थी, जिस कारण उन्होंने चैनल से हटने का फैसला किया. बताया जा रहा है कि प्रज्ञान भट्टाचार्या को चैनल का कामधाम सौंप दिया गया है.

भट्टाचार्या को एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बनाकर चैनल में लाया गया है. इस बीच, खबर भारती चैनल में आंतरिक राजनीति चरम पर होने की खबर है. एक दूसरे को नीचा दिखाने और परेशान करने के लिए धमकी भरे फोन कॉल कराए जाने की खबरें भी हैं. सूत्रों के मुताबिक चैनल का मालिक बघेल जिस तरह से अपने यहां वरिष्ठ पत्रकारों को लाने और निकालने का काम शुरू कर चुके हैं, उससे अब वह खुद कई पत्रकारों को निशाने पर आ गए हैं. बघेल का कच्चा चिट्ठा तैयार करके सार्वजनिक किए जाने की तैयारी भी शुरू हो चुकी है.

आईपीएफ संयोजक को वार्ता के लिए बुलाकर लाकअप में डाला

: लाकअप में महेश सिंह से गोंडा के एसपी ने मारपीट की और फर्जी धाराएं लगाकर जेल भेज दिया : अखिलेश का आरोप- अखिलेश राज में माफियाओं-सामंतों की लठैत बनी पुलिस : लखनऊ : गोंडा में पुलिस द्वारा आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के जिला संयोजक महेश सिंह की गिरफ्तारी की कड़ी आलोचना करते हुए आईपीएफ के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने प्रेस बयान जारी कर कहा कि अखिलेश राज में प्रदेश में गुंडाराज की वापसी हो गयी है। उन्होंने कहा कि खासकर गोंडा जिला सामंतों-माफियाओं की लूट और दमन का अखाड़ा बन गया है।

आए दिन निर्दोष लोगों की हत्या, उनके ऊपर दमन, महिलाओं और कमजोर तबकों का उत्पीड़न यहां के लिए आम बात हो गयी है। सामंतों और माफियाओं की इस कमान को इस जिले में पुलिस अधीक्षक गोंडा ने संभाल रखा है, वह सपा विधायक और मंत्रियों के साथ मिलकर उन लोगों के खिलाफ अभियान में उतरे हैं, जो लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था के हामी हैं और किसानों, नागरिकों के अधिकार के लिए लड़ते हैं।

जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्षरत आइपीएफ जिला संयोजक महेश सिंह की कल गिरफ्तारी और पुलिस लाकअप में एसपी द्वारा खुद मारपीट करना गोंडा में जनता की आवाज को दबाने की कोशिश है, जिसका मुकाबला जनांदोलन के द्वारा किया जायेगा और गोंडा को पुलिस की चारागाह नहीं बनने दिया जायेगा। इस गिरफ्तारी के विरूद्ध आज महामहिम राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रमुख सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक को पत्र भेजा गया है और गोंडा में 'लोकतंत्र बचाओ-गोंडा बचाओ' अभियान की शुरुआत की गयी है।

उन्होंने बताया कि पिछले दिनों भी कर्नलगंज में एकाएक मंदिर की मूर्ति का मुकुट चोरी हो गया लेकिन पुलिस आज तक इसका पर्दाफाश नहीं कर सकी। कर्नलगंज में एक अपाहिज के बेटे को सपा समर्थित दबंगों ने धर में बंद कर मारा पीटा और आतंक से वह भाग गया। परिवारवालों ने लड़के के मारे जाने की आशंका बतायी और एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस से कई बार अपील की पर एफआईआर दर्ज नहीं की गयी। महेश सिंह ने एफआईआर दर्ज कराने की उसके परिवार की लोकतांत्रिक मांग समर्थन किया तो सपा विधायक और उसके इशारे पर काम करने वाली पुलिस के आला अधिकारियों की आंख की वह किरकिरी हो गये।

कर्नलगंज घंटाघर में हुई आमसभा में एसपी ने सपा विधायक के साथ भाषण किया, जिसमें एसपी ने महेश के खिलाफ जहर उगला। इतना ही नहीं कथित मंदिर निर्माण विवाद के सवाल पर महेश सिंह को वार्ता के लिए एसपी ने बुलाया और गोंडा कोतवाली के लाकअप में डाल दिया। हद तो यह हो गयी कि लाकअप से महेश को निकालकर एसपी द्वारा उनके साथ बदतमीजी करके उन्हें जेल भेज दिया। गौर करने लायक बात यह है कि हर घटना को एक साम्प्रदायिक स्वरूप देने की कोशिश एसपी द्वारा की जा रही है। उन्होंने सभी वामपंथी, जनवादी, नागरिक समाज और जनपक्षधर ताकतों से अपील की कि गोंडा को राजाओं, सामंतों, माफियाओं, पुलिस का चारागाह नहीं बनने देने और लोकतंत्र की रक्षा के लिए 'लोकतंत्र बचाओ-गोंडा बचाओ' अभियान में शिरकत करें। 

1999 में करगिल युद्ध की शुरुआत भी इसी तरह से हुई थी

 पड़ोसी व बड़े भाई होने का जितना भी दंभ भरे भारत, तथाकथित उसके छोटे भाई ने एक बार फिर भरे बाजार में अपने बड़े भाई की इज्जत नीलाम करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। सच तो यह है कि नीलामी कर वह दूर बैठा तमाशा देख खुश हो रहा है, अपने उस तथाकथित बड़े भाई की जिसे दर्द तो खूब हो रहा है, पर खुलकर बोल नहीं पा रहा है। यह कैसी मजबूरी है और अगर इसे वह कूटनीतिक मजबूरी कहता है तो फेंक डालो ऐसी कूटनीतिक मजबूरी को और आ जाओ, जैसे को तैसे की तर्ज पर सबक सिखाने को। क्योंकि उसके पड़ोसी ने वह काम किया है जिसे नजरंदाज बिल्कुल नहीं किया जा सकता है, और एक दफा अगर सोच भी लें तो पड़ोसी का इतिहास इस बात को बल देता है कि मुंहतोड़ जवाब नहीं दोगे तो फिर इनका दुस्साहस और बढ़ेगा और फिर उसकी तरफ से इससे बड़ी कार्रवाई व दुस्साहस के लिए खुद को तैयार रखो।

याद है 1999 में करगिल युद्ध की शुरुआत भी इसी तरह से हुई थी। उस समय भी पाकिस्तानी सैनिकों ने कुछ इसी तरह की दरिंदगी दिखाते हुए गश्त के लिए गए कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। उनके क्षत-विक्षत शव बाद में भारत को सौंपे गए थे। कैप्टन कालिया के पिता अभी तक इंसाफ के लिए लड़ रहे हैं। यहां यह गौर करने वाली बात है कि तब हमने उन्हें सबक सिखाने के लिए करगिल युद्ध लड़ा और पाक को घुटने टेकने के लिए मजबूर किया। उस समय भी उनकी तरफ से ऐसी किसी भी कार्रवाई से मना किया जा रहा था, लेकिन जब दबाव डाला तो उन्होंने शहीद हुए हमारे सैनिकों के क्षत-विक्षत शव भी लौटाए। हमें वैसी ही कार्रवाई करने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि केवल हमने ही शांति का ठेका नहीं ले रखा है।

यह तो सामान्य सी बात है कि पड़ोसी होने के नाते एक-दूसरे का फर्ज होता है कि सीमा पर शांति बनाई रखी जाए लेकिन अगर कोई इसका पालन नहीं करता है तो क्या हमें उसे मनमाने के लिए तब तक इंतजार करना चाहिए, जब तक वह हमारी बात नहीं मान लेता? चाहे इसके लिए आपके अपने लगातार शहीद हो रहे हों? कहने की बात नहीं है लेकिन कई बार नहीं चाहते हुए भी कड़े फैसले लेने पड़ते हैं ताकि मैसेज जा सके कि तुमने जो कृत्य किया है, वह मुझे नागवार गुजरा है? एसे में जवाबी कार्रवाई तो बनता है। पाकिस्तानी सैनिकों का दुस्साहस ही कहेंगे कि किस तरह वह युद्धविराम का उल्लंघन कर मंगलवार को भारतीय सीमा में घुस आए और जम्मू एवं कश्मीर के पुंछ जिले स्थित नियंत्रण रेखा के निकट एक चौकी पर तैनात दो भारतीय जवानों में से एक का सिर काट लिया तो दूसरे का गला रेतकर अपने साथ ले गए। इस नृशंस हत्या का क्या मतलब होता है? क्या जानबूझकर यह कार्रवाई नहीं की गई और अगर हमें लगता है कि जानबूझकर कार्रवाई की गई है तो फिर देर किस बात की? सब कुछ मैसेज पर निर्भर करता है और हमें इसका खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए क्योंकि कूटनीति के तहत बातचीत तो अपनी जगह है ही लेकिन जैसे को तैसा ट्रीटमेंट भी कभी-कभी और कई बार जरूरी हो जाता है? निंदा करने व कार्रवाई को भड़काऊ वाला कह देने भर से काम नहीं चलने वाला, हमें पड़ोसी के दुस्साहस का पहले करारा जवाब देना चाहिए, फिर आगे की सोचनी चाहिए। शहीद हुए सुधाकर सिंह और हेमराज 13वीं राजपूताना राइफल्स से संबद्ध थे।

बताया जाता हैं कि इस घटना के बारे में सेना ने विस्तृत रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय के पास भेज दी है और अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इस पूरे मामले को किस तरह हैंडिल करती है? हालांकि सेना की तरफ से जो रिपोर्ट भेजी गई है उसमें हमले में 29 बलूच रेजीमेंट के शामिल होने की बात लिखी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तानी सैनिक घने कोहरे का फायदा उठाते हुए सीमा पर लगे कंटीले तारों को काटकर समीवर्ती पुंछ जिले के सोना गली इलाके में बनी भारतीय चौकी पर पहुंच गए और फिर वहां इस नृशंस कार्रवाई को उनलोगों ने अंजाम दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक यह घटना पूर्वाह्न् 11.30 बजे हुई। पाकिस्तानी सैनिकों ने दो भारतीय जवानों की हत्या कर दी और उनमें से एक के शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। हालांकि पाकिस्तान ने दो भारतीय जवानों की हत्या की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया है, लेकिन भारतीय अधिकारियों ने इसे झूठ करार देते हुए उसके दावे को तत्काल खारिज भी कर दिया है। अब इसके बाद की गतिविधियों पर करीब से नजर रखी जा रही है और बताया जाता है कि रक्षा मंत्रालय की तरफ से भी सेना को इस बात की हरी झंडी दे दी है कि सीमा पार से अगर इस तरह की कार्रवाई का अंदेशा उसे लगे तत्काल कार्रवाई करने से पीछे बिल्कुल न हटें। इस बीच, लेफ्टिनेंट जनरल केडी पटनायक ने घटनास्थल का दौरा कर सेना को 'सतर्क रहने को कहा है। साथ ही उन्होंने घोषणा की कि उपयुक्त समय पर समुचित कदम उठाया जाएगा।

उधर इस बात पर भी गौर किया जा रहा है कि क्या पाकिस्तानी सैनिकों के हमले की यह घटना भारत की इस अपील के तुरंत बाद सामने आई है कि पाकिस्तान यह सुनिश्चित करे कि नियंत्रण रेखा की पवित्रता हमेशा बनी रहेगी? इस घटना के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध एक बार फिर पटरी से उतरने की आशंका जताई जा रही है। याद रहे कि मंगलवार को ही पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी ने सियालकोट का दौरा कर सेना को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, गुप्त या प्रकट रूप से आने वाली रह चुनौती का डटकर मुकाबला करने के लिए तैयार रहने को कहा है। इस घटना को इस कड़ी से भी जोड़ा जा रहा है।

लेखक कुमार समीर पिछले ढाई दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. प्रिंट एवं इलेक्‍ट्रानिक में समान पकड़ रखने वाले कुमार समीर सहारा समेत कई बड़े संस्‍थानों के हिस्‍सा रह चुके हैं.

दबंग दुनिया को झटका, वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा ने दिया इस्तीफा

इंदौर में 'दबंग दुनिया' को इस्टेब्लिश करने वाले वरिष्ठ पत्रकार और सपांदक कीर्ति राणा ने आंतरिक मतभेदों के चलते संस्थान से इस्तीफा दे दिया है। कीर्ति राणा के इस्तीफा देने से 'दबंग दुनिया' प्रबंधन में खलबली मची है। 'दबंग दुनिया' के मालिक किशोर वाधवानी भी सकते में आ गए हैं, क्योंकि कीर्ति राणा ने अपने तजुर्बे से 'दबंग दुनिया' को इंदौर शहर में स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

बता दें कि दबंग दुनिया प्रबंधन ने पिछले दिनों कीर्ति राणा को इंदौर से स्थानांतरित कर भोपाल संस्करण का संपादक बना दिया था। इंदौर में पंकज मुकाती को ग्रुप एडिटर के तौर पर लाकर बिठा दिया। किशोर वाधवानी के यूज एंड थ्रो की पालिसी से खफा कीर्ति राणा ने इस्तीफा देकर अपनी नाराजगी को प्रकट कर दिया है। सूत्रों का कहना है कि कीर्ति राणा अभी नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं। नोटिस पीरियड खत्म होने के बाद वे अपनी आगे की रणनीति तय करेंगे।

कार्यालय में बिगड़ी जागरण के ब्‍यूरोचीफ विजय जूनियर की हालत, भर्ती

चंदौली में दैनिक जागरण के ब्‍यूरोचीफ विजय सिंह जूनियर अस्‍पताल में भर्ती हैं. बताया जा रहा है कि बुधवार को कार्यालय में काम करते समय अचानक उनके पेट में तेज दर्द हुआ. वे दर्द से बेहाल हो उठे. आनन फानन में पास में एक डॉक्‍टर को दिखाया गया, जिसने उन्‍हें दवा दी. परन्‍तु उनके ऊपर दवा का भी कोई असर नहीं हुआ. वे लगातार दर्द से परेशान रहे.

इसके बाद उनके सहकर्मियों ने चंदौली मुख्‍यालय स्थित एक निजी चिकित्‍सालय में भर्ती कराया. वे रात भर वे डाक्‍टरों की निगरानी में रहे. बताया जा रहा है कि उनकी कई जांच कराई गई है. जांच रिपोर्ट आने के बाद ही डाक्‍टर कुछ स्‍पष्‍ट बता पाएंगे. डाक्‍टरों को आशंका है कि उनके लीवर में कुछ दिक्‍कत हो सकती है. फिलहाल जूनियर अस्‍पताल में भर्ती हैं.

जवाबदेही से बचने के लिए सेल्फ रेगुलेशन का शोर मचाता है इलेक्ट्रानिक मीडिया : काटजू

भारतीय प्रेस परिषद के अध्‍यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने दावा किया कि इलेक्‍ट्रानिक मीडिया जिस 'आत्‍म नियमन' की दलील देता है, वह जवाबदेही से बचने की महज एक चाल है. काटजू बुधवार को आईआईएमसी में एक सम्‍मेलन को संबोधित करते हुए यह बात कही. काटजू जी ने कहा कि आत्‍म नियमन की बजाय एक मीडिया परिषद बनाए जाने की जरूरत है, जिसमें मीडिया के लोगों को शामिल किया जाए तथा परिषद को सजा देने का ज्‍यादा से ज्‍यादा अधिकार हो.

उन्‍होंने कहा कि इस प्रस्तावित मीडिया परिषद को मीडिया के लोगों या माध्यमों के लाइसेंस स्थगित करने का अधिकार होना चाहिए, लेकिन ऐसा केवल मीडिया परिषद में बहुमत के फैसले से ही किया जाना चाहिए. इसी मामले में बिजनेस लाइन में प्रकाशित खबर. काटजू के भाषण के कुछ खास अंश…

“Self regulation” as practised by the electronic media is a “ploy” to escape accountability, Press Council of India (PCI) chairperson Markandey Katju today claimed and favoured bringing them under the ambit of the media watchdog.

“Everybody is accountable to people but media people say we should not be accountable. We will practice self regulation…. Self regulation is no regulation. It is an oxymoron. It is a deliberate ploy so that there is no regulation,” he said. Katju was speaking at a conference organised at the Indian Institute of Mass Communication here.

The PCI chief said that he had proposed that the Press Council should be expanded to include 20 representatives of the electronic media industry and the body be named as Media Council and wondered what objection people had to this suggestion. He said that the media often did not highlight the real issues like poverty and malnutrition that the country is facing.

Katju said that the media created a hype around certain events like the Anna Hazare anti corruption protests which often did not reach any conclusion. Katju said that he was the person who had strongly taken up the cause of freedom of expression on several occasions. He said but he is criticised when he says that freedom is coupled with responsibility. He said that paid news and other evils were widespread yet it was being ignored. Katju said that he wanted regulation and not control.

पत्रकार संजय शर्मा ने यूपी सरकार को आइना दिखाया, नौकरशाही में हड़कंप

अब तक जिस प्रदेश सरकार ने दागी नौकरशाहों को मलाईदार पदों पर बैठाकर अपना आंख-कान सब बंद कर रखा था, अचानक उसे एक पत्रकार ने आइना दिखा दिया है. वीकएंड टाइम्‍स के संपादक संजय शर्मा की याचिका पर कोर्ट के आदेश के बाद यूपी की नौकरशाही में हड़कम्‍प मच गया है. आदेश के बाद आनन-फानन में अधिकारियों को इधर से उधर किया गया. हालां‍कि सरकार एवं उनके अधिकारियों ने याचिका खारिज करवाने के लिए अपनी तरफ से पूरी तैयारी कर रखी थी, परन्‍तु संजय शर्मा के अधिवक्‍ता अशोक पांडेय के तर्क के आगे सरकारी वकीलों के तर्क फीके पड़ गए.

पत्रकार संजय शर्मा ने निचली अदालत से सजा मिलने के बाद हाई कोर्ट से इस पर स्‍थगन आदेश पाए राजीव कुमार को दुबारा प्रमुख सचिव नियुक्ति बनाए जाने के मामले में कोर्ट में चुनौती दी थी. संजय कुमार ने याचिका के माध्‍यम से मांग की थी कि जब दो साल की सजा पाए सांसद-विधायक को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता है तो फिर राजीव कुमार को कैसे नौकरी करने दी जा रही है और वो भी इतने महत्‍वपूर्ण पद पर.

संजय शर्मा ने राजीव कुमार को बर्खास्‍त करने की भी मांग की है. इसी मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस उमानाथ सिंह और बीके दीक्षित के बेंच ने इस नियुक्ति पर  राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है. न्यायालय की कठोर टिप्‍पणी के बाद सरकार से लेकर नौकरशाही में हड़कंप मच गया. कोर्ट से नोटिस मिलने के कुछ घंटों के भीतर नोएडा के सीईओ संजीव शरण, जिन्हें हटाने के निर्देश कोर्ट ने काफी पहले दिए थे, को हटा दिया गया.

मजे की बात यह है कि 17 जनवरी से यूपी में 6 साल बाद आईएएस वीक मनाया जा रहा है. प्रदेश भर से सभी डीएम, कमिश्नर लखनऊ में इकट्ठा हुए हैं. वीक की शुरुआत से पहले ही संजय शर्मा की रिट ने इन अफसरों के मुहँ का जायका ख़राब कर दिया है. वीकएंड टाइम्स प्रदेश का पहला अखबार था, जिसने राजीव कुमार को प्रमुख सचिव नियुक्ति बनाए जाते ही खबर छापी थी कि उनके खिलाफ सीबीआई की जांच चल रही है, लिहाजा उन्हें प्रमुख सचिव नियुक्ति नहीं बनाया जाना चाहिए.

इसके कुछ दिन बाद ही नीरा यादव के साथ राजीव कुमार को भी तीन साल की सजा हो गई. इसके बाद सरकार ने उन्हें हटा दिया, मगर हाई कोर्ट से सजा के फैसले पर स्टे मिलते ही उन्‍हें फिर से इसी पद पर तैनात कर दिया गया. संजय शर्मा ने एक बार अपने अखबार के माध्‍यम से इस खबर को उठाया, परन्‍तु सरकार पर कोई असर ही नहीं हुआ.

इसके बाद कानूनी डिग्री हासिल किए संजय शर्मा ने कोर्ट का सहारा लेकर न केवल एक साहसिक पहल की बल्कि अपने पत्रकारीय दायित्‍व का भी निर्वहन किया. उन्होंने राजीव कुमार को इस पद से हटाने की जगह उन्हें सेवा से बर्खास्त किये जाने की मांग की. इस याचिका के दायर होते ही सरकार में हड़कंप मचा और सरकार के पैरोकार सक्रिय हो गए. सूत्रों का कहना है कि एक दर्जन से ज्‍यादा आईएएस अधिकारियों ने संजय शर्मा को विभिन्‍न तरीके से प्रभावित करने की कोशिश की, परन्‍तु उन्‍हें कामयाबी नहीं मिल पाई.

सूत्रों ने बताया कि इस याचिका को खारिज करवाने के लिए सरकारी वकीलों ने सर्विस मामलों के जाने माने अधिवक्‍ता कालियाजी से भी सलाह मशविरा किया. परन्‍तु कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए सरकार को नोटिस जारी कर दिया. मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी. इस रिट से संजय शर्मा ने यह भी दर्शा दिया कि पत्रकार खबर लिखने, पत्रकारिता करने के साथ-साथ अगर कानून का भी सहारा ले तो कई चीजो में  सुधार हो सकता है . इस साहसिक पहल पर संजय शर्मा को बधाई देने के लिए उनके मोबाइल नंबर 9452095094 पर काल कर सकते हैं.

एंकर सव्‍यसाची पटनायक की मौत के मामले में पुलिस जांच रिपोर्ट खारिज, फिर होगी जांच

नई दिल्‍ली : राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हैदराबाद के 27 वर्षीय पत्रकार सव्‍यसाची पटनायक की संदिग्‍ध परिस्थितियों में मौत की जांच रिपोर्ट खारिज कर दी है. आयोग ने साइबराबाद पुलिस की रिपोर्ट पर नाराजगी जताते हुए फिर से जांच करने का निर्देश दिया है. आयोग ने आंध्र प्रदेश के डीजी को भी इस संदर्भ में नोटिस भेजा है.  ओडिसा के सिद्धेश्‍वर जिले के रहने वाले पत्रकार सव्‍यसाची पटनायक बीते साल 11 फरवरी को संदिग्‍ध परिस्थितियों में मृत पाए गए थे. उनका शव हैदराबाद स्थित उनके किराए के घर में मिला था. वे एक प्राइवेट चैनल में एंकर के रूप में काम कर रहे थे.

सव्‍यसाची की संदिग्‍ध हालात में मौत के मामले में ओडिसा बेस्‍ड मानवाधिकार संगठन 'इंडिया मीडिया सेंटर' के कार्यकर्ता अखंड ने राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग में एक याचिका दायर की थी. अखंड ने आरोप लगाया था कि साइबराबाद पुलिस मौत को आत्‍महत्‍या का मामला बनाकर बंद करना चाहती है. इसके बाद आयोग ने पिछले साल 27 सितम्‍बर को हैदराबाद के पुलिस कमिश्‍नर को आदेश दिया कि वे सव्‍यसाची की मौत की जांच रिपोर्ट आयोग में दाखिल करें.

पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि सव्‍यसाची पटनायक बहुत ही संवेदनशील प्रवृत्ति के थे, वे मानसिक रूप से परेशान चल रहे थे, वे अपनी पिता की मौत के बाद से डिप्रेशन में थे. संभवत: नए जगह पर काम के दबाव के चलते उन्‍होंने आत्‍महत्‍या कर लिया होगा.

हालांकि साइबराबाद के पुलिस कमीशनर ने जांच रिपोर्ट में लारपवाही बरतने के आरोपों से इनकार किया है. वहीं अखंड ने अपने आरोपों को दुहराते हुए कहा कि पुलिस ने सव्‍यसाची के परिवार के किसी भी सदस्‍य का बयान नहीं लिया. इस मामले की फिर से निष्‍पक्ष जांच जरूरी है. दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद आयोग ने आंध्र सरकार तथा डीजीपी को फिर से जांच कराने का आदेश दिया है.

आयोग ने कहा है कि इस मामले की जांच किसी और जिले के अधिकारी से कराई जाए तथा चार सप्‍ताह में नइ रिपोर्ट पेश की जाए. अखंड का कहना है कि वे आयोग से मांग करेंगे कि उनको आरोपी बनाया जाए जिन्‍होंने सव्‍यसाची को जान देने को मजबूर किया. साथ ही पीड़ित परिवार को दस लाख रुपये प्रदान किया जाए.

थिएटर एक्ट्रेस वंदना ने रंगकर्मी अरविंद गौड़ को ‘गद्दार’ क्यों कहा?

: एनएसडी में हाईवोल्‍टेज ड्रामा, संदेह के घेरे में अरविंद गौड़ : गत सोमवार को नेशनल स्‍कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में ख्‍यात रंगमंच अभिनेत्री वंदना के साथ किये गये दुर्व्‍यवहार का मामला संगीन मोड़ लेता जा रहा है। इस मामले की आंच टीम अन्‍ना की कोर कमेटी के सदस्‍य व रंग निर्देशक अरविंद गौड़ तक पहुंचने लगी है। रंगमंच से जुड़े लोग बताते हैं कि यह 14 साल पहले एक उदीयमान अभिनेत्री की अवहेलना और शोषण से जुड़ा मामला है।

इस संवाददाता ने मामले से जुड़े लगभग सभी पक्षों से बात की लेकिन इन सभी की बातें इतनी विरोधाभासी और आपत्तिजनक हैं कि उन्‍हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। इस संवाददाता को वंदना का फोन नंबर अथवा उनका पता देने के लिए न तो अरविंद गौड़ राजी हुए, न ही रंगकर्मी विनीत, न ही उक्‍त कार्यक्रम में विमोचित पत्रिका 'समकालीन रंगमंच' के संपादक राजेश चंद।

गौरतलब है कि फारवर्ड प्रेस के पास मौजूद वीडियो में अभिनेत्री वंदना चीख-चीख कर अरविंद गौड़ पर आरोप लगा रही हैं और 14 साल पहले की किसी घटना का उल्‍लेख करना चाह रही हैं, लेकिन रंगकर्मी विनीत उन्‍हें बोलने से रोक रहे हैं।

वीडियो के अंत में वंदना बेहद तल्‍ख लहजे में अरविंद गौड़ को ''गद्दार'' कहती हैं। वीडियो में रंगकर्मी विनीत माइक का वायर उखाड़ते दिख रहे हैं जबकि अ‍रविंद गौड़ मीडियाकर्मी को कैमरा बंद करने को कह रहे हैं। सवाल यह उठता है कि वंदना के पास कहने के लिए ऐसा क्‍या है, जिसे दबाने के लिए इन 'सभ्‍य, प्र‍गतिशील' रंगकर्मियों को माइक तक उखाड़ना पड़ा?

और इससे भी बड़ा सवाल यह कि ये लोग वंदना का फोन नंबर क्‍यों नहीं देना चाहते? उम्‍मीद की जानी चाहिए कि ये लोग जल्‍दी ही वंदना को मीडिया के सामने लाएंगे – लेकिन क्‍या तब, जब वंदना को इन समर्थ लोगों द्वारा समझाने-बुझाने, दबाने, बरगानले का दौर पूरा हो चुका होगा?

फारवर्ड प्रेस के संवाददाता जितेन्द्र कुमार ज्योति की रिपोर्ट.

नकली सोने के साथ पत्रकार समेत दो गिरफ्तार

पठानकोट : सदर पुलिस ने अकालगढ़ के नज़दीक जांच के दौरान नकली सोने के साथ दो लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें एक पत्रकार बताया जा रहा है. उसके पास से एक अखबार का परिचय पत्र मिला है. पुलिस उसकी जांच करा रही है. जानकारी के अनुसार पुलिस ने गुप्‍त सूचना के आधार पर एक स्‍पार्क गाड़ी, जिसका नम्‍बर पीबी35 एम- 2080 था, को रोका. उसकी तलाशी ली तो गाड़ी में सवार लोगों के पास से 2 किलो 600 ग्राम सोने का सामान मिला.

पुलिस ने तत्‍काल दोनों लोगों को गिरफ्तार कर लिया. इनकी पहचान परमजीत सिंह उर्फ प्रिंस तथा राजेश कुमार के रूप में हुई. दोनों सुजानपुर के रहने वाले हैं. पुलिस ने बताया कि गाड़ी पर भी प्रेस लिखा था तथा परमजीत सिंह के पास से एक अखबार का कार्ड भी बरामद हुआ है. वो खुद को पत्रकार बता रहा था. पुलिस उसकी जांच करा रही है. पुलिस का कहना है कि मामला दर्ज कर लिया गया है. अगर कार्ड गलत निकला तो कथित पत्रकार के खिलाफ कुछ और मामले दर्ज किए जाएंगे.

पुलिस ने जब सोने की जांच कराई तो वो नकली निकला. पुलिस ने बताया कि उनलोगों को सूचना मिली थी कि कुछ लोग असली सोना के नाम पर नकली सोना बेचकर लोगों को ठग रहे हैं. ये लोग नकली सोने से बने एक ईंट, दो मूर्तियां एव एक शंख बेचने के लिए निकले थे.

प्रभात खबर, देवघर से पांच लोगों का इस्‍तीफा

प्रभात खबर के देवघर संस्करण में इन दिनों भगदड़ सी स्थिति है…अभी तक पांच पत्रकारों ने यहाँ से इस्तीफा दे दिया है…ये सभी मंझे हुए पत्रकार थे… यूं कह लें कि देवघर संस्करण की रीढ़ थे… देवघर संस्करण को बाय बाय कहने वालों में उप संपादक परासर प्रभात, वरुण राय और वरीय उप संपादक सुमन झा शामिल है…जबकि कुछ दिन पूर्व छोड़ जाने वालों में वरीय उप संपादक राकेश कुमार सिंह, संवाददाता राकेश पुरोहितवार शामिल हैं… इनमें से अधिकांश ने हिंदुस्तान अखबार का दामन थाम लिया है…जबकि सुमन झा ने दैनिक जागरण, मेरठ में अपनी नई पारी की शुरुआत की है.

अखबार के देवघर संस्करण के भीतर खाने से जो खबर आ रही है उससे पता चलता है कि यहाँ कि कार्य प्रणाली समर्पित पत्रकारों के अनुकूल नहीं रह गयी है…बताया जा रहा है कि यहां की परिस्थितियों से नाराज कई और लोग प्रभात खबर को अलविदा कह सते हैं… अन्य प्रतिद्वंद्वी अखबारों का प्रबंधन यहाँ के विक्षुब्ध लोगों से लगातार संपर्क बनाये हुए है…लेकिन प्रभात खबर प्रबंधन का रवैया इस तरफ से उदासीन है.

मीडिया पर खीझे आसाराम, कहा साबित करो और पचास लाख ले जाओ

इलाहाबाद : दिल्ली में पिछले दिनों हुए सामूहिक बलात्कार कांड के बाबत दिए गए बयान को लेकर विवादित और धर्मगुरू होने का दावा करने वाले आसाराम बापू ने मंगलवार को मीडिया पर ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। महाकुंभ में शिरकत के लिए आए आसाराम ने यह ऐलान भी किया कि यदि कोई यह साबित कर दे कि उन्होंने सामूहिक बलात्कार के लिए पीड़िता को भी जिम्मेदार बताया था तो वह उसे ईनाम के तौर पर 50 लाख रुपए देंगे ।

गौरतलब है कि आसाराम ने पिछले दिनों कहा था कि यदि 23 साल की पीड़िता ने दोषियों के सामने रहम की गुहार लगायी होती और उनसे यह कहा होता कि वह तो उनकी बहन की तरह है तो वह अपनी इज्जत और जान बचा सकती थी । आसाराम के इस बयान पर पूरा देश उबल पड़ा था ।

तथाकथित धर्मगुरू ने दावा किय कि मेरे बयान को संदर्भ से हट कर पेश किया गया । पीड़िता तो मेरी अपनी पोती की तरह थी । मीडिया ने मेरे बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया । आसाराम ने कहा कि यदि कोई यह साबित कर दे कि उन्होंने सामूहिक बलात्कार के लिए पीड़िता को भी जिम्मेदार बताया था तो वह उसे ईनाम के तौर पर 50 लाख रुपए देंगे।

रंगकर्मी विनीत पर वंदना और पत्रकार जितेंद्र से दुर्व्यवहार का आरोप

नई दिल्ली : नेशनल स्कूल आफ ड्रामा, नई दिल्ली में 14 जनवरी को अवसर था रंगकर्म की एक त्रैमासिक पत्रिका के विमोचन का। समारोह में मौजूद थे अरविंद गौड़, पत्रिका के संपादक राजेश चंद, मोहल्ला लाइव के अविनाश दास, विनीत और वंदना। शाम के करीब छह बजे विमोचन समारोह विचार समारोह में बदल गया और फिर विचार समारोह आपसी झगड़े में तब्दील हो गया। वंदना ने अरविंद गौड़ के विरूद्ध जैसे ही बोलने की कोशिश की, रंगकर्मी विनीत ने वंदना को पहले तो धक्का देने की कोशिश की और फिर बात को दबाने की कोशिश करने लगे।

विनीत यहां पर भी नहीं रूके और फॉरवर्ड प्रेस के प्रतिनिधि जितेन्द्र कुमार ज्योति को धमकाते हुए कहा कि आपको कौन यहां आने को बोला, अपने कैमरे को बंद कर। आपसे बाहर में हम बात करेंगे, देख लेंगे। आखिर क्या था वह मुददा जो वंदना सबके सामने कहना चाह रही थी और विनीत इसे रोकने की कोशिश कर रहे थे?

इस मामले पर हमने अरविंद गौड़ से दूरभाष से संपर्क करके सच्चाई जानने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि यह कोई मामला नहीं है और इसे तूल देने की कोशिश न करें। बहरहाल, सवाल यह है कि क्या नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के परिसर में सबकुछ ठीक नहीं है या इस संस्था में भी सब कुछ ठीक नहीं। इस मामले पर एनएसडी की निदेशिका का डा. अनुराधा कपूर से किसी भी तरह की बात नहीं हो सकी सिवाय कुछ एनएसडी कार्यालय कर्मचारियों के दूरभाष वार्तालाप के। मसलन, क्या था वह मुददा जो वंदना कहना चाह रही थीं और इसे क्यों सबके सामने आने से रोक दिया गया, यह जानना अहम होगा? विनीत द्वारा पहले किसी महिला के साथ गलत व्यवहार करना फिर मीडियाकर्मी को धमकाना, क्या यह उचित है?

जितेंद्र ज्योति की रिपोर्ट फारवर्ड प्रेस से साभार.  संपर्क- jitendra.forwardpress@gmail.com

‘हमवतन’ अखबार के कार्यकारी संपादक निर्मलेंदु साहा पर गिरी गाज

: नोएडा से बाहर तबादला : कार्यभार वापस लिया गया : आरपी श्रीवास्तव देखेंगे सारा काम : साईं प्रसाद मीडिया के हिंदी वीकली टैबलायड अखबार हमवतन से सूचना आ रही है कि इसके कार्यकारी संपादक निर्मलेंदु साहा से कार्यभार वापस ले लिया गया है और उनका तबादला नोएडा के बाहर कर दिया गया है. अखबार का सारा कामकाज अब आरपी श्रीवास्तव को सौंप दिया गया है जो संपादक के रूप में पहले से ही अखबार में कार्यरत हैं. निर्मलेंदु साहा से कामकाज वापस लिए जाने से संबंधित आंतरिक मेल जारी कर दी गई है.

14 जनवरी को जारी इस मेल में कहा गया है कि आगे से किसी भी प्रकार का पत्राचार सीधे संपादक आरपी श्रीवास्तव से किया जाए. उल्लेखनीय है कि आरपी श्रीवास्तव को सबसे पहले हमवतन अखबार की जिम्मेदारी दी गई लेकिन जब मुकेश कुमार चैनल हेड बने तो वे निर्मलेंदु साहा को ले आए और आरपी श्रीवास्तव व उनके लोगों को किनारे कर दिया. रही सही कसर साहा ने पूरी कर दी और उन्होंने अपने समय में आरपी श्रीवास्तव और उनके करीबी लोगों को खूब उपेक्षित व प्रताड़ित किया. अब निर्मलेंदु साहा का सिक्का चलना बंद हो चुका है. यह पता नहीं चल पा रहा है कि वे इस्तीफा देंगे या फिर अच्छे दिन लौटने का इंतजार करते हुए संस्थान में चुपचाप बने रहेंगे.

गौतम मयंक ने न्यूज एक्सप्रेस और शशि ने आजतक छोड़ा, दोनों नेशन टुडे के साथ

न्‍यूज एक्‍सप्रेस से खबर है कि सीनियर प्रोड्यूसर गौतम मयंक ने इस्‍तीफा दे दिया है. इन्‍होंने अपनी नई पारी अल्‍फा ग्रुप के जल्‍द लांच होने जा रहे चैनल नेशन टुडे के साथ की है. उन्‍हें यहां पर एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर बनाया गया है. गौतम मयंक ने करियर की शुरुआत हिंदुस्‍तान, पटना के साथ की थी. इसके बाद वो ईटीवी से जुड़ गए. बाद में दिल्‍ली में आजतक न्‍यूज चैनल के हिस्‍सा बने. नोएडा में डिप्‍टी ईपी के रूप में हमार टीवी के साथ रहे. महुआ के ब्‍यूरोचीफ बनकर पटना पहुंचे. फिर देश लाइव में बिहार स्‍टेट हेड के रूप में काम किया. यहां से निकाले जाने के बाद न्‍यूज एक्‍सप्रेस से जुड़ गए थे.

आजतक से खबर है कि शशि ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे वहां पर एंकर के रूप में कार्यरत थीं. शशि ने अपनी नई पारी अल्‍फा समूह के चैनल नेशन टुडे के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी एंकर बनाया गया है. आजतक के अलावा भी वे कई संस्‍थानों में काम कर चुकी हैं.

दैनिक जागरण में विष्णु त्रिपाठी के आदेश का उल्लंघन कर रहे अवधेश गुप्ता

: (कानाफूसी) : कुंभ के कारण दैनिक जागरण, इलाहाबाद के कर्मियों का वीकली आफ निरस्त करने का प्रकरण : दैनिक जागरण, इलाहाबाद के संपादकीय कर्मचारी परेशान हैं. कुंभ के नाम पर यहां काम करने वाले सभी कर्मचारियों का साप्‍ताहिक अवकाश निरस्‍त कर दिया गया है. अब उन्‍हें सप्‍ताह के पूरे दिन काम करना पड़ेगा. यह निर्देश ऊपर से नहीं है. संपादकीय प्रभारी अवधेश गुप्‍ता ने मौखिक निर्देश देकर सबकी छुट्टियां निरस्‍त कर दी हैं. इसके चलते दैनिक जागरण में काम करने वाले कर्मचारी नाराज हैं. पर नौकरी चले जाने के डर से वे इसके खिलाफ कुछ बोल भी नहीं पा रहे.

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अवधेश गुप्‍ता ने एडिटोरियल के सभी कर्मचारियों को स्‍पष्‍ट निर्देश दे दिया है कि अब किसी को साप्‍ताहिक अवकाश नहीं मिलेगा. उनके इस आदेश से केंद्रीय श्रम कानूनों का उल्‍लंघन तो हो ही रहा है, वे अपने वरिष्‍ठों के आदेशों को भी दरकिनार कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि जागरण के कुंभ स्‍पेशल की लांचिंग के लिए इलाहाबाद आए एसोसिएट एडिटर विष्‍णु त्रिपाठी ने ऐसी शिकायतें मिलने के बाद स्‍पष्‍ट निर्देश दिए थे कि किसी भी स्थिति में कर्मचारियों का साप्‍ताहिक अवकाश निरस्‍त न किया जाए. उन्‍होंने संपादकीय प्रभारी को भी इस बारे में निर्देशित किया था.

परन्‍तु उनके जाते ही संपादकीय प्रभारी ने सभी कर्मचारियों के साप्‍ताहिक अवकाश को कुंभ चलने तक निरस्‍त करने का फरमान जारी कर दिया. इस बारे में बताया जा रहा है कि विष्‍णु त्रिपाठी से शिकायत किए जाने से वे चिढ़ गए थे तथा अपने पॉवर का इस्‍तेमाल करते हुए अवकाश निरस्‍त करने का आदेश जारी कर दिया. वैसे भी कुंभ स्‍पेशल निकालने के लिए कई यूनिटों से लगभग दस लोगों को बुलाया गया है, जो कुंभ स्‍पेशल को प्रकाशित कर रहे हैं. स्‍थानीय कर्मचारियों को बस इनका सहयोग करने को कहा गया है. इसके बाद भी अवकाश निरस्‍त होने से कर्मचारियों में रोष है.

कंचन वर्मा एवं विनोद भावुक जागरण से जुड़े

दैनिक जागरण, हल्‍द्वानी से खबर है कि कंचन वर्मा ने अपनी नई पारी शुरू की है. वे यहां पर सीनियर सब एडिटर बनाए गए हैं. उन्‍हें मंडल की जिम्‍मेदारी दी गई है. कंचन की दैनिक जागरण के साथ यह दूसरी पारी है. वे इसके पहले लम्‍बे समय तक आज, दैनिक जागरण और अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वे लम्‍बे समय तक बरेली में क्राइम रिपोर्टर के रूप में काम कर चुके हैं. गौरतलब है कि कंचन अमर उजाला में बदायूं के ब्‍यूरोचीफ थे. कुछ शिकायतों के बाद प्रबंधन ने उनके समेत पूरे स्‍टाफ को बर्खास्‍त कर दिया था.

हिमाचल दस्‍तक से खबर है कि विनोद भावुक ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे धर्मशाला में अखबार के ब्‍यूरोचीफ थे. विनोद ने अपनी नई पारी दैनिक जागरण के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. वे इसके अलावा कई अखबारों में काम कर चुके हैं.

Global Festival of Journalism First Time In India On 12th-14th Feb

National Media Council has supported Asian Education Group in organizing  Global Festival of Journalism in Noida from 12th to 14th February, 2013. Before this, a powerful meeting was also held at Asian Education Group consisting of all the department heads of Journalism at Marwah Studios to plan and execute the first ever festival of journalism at the global level from 12th to 14th February at Noida Film City.

“This is going to be the first time not only in India but also in Asia when a festival of that stature and size highlighting journalism going to be held. We are probably now the second one in the World to have event of this nature after International Festival of Journalism in Italy” expressed Sandeep Marwah President of Marwah Studios.

"Journalists and media community of India welcomes this decision and will provide all possible helps and support to AEG in making this event successful" said Dhiraj Bhardwaj, chairman of National Media Council. Various activities are planned related to journalism as suggested by the heads of different departments of Journalism in these three days including Awards to the journalist. The journalist of India will also get a chance to interact with their global counterparts during the event. Asian Education Group has already generated and designed many successful national and international events in the field of film, television and media.

Pakistan: It’s fate is turning but which side?

After an eventful day in Pakistan, it has become very interesting to see what the next. As far as "Pakistani Awaam" is concerned it is too divided and confused on these series of events. A certain section of media and intellects however here in India is very exciting over it. All the "never before" secular democratic spirit waving in streets of Islamabad appears to be very aspiring, encouraging and appealing to intellectuals in India here and making them fanatic of brotherhood & permanent peace across border.

However a reality-check of all these happenings are not that encouraging & presents a different version of truth inside. All these so called self-driven series of happenings are well planned and choreographed as per the claims of eminent Pakistani Journalists and experts. These claims however did not attract much attention at starting but at a later stage when all things started to happen exactly as pro-claimed, compelled to re-think.

And with announcement of Imraan Khan to launch/join the march, it seems to be happening ditto in Pakistan as indicated by Tarak Fateh one & half year ago and as predicted by Najam Sethi last night in very detail. All this turmoil in Pakistan is well-choreographed by Military-Judiciary establishments. In fact it is just an attempt of coup with most sophisticated tools ever in history of Pak – but a coup is a coup in whatever form !!
 
As far as Quadri is concerned- May he be a man of nice motives (this is subject to examine too); but right now seems to be playing into hands of Pakistani Army & fundamentalists. Once he would be well utilized to de stabilize govt. in Islamabad and derail parliamentary democracy, Army will thrash him and his "million-men" in ruthliest manner ever in Pak if situation keeps on developing as choreographed. The illogical support of most fundamentalist parties of Pak to this liberal & secular march too, seems to get it's answer in light of mentioned game plan. Also Earlier much criticized decision of making Army as patron for coming general elections in Pak by Supreme Court and now timing of Chief Justice to issue arrest warrant of Pak PM is just a consequence of this well-planned series of events. In fact the created tension at LoC with India is also a little part of this big planning.
 
And at the last- In awake of these all turmoil in it's most critical neighbor, message for my country is- be cautious, be vigilant, be prepared as the "return of glorious days" of Pak Army has been planned in a perfect manner & being implemented in even a more perfect way. Don't be overwhelmed with these revolutionary slogans of democracy and secularism echoing in Pakistan today because it is containing seeds of war-crying fundamentalist anti-india military rule there!!!

लेखक अभिनव शंकर प्रोद्योगिकी में स्नातक हैं और एक स्विस बहु-राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं.

असम के मीडिया घरानों ने खत्म किया गणतंत्र दिवस का अवकाश

गुवाहाटी। गणतंत्र दिवस के मौके पर असम के मीडियाकर्मी स्वतंत्र रूप से इस राष्ट्रीय पर्व को नहीं मना पाएंगे। असम के मीडिया घरानों ने गणतंत्र दिवस के मौके पर परंपरागत रूप से चल रहे अवकाश को खत्म कर दिया है। मीडिया घरानों ने गणतंत्र दिवस के मौके पर अखबारों का दफ्तर खोले रखने और अखबार प्रकाशित करने का फैसला किया है। जिसके बाद मीडिया कर्मियों में खासी नाराजगी है लेकिन असंगठित यहां के मीडिया कर्मी मुहं खोलने की स्थिति में नहीं है।

बताते चलें कि मीडिया घरानों ने इस साल से बिहूं यानी मकर संक्रांति के मौके पर होने वाली एक दिन की घुट्टी को दो दिन कर दिया है। जिसकी भारपाई के लिए गणतंत्र दिवस की छुट्टी को खत्म करने जा रही है। लेकिन इन्हें यह समझ नहीं है कि गणतंत्र दिवस की बराबरी बिहू या अन्य पर्व से नहीं किया जा सकता। और पूरे देश का हर अखबार इस दिन बंद होता है।
 

इज्जत की रक्षा के नाम पर जान देने और बहादुर बेटी का खिताब लेने से बचो

: जान बड़ी या इज्‍जत (1) : बात की शुरुआत खरगोन में पुलिस विभाग की ओर से आयोजित एक संगोष्‍ठी में दिये गये कृषि वैज्ञानिक डा. अनिता शुक्ला के इस बयान से कि ''अगर वह छह लोगों से घिर गयी थी तो अपने को सौंप क्यों नहीं दिया।’’ वैसे तो उन्होंने और भी बातें कहीं थीं, लेकिन और बातों से मैं सहमत नहीं हूं, इसलिये उन बातों का जिक्र नहीं कर रहा हूं। डा. अनिता शुक्ला के इस बयान पर कि ‘‘अगर वह छह लोगों से घिर गयी थी तो अपने को सौंप क्यों नहीं दिया’’ जर्बदस्त आलोचन हुयी।

यह कहा गया कि मोहतरमा ने ऐसा कह कर देश की बहादुर बेटी की हिम्मत का अपमान किया है जिसने अपनी इज्जत को बचाने के लिये अपनी जान तक दे दी। पूरे देश में दिल्ली गैंग रेप की पीड़िता को बहादुर बेटी कहा गया। उसकी इसलिये व्यापक पैमाने पर सराहना हुयी क्योंकि उसने अपनी इज्जत बचाने के लिये छह बलात्कारियों से जी जान से संघर्ष किया कि और आखिरकार उसने अपनी इज्जत बचाने के लिये जान तक दे दी।

यहां सवाल उठाता है कि आखिर यह इज्जत या आबरू क्या चीज है जिसे बचाने के लिये जान तक दे दिया जाना चाहिये। जान रहे या नहीं रहे, इज्जत नहीं जाने देना चाहिये। मतलब यह कि एक स्त्री के लिये इज्जत, जान से भी बड़ी चीज है और जिसकी इज्जत लूट ली जाये वह जीने के काबिल नहीं है। एक लड़की जान और इज्जत की दो गठरियां लिये पैदा होती है और हर लड़की एवं स्त्री को चाहिये कि वह इज्जत की गठरी की हमेशा रक्षा करे, इसके बचाने के लिये अगर जान की गठरी की कुर्बानी देनी पड़े तो इसमें देर नहीं करनी चाहिये, क्योंकि अगर इज्जत ही चली जाये तो फिर जान के बचने रहने से क्या फायदा।

संसद के पिछले शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में राष्‍ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष गिरिजा व्यास ने कहा था कि बलात्कार की शिकार महिला पल-पल मरती है। इसका लोकसभा में विपक्षी की नेता समेत सभी महिला सांसदों ने समर्थन किया। सवाल यह है कि बलात्कार की शिकार महिला के साथ ऐसा क्या हो जाता है जिसके कारण या तो वह जान दे देती है और जो जान देने की हिम्मत नहीं कर पाती है वह पल-पल मरती है।

हम अक्सर पढ़ते-सुनते रहते हैं और फिल्मों में भी देखते हैं कि बलात्कार की शिकार फलां महिला या लड़की ने आत्महत्या कर ली। क्यों? इसलिये कि उसकी अपनी इज्जत को बचा नहीं सकी। सवाल यह है कि लड़की को अपनी जान देकर भी अपनी इज्जत क्यों बचानी चाहिये। किसी अविवाहित लड़की को ऐसा इसलिये करना चाहिये ताकि सुहाग रात के समय अपने पति के समक्ष अपने को बिल्कुल शुद्ध रूप में पेश कर सके। अगर शादीशुदा महिला के साथ बलात्कार हो जाये तो तो यह माना जाता है कि वह पति के लिये जूठी हो गयी। जिस तरह से चिड़िया के बच्चे को अगर कोई छू ले तो वह अपने बच्चे को मार देती है। उसी तरह से अगर किसी महिला के शरीर का उपभोग (जबरन या बहला-फुसलाकर) कोई और कर ले तो वह अपने पति परमेश्‍वर के लिये अपवित्र हो जाती है और ऐसी अपवित्र लड़की या और से शादी कौन करेगा और अगर वह शादीशुदा है तो कौन सा मर्द उसके अपने घर में रखेगा। ऐसे में एक लड़की या औरत के लिये जिंदा रहने का अर्थ ही क्या है, इसलिये वह या तो आत्महत्या कर लेती है या पल-पल मरती रहती है।

इस सोच से हर लड़की किसी न किसी हद तक ग्रस्त होती है और इसलिये जब कोई उसके साथ जोर-जबर्दस्ती करता है तो उसे अपने शील की रक्षा करने के लिये अपनी जान तक दे दी है। चूंकि यही काम दामिनी ने किया और इसलिये वह देश की बहादुर बेटी है और उस पर हर देशवासियों को नाज है। इस आलेख का मतलब यह कतई नहीं कि कि अगर कोई या कुछ लोग सामूहिक बलात्कार करें तो उन्हें बिना विरोध के करने देना चाहिये। महिलाओं और लड़कियों की आत्मरक्षा अथवा हैवानों से बचने का प्रशिक्षण देने के दौरान क्या यह सीखाया जाता है कि अगर कोई लड़की कुछ दरिंदों से घिर जाये और उसके लिये अपनी इज्जत बचाने का कोई चारा नहीं रहे तो उसे अपनी जान दे देनी चाहिये।

अगर बलात्कार या यौन शोषण को तथाकथित इज्जत/आबरू की अवधारणा से परे होकर देखा जाये तो बलात्कार का सीधा मतलब यह है कि जबरन या बलपूवर्क स्थापित किया यौन संबंध। एक महिला अपने पूरे जीवन काल में कई हजार बार यौन संबंध स्थापित कर सकती है। जब वह अपने पति या प्रेमी के साथ अपनी सहमति से यौन संबंध स्थापित करती है, तो उसे कोई आपत्ति नहीं होती बल्कि उसे आनंद मिलता है, लेकिन अगर उसके साथ जबरन यौन संबंध स्थापित करे तो उसे नागवार गुजरना चाहिये और इसका हरसंभव विरोध किया जाना चाहिये, लेकिन यह कौन सी मानसिकता है कि किसी महिला के साथ अगर कोई या कुछ लोग जबरन यौन संबंध स्थापित कर लें तो अपनी इज्जत बचाने के लिये उसे जान तक दे देने में कोई कोताही नहीं करनी चाहिये।

यह माना जाता है कि पति का पत्नी की देह पर अधिकार है और जब पति जब मन आता है तब यौन संबंध स्थापित करता है, चाहे उसकी पत्नी मानसिक या शारीरिक रूप से तैयार हो या नहीं। इसका विरोध वह आम तौर पर नहीं करती। क्योंकि उसने मान लिया है कि उसका देह उसके पति के लिये है। जब कोई अविवाहित लड़की के साथ उसका कोई प्रेमी यौन संबंध स्थापित करता है तब भी वह विरोध नहीं करती, क्योंकि उसे लगता है कि वह प्रेम कर रही है, भले ही उसका प्रेमी प्यार करने का नाटक कर रहा होता है। कई बार यह भी होता है कि कोई पुरुष किसी महिला को शादी, नौकरी या पैसे का प्रलोभन देकर उसके साथ यौन संबंध स्थापित करता है और इसका भी तब तक विरोध नहीं होता जब तक कि यह साफ नहीं हो जाता कि वह पुरुष उसे धोखा दे रहा था।

जाहिर है कि यौन संबंध कोई कष्‍टकारक प्रक्रिया नहीं है और न ही यौन संबंध ऐसी प्रक्रिया है जो एक बार ही होती है या अगर किसी ने एक बार जबरन यौन संबंध स्थापित कर लिया तो उसका शील भंग हो जायेगा और वह समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी। इस समाज में तमाम कुकर्मी, घोटालेबाज, भ्रष्‍ट, अपराधी और पापी सीना तान कर चलते हैं। पाप धोने के लिये गंगा में स्नान कर लेते हैं। बच्चों की हत्या करने, मासूमों के साथ बलात्कार करने, दूसरे के हक को छीनने, किसानों को आत्महत्या के लिये मजबूर करने, देश को लूट कर खाने और तमाम तरह के अनैतिक काम करने से नेताओं, अपराधियों और किसी पुरुष की इज्जत नहीं जाती है, लेकिन अगर किसी महिला के साथ किसी ने जबरन यौन संबंध स्थापित लिया या उस महिला ने प्रलोभन में आकर या अपनी सहमति से किसी पर पुरुष के साथ संबंध स्थापित कर लिया तो उसकी इज्जत चली जायेगी। इस पाखंड को आधुनिकता और पश्चिमी विचारों में पली बढ़ी लड़कियां भी नहीं समझती है।

हर महिला और पुरुष को अपने शरीर पर केवल उसका पूरा अधिकार है। किसी को उसकी इजाजत के बगैर उसकी देह से छेड़खानी करने का अधिकार नहीं है। कोई अगर ऐसा करता है तो उसका कड़ा जवाब देना चाहिये। बलात्कार करने वाले या किसी महिला के साथ छेड़खानी करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिये, ताकि कोई ऐसा करने की हिम्मत नहीं कर सके। यही नहीं किसी भी महिला को अपने कौमार्य की रक्षा करने का अधिकार होना चाहिये और एक सभ्य समाज में उसके इस अधिकार का हर हाल में सम्मान होना चाहिये। उसकी मर्जी के विरूद्ध अगर कोई उसके साथ छेड़खानी करने की कोशिश करे या यौन शोषण करे तो उसका हर तरीके से प्रतिरोध करना चाहिये, क्योंकि यह उसके स्वविवेक पर अतिक्रमण है, लेकिन यह मानसिकता को पालना अथवा आज आधुनिक युग में ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देना कितना सही है – कि किसी लड़की या महिला को अपनी इज्जत को जान देकर भी बचानी चाहिये और अगर वह अपनी इज्जत बचाने में कामयाब नहीं हो पाये तो बाद में आत्महत्या कर लेनी चाहिये। क्या बलात्कार की कोशिश के दौरान अपनी इज्जत बचाने के लिये अपनी जान दे देने या बलात्कार के बाद अपनी जान दे देने की मानसिकता क्या महिला को गुलाम बनाये रखने की पुरुष मानसिकता का ही विस्तार नहीं है। यह सही है कि इस समाज को महिलाओं के प्रति अपनी मानसिकता बदलनी चाहिये, लेकिन एक महिला को भी अपनी मानसिकता क्या नहीं बदलनी चाहिये, जिसके कारण वह तथाकथित इज्जत को अपनी जान से भी अधिक महत्वपूर्ण मान बैठती है।

क्या इज्जत का पूरा चक्रव्यूह पुरुष समाज द्वारा इसलिये रचा गया है ताकि महिलाओं को अपने अधीन रखा जा सके। लेकिन हमारा आधुनिक समाज, महिला सशक्तीकरण की बात करने वाले नारीवादी, महिला संगठन, फेसबुक और मोबाइल जैसे आधुनिक आविष्‍कारों का उपभोग करने वाले लोग और हमेशा आधुनिक होने के दावे करने वाली युवा पीढ़ी भी यही मानती है कि महिला या स्त्री को अपनी इज्जत की रक्षा करने के लिये अपनी जान देकर बहादुर बेटी का खिताब हासिल करना चाहिये।

लेखक विनोद विप्लव पेशे से पत्रकार हैं। मोहम्मद रफी की उनकी लिखी जीवनी ‘‘मेरी आवाज सुनो’’ काफी लोकप्रिय हुयी। विभिन्न विषयों पर लिखे उनके आलेख, फीचर, कहानियां एवं व्यंग्य प्रमुख समाचार पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। उनका कहानी संग्रह, सिनेमा और स्वास्थ्य विषयों पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। उनका व्यंग्य संग्रह ‘‘ढिबरी न्यूज चैनल’’ शीघ्र प्रकाशित होने वाला है। बिहार में पांच नवम्बर, 1963 को जन्मे विनोद विप्लव भारतीय जनसंचार संस्थान (नयी दिल्ली) से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा करने के बाद पत्रकारिता से जुड़े। इस समय राष्‍ट्रीय संवाद समिति ‘‘यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया’’ से संबद्ध भारतीय भाषाओं की संवाद समिति ‘‘यूनीवार्ता’’ में विशेष संवाददाता हैं

उत्‍तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री से बड़ा सरकारी डाक्टर!

देहरादून। उत्तराखण्ड में मंत्री से बड़े अधिकारी बेलगाम होकर मंत्रियों के आदेशों को ठेंगा दिखाते नजर आ रहे हैं। यह पहला मामला नहीं है कई मामलों में सरकार के मंत्रियों की अधिकारी एक नहीं सुन रहे। प्रदेश के मुख्यमंत्री भी अधिकारियों की इस चाल से खासे परेशान हैं लेकिन प्रदेश में अधिकारियों की कमी के चलते सीएम का हंटर अभी चलता हुआ नहीं दिख रहा। उत्तराखण्ड में अधिकारियों की एकजुटता सरकार के मंत्रियों को भी कोई काम नहीं करने दे रही।

ताजा मामला उत्तराखण्ड के स्वास्थ्य महकमे का सामने आया है, जिसमें स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी के आदेशों को महानिदेशक स्वास्थ्य द्वारा किस तरह ठेंगा दिखाते हुए नजर अंदाज कर डाला है, जबकि स्वास्थ्य मंत्री ने तत्काल प्रभाव से तबादला आदेश जारी किए थे। इसे अधिकारियों की लाबिंग कहें या फिर मंत्री से बड़ा डाक्टर जिसकी तूती पूरी महकमे में बोलती हुई दिख रही है। गरदपुर में तैनात चिकित्साधिकारी डा. इनायत उल्ला खान कार्यप्रणाली एवं जनता के साथ दुर्व्यवहार के संबंध में शिकायतें प्राप्त हो रही थी और इतना ही नहीं बीते कुछ समय पूर्व स्वास्थ्य मंत्री द्वारा जब गदरपुर के सरकारी अस्पताल में छापा मारा गया था, तब भी कई अनियमितताएं मौजूद मिली थीं। इसके अलावा यह भी पता चला था कि सरकारी डाक्टर के पद पर रहते हुए डा. खान अस्पताल के बजाए अपने प्राइवेट क्लीनिक में मरीजों को देखते हैं। अस्पताल के अन्य कर्मचारियों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाता है, जिसकी शिकायत सीएमओ से उधमसिंहनगर से लेकर डीजी स्वास्थ्य से की गई थी, लेकिन जांच की खाना पूर्ति कर सीएमओ से भी अपने पाले से गेंद को आगे सरका दिया, जबकि बीते कुछ समय पूर्व डा. खान द्वारा अवकाश के दौरान सरकारी आदेश लिखे गए थे।

देहरादून में प्रशिक्षण कार्यक्रम तक में भाग में लिया गया था। इसकी शिकायत गदरपुर अस्पताल में तैनात फार्मासिस्ट विकास ग्वाड़ी द्वारा भी की गई थी। अस्पताल में कई कई अनियमितताओं की तरफ भी इशारा किया गया था, लेकिन बाद में जब सीएमओ उधमसिंहनगर द्वारा फार्मासिस्ट को गदरपुर से तबादला किए जाने की धमकी दी गई तो विकास ने डा. खान से समझौता कर लिया और अधिकारियों को भी यह बताया कि अब अस्पताल में ठीक तरीके से चल रहा है। जबकि इस बात के तमाम सबूत मौजूद हैं कि फार्मासिस्ट विकास द्वारा डा. खान पर आरोप ही नहीं लगाए गए जमीन के एक मामले में लाखों रुपये लिए जाने की खुलासा किया गया था, लेकिन सवाल यह उठ रहा था कि क्या स्वास्थ्य महकमे का एक मंत्री इतना लाचार हो गया है कि उसके आदेशों को स्वास्थ्य महकमे का महानिदेशक भी मानने से इनकार कर रहा है। इससे साबित हो जाता है कि उत्तराखण्ड में कांग्रेस की सरकार के कैबिनेट मंत्रियों की हैसियत अधिकारियों की नजर में कितनी है। जब इस बारे में स्वास्थ्य महकमे के डीजी से उनके दूरभाष नम्‍बर पर बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कई दिनों तक अपना फोन नहीं उठाया जबकि यह तबादला आदेश 11 दिसम्बर 2012 को जारी किया गया है, जिसमें डा. खान को चमोली या पिथौरागढ़ में तत्काल प्रशासनिक आधार पर करने के आदेश स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्र नेगी द्वारा किए गए हैं।

देहरादून से नारायण परगांई की रिपोर्ट.

क्या ‘जागरण’ इस खबर का मतलब समझता है?

मीडिया और अंधराष्ट्रवादी तत्व अपने निहित स्वार्थों और संकीर्ण राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए युद्धोन्माद फैलाने में लगे हुए हैं. ‘दैनिक जागरण’ की एक खबर का शीर्षक है : “बस एक बटन दबा और पाकिस्तान तबाह.” क्या ‘जागरण’ इस खबर का मतलब समझता है? यह गिनने का क्या मतलब है कि भारत के पास २०० परमाणु बम हैं और पाकिस्तान के पास ५० परमाणु हैं? क्या परमाणु युद्ध के मायने वह जानता है और क्या परमाणु युद्ध में कोई विजेता होगा?

ये है जागरण की पूरी खबर…

बस एक बटन दबा और पाकिस्तान तबाह

नई दिल्ली। पाकिस्तान के सैनिकों ने जिस तरह भारतीय सीमा में घुसकर दो सैनिकों के सिर काट दिए उसके लिए बर्बर, दुर्दात, जघन्य जैसे शब्द भी छोटे हैं। पाकिस्तान का दुस्साहस लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पिछले पांच महीने में उसने 26 बार संघर्षविराम का उल्लंघन किया है। इसके मद्देनजर भारत को अपना ढुलमुल रवैया छोड़कर कोई कड़ा कदम उठाना ही होगा। 2008 में मुंबई पर आतंकी हमले के बाद ऐसा महसूस किया जा रहा था कि दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति आ सकती है, लेकिन भारतीय हुक्मरानों की कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण यह टल गया। अब जब दो-तीन साल की तनातनी के बाद माहौल सामान्य हो रहा था तब ऐसे समय में पाकिस्तानी सेना के एक और बर्बर कृत्य ने दोनों देशों के बीच कड़वाहट बढ़ा दी है।

संसद पर हमला, मुंबई हमला और अब ताजा घटना पर जनता का रोष खत्म होता नहीं दिख रहा है। बेशक हम युद्ध नहीं चाहते हैं लेकिन यदि ऐसी परिस्थिति आई तो हम कितने तैयार हैं, आइए करते हैं दोनों देशों की सैन्य शक्तियों की तुलना-

-जहां तक थल सेना की बात है तो भारत के पास 13 लाख सैनिक हैं जबकि पाकिस्तान के पास लगभग सात लाख थल सैनिक हैं। भारतीय वायुसेना के बेड़े में दुनिया की सबसे बेहतरीन लड़ाकू विमान मौजूद हैं। भारत के पास करीब 800 ऐसे विमान हैं जिनमें सुखोई, मिराज, मिग-21, मिग-27, मिग-29 और जगुआर शामिल हैं। पाकिस्तान के सिर्फ 400 लड़ाकू विमान हैं जिनमें चीनी एफ-7, अमेरिकी एफ-16 और मिराज शामिल हैं।

मिसाइलों के मामले में भारतीय सेना पाकिस्तान के मुकाबले काफी आगे है। भारतीय सेना के बेड़े में सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल पृथ्वी, अग्नि, आकाश, ब्रह्मोस, त्रिशूल और नाग जैसी मिसाइलें हैं। पाकिस्तान के पास गौरी, शाहीन, गजनवी, हत्फ और बाबर मिसाइलें हैं। भारत के पास लगभग 200 परमाणु मिसाइलें हैं वहीं, पाकिस्तान के पास लगभग 50 के करीब परमाणु मिसाइलें हैं। भारत के बेड़े में ब्रह्मोस की तकनीक सबसे आधुनिक है और इसे 5 मिनट में दागने के लिए तैयार किया जा सकता है।

इसके साथ ही भारत के पास 27 युद्ध पोत हैं जबकि पाकिस्तान के सिर्फ आठ युद्धपोत हैं। वहीं पनडुब्बी के मामले में भी भारत पाकिस्तान से आगे है। भारत के पास 16 पनडुब्बी हैं तो पाकिस्तान के पास सिर्फ 10 पनडुब्बी। जहां तक परमाणु हथियारों की बात है तो भारत के साथ लगभग 90 परमाणु हथियार हैं वहीं, पाक सेना के पास 50 से ज्यादा परमाणु हथियार हैं।

भारत के परमाणु मिसाइल की जद में पूरा पाकिस्तान आता है। भारत की अग्नि-1 से 5 तक मिसाइलें पांच हजार किलोमीटर तक की मारक क्षमता रखते हैं जिसके जद में इस्लामाबाद तक आता है, जबकि पाकिस्तान गौरी-3 से अधिकतम 3000 किलोमीटर तक मार कर सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने इंटरसेप्टर मिसाइल तकनीक बना ली है। इसके तहत किसी मिसाइल को हवा में ही मारकर गिराया जा सकता है।

आईआईएमसी के शिक्षक Anand Pradhan के फेसबुक वॉल से.

देश में आठ करोड़ ब्राडकास्टर हैं जिनका नियमन संभव नहीं : मनीष तिवारी

सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि मंत्री ने कहा सोशल मीडिया में इतनी अधिक गतिविधियां होती हैं कि उसका नियमन असंभव है। नए मीडिया में कई करोड़ युवा भारतीय हैं और उनमें से हरेक ब्राडकास्टर हैं क्योंकि सबके अपने प्रशंसक हैं। इसलिए आज आप एक ब्राडकास्टर से नहीं, यहां तक कि 852 ब्राडकास्टर से भी नहीं बल्कि संभावित तौर पर आठ करोड़ ब्राडकास्टरों से निपट रहे हैं। तिवारी ने कहा, बाघों को पालतू बनाना ना ही मेरा काम है और ना ही मेरा शौक है और इसे लेकर मुझे कोई भ्रांति नहीं है।

सरकार नए मीडिया में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की रणनीति तैयार करने की योजना बना रही है। यह एक मंच है, अत: अगर आपमें इसे इस्तेमाल करने की सलाहियत है तो सरकार में भी है और यह सरकार की मूर्खता होगी अगर वह इस अवसर को हाथ से जाने दे।

तिवारी ने कहा कि भारतीय मीडिया बाहरी नियंत्रण नहीं चाहता है इसलिए इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट तथा सोशल मीडिया को अपनी समस्याओं का हल खुद तलाशना चाहिए। तिवारी ने कहा, क्या भारतीय मीडिया नियमन के लिए तैयार है? मेरा मानना है कि जवाब ना है। जिस पल सरकार कोई कदम, यहां तक कि वित्तीय मामलों में भी कोई वाजिब प्रयास करेगी तो प्रेस क्लब से लेकर साउथ ब्लॉक परिसर तक प्रदर्शन शुरू हो जाएगा। मंत्री से पूछा गया था कि क्या बाजारों से जुड़ी खबरों का नियमन होना चाहिए क्योंकि इससे जुड़ी किसी भी तरह की गलत सूचना कई लोगों को प्रभावित करती है।

उन्होंने कहा कि सरकार और मीडिया की भूमिका पूरक की होती है लेकिन साथ ही उनके बीच एक खास तरह का विरोधात्मक संबंध भी रहता है। तिवारी ने कहा, अब आप दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाकर रखते हैं। जिस पल मैं रेखा को पार करूंगा आप मुझ पर धौंसपट्टी का आरोप लगाएंगे। भले ही यह मेरा इरादा नहीं हो। सूचना प्रसारण मंत्री ने कहा, इसलिए हमें उस संतुलन को बनाए रखना होगा और हम दोनों को अपनी 'लक्ष्मण रेखाओं' में रहना होगा। मीडिया को वास्तव में आत्मनिरीक्षण करने और दोषों का समाधान तलाशने की जरूरत है।

भास्‍कर में फिल्‍म संपादक बने आलोक, ‘लक्ष्‍य’ बंद होगा और जयपुर से छपेगा रसरंग

अहा जिंदगी से खबर है कि आलोक श्रीवास्‍तव की जिम्‍मेदारियां बढ़ा दी गई हैं. वे अहा जिंदगी के साथ दैनिक भास्‍कर के फिल्‍म संपादक भी बना दिए गए हैं. आलोक लम्‍बे समय से अहा जिंदगी के साथ जुड़े हुए थे तथा इसे अलग पहचान दी. आलोक ने अपने करियर की शुरुआत 1990 में धर्मयुग के साथ की थी. इसके बाद वे कई संस्‍थानों को सेवा देते हुए भास्‍कर पहुंचे थे, जहां उन्‍हें अहा जिंदगी की जिम्‍मेदारी दी गई थी. उनकी काबिलियत को देखते हुए प्रबंधन ने अब उन्‍हें नई जिम्‍मेदारी सौंप दी है.

उधर, भास्‍कर समूह करियर और एजुकेशन पर आधारित अपनी पत्रिका 'लक्ष्‍य' का प्रकाशन बंद करने जा रहा है. खबर है कि इस पत्रिका को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई. बाजार में मौजूद दूसरी प्रतियोगी पत्रिकाओं में काफी कोशिश के बाद भी 'लक्ष्‍य' अपना लक्ष्‍य हासिल नहीं कर पाया. लगातार गिरते प्रसार के चलते प्रबंधन ने अब इस पत्रिका को बंद करने का निर्णय ले लिया है. यह पत्रिका प्रशासनिक सेवाओं के साथ रेलवे व अन्‍य प्रतियोगी परीक्षाओं को ध्‍यान में रखकर प्रकाशित किया जा रहा था. पर अन्‍य पत्रिकाओं की तुलना में कंटेंट लेबल पर यह पत्रिका उन्‍नीस साबित हो रही थी, जिसके चलते पाठकों का रुझान इस पत्रिका को नहीं मिल पाया.

वहीं दूसरी खबर यह है कि भास्‍कर अब मुंबई से प्रकाशित होने वाले रसरंग का प्रकाशन सेंटर भी चेंज कर दिया है. प्रबंधन अब रसरंग का प्रकाशन जयपुर से करेगा. इसके लिए एक आंतरिक मेल भी जारी कर दिया गया है. मेल में बताया गया है कि रसरंग सप्‍लीमेंट को अहा जिंदगी की टीम बनाएगी. गौरतलब है कि अहा जिंदगी की टीम की कुशलता के चलते ही यह पत्रिका भास्‍कर समूह की ज्‍यादा बिकने वाली पत्रिका बनती जा रही है. इसमें आलोक श्रीवास्‍तव के साथ चंडीदत्‍त शुक्‍ला जैसे पत्रकार शामिल हैं.
 

श्रीकांत जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय तब हुआ जब मैं उत्तरांचल प्रान्त प्रचार प्रमुख बना

: श्रद्धांजलि : श्रीकांत जी के निधन का समाचार सुनकर मन को गहरा आघात पहुंचा। अभी 22 दिसंबर 2012 को ही उनसे प्रयाग में हिन्दुस्थान समाचार के निदेशक मंडल की बैठक में मुलाकात हुई थी। उस मुलाकात की अनुभूति अभी बिल्कुल ताजी है। सब कुछ सामान्य लग रहा था, हां थोड़ी अस्वस्थता दिख रही थी। लगा कि सर्दी के मौसम तथा अधिक आयु के कारण कुछ खांसी जुकाम जैसी हल्की फुल्की बात है। बैठक में पूरे दिन सभी सत्रों में पूरी सक्रियता से उन्होंने भाग लिया तथा सभी आए हुए कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत वार्ता भी करते रहे।

श्रीकांत जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय सन-2000 से था, जब से मैं उत्तरांचल प्रान्त प्रचार प्रमुख बना। नया प्रान्त बनने के कारण विश्व संवाद केन्द्र व जागरण पत्र और प्रचार विभाग की सभी गतिविधियों को मैंने उनके ही मार्गदर्शन में प्रारंभ किया। विश्व संवाद केन्द्र उत्तरांचल का उद्घाटन उनके ही कर-कमलों से 2001 में हुआ। प्रचार विभाग की अखिल भारतीय बैठक में सदैव उनका सान्निध्य मार्गदर्शन मिलता रहा। बाद में जब उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार के पुनरोत्थान का संकल्प लिया तब भी उत्तरांचल में हिन्दुस्थान समाचार का कार्य करने का दायित्व उन्होंने मुझे ही सौंपा। शनैः शनैः हिन्दुस्थान समाचार जिस प्रकार अखिल भारतीय स्तर पर आकार लेने लगा उसी प्रकार उत्तरांचल में भी गति पकड़ने लगा। हिन्दुस्थान समाचार का दायित्व संभालने के पश्चात उनसे निकटता और बढ़ गई। अखिल भारतीय स्तर पर निदेशक मंडल का गठन करते समय उन्होंने मेरा नाम निदेशक मंडल के सदस्य के नाते तय कर दिया यद्यपि न तो मेरी पात्रता थी और न ही इच्छा।

एक सामान्य नियम है कि जब तक किसी व्यक्ति से सहज स्वाभाविक रूप से मिलना-जुलना संपर्क संबंध रहता है तब तक व्यक्ति की विशेषता भी सामान्य सी लगती है, परन्तु व्यक्ति के चले जाने के बाद सामान्य सी लगने वाली विशेषताएं असामान्य हो जाती हैं। मानस पटल पर व्यक्ति के साथ बिताए छण संस्मरण के रूप में उभरने लगते हैं। श्रीकांत जी का पिछले वर्ष अमृत महोत्सव दिल्ली में हिन्दुस्थान समाचार की ओर से मनाया गया था तो सभी ने उनकी दीर्घायु होने की कामना की थी स्वार्थ के कारण। हम सबका स्वार्थ था कि श्रीकांत जी को ईश्वर लंबी आयु दे ताकि हिन्दुस्थान समाचार के पुनरोत्थान की प्रक्रिया पूर्ण होकर यौवनावस्था तक पहुंच जाए। श्रीकांत जी के पास हिन्दुस्थान समाचार के अतिरिक्त भी कई संगठनों का पालक और अनेक जिम्मेदारियां थी, वह सब यशस्वी हो, उनका मार्गदर्शन चिरकाल तक मिलता रहे यही हम सबकी सामूहिक इच्छा थी।

श्रीकांत जी ने 50 वर्ष से अधिक राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के प्रचारक के रूप में जीवन जिया। उन्होंने सदैव चुनौतियों से भरा दायित्व संभाला। असम संघ दृष्टि से बहुत दुर्गम क्षेत्र है, चुनौतियों से भरा है और अनेक समस्याओं से ग्रसित है। ऐसे क्षेत्र में वे विभाग प्रचारक और प्रान्त प्रचारक के दायित्व का निर्वहन किया। 25 वर्ष का एक लंबा कालखंड उन्होंने विभिन्न दायित्वों को संभालते हुए असम में बिताया। असम में विद्या भारती के विस्तार, असम आन्दोलन (1979-85) को ठीक दिशा देने तथा संघ कार्य के विस्तार आदि सभी कठिन कार्यों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

1987 से 1996 तक बाला साहब देवरस तृतीय सरसंघचालक के निजि सहायक के रूप में भी उनका कार्यकाल उत्कृष्ठ रहा। बाला साहब के सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होने पर भी उनके जीवनपर्यन्त साथ रहे यह उनकी अटूट निष्ठा का परिचायक है। 1994 में संघ में दो नया आयाम संपर्क और प्रचार विभाग शुरू हुआ। प्रचार विभाग बिल्कुल नया काम संघ की प्रवृत्ति से भिन्न तथा पूर्णतः तकनीकि कार्य है। श्रीकांत जी 1997 में अ.भा. प्रचार प्रमुख घोषित हुए। उन्होंने प्रचार विभाग की कल्पना को स्पष्ट किया, प्रचार विभाग के तंत्र को खड़ा किया प्रचार विभागान्तर्गत विभिन्न गतिविधियां जागरण पत्र आदि की कार्य योजना तैयार की तथा पूरे देश में प्रचार विभाग का नेटवर्क खड़ा किया। ये सब कार्य परंपरागत कार्य नहीं थे बल्कि चुनौतीपूर्ण कार्य थे। शून्य से सृष्टि निर्माण करने जैसा था।

सबसे बढ़ कर दुरूह कार्य उन्होंने किया मृतप्राय हिन्दुस्थान समाचार को पुनर्जीवित करने का। हिन्दुस्थान समाचार कभी देश का प्रथम क्रमांक का समाचार संवाद समिति थी। हिन्दुस्थान समाचार का ही गौरव था कि इसके पास हिन्दी टेलीप्रिंटर था। 1975 के आपात काल के दौरान मीडिया का गला घोंटा गया। जिसका पहला शिकार हिन्दुस्थान समाचार बना। राष्ट्रीय विचार की प्रमुख न्यूज एजेंसी होने के कारण प्रजातंत्र का गला घोंट कर निरंकुश तानाशाही स्थापित करने वाली प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने समस्त न्यूज एजेंसी की स्वतंत्रता को समाप्त कर सभी को एक कर एक नई सरकारी न्यूज एजेंसी (समाचार) गठित की। हिन्दुस्थान समाचार का संपूर्ण तंत्र ध्वस्त हो गया था। किसी को भी स्वप्न में भी आशा नहीं थी कि हिन्दुस्थान समाचार पुनः खड़ा होगा। कुछ भी नहीं बचा था परंतु श्रीकांत जी की जिद चुनौतियों से खेलने का शौक, हृदय में राष्ट्रीयता की आग के कारण केवल 5-6 वर्षों में ही हिन्दुस्थान समाचार का तंत्र केवल भारत में ही नहीं नेपाल, मॉरीशस और थाईलैंड में भी खड़ा हो गया।

काश वे कुछ वर्ष भी और रहते हिन्दुस्थान समाचार न केवल पुराने वैभव को प्राप्त करता बल्कि नई ऊचांइयों को छूता। न केवल हिन्दुस्थान समाचार की चिंता उन्होंने किया बल्कि समस्त पत्रकार जगत की भी चिंता की। उन्हीं की प्रेरणा से 2005 में राष्ट्रीय संपादक परिषद का गठन भोपाल में हुआ, जिसमें देश के सभी राष्ट्रीवादी पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों को एक मंच पर लाने और पत्रकार जगत में राष्ट्रवाद स्थापित हो यह उद्देश्य था। पत्रकारों की व्यक्तिगत चिंता तथा अच्छे पत्रकार, लेखक व छायाकारों को सम्मान मिले इस दृष्टि से उन्होंने एक पत्रकारिता कल्याण न्यास की भी स्थापना किया। न्यास की ओर से प्रतिवर्ष तीन पुरस्कार महिला पत्रकारिता के क्षेत्र में आशा रानी वोहरा पुरस्कार, छाया चित्र पत्रकारिता में दादा साहब आप्टे पुरस्कार और सामान्य पत्रकारिता में बापू राव लेले पुरस्कार दिया जाता है।

हिन्दुस्थान समाचार को हर प्रांत में खड़ा करने तथा सभी भारतीय भाषाओं में समाचार संकलन तथा संप्रेषण की तकनीक खड़ा करने हेतु प्रचुर मात्रा में धन की आवश्यकता थी और अभी भी है, इस नाते उनका ध्यान सदैव धन संग्रह पर रहता था। कभी कभी उनके साथ मुझे जब किसी से मिलने जाना होता था और वे मुख्य रूप से धन की बात करते थे तो मेरे मन में लगता था, भाई साहब केवल पैसे की बात करते हैं। उनके असामयिक निधन से केवल संघ विचार परिवार को ही नहीं बल्कि मीडिया जगत में भी एक रिक्तता निर्माण हुई है। सभी को मिलकर उस रिक्तता को भरना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनके इस तरह से अचानक जाने पर किसी शायर की दो पंक्तियां याद आती है कि बड़े गौर से सुन रहा था जमाना तुम्ही सो गए दास्तां कहते-कहते।

लेखक लक्ष्मी प्रसाद जायसवाल वरिष्ठ अधिवक्ता व समाजसेवी है.

शहीद बाबूलाल की अंत्‍येष्टि के बाद उपजे सवाल दर सवाल

झारखंड में नक्सलियों के हाथों शहीद हुए इलाहाबाद के सपूत बाबूलाल की अंत्‍येष्टि पैतृक गांव शिवलाल के पूरा के पास स्थित श्रृंग्वेरपुर गंगाघाट पर हो गई। हजारों की संख्या में जुटे लोगों ने गम, गुस्सा के माहौल में आंसुओं से नम आंखों से शहीद बाबूलाल को आखिरी विदाई दी। झारखंड के लातेहार जिले में सीआरपीएफ चौकी पर तैनात बाबूलाल पटेल (26 वर्ष) नक्सलियों की गोलियों का शिकार हो गया। 11 जनवरी को दोपहर डेढ़ बजे जैसे ही शहीद का शव नवाबगंज क्षेत्र स्थित पैतृक आवास शिवलाल का पूरा गांव पहुंचा, उपस्थित नौजवानों के जोशीले नारे फिजाओें में गूंजे- ‘बाबूलाल की यह कुर्बानी, याद करेगा हिंदुस्तानी।’

जिस बेटे को छुट्टी पूरी होने के बाद महीने भर पहले दिसंबर में ड्यूटी वापसी पर माता जगपती देवी, पिता मुन्नीलाल और पत्नी रेखा ने घर से विदा किया था, अचानक उसकी लाश की वापसी देख उनका कलेजा मुंह को आ गया। परिवार का इकलौता चिराग बुझ गया। पांच बहनों के बीच इकलौता भाई, दस महीने पहले ब्याह कर ससुराल आई चार माह की प्रेगनेंट रेखा के सामने अंधेरा ही अंधेरा है। महज एक बीघे से भी कम खेत पर किसी तरह गुजर-बसर करने वाले परिवार के सामने अनिश्चय भविष्‍य मुंह बाए खड़ा है। आसपास के गांव वालों, इलाकाई नेताओं का दरवाजे पर आकर सांत्वना देने की औपचारिकता का निर्वाह हो रहा है।

उपेक्षा और लापरवाही दर लापरवाही : शहीद बाबूलाल की मौत ने केंद्र, प्रदेश सरकार से लेकर सीआरपीएफ के अफसरों की लापरवाही की पोल खोल दी है। दिल्ली, बलिया और मथुरा जाकर सांत्वना व्यक्त करने वाले सीएम अखिलेश यादव शिवलाल का पूरा गांव भूल गए। यह वही ‘माटी का लाल’ है जिसे नक्सलियों ने गोली मारी, बाद में पेट फाड़ने के बाद भीतर ढाई किलो का बम प्लांट कर दिया था। जवानों के शव पर बम फिट करने की शायद यह पहली वारदात है।

घटना की पुष्टि के बाद जिस दिन शहीद के घर मातम था। पूरा देश मीडिया के जरिए जान गया पर क्षेत्रीय सांसद बसपा के कपिलमुनि करवरिया और सत्ताधारी दल से चुने गए विधायक अंसार अहमद शहीद के शवयात्रा तक में शामिल न हो सके। जिस समय इलाके के सैकड़ों ग्रामीण शहीद के दरवाजे पर सांत्वना देने इकट्ठा हुए थे।

उसी समय इलाकाई विधायक अंसार अहमद सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ शहीद के घर के बगल एक किमी दूर नवाबगंज हाइवे के पास पार्टी के रसूखदार नेता सीएम के चचेरे भाई व सांसद धर्मेंद्र यादव का माल्यार्पण कर उनकी शान में कसीदे काढ़ने के लिए डंटे हुए थे। शहीद के घर आने की जरूरत किसी सपाई ने नहीं समझी। तीन दिन बाद झारखंड से शव आने के बाद उठी शवयात्रा में केंद्र, प्रदेश सरकार का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं हो सका। 12 जनवरी को मीडिया की खिंचाई के बाद इलाकाई सांसद और विधायक शहीद के दरवाजे पर सांत्वना देने पहुंचे।

सात जनवरी को नक्सलियों की गोलियों से घायल बाबूलाल ने पत्नी को फोन पर बताया था कि नक्सलियों से मुठभेड़ में वह घायल हो गया है। चार गोलियां लगी हुई हैं। फोन से जानकारी मिलने के बाद बाबूलाल की पत्नी घबड़ा गई। घर में कोहराम मच गया। खबर जंगल में आग की तरह फैली। आसपास के लोग दरवाजे पर जुट आए। इसके बाद बाबूलाल के फोन का संपर्क टूट गया।

सीआरपीएफ अफसरों को बाबूलाल के पिता ने कई बार फोन लगाकर इकलौते बेटे का कुशलक्षेम जानना चाहा पर फोन बार-बार काट दिया। कई घंटे की लगातार कोशिशों के बाद डिप्टी कमांडेट ने बाबूलाल के पिता मुन्नीलाल को बताया कि बाबूलाल को गोली नहीं लगी है। मुन्नीलाल ने रोते हुए फरियाद की, ठीक है साहब उससे बात करा दो। इस पर मुन्नीलाल को बताया गया कि वह लापता है, उसे खोजा जा रहा है। सात से लेकर दस जनवरी की दोपहर तक बाबूलाल के परिजनों को कोई जानकारी तक नहीं दी गई। शहीद के परिजनों और नातेदारों का तीन दिनों में एक एक पल पहाड़ सरीखे बीता। दस जनवरी को दोपहर बाद सीआरपीएफ की तरफ से शहीद के घर सूचना भेजी गई।

क्या राजकीय सम्मान का मतलब यही है?

शहीद का शव मकान की उस डेहरी तक नहीं पहुंच सका, जिस डेहरी पर बाबूलाल पला बढ़ा और जवान हुआ। वजह, घर तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता ही नहीं है। शहीद की शवयात्रा में शामिल हुए हजारों लोग जिसमें कई जनप्रतिनिधि, अफसर भी थे, उनको नापदान के कीचड़ और उससे उठती दुर्गंध के चलते नाक दबाकर निकलने को मजबूर होना पड़ा। स्थानीय प्रशासन बुनियादी इंतजाम तक नहीं कर सका। इतना ही नहीं, चिता की लकड़ी तक का इंतजाम शासन-प्रशासन नहीं कर सका। आखिर में घर वालों को चिता की लकड़ी जुटानी पड़ी।

…और बगल से निकल गए प्रो. रामगोपाल

धर्मेंद्र यादव की ही तरह सपा के बड़े नेता, मुलायम सिंह के भाई और मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह के चाचा प्रो. रामगोपाल यादव शहीद के घर के बगल लखनऊ-इलाहाबाद राजमार्ग से गुजर गए। 12 जनवरी को विधायक अंसार अहमद शहीद के दरवाजे पर बैठे सांत्वना दे रहे थे, उसी समय खबर पहुंची कि प्रो. यादव शहीद के दरवाजे आ सकते हैं। लोग इंतजार करते रहे और प्रो. यादव के गाड़ी का काफिला हूटर बजता हुआ गुजर गया। परिजनों के जिक्र करते ही चौंकते हुए विधायक ने ही उल्टे सवाल कर दिया-क्या प्रोफेसर साहेब इधर आ रहे हैं। बाद में जिलाध्यक्ष पंधारी यादव से प्रो. रामगोपाल यादव के इलाहाबाद में होने की पुष्टि फोन पर की।

परिजनों की इच्छा

शहीद बाबूलाल के परिजन, नातेदार से लेकर गांव के संगी-साथी तक चाहते हैं कि मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह को शिवलाल का पूरा गांव आकर सांत्वना दें। शहीद की याद में गांव में शहीद स्मारक बने और हर साल यहां शहीद की याद में मेला लगे। ग्राम प्रधान संजय तिवारी स्मारक स्थल के लिए जमीन देने को तैयार हैं। देखिए यहां के लोगों की यह इच्छा कब तक पूरी हो पाती है।

शहीद के गांव से लौटकर शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

दैनिक भास्कर के पत्रकार रविकांत को खतरनाक बीमारी, आपकी मदद चाहिए

दैनिक भास्कर, ग्वालियर के पत्रकार रविकांत युवा, विनम्र और ईमानदार पत्रकार हैं. किस्मत ने उनके साथ कुछ ऐसा खेल किया है कि वे इन दिनों बुरी स्थिति में हैं. रविकांत को जी.बी.एस यानि गुलियन बारी सिंड्रोम नामक बीमारी हो गई है. पूरे शारीर को सुन्न कर देने वाली यह बीमारी बेहद खतरनाक है. इलाज कर रहे ग्वालियर के डॉक्टर जब मायूस हो गए तो उन्हें दिल्ली भेज दिया. रविकांत को दिल्ली में सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया है. यहां रविकांत पिछले करीब 20 दिन से भर्ती हैं. उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया है.

रविकांत

भास्कर परिवार के लोग और उनके संगी साथी हर तरह की मदद में जुटे हुए हैं ताकि अपने परिवार का चहेता रविकांत फिर से नार्मल जिंदगी जी सके, पत्रकारिता कर सके और अपनी पत्नी का साथ जीवन भर निभा सके. रविकांत की पत्नी गर्भवती हैं पर पति की खतरनाक बीमारी से वह सदमें में हैं.

रविकांत को इलाज के लिए काफी पैसों की जरूरत है. उनके अपने लोगों ने अब तक भरपूर कोशिश की है कि आर्थिक संकट न आए लेकिन महंगे इलाज के कारण संसाधन खत्म होते जा रहे हैं. ऐसे में अब मीडिया और मीडिया से बाहर के सभी लोगों के मदद की दरकार है.

रविकांत की बीमारी के बारे में गंगाराम अस्पताल के डाक्टरों की राय नीचे प्रकाशित है. रविकांत का बैंक एकाउंट भी नीचे दिया जा रहा है. रविकांत की मदद के लिए परिजनों की तरफ से जारी एक अपील भी नीचे प्रकाशित है. दिल्ली के पत्रकार साथियों से अपील है कि वे अपने स्तर पर सक्रिय होकर रविकांत को यथासंभव सरकारी और गैर-सरकारी मदद कराने की कोशिश करें. रविकांत का बैंक एकाउंट नंबर ये है-


Ravikant Saini

IDBI Bank

Ac 0056104000318075

Achleshwar road

Gwalior


रविकांत के बारे में ज्यादा जानने के लिए इन नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है…

Mobille No-

09826274134

09926283168


‘बालिका वधू’ नंबर वन, ये हैं टाप टेन टीवी प्रोग्राम

30 दिसंबर से 5 जनवरी के बीच यानी नए साल के पहले सप्ताह कलर्स पर प्रसारित शो 'बालिका वधू' टॉप पर रहा। आनंदी की शादी के बाद उसका ससुराल और जगदीश की लाइफ में एक नई लड़की की एंट्री होने और कहानी को नया मोड़ देने के कारण इस शो में कई उतार-चढ़ाव आ रहे हैं जो कि दर्शकों को लगातार अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। अब आनंदी का मेकओवर भी कर दिया गया है, आनंदी अब राजस्‍थानी ड्रेस के बजाय साड़ी में दिखाई देती है।

स्टार प्लस पर प्रसारित शो 'दिया और बाती' इस सप्ताह नंबर दो पर रहा। इस शो में जहां सलमान खान ने अपनी दबंगई दिखाई थी, वहीं शो में कई और फिल्मी सितारे अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए आते रहते हैं जिससे दर्शकों का शो में लगातार इंटरेस्ट बना रहता है। स्टार प्लस पर ही प्रसारित हो रहा शो 'ये रिश्ता क्या कहलाता है' नंबर तीन की पोजीशन पर है। इसी चैनल पर आने वाला शो 'प्यार का दर्द' भी टॉप 10 में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गया है।

स्टार प्लस पर आने वाला डांस रियलिटी शो 'नच बलिए सीजन 5' इस सप्ताह अपनी नंबर चार में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा है। इसका एक कारण शो में राहुल महाजन और डिम्पी, सानिया मिर्जा और शोएब, दीपशिख और केशव जैसी जोड़ियों का होना भी माना जा रहा है। न्यूली मैरिड जोड़ियों के डांस को दर्शक खूब पसंद कर रहे हैं। जी टीवी पर प्रसारित धारावाहिक 'सपने सुहाने लड़कपन के' इस फेहरिस्त में नंबर पांच पर रहा। वही स्टार प्लस पर प्रसारित शो 'साथ निभाना साथिया' नंबर छह पर है।

सब टीवी पर प्रसारित कॉमेडी शो 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' नए साल के पहले सप्ताह में नंबर सात की पोजीशन पर है। यानी दर्शक कॉमेडी शोज को भी खूब पसंद रहे हैं। कलर्स पर प्रसारित शो 'ससुराल सिमर का' में नया ट्विस्ट आ गया है। अब रोली को जहां एक और अपनी पति से तलाक लेने की नौबत आ रही है वहीं खुशी सारी प्रोपर्टी अपने प्रेमी के नाम कर रही है। शो का ये ट्विस्ट और रोली के षड्यंत्र के चलते शो की रेटिंग काफी बढ़ गई है जिससे शो आठवें नंबर की रैंक पर है।

कलर्स पर प्रसारित 'मधुबाला' में मधु के पिता बलराज के वापिस आने और मधु की बहन को फिल्म मिलने, मधु की मां की शादी की तैयारियां चलने जैसे कई और ट्विस्ट आने से शो टॉप 10 में जगह बनाने में कामयाब रहा। टॉप 10 के अलावा सीआईडी, केबीसी, बिग बॉस, क्राइम पेट्रोल, देवो के देव म‌हादेव, फीयर फाइल्स और उतरन जैसे रियलिटी और नॉन रियलिटी शोज टॉप 20 की रैकिंग में अपनी जगह बनाने में कामयाब हुए हैं।
 

अवनीश सिंह चौहान को सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार

जयपुर। जयपुर के भट्टारकजी की नसियां स्थित इन्द्रलोक सभागार में पं. झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यान समारोह का भव्य आयोजन किया गया। आयोजन का शुभारम्भ माँ सरस्वती के समक्ष जनरल वी.के. सिंह जी और गुलाब कोठारी जी द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता एवं विशिष्ट अतिथि पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह रहे जबकि पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी जी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। तत्पश्चात जनरल वी के सिंह जी और गुलाब कोठारी जी के कर-कमलों से अवनीश सिंह चौहान को सम्मानित किया गया।

पत्रिका का वार्षिक 'सृजनात्मक साहित्य सम्मान-2013 के अंतर्गत श्री चौहान को 11000 रू. नकद, सम्मान पत्र और श्रीफल प्रदान किया गया। राजस्थान पत्रिका की ओर से हर साल दिए जाने वाले सृजनात्मक साहित्य पुरस्कारों की घोषणा पहले ही कर दी गई थी। कविता में पहला पुरस्कार युवा कवि अवनीश सिंह चौहान के गीतों को दिया गया। इटावा में जन्मे अवनीश सिंह चौहान युवा कवियों में अपना अहम स्थान रखते हैं। हमलोग परिशिष्ट में प्रकाशित उनके तीन गीत- 'किसको कौन उबारे', 'क्या कहे सुलेखा' तथा 'चिंताओं का बोझ- ज़िन्दगी' आम आदमी के संघर्ष और रोजी-रोटी के लिए उसके प्रयासों को रेखांकित करते हैं और भी कई अनकही पीड़ाओं को बयां करते हैं उनके गीत। अब अवनीश के ये गीत उनके सधः प्रकाशित संग्रह 'टुकड़ा कागज़ का' में संकलित हैं।

इस अवसर पर अपने वक्तव्य में जनरल सिंह ने कहा- "दिनकर जी की रचनाएँ आज भी उन्हें प्रेरणा देतीं हैं। कविताओं में जीवन को सुन्दर बनाने की शक्ति होती है।" कोठारी जी ने कहा- "आज लोग संवेदनहीन हो गए हैं उनमें सम्वेदना जगाने की जरूरत है।"

उल्लेखनीय है कि इस साल कविता में दूसरा पुरस्कार प्रीता भार्गव को दिया गया। कहानी में पहला पुरस्कार राहुल प्रकाश को तथा दूसरा पुरस्कार कथाकार मालचंद तिवाड़ी को दिया गया। पुरस्कार पत्रिका समूह के परिशिष्टों में वर्ष भर में प्रकाशित कविताओं और कहानियों के लिए दिए जाते हैं। इस साल कहानी और कविता के निर्णायक मंडल में मशहूर व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी, प्रसिद्ध कथाकार हबीब कैफी और प्रफुल्ल प्रभाकर तथा जस्टिस शिवकुमार शर्मा, अजहर हाशमी और प्रोफेसर माधव हाड़ा थे। पत्रिका समूह की ओर से दिए जाने वाले सृजनात्मक साहित्य पुरस्कारों के क्रम में यह सत्रहवें पुरस्कार हैं। ये पुरस्कार 1996 से शुरू किये गये थे।

इस अवसर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले राजस्थान पत्रिका के पत्रकारों को भी सम्मानित किया गया था। कार्यक्रम में शहर के कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे। विशेष सहयोग रहा आनंद जोशी, चाँद मोहम्मद, डॉ दुष्यंत, शालिनीजी एवं वर्षाजी का रहा और आभार अभिव्यक्ति सुकुमार वर्मा ने की।

प्रेस विज्ञप्ति

प्रभात खबर ने महात्मा गांधी को ‘चर्चित राष्ट्रपति’ बताया!

12 जनवरी के प्रभात खबर, पटना में शहर में महात्मा गांधी की प्रमिता अनावरण को लेकर एक खबर छपी। इसकी पहली पंक्ति देखिए- ‘‘26 जनवरी को गांधी मैदान में चर्चित राष्ट्रपति महात्मा गांधी की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया जाना है ……’’ इन पंक्तियों में इस तरह से गलत टाइपिंग या छपाई की गुंजाइश भी नजर नहीं आती, जो कि राष्ट्रपिता से चर्चित राष्ट्रपति हो जाए।

इस रिपोर्ट में यों तो गलतियां और भी हैं, पर अभी बात सिर्फ तथ्यपरक गलतियों की। यह अखबार के खास पेज- प्रभात खबर लाइफ@पटना की उस दिन की प्रमुख खबर थी। अन्य अखबारों में खबरों में भी कई बार गलतियां देखने को मिलती हैं। इन दिनों अक्सर ही अखबार पढ़ते हुए ऐसा देखने को मिलता है। जबकि एक खबर, लिखे जाने से लेकर छप जाने तक कई नजरों से होकर गुजरता है।

गलतियों हो जाती हैं या कई मुद्दों पर जानकारी का अभाव हमें अच्छे अच्छे लोगों में देखने को मिलता हैं, लेकिन तथ्य से संबंधित इस तरह की भयंकर गलतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसे हम क्या कह सकते हैं ? संवाददाता की कम जानकारी, संपादक का अनदेखापन, पेज इंचार्ज की गैर जिम्मेवारी या फिर यह सभी कुछ?

सच्चाई है कि आज हमें कई खबरें पढ़ने या देखने को मिलती हैं, जो तथ्यात्मक या भाषाई तौर पर गलत होते हैं। खासकर जब बात एक पत्रकार की की जाए तो सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है? पत्रकारों का सामान्य ज्ञान कम क्यों होता जा रहा है? कम से कम खुद लिखे जाने वाले खबरों के बारे में उसका सामान्य ज्ञान इतना तो होना चाहिए। आज जब देश भर में जगह-जगह पत्रकारिता की पढ़ाई होने लगी है और पत्रकारिता की डिग्री वालों को ही किसी मीडिया में जगह दी जाती है- ये सवाल और भी प्रासंगिक हैं।

पटना से लीना की रिपोर्ट.

अखिलेश सरकार के राज में इन अफसरों को प्रमोशन मिलेगा!

पिछले कुछ दिनों से सत्ता के केंद्र मुख्यमंत्री कार्यालय में हलचल काफी तेज है। सूचना आ रही है कि राज्य की अखिलेश सरकार कुछ आईपीएस व आईएएस अधिकारियों को इसी माह के अंत तक प्रोन्नति देने जा रही हैं। इस प्रोन्नति के संदर्भ में कहा जा रहा है कि ये विभागीय प्रोन्नति है जो एक निश्चित समय पर किसी भी अधिकारी को उसके सेवाकाल में मिलती हैं।

पर यहाँ जो एक अहम् प्रश्न खड़ा है वो ये है कि यदि अधिकारियों को मिलने वाली प्रोनत्ति रूटीन प्रोनत्ति का हिस्सा है तो फिर ये प्रोन्नति उन्ही क्यों मिल रही है जो सत्ता के करीब है। जबकि अगर हम अधिकारियों की सूची देखें तो पता चलेगा कि तमाम ऐसे भी अधिकारी है जो प्रोनन्ति पाने के पात्र है फिर भी उन्हें पिछले कई वर्षो से प्रोनत्ति नहीं मिली।  इस कड़ी में सबसे पहला नाम आईपीएस अधिकारी डी.डी मिश्रा का है जिन्हें तत्कालीन माया सरकार ने केवल इसलिए पागल घोषित कर अस्पताल पहुचने की कोशिश की क्योकि उन्होंने माया सरकार के तमाम घोटालो पर से पर्दा उठाना शुरू कर दिया था। दूसरा नाम 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं जसबीर सिंह का है। जसबीर सिंह भी सत्ताधारी पार्टियों की अवहेलना के शिकार है, उन्हें भी पिछले छह-सात सालों से प्रदेश के शीर्ष पर राज करने वाली पार्टियों ने प्रोन्नति नहीं दी क्योकि जसबीर सिंह ने राजनीतिक नेतृत्व की चापलूसी करने की बजाये ये जनता की हितों को तरजीह देना ज्यादा बेहतर समझा। अब इस कड़ी एक और बड़ा नाम जुड़ चुका है,  1992 बैच  के ही आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर का जिन्हें पिछले कई वर्षो से पुलिस अधीक्षक के पद पर ही लटकाये रखा गया है। सूचना है की इस बार भी 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को  पदोन्नति नहीं दी जा रही क्योंकि उन्होंने कभी भी अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया। इतना ही नहीं उन्होंने तो कई बार सच्चाई की हिफाजत में प्रदेश सरकार के खिलाफ भी अपनी आवाज बुलंद की। यही कारण कि चाहे मायावती की सरकार रही हो या मुलायम की वो हमेशा सरकार की आँखों की किरकिरी बने रहे। ठीक इसके विपरीत उन्ही के साथ के तमाम आईपीएस अधिकारी आज प्रोन्नति पाकर पुलिस उप-महानिरीक्षक के पद पर पहुच गएँ। इतना ही नहीं ऐसे नौकरशाहों की भी एक लम्बी लिस्ट है जो रिटायर्ड हो कर भी सरकारी पदों पर बैठ कर मलाई काटने में लगे रहते हैं। मलाई काटने वाले ऐसे नौकरशाह आम तौर पर अपनी योग्यता के बजाये सरकारों के साथ अपनी वफादारी के बदले में ऐसे इनाम पाते हैं।
सरकारों की मनमर्जी के शिकार होने वाले अधिकारियों में ऐसा नहीं है कि सिर्फ आईपीएस अधिकारी ही है।  कई आईएएस भी हैं जो राजनैतिक कुंठा का शिकार हुए है। जिनमे सबसे प्रमुख नाम राज्य के वरिष्ठतम आईएएस अधिकारियों में से एक विजय शंकर पांडेय हैं। इनकी वरिष्ठता का आलम यह है कि इन्हें मुख्य सचिव के रैंक तक होना चाहिए। पर अफ़सोस की ये आज भी महत्वहीन पद पर ही हैं। पांडे के करीब रहे एक अन्य नौकरशाह बताते हैं कि विजय शंकर पांडे ने सरकार के विरुद्ध किये गये एक पीआईएल को अफिडेविट कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि सरकार ने उन्हें अपने निशाने पर ले लिया। इसी तरह 1986 में यूपी के ही आईएएस अधिकारी धर्म सिंह रावत को भी पागल ठहराने की कोशिश की गई थी। रावत भ्रष्टाचार के खिलाफ उपवास कर रहे थे।
ये तो सिर्फ एक बानगी है सत्ता और ब्यूरोक्रेसी के उस नापाक गठजोड़ की जिसमे भ्रष्ट अधिकारी लगातार प्रोन्नति पता जाते हैं और ईमानदार अपनी ईमानदारी के सिले में नाइंसाफी का शिकार होता रहता है। इतना ही नहीं सजा पाया हुआ भ्रष्ट अधिकारी भी सत्तानाशीनों की मेहरबानी पर महतवपूर्ण पदों पर आसीन हो जाता है जिसमे ताजा नाम वरिष्ठ प्रशानिक अधिकारी राजीव कुमार का है जो अखिलेश सरकार की मेहरबानियों के चलते एक बार पुनः मतवपूर्ण पद, प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद पर आसीन हो गए हैं। जबकि सजायाफ्ता अधिकारी की पदोन्नति में कई रुकावटें होती हैं। इसके बावजूद अखिलेश यादव सरकार ने नियमों को धता बताते हुए सजा पाए हुए अधिकारी को महतवपूर्ण पद पर नियुक्त  कर दिया है। इसके उलट जो ईमानदार और बेदाग है वो आज भी विभिन्न महत्वहीन पदों पर बैठें है।
हलाकि यह पहली बार नहीं हुआ जब अखिलेश सरकार ने किसी सजा पाए हुए अधिकारी को महत्वपूर्ण पद पर बैठाया हो। इससे पहले भी उन्होंने एनआरएचएम घोटाले में सजा पाए हुए वरिष्ठ प्रशानिक अधिकारी प्रदीप कुमार को महतवपूर्ण पद बैठाया था। पर लखनऊ उच्च न्यायालाय की सख्ती के चलते राज्य सरकार को उन्हें उनके पद से हटाना पड़ा था। इस बार भी राजीव कुमार के लिए अखिलेश सरकार की राह इतनी आसान न होगी क्योकि तस्वीर बदली हुई है। लखनऊ के ही एक जुझारू पत्रकार ने मसले पर अपनी आवाज उठा दी हैं। उन्होने राजीव कुमार की नियुक्ति के खिलाफ इलाहाबाद की लखनऊ खण्डपीठ में एक यचिका दखिल की है। ऐसी स्थति यह देखना रोचक होगा की प्रशानिक अधिकारी राजीव कुमार की प्रमुख सचिव नियुक्ति के रूप में हुई तैनाती को चुनौती देने वाली इस याचिका पर उच्च न्यायालाय की लखनऊ खण्डपीठ क्या रुख अपनाती है?पिछली बार उच्च न्यायालय ने इस सड़ांध को काफी हद तक साफ करने की कोशिश की थी। हो सकता इस बार भी करें।
कितु यक्ष प्रश्न यही है कि कब तक उच्च न्यायालय सत्ता की गलियारों की सड़ांध साफ करेगा? क्या राजनेताओं से ईमानदारी की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए?

लेखक अनुराग मिश्र स्वतंत्र पत्रकार हैं और लखनऊ में रहते हैं. उनसे संपर्क 093899990111 के जरिए किया जा सकता है.

पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान गिरीश पंकज को

भोपाल : रायपुर से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘सद्भावना दर्पण’ के संपादक गिरीश पंकज को पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान-2012 से अलंकृत करने की घोषणा की गयी है। मीडिया विमर्श पत्रिका द्वारा प्रतिवर्ष साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले संपादकों को यह सम्मान प्रदान किया जाता है। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा( इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज (गोरखपुर) के संपादक डा. विश्वनाथप्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण और अक्सर (जयपुर) के संपादक हेतु भारद्वाज को दिया जा चुका है।

मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने यह जानकारी देते हुए बताया कि सम्मान के तहत ग्यारह हजार रुपए, शाल- श्रीफल, प्रतीक चिन्ह एवं मानपत्र देकर सम्मानित किया जाता है। इस वर्ष यह आयोजन भोपाल के भारत भवन में मार्च माह में सम्पन्न होगा। इस सम्मान के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव, रमेश नैयर, डा. सुभद्रा राठौर, जयप्रकाश मानस एवं डा. श्रीकांत सिंह शामिल हैं। उन्होंने बताया कि सद्भावना दर्पण विगत 16 सालों से रायपुर से निरंतर प्रकाशित एक ऐसी पत्रिका है जिसने विविध भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद प्रकाशित कर भाषाई सद्भभावना को स्थापित करने में उल्लेखनीय योगदान किया है।

प्रेस विज्ञप्ति

”मात्र एसएमएस ही तो भेजा, फिजिकली टच तो नहीं किया”

सेवा में, श्री बी एल जोशी, महामहिम राज्यपाल, उत्तर प्रदेश, लखनऊ : विषय- सुश्री ऋचा श्रीवास्तव, सहायक सांख्यकीय अधिकारी, अर्थ एवं संख्या अधिकारी कार्यालय, जनपद अमेठी के साथ उनके विभागीय अधिकारी द्वारा अश्लील हरकतें करने विषयक  :

महोदय,

कृपया निवेदन है कि मैंने अपने पत्र संख्या- NT/RS/Amethi दिनांक-08/01/2013 द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार में तैनात एक नयी महिला कर्मी सुश्री ऋचा श्रीवास्तव, सहायक सांख्यकीय अधिकारी, अर्थ एवं संख्या अधिकारी कार्यालय, जनपद अमेठी के साथ उनके ही कार्यालयाध्यक्ष द्वारा अश्लील हरकतें करने और इस का विरोध करने पर उलटे उन्हें ही प्रताडित और परेशान करने, अमेठी जिले के जिलाधिकारी/ मुख्य विकास अधिकारी से ले कर विभागीय प्रमुख तक शिकायत करने के बाद भी प्रताडित होने सम्बंधित एक शिकायत मा० मुख्यमंत्री तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को प्रेषित किया था, जिसकी प्रति पुनः संलग्न कर रही हूँ. 

इसी बीच एक कथित जांच समिति भी इस प्रकरण में जांच करने अमेठी गयी थी लेकिन यह समिति भी उस महिला अधिकारी की मदद करने के स्थान पर उलटे उन्ही से वरिष्ठ अधिकारी द्वारा किये गए कॉल के कॉल डिटेल्स मांग रही है, जिससे इस समिति की संवेदनशीलता साफ़ दिख जाती है, क्योंकि यह सभी जानते हैं कि मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर सीधे किसी व्यक्ति को कॉल डिटेल्स नहीं देते. अतः जहाँ किसी भी संवेदनशील प्रशासन से इस अत्यंत संवेदनशील प्रकरण में प्रत्येक स्तर पर सहयोगी रुख की उम्मीद की जानी चाहिए थी, वहीँ यह नयी महिला अधिकारी समस्त प्रताडनाओं के बाद भी अकेले संघर्ष कर रही है, जबकि पूरा देश महिला अत्याचार और महिला अपराध के विरुद्ध आवाज उठाता दिख रहा है. अतः मैं इस मामले में आपके व्यक्तिगत दृष्टिपात का निवेदन करती हूँ और साथ ही यह भी मांग करती हूँ कि ना सिर्फ उस महिला कर्मी के साथ न्याय हो बल्कि जिलाधिकारी अमेठी से ले कर निदेशक, अर्थ एवं संख्या तक जिस किसी भी अधिकारी ने इस अत्यंत संवेदनशील प्रकरण में अतीत असंवेदनशील और अनपेक्षित आचरण किया है, उनके विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही की जाए.

पत्र संख्या- NT/RS/Amethi       
दिनांक-14/01/2013
भवदीय,
(डॉ नूतन ठाकुर )
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ  
# 94155-34525

 
सेवा में,
श्री अखिलेश यादव,
मा० मुख्यमंत्री,
उत्तर प्रदेश शासन,
लखनऊ
विषय- सुश्री ऋचा श्रीवास्तव, सहायक सांख्यकीय अधिकारी, अर्थ एवं संख्या अधिकारी कार्यालय, जनपद अमेठी के साथ उनके विभागीय अधिकारी द्वारा अश्लील हरकतें करने तथा युवा महिला अधिकारी द्वारा इसकी शिकायत करने पर उलटे उसी महिला अधिकारी को परेशान करने सम्बंधित कतिपय गंभीर आरोप  
महोदय,
 कृपया निवेदन है कि मैं महिला अपराध तथा छेड़खानी से जुड़ा एक अत्यंत ही गंभीर प्रकरण आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ जिसमे उत्तर प्रदेश सरकार में तैनात एक नयी महिला कर्मी के साथ उनके ही कार्यालयाध्यक्ष द्वारा पहले अश्लील हरकतें की गयीं, उनके प्रति अनुचित टिप्पणियाँ की गयीं, उनका गलत प्रकार से शोषण करने का कुत्सित प्रयास किया गया और जब उस महिला ने इस का विरोध किया और इस पर आपत्ति की तो उलटे उन्हें ही प्रताडित और परेशान किया गया. आज स्थिति यह है कि अपने विभाग के प्रमुख सचिव, विभागीय निदेशक से ले कर अमेठी जिले के जिलाधिकारी तथा मुख्य विकास अधिकारी तक शिकायत कर चुकने के बाद भी वह युवा महिला कर्मी न्याय के लिए भटक रही है और परेशान हो कर अवकाश ले कर घर बीतने को मजबूर हो गयी है, जबकि उसके साथ इस प्रकार की गन्दी, वीभत्स तथा कलंकित कृत्य करने वाले अधिकारी उसी स्थान पर बैठे हुए हैं. इतना ही नहीं, उन अधिकारी महोदय ने अपने प्रभाव का स्पष्ट दुरुपयोग करते हुए इस प्रकरण में इस युवा महिला अधिकारी का साथ देने और उनके पक्ष में बात कहने का साहस करने वाले अन्य तमाम अधीनस्थ अधिकारियों को भी परेशान करने की नीयत से अन्यत्र स्थानांतरित करा दिया है. इससे भी अधिक वीभत्स बात यह कि इस प्रकरण में नियुक्त हुए एक जांच अधिकारी उलटे उसी पीड़ित महिला से कहते सुने गए कि केवल एसएमएस ही तो भेजा है, तुम्हे फिजिकली टच तो नहीं किया है. स्वाभाविक है कि यदि एक महिला अधिकारी, एक युवा महिला अधिकारी को अपने प्रति किये जा रहे महिला अपराध के लिए आवाज़ उठाने पर यदि इस प्रकार शोषित किया जाएगा और प्रमुख सचिव से लेकर जिलाधिकारी तक सभी केवल कागजी कार्यवाही करते रहेंगे तो प्रदेश में महिला अपराध और महिला उत्पीडन की घटनाएँ कभी कम नहीं होंगी.

यह प्रकरण सुश्री ऋचा श्रीवास्तव, सहायक सांख्यकीय अधिकारी, अर्थ एवं संख्या अधिकारी कार्यालय, जनपद अमेठी का है जिन्होंने पिछले वर्ष छह अगस्त को अपनी नयी सेवा ज्वायन किया था और अर्थ एवं संख्या अधिकारी कार्यालय, जनपद अमेठी में नियुक्त हुई थीं. उनके कार्यालय क्वायान करने के बाद से ही उनके कार्यालयाध्यक्ष श्री जयदीप सिंह, जिला अर्थ एवं संख्या अधिकारी ने उनके साथ अनुचित और आपराधिक कृत्य करना शुरू कर दिया. वे अकारण उस महिला अधिकारी से देर रात तक फोन पर बातें करते. इसके अलावा बिला मतलब ही देर तक कार्यालय में बैठाया करते. वे अपनी बातचीत में अकसर अश्लील और अनुचित शब्दों का प्रयोग करते. वे सुश्री ऋचा के कपड़ों, उनके ड्रेस आदि पर भी टिप्पणी करते और इन पर जबरदस्ती अपनी राय अधिरोपित करते.

जब सुश्री ऋचा इन अनुचित और घृणित हरकतों से आजिज हो गयीं तो उन्होंने 20/11/2012 को इस सम्बन्ध में श्री विद्या भूषण, जिलाधिकारी, अमेठी को फ़ोन पर शिकायत की. लेकिन यह अत्यंत कष्ट का विषय रहा कि जिलाधिकारी ने भी इस प्रकरण को बहुत हलके में लेते हुए प्रकरण श्री हरि शंकर उपाध्याय, मुख्य विकास अधिकारी को संदर्भित कर दिया जबकि उन्हें स्वयं इस अत्यंत गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए तत्काल ठोस कार्यवाही करना चाहिए था. मुख्य विकास अधिकारी ने सुश्री ऋचा को बुला कर एक लिखित प्रार्थनापत्र लिया लेकिन उन्होंने भी स्वयं तत्काल कठोर कार्यवाही करने की जगह परियोजना निदेशक को यह प्रकरण संदर्भित कर दिया. परियोजना निदेशक ने भी पिछले डेढ़ माह से इस प्रकरण में कोई कार्यवाही नहीं की और इस प्रकार जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी को प्रार्थनापत्र देने के बाद अब तक डेढ़ माह बीत जाने पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई है. यह निश्चित रूप से अत्यंत आपत्तिजनक बात है कि स्वयं जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी को एक युवा महिला कर्मी के साथ इस प्रकार के महिला अपराध होने की बात संज्ञान में आ जाने के बाद भी उनके स्तर से कोई भी कार्यवाही नहीं की और आँखें मूंदे रखा गया. मुझे विश्वास है कि आप इन अधिकारियों द्वारा इस प्रकार कर्तव्यपालन में की गयी घोर लापरवाही और महिला अपराध के प्रति नितांत अगम्भीरता और अनुत्तरदायी आचरण के लिए उन्हें दण्डित करने की कृपा करेंगे.

सुश्री ऋचा द्वारा 20/11/2012 को यह शिकायत करने के बाद भी श्री जयदीप सिंह द्वारा उन्हें परेशान करना जारी रखा गया. उन्होंने लगातार सुश्री ऋचा को फोन करना जारी रखा. इसके अलावा 24/11/2012 को करीब 3 बजे एसएमएस भी भेजा जिसमे लिखा कि “Call me urgently”. सुश्री ऋचा ने उनका फोन रिसीव नहीं किया और ना ही उन एसएमएस का भी जवाब नहीं दिया. दिनांक 26/11/2012 (सोमवार) को कार्यालय खुलने के बाद श्री जयदीप सिंह ने सुश्री ऋचा को अपने कक्ष में बुलाया और इस प्रकार शिकायत करने के पर कई प्रकार की धमकी दी और कहा कि वे उनका कैरियर खराब कर देंगे. कार्यालय में इस बात की चर्चा होने पर कार्यालय के अन्य स्टाफ भी वहाँ गए और उन्होंने श्री जयदीप सिंह के इस आचरण की निंदा और विरोध भी किया.

इस प्रकार की घटना घटने पर कुछ स्थानीय पत्रकारों  को यह बात जानकारी में  आई और यह खबर अख़बारों में भी छपी. श्री जयदीप सिंह द्वारा इस प्रकार धमकी देने के बाद सुश्री ऋचा एक बार पुनः श्री विद्या भूषण, जिलाधिकारी के पास गयीं जिन्होंने इस मामले को उनके कार्यालय का निजी मामला बता कर इससे स्वयं को अलग कर लिया और अपने अधीनस्थ एक युवा महिला कर्मी के साथ हो रहे दुराचरण और महिला अपराध के प्रति अत्यंत ही असंवेदनशील और अनुचित आचरण का परिचय दिया.

यह प्रकरण श्री प्रेम नारायण, निदेशक, अर्थ एवं संख्या, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के संज्ञान में आने के बाद इस सम्बन्ध में श्री अमलेन्दु राय, उपनिदेशक, अर्थ एवं संख्या, फैजाबाद मंडल दिनांक 27/11/2012 को अमेठी आये. उन्होंने कार्यालय के लोगों से पूछताछ की और उसके बाद उन्होंने सभी लोगों के सामने कहा कि “श्री जयदीप सिंह ने आपको फोन पर ही अमर्यादित बातचीत किया है, आपको फिजिकली टच तो नहीं किया है. यह इतना गंभीर मुद्दा नहीं है.” मैं समझती हूँ कि इससे अधिक अनुचित, घृणित और आपराधिक कृत्य कोई और नहीं हो सकता जिसमे एक वरिष्ठ अधिकारी जिससे ऐसे मामलों में न्याय और कठोरतम कार्यवाही की अपेक्षा हो, वह इस तरह की ओछी और फूहड़ बात कहें. अगले दिन श्री राय ने सुश्री ऋचा और कार्यालय में उनकी बात का समर्थन कर रहे अन्य कर्मियों का कैरियर बर्बाद करने और दूरदराज स्थानांतरित करने की भी धमकी दी.

इस प्रकरण में इतना ही नहीं हुआ. दिनांक 01/12/2012 को श्री जयदीप सिंह ने कार्यालय के अन्य कर्मियों श्री वासुदेव भारती, श्री अनुपम सिंह और श्री रमाशंकर यादव के सामने सुश्री ऋचा को एक बार पुनः धमकी दी.

एक तो श्री अमलेन्दु राय  ने अपने स्तर से कुछ नहीं किया, ऊपर से उन्होंने श्री प्रेम नारायण, निदेशक ने उनके प्रस्ताव को मानते हुए दिनांक 07/12/2012 के अपने आदेश द्वारा सुश्री ऋचा को अमेठी से बाराबंकी, श्री राम शंकर यादव, अपर सांख्यकी अधिकारी को अमेठी से अम्बेडकरनगर और श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय, वरिष्ठ सहायक को अमेठी से फैजाबाद स्थानांतरित कर दिया. इस स्थानांतरण आदेश में स्थानांतरण का कारण प्रशासनिक आधार बताया गया और इस पत्र का शीर्षक दिया गया-“ अर्थ एवं संख्याधिकारी कार्यालय, अमेठी में अधिकारियों और कर्मचारियों के आपसी विवाद और कर्मचारियों द्वारा की गयी अभद्रता के सम्बन्ध में”. श्री जयदीप सिंह ने दिनांक 13/12/2012 को इसके क्रम में सुश्री ऋचा को कार्यमुक्त करने के आदेश कर दिये. यही नहीं उन्होंने सुश्री ऋचा के कार्यमुक्त होने के बाद भी दिनांक 22/12/2012 को 43 तालिकाएं तैयार नहीं कर पाने के नाम पर उन्हें स्थानांतरण के बाद उन्हें “विशेष प्रतिकूल प्रविष्ठि” दे दी और इसकी प्रतिलिपि सभी सम्बंधित वरिष्ठ अधिकारियों को प्रेषित की.

इसी बीच सुश्री ऋचा अपने विभाग के प्रमुख सचिव से भी मिल चूँकि हैं और प्रमुख सचिव ने शायद कोई तीन-सदस्यीय  जांच समिति बनाए जाने के आदेश दिये हैं लेकिन इस जांच समिति ने भी अभी तक कोई  निश्चित कार्य नहीं किया है.

इस प्रकार एक युवा महिला  कर्मी द्वारा अपने कार्यालय अध्यक्ष के अनुचित आचरण करने, महिला अपराध कारित करने, घृणास्पद आचरण करने के विरुद्ध सामने आ कर आवाज़ उठाने का नतीजा आज यह है कि वह महिला कर्मी शिकायत प्रस्तुत करने के बाद अपने स्थान से स्थानांतरित कर दी गयी, उसे मामूली बात पर मनगढंत ढंग से “विशेष प्रतिकूल प्रविष्ठि” दी गयी, उसकी बात किसी स्तर पर नहीं सुनी गयी, उसके उच्चाधिकारियों ने उल्टा उसे इस तरह की बात कही कि मात्र एसएमएस ही तो भेजा गया है फिजिकली टच तो नहीं किया गया है, जिले के जिलाधिकारी ने यह कह कर पल्ला झाड लिया कि यह विभागीय मामला है, विभागीय प्रमुख सचिव मात्र जांच के आदेश दे कर बैठ गए और विभागीय निदेशक इसे आपसी विवाद के रूप में ले कर शिकायत करने वाली महिला अधिकारी के विरुद्ध ही कार्यवाही करते हैं.

बहुत साफ़ है कि इस प्रकार के लचर और महिला विरोधी माहौल में पूरे प्रदेश में कोई भी महिला कर्मी अपने किसी अधिकारी द्वारा उसके साथ किये जाने वाली अभद्रता, दुराचरण, कुत्सित और घृणित हरकत का ना तो विरोध कर पायेगी और ना ही उसके खिलाफ सामने ही आएगी. यदि सामने आ कर अपने वरिष्ठ अधिकारी के महिला अपराध और कदाचरण का विरोध करने का नतीजा यह हो कि वह महिला अधिकारी और उसका सहयोग करने को आगे बढे कर्मचारी स्थानांतरित कर दिये जाएँ, उस महिला अधिकारी को प्रतिकूल प्रविष्ठि दे दी जाए, घृणित आचरण करने वाले सम्बंधित अधिकारी और इस मामले में लचर और महिलाविरोधी आचरण करने वाले जिलाधिकारी, निदेशक, अर्थ एवं संख्या आदि उच्चपदस्थ अधिकारियों के विरुद्ध किसी भी प्रकार की कोई भी कानूनी कार्यवाही नहीं की जाए, तो स्वाभाविक है कि कोई भी महिला कर्मी अपने प्रति किये जा रहे अपराध को सामने आ कर ना तो कहेंगी और ना ही इसका किसी प्रकार से कोई विरोध करेंगी.

यह अत्यंत कष्ट का विषय रहा  कि इस पूरे मामले में किसी भी स्तर पर यह छोटी सी बात  नहीं सोची गयी कि एक युवा महिलाकर्मी, जिसने हाल  में ही विभाग में सहभागिता की है, अपने वरिष्ठ अधिकारी  पर इस प्रकार का गंभीर आरोप क्यों लगायेगी? ना ही इस ओर कोई चिंतन किया गया कि यदि यह महिलाकर्मी सामने आई है तो पूरी प्रशासनिक मशीनरी को लगा कर उसे सुरक्षा दी जाए, उसका सहयोग किया जाये और सम्बंधित दोषी अधिकारियों पर कठोरतम कार्यवाही की जाये.

इन समस्त तथ्यों के दृष्टिगत मैं आपसे निम्न निवेदन करती हूँ-

    1-कृपया इस प्रकरण में सुश्री ऋचा श्रीवास्तव द्वारा विभिन्न अधिकारियों को प्रस्तुत शिकायती प्रार्थनापत्र पर तत्काल प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने के निर्देश देने की कृपा करें
    2-कृपया इस मामले की तत्काल जांच करा कर दोषी पाए जाने पर श्री जयदीप सिंह, जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी, अमेठी के विरुद्ध सभी संभव आपराधिक और प्रशासनिक कार्यवाही कराई जाये
    3-इस पूरे प्रकरण के सन्दर्भ में सुश्री ऋचा श्रीवास्तव की हर प्रकार से सहायता और सहयोग किया जाये और सम्बंधित अधिकारियों को यह स्पष्ट निर्देश निर्गत किये जाएँ कि सुश्री श्रीवास्तव की पूरी सुरक्षा हो और उन्हें किसी भी प्रकार से परेशान नहीं किया जाये
    4-इस प्रकरण में अमर्यादित आचरण करने वाले जांच अधिकारी श्री अमलेन्दु राय, उप निदेशक, अर्थ एवं संख्या, फैजाबाद के विरुद्ध भी विधिक तथा प्रशासनिक कार्यवाही की जाये
    5-इस प्रकरण में लचर और गैर-जिम्मेदार आचरण करने वाले श्री विद्या भूषण, जिलाधिकारी अमेठी तथा श्री प्रेम नारायण, निदेशक, अर्थ एवं संख्या, उत्तर प्रदेश की भी प्रशासनिक जिम्मेदारी नियत की जाए

मुझे पूर्ण विश्वास है कि जिस प्रकार से आपने अनवरत महिला अपराध के प्रति खुल कर अपनी संवेदनशीलता प्रदर्शित की है, उसके अनुरूप आप इस मामले में भी अत्यंत कठोर कार्यवाही सुनिश्चित करते हुए सुश्री ऋचा श्रीवास्तव को न्याय दिलाना सुनिश्चित करेंगे.

पत्र संख्या- NT/RS/Amethi        
दिनांक-08/01/2013
भवदीय
(डॉ नूतन ठाकुर )
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ  
# 94155-34525

प्रतिलिपि-
1. मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश, लखनऊ को कृपया सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु  
2. प्रमुख सचिव, गृह, उत्तर प्रदेश को कृपया सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु
3. पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश को कृपया सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु

यूपी में महिला अफसर ने अपने सीनियर अफसर पर लगाया गंभीर आरोप

: जांच के नाम पर पीड़िता को ही परेशान किया जा रहा : यूपी में सरकारी कार्यालय में महिला अपराध सम्बंधित अत्यंत गंभीर घटना : ऋचा श्रीवास्तव ने सहायक सांख्यकीय अधिकारी के पद पर अर्थ एवं संख्या अधिकारी कार्यालय, जनपद अमेठी में पिछले छह अगस्त 2012 को ज्वायन किया. तबसे उनके कार्यालयाध्यक्ष जयदीप सिंह जो कि जिला अर्थ एवं संख्या अधिकारी हैं, ने अकारण देर रात तक ऋचा को फोन करते रहे, इधर-उधर की बातें करते रहे, बिना मतलब देर तक कार्यालय में बैठाते रहे, बातचीत में अक्सर अश्लील और अनुचित शब्दों का प्रयोग करते रहे और ऋचा के कपड़ों, ड्रेस आदि पर भी टिप्पणी करना शुरू कर दिया.

ऋचा ने आजिज हो कर 20 नवंबर 2012 को इस सम्बन्ध में विद्या भूषण, जिलाधिकारी, अमेठी को शिकायत की. तब परियोजना निदेशक ने जांच शुरू की लेकिन उसमें आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है. शिकायत के बाद 26 नवंबर को जयदीप सिंह ने ऋचा को अपने कक्ष में बुला कर बहुत धमकाया. शिकायत किये जाने पर जिलाधिकारी ने कार्यालय का निजी मामला बता कर इससे पल्ला झाड़ लिया.

जब यह प्रकरण प्रेम नारायण, निदेशक, अर्थ एवं संख्या, उत्तर प्रदेश के संज्ञान में आया तो उन्होंने अमलेन्दु राय, उपनिदेशक, अर्थ एवं संख्या, फैजाबाद मंडल को जांच दी. अमलेंदु राय ने उल्टा ऋचा को ही कहा कि जयदीप सिंह ने आपको फोन पर ही अमर्यादित बातचीत किया है, आपको फिजिकली टच तो नहीं किया है, इसलिए यह इतना गंभीर मुद्दा नहीं है.

ऋचा द्वारा शिकायत किये जाने के बाद प्रेम नारायण ने 07 दिसंबर को ऋचा को अमेठी से बाराबंकी और उनके साथ देने वाले कर्मचारियों राम शंकर यादव, अपर सांख्यकी अधिकारी और प्रदीप कुमार पाण्डेय, वरिष्ठ सहायक को अमेठी से बाहर स्थानांतरित कर दिया. साथ ही जयदीप सिंह ने ऋचा के कार्यमुक्त होने के बाद 22 दिसंबर को कुछ तालिकाएं तैयार नहीं कर पाने के नाम पर विशेष प्रतिकूल प्रविष्ठि दे दी.  

यह महिला अपराध की अत्यंत संवेदनशील घटना है और मैंने आज इस सम्बन्ध में बील एल जोशी, राज्यपाल, उत्तर प्रदेश और जावेद उस्मानी, मुख्य सचिव ने मिल कर इस मामले में ऋचा के प्रति तत्काल न्याय करने, उनके प्रकरण में तत्काल एफआईआर दर्ज करने, जयदीप सिंह के विरुद्ध सभी संभव आपराधिक और प्रशासनिक कार्यवाही करने,  अमर्यादित आचरण करने वाले जांच अधिकारी अमलेन्दु राय के साथ गैर-जिम्मेदार आचरण करने वाले जिलाधिकारी अमेठी और निदेशक, अर्थ एवं संख्या के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्यवाही करने की मांग की है. राज्यपाल ने इसे अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताते हुए कठोर कार्यवाही का आश्वासन दिया है, जबकि मुख्य सचिव ने भी इस सम्बन्ध में तत्काल कार्यवाही की बात है.

लखनऊ से नूतन ठाकुर की रिपोर्ट.

बोरसी की आग सी हैं लघु पत्रिकाएं

: लघु पत्रिकाओं की प्रासंगिकता बनी रहेगी : सामंती व साम्राज्यवादी ताकतों के चक्रव्यूह को तोड़ती हैं लघु पत्रिकाएं : रविवार को पटना जिला प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा केदार भवन में  हिन्दी साहित्य की पाँच लघु पत्रिकाओं यथा – शीतल वाणी, दोआबा, एक और अन्तरीप, साँवली और देशज के ताज़े अंकों पर विमर्श का आयोजन किया गया। इस विमर्श में लघु पत्रिका अभिधा, अक्षर पर्व, कृतिओर एवं माटी के ताज़े अंकों की भी चर्चा हुई।

लोक चेतना के जागरण में इन पत्रिकाओं के योगदान को रेखांकित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डा. रानी श्रीवास्तव ने की। मुख्य वक्ता युवाकवि शहंशाह आलम ने कहा कि लघु पत्रिका का कैनवस बहुत बड़ा है आजादी के दिनों में पत्रिकाएं अलख जगाने का काम करती थीं। फिर सामंती और साम्राज्यवादी ताकतों के विरूद्ध मसाल लेकर खड़ी रही हैं। उन्होंने कहा कि ‘वागर्थ’ का अस्सी दशक के बाद के कवियों पर केन्द्रित अंक आया है। अंक पठनीय है परन्तु 80 के दशक के बाद के अनेक कवियों को अनदेखा किया गया है… ऐसे कार्य जानबूझ कर और चालाकी से किये जा रहे हैं.. खासकर बिहार के युवा कवियों को नजरअंदाज कर। ऐसे कृत्यों की निंदा की जानी चाहिए।

वक्ताओं में रमेश ऋतंभर, पूनम सिंह, अरुण शीतांश, विभूति कुमार एवं राजकिशोर राजन आदि ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन अरविन्द श्रीवास्तव ने किया। उन्होंने जल्द ही पाँच कवयित्रियों की समकालीन कविता पर पटना में विमर्श कये जाने की भी सूचना दी।

– अरविन्द श्रीवास्तव (मधेपुरा)
बिहार प्रलेस मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता
मोबाइल – 09431080862

पहले शाही स्नान में जूना अखाड़े का जलवा दिखा

इलाहाबाद : सोमवार को पवित्र गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम तट पर शाही स्नान के साथ पर महाकुंभ शुरू हो गया। तीर्थराज के नाम से मशहूर प्रयाग (इलाहाबाद) में चल रहे इस महा आयोजन में परंपरा के हिसाब से सुबह साढ़े पांच बजे सबसे पहले महानिर्वाणी अखाड़े के संतों ने शाही स्नान किया। अखाड़ों के स्नान का क्रम शाम साढ़े पांच बजे तक चला। इस दौरान 13 अखाड़ों के करीब 3 लाख साधुओं ने स्नान किया। कुंभ मेला प्रशासन के मुताबिक पहले दिन 82 लाख श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई।

दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन महाकुंभ पूरे जोश और शांति से इलाहाबाद में संगम के तट पर अपने रंग में नजर आ रहा है। पहले शाही स्नान पर्व पर अखाड़ों के नागा संन्यासियों, महामंडलेश्वरों, साधु-महात्माओं सहित लाखों आम लोगों ने संगम में डुबकी लगई। आज 4 बजे सुबह से शुरू स्नान पूरे दिन जारी रहेगा। सुबह सबसे पहले 5.45 बजे महानिर्वाणी के साधु-संत पूरे लाव-लश्कर के साथ शाही स्नान को निकले। इस तरह अखाड़ों के स्नान का क्रम शुरू हुआ। सभी अखाड़ों को बारी-बारी से स्नान के लिए चालीस मिनट का समय दिया दिया गया है।

साधु-संतों के साथ आम श्रद्धालुओं भी संगम सहित अलग-अलग घाटों पर स्नान कर रहे हैं। कड़ी सुरक्षा के बीच घाटों पर नहाने और पूजा पाठ का सिलसिला जारी है। पारा 10 डिग्री सेल्सियस से भी कम होने के बाद भी बड़ी तादाद में लोग डुबकी लगा रहे हैं। सुबह साढ़े नौ बजे तक करीब 35 लाख लोगों ने डुबकी लगाई है।

पुण्य की एक डुबकी की चाहत में आस्था का समुद्र उमड़ पड़ा है। श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला लगातार जारी है। मेला प्रशासन ने एक करोड़ दस लाख श्रद्धालुओं के आने का अनुमान लगाया है। इसके मद्देनजर सुरक्षा के सख्त इंतजाम भी किए गए हैं। पूरे मेला क्षेत्र और इलाहाबाद शहर को कमांडो के घेरे में लिया गया है। हर आने-जाने वालों पर नजर रखी जा रही है।

महाकुंभ के पर्व पर साधु-संतों के अखाड़ों के शाही स्नान की परंपरा के तहत तीन शाही स्नान होने हैं। पहला शाही स्नान सोमवार को होगा। इसमें तेरह अखाड़ों के करीब तीन लाख साधु शामिल होंगे। मेलाधिकारी मणिप्रसाद मिश्र के मुताबिक सुबह सवा पांच बजे से शाही स्नान का मुहूर्त रखा गया है, जो शाम पांच बजे तक चलेगा। इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आए हैं। यह विदेशियों के आकर्षण का भी मुख्य केंद्र होता है। इसमें कई विदेशी बाबा व शिष्य भी शामिल होंगे। परंपरा के मुताबिक शाही स्नान में सबसे पहले महानिर्वाणी और अटल अखाड़े के संत उतरेंगे। इसी तरह बारी-बारी से तेरह अखाड़ों के संत शाही स्नान करेंगे। सबसे अंत में निर्मल अखाड़े के संत स्नान करेंगे। शाही स्नान के लिए सेक्टर चार से लेकर संगम नोज तक विशेष मार्ग बनाया गया है। सैकड़ों पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की ड्यूटी लगाई गई है। इसी शाही स्नान के साथ महाकुंभ की शुरुआत हो जाएगी। मेले में महामंडलेश्वर महेश्वरानंद और पायलट बाबा व अन्य संतों के साथ उनके सैकड़ों विदेशी भक्त भी आए हैं। ये भी महाकुंभ की छटा देखने आए हैं और खुद भी मेले के आकर्षण का केंद्र बने हैं।

सोमवार को पहले शाही स्नान में जूना अखाड़े का जलवा दिख रहा है। 50 हजार संन्यासी, 15 हजार नागा और 50 रथों पर सवार महामंडलेश्वर अखाड़े की शोभा बढ़ा रहे हैं। रविवार की रात्रि तक सभी अखाड़ों के कैंप साधु संतों से भर गए थे। सुबह सवा छह बजे महानिर्वाणी के इष्टदेव के संगम में स्नान के साथ ही शाही स्नान शुरू हो गया। अखाड़े के संत फिर सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश को स्नान कराए। अखाड़े के सचिव महंत रवीन्द्र पुरी ने बताया कि नागा संन्यासी सबसे आगे रहे। करीब दो सौ नागा रहें। दस साधु संन्यासी शामिल हुए। 40 महामंडलेश्वर शामिल। आचार्य विष्णुदेवानंद जी महराज को स्नान कराने के बाद अखाड़े के सभी साधु संत स्नान किए।
 

आलोक पुंज और राजन चम्‍बा नए ठिकानों पर पहुंचे

 

आलोक पुंज ने आस्‍था टीवी से इस्‍तीफा दे दिया है. वे दिल्‍ली में चैनल के साथ डाइरेक्‍टर ऑफ प्रोग्रामिंग के रूप में जुड़े हुए थे. आलोक ने अपनी पारी नक्षत्र चैनल के साथ शुरू की है. उन्‍हें बिहार में चैनल का हेड बनाया गया है. आलोक आस्‍था से पहले जी न्‍यूज को रिपोर्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 
 
हिमाचल के वरिष्‍ठ पत्रकार राजन चम्‍बा के बारे में खबर है कि उन्‍होंने पंजाब केसरी से इस्‍तीफा दे दिया है. राजन ने अपनी नई पारी दैनिक सवेरा के साथ शुरू की है. उन्‍हें ऊना का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. जिले में टीम गठन की जिम्‍मेदारी भी राजन को सौंपी गई है. राजन इसके पहले दैनिक भास्‍कर, अखंड हिमाचल तथा हिमजन आवाज को भी ब्‍यूरोचीफ के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

भास्‍कर के पत्रकार विजय सिंह को मैक्‍स चैनल देगा अवार्ड

 

जयपुर : दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण के जर्नलिस्ट विजय सिंह को टेलीविजन चैनल मैक्स की ओर से अवॉर्ड के लिए चुना गया है। पिछले दिनों चैनल की ओर से हिन्दी सिनेमा के 100 वर्ष पूरे होने पर एक कांटेस्ट शुरुआत यहीं से… आयोजित किया गया था। कॉन्टेस्ट में हिन्दी सिनेमा से जुड़े अपनी रियल लाइफ एक्सपीरियंस को स्टोरी के रूप में शेयर करना था। इसमें पूरे देश भर के मीडिया हाउस से 300 से ज्यादा जर्नलिस्ट ने हिस्सा लिया और अपनी अनुभव भरी स्टोरी चैनल को भेजी। सभी स्टोरीज को मैक्स चैनल की ज्यूरी ने पढ़ा और जांच-परखकर उसमें से बेस्ट तीन को अवॉर्ड के लिए चयनित किया।
 
इसमें जयपुर, भास्कर (सिटी भास्कर) के जर्नलिस्ट विजय सिंह के अनुभव और स्टोरी को तीसरा स्थान मिला और उनको अवॉर्ड के लिए चुना गया। सिंह को टेलीविजन की ओर से सोनी कंपनी का 30 हजार रुपए मूल्य का टैबलेट पुरस्कार के रूप में दिया जाएगा।

पंजाब केसरी ने उधेड़ी जेपी समूह की बखियां

 

पंजाब केसरी, आगरा से खबर है कि उसने इस समय जेपी समूह की बखिया उधेड़ना प्रारंभ कर दिया है, जिसके कारण शासन-प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है. क्योंकि जेपी समूह को इस समय सत्ता का आशीर्वाद है. जेपी ग्रुप मोटा विज्ञापन भी जारी करता है इसलिए ज्‍यादातर मीडिया भी चुप है. बीते दिनों जेपी समूह ने जमीन बेचने के मामले में गोलमाल किया, जिस पर सामाजिक कार्यकर्ता नरेश पारस ने इस बाबत बाँट माप विभाग पर संपर्क साधा तो पता चला कि यह नीति गलत है लेकिन उसने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की. 
 
जब इस मामले में पंजाब केसरी को जानकारी हुयी तो उसने विज्ञापन के साथ ही इसे प्रकाशित कर डाला. उधर इस मामले में एक बात और सामने आ रही है कि विज्ञापन न मिलने के कारण पंजाब केसरी ने ऐसा किया है. बरहाल इस खबर के प्रकाशित होने से हड़कंप मचा हुआ है व लोग पंजाब केसरी की तारीफ कर रहे हैं. नीचे अखबार में प्रकाशित खबर. 
 

पत्रकार जिम्मेदारी की भावना को समझें : मार्कण्डेय काटजू

 

: अधिकार सम्पन्न मीडिया काउन्सिल की जरूरत : लखनऊ। भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने कहा है कि पत्रकार पेशेगत जिम्मेदारी की भावना को समझें। अन्यथा उनके पेशे का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उन्होंने पत्रकारों को आगाह किया कि समाजिक सरोकार से जुड़ी हुई खबरों को महत्व दें। जस्टिस काटजू ने इस बात पर नाराजगी जाहिर की कि भारतीय मीडिया सेलिब्रिटी से जुड़ी खबरों के सामने आम आदमी से जुडे मुद्दों की उपेक्षा कर देता है। जस्टिस काटजू आज यहां हिन्दी समाचार पत्र सम्मेलन द्वारा मीडिया में एकाधिकार प्रवृत्ति विषयक संगोष्ठी में मुख्य अतिथि पद से विचार व्यक्त कर रहे थे।
 
जस्टिस काटजू ने कहा कि देश के पत्रकार असल मुद्दों की उपेक्षा कर रहे हैं। वे ऐसी खबरों के पीछे भागते हैं जिनका समाज के विकास और आम आदमी से कोई सरोकार नहीं होता। उन्होने कहा कि आज भी देश में प्रतिदिन 47 किसान आत्महत्या करते हैं किन्तु अखबारों में खबरें दिखायी नहीं देतीं। देश के 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। यह आंकड़ा उन अफ्रीकी देशों से भी अधिक है जहां सबसे यादा गरीबी है। इन अफ्रीकी देशों मे बच्चों में कुपोषण की दर 33 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि असल मुद्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। असल मुद्दे आर्थिक हैं। उन्होने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि पत्रकार अपनी सेंस आफ रिस्पांसबिलिटी को समझें अन्यथा बहुत दिन तक मीडिया और पत्रकारों की यह बात स्वीकार नहीं की जाएगी।
        
मीडिया में सामाजिक सरोकार की बात करते हुए जस्टिस काटजू ने कहा कि वे इस पेशे से पैसा कमाने की प्रवृत्ति के खिलाफ नहीं हैं, किन्तु मीडिया मालिक कहें कि हमें सिर्फ पैसा कमाना है देश की कोई जिम्मेदारी नहीं हैं। अथवा हमारा कोई समाजिक सरोकार नहीं है तो यह गलत है। हमें समाजिक जिम्मेदारी निभानी ही होगी।
        
इलेक्ट्रानिक मीडिया के संदर्भ में जस्टिस काटजू ने कहा कि वे नियमन के लिए कानून बनाये जाने के पक्ष में हैं। किन्तु इलेक्ट्रानिक मीडिया की एसोसिएशन स्व: नियमन की बात करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सेल्फ रेगूलेशन इज नो रेगूलेशन। यदि ऐसा ही होगा तो सभी कानून खत्म करने होंगे। समाज का हर वर्ग कहेगा कि हम अपना कानून लागू करेंगे। उन्होंने कहा कि हम कंट्रोल के खिलाफ हैं किन्तु रेगूलेशन होना चाहिए। कंट्रोल में तानाशाही हो सकती है किन्तु रेगूलेशन तो नियमों के अनुसार होता है। इस संदर्भ में उन्होंने मीडिया काउन्सिल बनाये जाने तथा उसे अधिकार संपन्न बनाये जाने की वकालत की।
        
संगोष्ठी में प्रदेश के राजस्व मंत्री अम्बिका चौधरी ने कहा कि मीडिया में एकाधिकार की बढ़ती प्रवृति चुनौती है। उन्होंने कहा कि देश के कुल पचास घराने समूचे मीडिया जगत पर छाये हुए हैं। ये ही आज समाज की एजेण्डा तय कर रहे रहे हैं। इसी के चलते कारपोरेट घराने सरकारों की नीतियों को प्रभावित करते हैं। श्री चौधरी ने कहा कि अभी गनीमत है कि मीडिया का एकाधिकार सरकारों को बनाने और बिगाड़ने की स्थिति में नहीं आया है। उन्होंने कहा कि हमें इस बात से सचेत रहना होना होगा कि मीडिया की एकाधिकार प्रवृत्ति सरकारों की नीतियों और इसके अस्तित्व को प्रभावित न करे।
        
उन्होंने छोटे और मझोले समाचार पत्रों की समाचार नीतियों की प्रसंशा करते हुए कहा कि ये एकाधिकार प्रवृति के मार्ग में अवरोध बने हुए हैं। छोटे अखबार आज भी एकाधिकार की प्रवृत्ति से बचे हुए हैं। उन्होंने कहा कि इसे और सशक्त करना होगा। श्री चौधरी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पत्रकारों की रिपोर्टिंग के मानक तय करने से इनकार कर सकता है किन्तु प्रेस परिषद् इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। उसे यह जिम्मेदारी निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि एकाधिकार की प्रवृत्ति को रोकने के लिए भी पीसीआई को ही पहल करनी होगी।
        
गोमती नगर स्थित हिन्दी मीडिया सेंटर के सभागार में आयोजित संगोष्ठी और सम्मान समारोह में विशिष्ट अतिथि समाज कल्याण मंत्री अवधेश प्रसाद ने कहा कि छोटे और मझोले अखबारों और ग्रामीण पत्रकारों को महत्व मिलना चाहिए। संगोष्ठी में पत्रकार बलदेव राज गुप्ता ने कहा कि नये परिवेश में प्रेस काउन्सिल आफ इण्डिया को भी बदलाव करना होगा। उन्होने प्रेस काउन्सिल से अपील की कि वह नये मानक तैयार करे। पत्रकारों के प्रशिक्षण के लिए भी एक राष्ट्रीय नीति बनाकर एक समान पाठयक्रम तय किया जाना चाहिए।
        
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार और प्रेस काउन्सिल के सदस्य शीतला सिंह, हिन्दी समाचार पत्र सम्मेलन के अध्यक्ष उत्तम चन्द्र शर्मा, उपाध्यक्ष राजीव अरोरा, रजा रिजवी, सुश्री ताहिरा हसन, सूर्यमणि रघुवंशी आदि ने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम में उ.प्र.जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) के अध्यक्ष रतन दीक्षित, महामंत्री सर्वेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार सुभाष राय, कंमलजीत सिंह समेत प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आये पत्रकार शामिल थे। संचालन सम्मेलन की महामंत्री सुमन गुप्ता ने किया। (उप्रससे)

विक्रम की नई पारी, रवींद्र का इस्‍तीफा

 

सीएनईबी, जनसंदेश, नेटवर्क10 जैसे संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके विक्रम श्रीवास्‍तव एक बार फिर से 'न्‍यूज टाइम' से जुड़ गए हैं. उन्‍हें ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. उल्‍लेखनीय है कि जनसंदेश चैनल का ही नया नाम न्‍यूज टाइम किया गया है. श्रीवास्‍तव की गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है. 
 
दैनिक भास्‍कर, धनबाद से खबर है कि रवींद्र कुमार ने संस्‍थान से इस्‍तीफा दे दिया है. हालांकि उनको हटाए जाने की चर्चाएं भी हो रही हैं. रवींद्र की गिनती अच्‍छे रिपोर्टरों में होती थी. वे रेल तथा क्राइम समेत कई बीट की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. हालांकि इस संदर्भ में पूछे जाने पर रवींद्र ने इस्‍तीफा या निकाले जाने जैसी किसी भी बात से इनकार किया. 

टीओआई ने नर्मदा जल सत्‍याग्रह को छद्म तथा मीडिया को झूठा बताया

 

अंग्रेजी अखबार टाइम्स आफ इंडिया ने तमाम मीडिया को झूठा बताते हुए एक खबर प्रकाशित की है कि नर्मदा जल सत्याग्रह छद्म था, फेक था. खबर में इस बात को प्रमुखता से बताया गया है कि वह नर्मदा नहीं थी, एक नाला था जिसमें कि लोग खड़े थे. जबकि यह सर्व विदित है कि जिसे अखबार नाला बता रहा है वो कावेरी नदी है, जो कि "नर्मदा की ट्रीब्यूटरी" है और घोगल गाँव और टोंकी के बीच में बहती है. 
 
इतिहास गवाह है कि कोई भी प्रदर्शन या सत्याग्रह सांकेतिक होता है. इसके लिए जगह भी सांकेतिक होती है. जरूरी नहीं कि सब लोग नर्मदा में खड़े होके ही प्रदर्शन करें. और जैसा कि खबर में कहा गया कि अब वहां बिलकुल पानी नहीं है तो ये भी सब जानते हैं कि ट्रीब्यूटरी नदी में जो बैकवाटर होता है, वो पानी घटने के साथ ही मुख्य नदी में वापस चला जाता है. ऐसे में इस अखबार का ये कहना कि वह सत्याग्रह ही गलत था पूरी तरह से हास्यास्पद है और जनभावनाओं से खिलवाड़ है. 
 
 

पत्रकारिता विभाग में लेक्‍चरर बने देश दीप‍क

 

लगभग आठ साल से लखनऊ की पत्रकारिता में सक्रिय देश दीपक सिंह ने सक्रिय पत्रकारिता को अलविदा कह कर अब पत्रकारिता शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं. देश दीपक ने अपनी नई पारी की शुरुआत महाराणा प्रताप संस्‍थान के पत्रकारिता विभाग में लेक्‍चरर के रूप में शुरू किया है. देश दीपक लखनऊ के कई अखबारों में सेवा देने के बाद न्‍यूज9, न्‍यूज18, जनसंदेश चैनल, चैनल वन, साधना टीवी समेत कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वे अब भी स्‍वतंत्र रूप से कई न्‍यूज पोर्टलों एवं मैगजीनों में लिखते रहते हैं. 

रामदेव के खिलाफ जानकारी जुटाने वाले पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज

 

हरिद्वार। बाबा रामदेव और उनके संस्थानों से जुड़ी जानकारी के लिए उनके वाहन चालक को रिश्वत की पेशकश के आरोप में दिल्ली के एक पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। पत्रकार के खिलाफ दिल्ली के बसंत विहार थाने में भी उगाही का मामला दर्ज है। पुलिस ने पड़ताल शुरू कर दी है। बाबा रामदेव के चालक इंद्रदेव कुमार, निवासी दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट, कनखल ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। चालक ने एक व्यक्ति पर बाबा रामदेव के संस्थानों की गुप्त सूचनाएं देने और दवाओं में मिलावट करने के लिए रिश्वत की पेशकश का आरोप लगाया था। सीओ सिटी अजय सिंह ने इस मामले की जांच की। 
 
सीओ के मुताबिक जांच में रिश्वत की पेशकश करने वाला व्यक्ति दिल्ली का एक खोजी पत्रकार है। उसकी पहचान पुष्प कुमार शर्मा के रूप में की गई है। पुष्प कुमार शर्मा हरियाणा निवासी है और दिल्ली में पत्रकारिता करता है। सीओ सिटी ने बताया कि बाबा रामदेव के चालक को किया गया फोन पुष्प कुमार शर्मा के नंबर से ही आया था। शिकायतकर्ता ने जिस गाड़ी का जिक्र तहरीर में किया था, उसकी भी पहचान कर ली गई है। यह सफेद सफारी पुष्प कुमार शर्मा, निवासी सुशांत लोक फेस-1 गुड़गांव, हरियाणा के नाम पंजीकृत है। उन्होंने बताया कि आरोपी बाबा रामदेव के चालक से दो बार मिला। इस दौरान चालक को रिश्वत की पेशकश की गई। यही नहीं देहरादून में जिस जगह आरोपी पत्रकार ने अपनी गाड़ी की सर्विसिंग कराई थी, उस मैकेनिक के भी बयान पुलिस ने ले लिए हैं। तमाम सबूतों के आधार पर पुलिस ने पत्रकार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 419, 503, और 506 के तहत कनखल थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया है। 
 
आरटीआई के तहत भी मांगी थी जानकारी : पत्रकार पुष्प कुमार शर्मा ने बाबा रामदेव के गुरु स्वामी शंकर देव की गुमशुदगी के संबंध में भी सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी। इसके लिए आरोपी पत्रकार ने एक स्थानीय पत्रकार की भी मदद ली थी। स्थानीय पत्रकार के नाम से ही स्टांप खरीदा गया। 
 
ज्योतिष की कॉल डिटेल ने भी की मदद : खोजी पत्रकार पुष्प कुमार शर्मा के बारे में कोई भी जानकारी होने से इनकार करने वाले हनुमंतपुरम, कनखल निवासी ज्योतिष मनीष आचार्य से भी पुलिस को कई सुराग हाथ लगे हैं। ज्योतिष मनीष आचार्य से पत्रकार पुष्प कुमार शर्मा ने पिछले 15 दिन में करीब 17 बार बात की। सीओ सिटी अजय सिंह ने बताया कि लंबी बात से यह साबित होता है कि दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं। 
 
दिल्ली में भी है मुकदमा दर्ज : खोजी पत्रकार के खिलाफ दिल्ली के बसंत विहार थाने में वर्ष 2009 में भी मुकदमा हो चुका है। यह मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। सीओ सिटी अजय सिंह ने बताया कि दिल्ली में यह मुकदमा स्टिंग ऑपरेशन कर उगाही करने से संबंधित है। (अमर उजाला)

पंजाब की शक्ति के डीजीएम गुरप्रीत ने भी दिया इस्तीफा

 

पंजाब में हिंदी समाचार पंजाब की शक्ति को अभी लांच होने में शायद और समय लग जाय लेकिन अपनी टीम के लोगों को बाहर का रास्ता दिखने का काम लगातार जारी है, जिसके तहत अभी कुछ दिन पहले ही जागरण से हाथ छुड़ा कर आये गुरप्रीत सिंह पंजाब की शक्ति में बतौर डीजीएम के पद पर विराजे थे, जुम्मा जुम्मा अभी पन्द्रह दिन में ही इस्तीफा दे गये. 
 
वैसे अख़बार के सूत्रों का कहना है कि उनकी पगार अधिक होने के कारण एनई नवीन जो कि सर्वे सर्वा बने हुए हैं, के कहने पर उन्‍हें बाहर का रास्ता दिखाया गया है. पंजाब की शक्ति में कोई भी टिक नहीं पा रहा, जिसका कारण अख़बार प्रबंधकों की अस्थिर सोच को माना जा रहा है और पंजाब की शक्ति के लांच होने में भी संदेह प्रकट होने लगा है. प्रदीप ठाकुर के बाद सर्कुलेशन इंचार्ज  संधू, आरती सेठ, मंदीप, आशु और अब गुरप्रीत को भी बहार का रास्ता दिखा दिया गया है. 
 
अख़बार के लांच होने के दावे पिछले छह माह से लगातार जारी है लेकिन सुगठित टीम और विजन की कमी के चलते पंजाब के लोगों में अखबार के लांच होने की उम्‍मीद ख़तम हो रही है. उस पर से परेशानी यह कि जो लोग पंजाब की शक्ति का दामन छुड़ा कर बाहर आये हैं वो पूरी तरह से दुष्‍प्रचार करने में लगे हुए हैं. ऐसे हालत में कई सवाल मुंह खोले खड़े हैं जिनका जवाब पंजाब की शक्ति के एनई नवीन और प्रबंधकों के पास भी नहीं है, अख़बार को पंजाब से पहले हिमाचल में लांच करने में प्रबंधक लगे हैं. प्रदेश में चर्चा है कि अगर लांच होने में और देर हुई तो पंजाब की शक्ति पर धोखाधड़ी के मामले भी दर्ज हो सकते हैं.  

जागरण के शैलेश गुप्‍ता बने एबीसी के चेयरमैन

 

जागरण प्रकाशन लिमिटेड के निदेशक (मार्केटिंग) शैलेश गुप्ता को वर्ष 2012-13 के लिए सर्वसम्मति से ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) का चेयरमैन चुना गया है। जबकि, आईटीसी लिमिटेड के कार्यकारी वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग) सैयद महमूद अहमद एबीसी के डिप्टी चेयरमैन बनाए गए हैं। हरमूज मसानी ब्यूरो में महानिदेशक होंगे।
 
इसके अलावा, वर्ष 2012-13 के लिए हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स के एम. वेंकटेश, मलयालम मनोरमा के अमित मैथ्यू, एबीपी प्राइवेट लिमिटेड के अरित्रा सरकार, उषोदया इंटरप्राइजेज के आई. वेंकट, द बांबे समाचार के होर्मुशजी एन. कामा, लोकमत मीडिया के देवेंद्र वी. दर्डा और बैनेट कोलमैन एंड कंपनी के संजीव वोहरा प्रकाशक प्रतिनिधियों की ओर से एबीसी की मैनेजमेंट काउंसिल के सदस्य चुने गए हैं।
 
एडवटाइजर्स प्रतिनिधियों की ओर से टाटा मोटर्स के रवि पिशरोदा, कोका कोला इंडिया के देबब्रत मुखर्जी, हीरो मोटोकार्प के अनिल दुआ, यूनिवर्सल मैककान एरिक्शन के शशिधर सिन्हा, मुद्रा कम्युनिकेशंस के मधुकर कामथ, ग्रुप एम मीडिया इंडिया के विक्रम सखुजा और आरके स्वामी बीबीडीओ के श्रीनिवास के. स्वामी मैनेजमेंट काउंसिल के सदस्य बनाए गए हैं। (एजेंसी)

गढ़वा में पत्रकार पर हमला, पुलिस उदासीन

 

गढ़वा जिले के भंडरिया में पुलिस का नहीं माफियाओं का राज चल है। यह हम नहीं बल्कि स्वयं भंडिरिया पुलिस द्वारा बुधवार की दोपहर माफियाओं के हाथों पीटे गये पत्रकार सत्येंद्र केसरी के मामले मे अब तक की गई पुलिसिया कार्रवाई कह रही है। इससे माफियाओं के हौसले को इतना बल मिला है कि उन्होंने एक बार फिर शुक्रवार को अहले सुबह संगठित हो सत्येंद्र पर हमला बोल दिया। घटना के समय सत्येंद्र गोदरमाना से अखबार का बंडल लेकर भंडरिया लौट रहा था। भला हो सरइडीह के ग्रामीणों का जिन्होंने प्रखंड प्रमुख व अन्य पंचायत प्रतिनिधियों की मदद से सत्येंद्र को पिटाई कर रहे माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराकर उसे इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भंडरिया में भर्ती कराया।
 
पत्रकार सत्येंद्र केसरी उर्फ टेंपो को बुधवार को सूचना मिली की सुरक्षित वन क्षेत्र से जेसीबी लगाकर अवैध तरीके से मोरम-मिट्टी की खुदाई की जा रही है। वह जब वहां पहुंचा तो पाया कि रेंजर अगिस्तन तिग्गा व वनरक्षी एतवा मुंडा तथा कैटल वाचर जुमराती मंसूरी के साथ मोरम लदे दो टै्रक्टर को जब्त कर रेंज कार्यालय लौट रहे हैं। सत्येंद्र ने अवैध खुदाई कर रहे जेसीबी का फोटो लिया और पकड़े गये ट्रैक्टर के संबंध में जानकारी लेने के लिए रेंज कार्यालय जाने लगा। तभी वहां एक आल्टो कार पर सवार हो अशोक गुप्ता, राजेश कुमार वर्मा उर्फ बबलू वर्मा, संजय केसरी व मदन केसरी पहुंचे। कार रुकते ही वे लोग सत्येंद्र को भद्दी-भद्दी गाली देते हुए उसकी पिटाई कर डाली। इस मामले में सत्येंद्र ने भंडरिया थाना में उक्त सभी लोगों के विरुद्ध लिखित शिकायत की है। बावजूद इसके पुलिस का रवैया आरोपियों के धर-पकड़ के प्रति उदासीन रहा। नतीजा रहा कि उक्त लोगों ने शुक्रवार की अहले सुबह एक बार फिर से सत्येंद्र का हाथ-पैर बांधकर उसकी जमकर धुनाई कर डाली।
 
पत्रकार सत्येंद्र केसरी की माफियाओं द्वारा पिटाई का विरोध स्थानीय पत्रकारों के साथ-साथ प्रखंड के बुद्धिजीवियों ने किया। व्यवसायियों ने अपनी दुकानें बंद कर इंदिरा गांधी चौक पर जमा हो गये तथा सत्येंद्र की पिटाई करने वाले सभी लोगों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग पुलिस प्रशासन से की। इधर पुलिस अधीक्षक डा. माइकल राज एस का कहना है कि पीड़ित पत्रकार द्वारा जिन लोगों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए थाना में आवेदन दिया गया है, उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। पुलिस शीघ्र ही सभी आरोपियों पर कार्रवाई करेगी। साभार : जागरण 

कोलगेट मामले में भास्‍कर समूह ने भी मुंह काला किया है!

: 765 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप : कोल ब्‍लाक आबंटन के खेल में केवल राजनेताओं और उद्योगपतियों के ही हाथ और मुंह काले नहीं हुए हैं बल्कि मीडिया से जुड़े लोगों के दामन पर भी यह कालिख लगी है. काला हीरा लूटने के इस खेल में लोकमत समाचार समूह के मालिकान का नाम आया तो एक अखबार ने खुलासा किया है कि भास्‍कर समूह ने भी 765 करोड़ रुपये कोयले से अपना हाथ काला किया है. 

 
आरोप है कि भास्‍कर समूह अखबार का इस्‍तेमाल करते हुए अपनी दो बिजली कंपनियों के लिए कोल ब्‍लाक का आबंटन करवाया लेकिन इस कोयले का उपयोग बिजली उत्‍पादन में करने की बजाय इसे बाजार में बेच दिया गया.
 

हिन्दुस्तान, रांची के संपादक सहित दो रिपोर्टरों को कोर्ट का समन

पलामू के वरीय अधिवक्ता मंगलदेव सिंह ने 25 मई 2011 को पलामू सिविल कोर्ट में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में दैनिक हिन्दुस्तान समाचार पत्र में मिथ्या समाचार प्रकाशित कर उनकी प्रतिष्ठा हनन से संबंधित परिवाद दायर किया था. परिवाद संख्या 429/2011 है. अदालत ने पर्याप्‍त साक्ष्य के आधार पर दंड प्रक्रिया संहिता 501 के तहत हिन्दुस्तान के संपादक दिनेश मिश्र व डालटनगंज कार्यालय के प्रभारी सतीश सुमन व रिर्पोट दिलीप कुमार के विरूद्ध संज्ञान लेते हुए समन जारी किया है.

 
वरीय अधिवक्ता मंगलदेव सिंह ने हिन्दुस्तान के वरीय संपादक दिनेश मिश्र सहित मेदिनीनगर कार्यालय के प्रभारी सतीश सुमन व रिर्पोटर दिलीप कुमार के विरूद्ध वरीय अधिवक्ता को प्रतिष्ठा हनन करने की नियत से गलत दुष्‍प्रचार करने हेतु मिथ्या समाचार दैनिक हिन्दुस्तान में छापने से संबंधित परिवाद दायर किया था. वरीय अधिवक्ता ने अपने पक्ष से संबंधित गवाहों को साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया. सभी साक्षियों ने भी अखबार में छपे समाचार को पढ़ने के बाद समाचार को मिथ्या व प्रतिष्ठा हनन होने की बात की पुष्टि की. 
 
इस मामले में हिन्दुस्तान मेदिनीनगर कार्यालय के प्रभारी सतीश सुमन व रिर्पोट दिलीप कुमार ने 4 अगस्त 2012 को मुख्य न्यायायिक दंडाधिकारी की अदालत में जमानत याचिका दाखिल किया था, अदालत ने पर्याप्‍त प्रतिभूति लेकर जमानत अर्जी को स्वीकृत कर लिया. शेष आरोपी अनुपस्थित रहे. अगली तिथि 18 सितंबर निश्चित की गई है. इस मामले को प्रोविंशियल इंचार्ज सह संयुक्त समाचार संपादक वाइएन झा ने उक्त मामले को काफी हल्क तरीके से लिया. उन्होंने समय रहते मेदिनीनगर कार्यालय से छपी समाचार पर संज्ञान लेकर वरीय संपादक दिनेश मिश्र से वार्ता नहीं की. दूसरी ओर सतीश सुमन ने भी उक्त मैटर पर संपादक को समय रहते सूचना नहीं दी. बाध्य हो कर वरीय अधिवक्ता को पदिवार दायर करना पड़ा. जबकि अखबार में प्रकाशित समाचार को लेकर वरीय अधिवक्ता मंगलदेव सिंह ने कानूनी नोटिस भी रांची कार्यालय भेजा था. नीचे समन की कॉपी.
 
 
 

प्रतियां खरीद कर पत्रिका को नुकसान पहुंचा रहा है भास्‍कर!

 

पत्रिका के भोपाल एडिशन की हालत दिनोदिन ख़राब होती जा रही है, सर्कुलेशन के लगातार गिरने से मैनेजमेंट खासा परेशान है. परेशानी की मुख्य वजह दैनिक भास्कर द्वारा पत्रिका की खरीदी करना है. याद रहे कि भोपाल में दैनिक भास्कर का मुख्यालय है तथा समूह के चैयरमेन रमेश अग्रवाल तथा एमडी सुधीर अग्रवाल वहीँ अधिक समय रहते हैं. बताते हैं कि रमेश अग्रवाल का सर्कुलेशन के क्षेत्र में कोई सानी नहीं है, उन्हीं के दिमाग की उपज है कि एमपी व सीजी में पत्रिका की प्रतियाँ खरीद कर पत्रिका समूह को चौतरफा नुकसान पहुँचाया जाये. 
 
इस बीच दैनिक जागरण समूह ने भी नई दुनिया खरीद कर एमपी व सीजी में आमद दे दी. भास्कर समूह से लड़ाई लड़ रहे पत्रिका को अब इस समूह से भी लड़ना पड़ रहा है. सूत्र बताते हैं कि जागरण की हलचल होते ही पत्रिका ने भोपाल में अपने अखबार के साथ एक्सपोज़ का प्रकाशन शुरू किया और अखबार का मूल्य 80 /- रुपये कर दिया, जिन ग्राहकों को एक्सपोज़ नहीं चाहिए उन्हें 60 /- रुपये में ही पत्रिका मिलेगा. एजेंटों के ऊपर दबाव डाला जा रहा है कि उन्हें एक्सपोज़ की प्रतियाँ अधिक बेचनी हैं, जिससे वो हैरान परेशान हैं. कई एजेंटों ने तो चार – चार माह से पत्रिका को पेमेंट ही नहीं किया है. 
 
उधर, पत्रिका के भोपाल मैनेजमेंट की तानाशाही और सर्कुलेशन में काम करने वाले लोगों के दबाव के चलते भोपाल पत्रिका के सबसे बड़े एजेंट मनोज वाणी ने एक पत्र मेल द्वारा भेज कर तुरंत एजेंसी छोड़ने का निर्णय ले लिया. मनोज वाणी के पास पत्रिका के पाँच सेंटरों पर तकरीबन पचास हज़ार कॉपी थी. अब पत्रिका मैनेजमेंट एजेंटों की तलाश में घूम रहा है, लेकिन कोई भी हाथ रखने को तैयार नहीं है. मनोज वाणी ने अपनी व्यथा पत्रिका के एमडी निहार कोठारी को लिख कर भेजी है. 

प्रधान संपादक गुंजन सिन्हा ने छोड़ा न्यूज़11 का साथ

न्यूज़ 11 के प्रधान संपादक गुंजन सिन्हा ने चैनल को अलविदा कह दिया है. न्यूज़ 11 के साथ गुंजन सिन्हा की यह दूसरी पारी थी. दोनों बार अप्रिय स्थिति में गुंजन सिन्हा ने चैनल का साथ छोड़ा है. हालाँकि अंदरखाने की ख़बरों के अनुसार गुंजन सिन्हा ने चैनल के कर्ता- धर्ता अरूप चटर्जी के द्वारा धमकी दिए जाने के बाद यह कदम उठाया है. गुंजन सिन्हा ने अरूप द्वारा दिए गए धमकी को गंभीरता से लिया और फेसबुक पर अपना दर्द भी बयां किया. गुंजन सिन्हा यहीं नहीं रुके बल्कि न्यूज़ 11 और अरूप की नन बैंकिंग कंपनी केयर विजन की पोल पट्टी खोलनी शुरू कर दी.

 
अपने फेसबुक वाल पर गुंजन सिन्हा ने लिखा कि झारखण्ड में एक और घोटाला हो रहा है जो कि संजीवनी बिल्डकान घोटाले की ही तरह है. ज्ञात हो कि संजीवनी बिल्डकान नाम की एक कंपनी द्वारा रांची के लोगों से फ्लैट दिलाने के नाम पर ठगी की गयी है और इस मामले में बिल्डकान कंपनी के मालिक जेल में हैं. हालाँकि गुंजन सिन्हा ने किसी का नाम लिए बगैर यह बातें लिखी है परन्तु सभी जानते हैं कि अरूप केयर विजन द्वारा उगाहे गए पैसों से धनबाद में रियल स्टेट कारोबार डेवलप करने के फ़िराक में हैं. इशारों इशारों में गुंजन सिन्हा ने अरूप को मीडिया माफिया तक कह दिया है. और तो और इस बात पर भी सवाल उठाये हैं कि जिस आदमी का पचास हज़ार का चेक बाउंस हो जाता है उसे नन बैंकिंग का लायसेंस कैसे मिल जाता है?
 
रांची में एक महिला के साथ हुए बलात्कार की घटना के बाद रांची पुलिस द्वारा एक्शन नहीं लेने से परेशान गुंजन सिन्हा जब अपने चैनल में इस बात की खबर बनाना चाहते हैं तो उनको रोका जाता है. इस बात से दुखी होकर गुंजन सिन्हा ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा कि जन चैनल डीजीपी की स्तुति गान करेगा तो मीडिया संस्थान कैसा चलेगा? गौरतलब है कि गुंजन सिन्‍हा बिहार-झारखंड के जाने माने और तेजतर्रार पत्रकारों में गिने जाते हैं. गुंजन ईटीवी, मौर्य, आर्यन, आज, टाइम्‍स आफ इंडिया समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं. गुंजन सिन्‍हा ने भड़ास से बातचीत में अपने इस्‍तीफे की पुष्टि की. आइए अब आप भी देखें गुंजन सिन्हा के फेसबुक का स्क्रीन शॉट.
 
 

जीते जी अटल जी को स्‍वर्गवासी बना दिया दैनिक जागरण ने

ग्यारह राज्य, सैंतीस संस्करण और 5.6 करोड़ पाठक संख्या वाले भारत के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले बल्कि यूँ कहें कि "विश्व के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले" अखबार "दैनिक जागरण" ने भाजपा के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को "स्वर्गीय" बना दिया! जी हाँ, आगरा संस्करण के पृष्‍ठ संख्या आठ पर छपी खबर पर विश्वास करें तो पूर्व प्रधानमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी स्वर्गवासी हो चुके हैं।

 
अब इसे सम्पादकीय विभाग की बेवकूफी कहें या कर्मचारियों के शोषण का नतीजा जो इन्होंने अटल जी को जीते-जी मार डाला। वैसे भी पिछले कुछ समय से जागरण की आगरा यूनिट कर्मचारियों के शोषण/षड़यंत्र और ऐसे ही कांडों के लिए ख्याति प्राप्त कर रही है। जागरण के कर्मचारी काम में कम और षणयंत्रों में कुछ ज्‍यादा ही ध्‍यान लगाने लगे हैं। 
 
 
शिवम् भारद्वाज
आगरा 

एसएसपी बोला- खबर उल्टी लिखी तो जेल भेज दूंगा..

 

पूरे देश में पत्रका‍रों का उत्‍पीड़न तथा डराने धमकाने का दौर जारी है. ताजा मामला उत्‍तराखंड के हरिद्वार जिले का है. यहां पर एसएसपी ने हिंदुस्‍तान के पत्रकार को धमकी दी कि अगर खबर उल्‍टी लिखी तो जेल भेज दूंगा. हरिद्वार में एसएसपी ने पुलिसकर्मियों के गैंगरेप की शिकार युवती को आरोपियों की तरह मीडिया के समक्ष पेश किया. 
 
इस दौरान पत्रकार कुछ प्रश्‍न पूछने लगे तो एसएसपी बिफर गया तथा हिंदुस्‍तान अखबार के पत्रकार को धमकी देने के अंदाज में कहा कि अगर उल्‍टी खबर छापी तो जेल भेज दूंगा. एसएसपी की धमकी से नाराज पत्रकारों ने प्रेस कांफ्रेंस का बहिष्‍कार कर दिया. इस धमकी से पत्रकारों में रोष है. यूपी-उत्‍तराखंड में सच लिखने वाले पत्रकारों के उत्‍पीड़न का दौर चल रहा है. पुलिस अपने अधिका‍रों का दुरुपयोग करते हुए पत्रकारों को सबक सिखाने का कोई मौका नहीं गंवा रही है.  
 

गलतियों का अंबार लगाता दैनिक जागरण

 

"कुछ भी हो जाये हम नहीं सुधरेंगे" शायद कुछ ऐसी ही कसम इस समय दैनिक जागरण वालों ने खा रखी है। पिछले कुछ समय से अखबार में निरंतर हो रही गलतियाँ इस बात का प्रमाण हैं। ऐसा ही एक और वाकया इनके आगरा संस्करण के 7 तारीख के अखबार में खेल पेज पर देखने को मिला, जहाँ "साइना से सीखो मेहनत करना : तेंदुलकर" शीर्षक के साथ छापी गयी खबर में "साइना नेहवाल" की जगह "सानिया मिर्जा" की तस्वीर लगा दी गयी। 
 
खबर तो अन्य संस्करणों में भी छपी थी लेकिन उनमे केवल सचिन की फोटो ही थी, आगरा संस्करण में तो सचिन के साथ साइना की जगह सानिया की तस्वीर लगाकर खबर को खेल पेज पर लगाया गया। ये खबर अभी भी ऑनलाइन 7 तारीख के आगरा संस्करण पर देखी जा सकती है। ये गलतियाँ क्यूँ हो रही हैं, क्या कारण हैं वो सब एक अलग बात है लेकिन "नंबर वन" और "उत्कृष्ट छपाई" होने का दंभ भरने वाले एक स्तरीय अखबार से कम से कम इस प्रकार की गलतियों की अपेक्षा तो नहीं की जा सकती। एक बात तो माननी पड़ेगी कि छपाई वास्तव में उत्कृष्ट है तभी तो साइना की जगह सानिया की तस्वीर साफ़ पहचानने में आ रही है!
 

शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा, मुद्राराक्षस जैसा नहीं

सच आज की तारीख में अगर शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा। मुद्राराक्षस जैसा नहीं। नामवर जी बीते ३० अगस्त को लखनऊ आए। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के बुलावे पर। हिंदी संस्थान ने भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर व्याख्यान आयोजित किया था। कुसुम वार्ष्णेय भगवती बाबू पर बोलीं। बिलकुल पारंपरिक ढंग से। मुद्राराक्षस अपनी रवायत के मुताबिक अमृतलाल नागर पर बोले विवादास्पद ढंग से। 

 
कहा कि नागर जी प्रथम श्रेणी के लेखक नहीं थे। आदि-आदि। इस पर सभा में विवाद भी हुआ। कुछ लोग इतने मुखर हुए कि मुद्रा जी को बोलने नहीं दिए। यह भी शर्मनाक था। लेकिन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर नामवर जी बोले बिलकुल पानी की तरह। और इधर जैसा कि वह बढ़ती उम्र के चलते स्मृति दोष के शिकार होने लगे हैं अपने बोलने में जब-तब, आज बिलकुल नहीं हुए। कोई पौन घंटे वह बोले। जैसा एक अभिभूत शिष्य अपने गुरु के लिए बोल सकता है। बिलकुल भक्ति भाव से। उन्हों ने बताया कि कैसे उन के गुरुदेव बिना अपनी हसरत पूरी किए दुनिया से कूच कर गए। उन्हों ने पहले सूर पर लिखा। फिर कबीर पर लिखा। वह तुलसी पर भी लिखना चाहते थे। तैयारी भी कर चुके थे। पर विधिवत तुलसी पर लिखे बिना वह दुनिया छोड़ गए। नामवर ने तुलसी पर उन की लिखी कुछ टीकाओं का हवाला भी दिया। उन्हों ने पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी द्वारा संपादित सरस्वती में तुलसी की रामचरित मानस के अयोध्या कांड की चौपाई:
 
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथ अमित अति आखर थोरे॥
जिमि मुख मुकुर, मुकुर निज पानी । गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥
 
पर छपे लेख का विस्तार से ज़िक्र किया। तुलसी की विपन्नता और काशी प्रवास में उन की उपेक्षा को हजारी प्रसाद द्विवेदी की विपन्नता और काशी प्रवास की उपेक्षा से जोड़ा और बताया कि असल में गुरुदेव तुलसी के बहाने अपनी विपन्नता, अपनी उपेक्षा को लिखना चाहते थे। तुलसी ने भी असल में राम के बहाने अपने ही मान-अपमान की कथा लिखी थी। नामवर बोले हर उपन्यास कहीं न कहीं लेखक की आत्मकथा भी होता ही है।
 
जैसे तुलसी जब बनारस में रहते थे तो बनारस से बाहर रहते थे। अभी भी देखिए कि तुलसी घाट शहर में नहीं शहर से बाहर है। तुलसी भी दरवाज़ा-दरवाज़ा घूम कर एक-एक दाना भिक्षा में बटोरते थे, तब खाते थे। बाबा विश्वनाथ का दर्शन उन्हें नसीब नहीं था। वह शहर से दूर ही रह कर गंगा नहा लेते थे। हमारे गुरुदेव भी उसी बनारस में घूम-घूम कर भागवत बांच-बांच कर जीवन यापन करते थे। शांति निकेतन भी गए पढा़ने तो वहां कोई अच्छी तनख्वाह नहीं मिलती थी। पचास रुपए में कोई बड़े परिवार का खर्च कैसे चला सकता था?वह चलाते थे। तमाम जगहों पर वह लिखते भी रहते थे। बनारस आए। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे।बनारसी राजनीति के शिकार हो कर यहां से भी बर्खास्त कर दिए गए। चंडीगढ़ जाना पड़ा उन्हें फिर पढा़ने के लिए। कहते हैं काशी में मरने से मुक्ति मिलती है। पर हमारे गुरुदेव को मुक्ति नहीं मिली। जैसे कबीर काशी छोड़ मगहर में मरे हमारे गुरुदेव भी दिल्ली में मरे।
 
हजारी प्रसाद द्विवेदी और उन की रचनाओं से जुड़ी कई अनछुई बातें बड़े मोहक अंदाज़ में आज नामवर ने कहीं। बड़ी शिद्दत और नफ़ासत से । न सिर्फ़ वह डूब कर बोल रहे थे बल्कि सुनने वालों को भी उस में डुबकी लगवा रहे थे। किसी शिष्य का गुरु को ऐसा अवदान मैं पहली बार देख रहा था। और भींग रहा था। बतर्ज़ कबीर बरसे कंबल भींजे पानी। वह व्यौरे पर व्यौरे ऐसे परोसते गए जैसे कोई स्त्री रसोई परोसे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और राधाबल्लभ त्रिपाठी तक वह ले गए। विश्वनाथ त्रिपाठी के व्योमकेश दरवेश की भी चर्चा की। उन के उपन्यासों और उन की संस्कृत कविताओं की बात की। कहा कि उन के उपन्यासों में भी कविता है। इस बार नामवर के बोलने की खासियत यह भी थी कि वह बिखरे नहीं, कुछ भूले नहीं। उम्र का प्रभाव आज गायब था। अपेक्षतया कम समय बोले लेकिन हम जैसे सुनने वाले गदगद हो गए। और तृप्त हो कर घर लौटे। हालां कि मुद्रा जी भी नागर जी के शिष्य कहे जाते हैं। पर उन्हों ने आज नागर जी के नाम पर जो बड़बोलापन और बदमगजी की वह भी नहीं भूलने वाली है। जाने क्या है कि वह धारा के खिलाफ़ बोलने के चक्कर में इधर कुछ वर्षों से वह निरंतर कुछ का कुछ इस अंदाज़ में बोल जाते हैं कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है। वह फ़तवा जारी कर बैठते हैं बिना किसी तर्क या आधार के। कई बार वह अपनी विद्वता का दुरुपयोग करते हुए मिलते हैं। खास कर इधर हिंदी कवियों और लेखकों को ले कर उन का धिक्कार भाव बहुत जागा है। 
 
श्रीलाल शुक्ल से जो वह शुरु हुए हिंदी लेखकों की धुलाई पर तो प्रेमचंद तक की धुलाई पर उतर आए। भगवती चरण वर्मा पर भी वह फ़तवा जारी कर चुके हैं। बता चुके हैं कि वह जनसंघी और सामंती लेखक थे। वह बिना रचनाओं का ज़िक्र किए, बिना रचनाओं की पड़ताल किए किसी भी के लिए कुछ भी फ़तवा जारी करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। और बिलकुल लगभग कुतर्क करते हुए। मुद्रा जी एकला चलो की धुन में यह भी भूल जाते हैं कि उन्हें आखिर जाना कहां है? एक समय वह लोहियावादी कहे जाते थे पर लोहिया को भी बाद में पानी पी कर कोसने लग गए। तब जब कि वह खुद बताते हैं कि लोहिया जी ने उन का विवाह भी करवाया था। अभी बीते साल कथाक्रम के एक आयोजन में वह कह गए कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान हिंदी कवि भजन लिख रहे थे। आज़ादी की कविताएं या क्रांतिकारी कविताएं तो बस उर्दू में लिखी जा रही थीं। फ़ैज़, इकबाल से लगायत कई नाम उन्हों ने गिना दिए और कहा कि हिंदी में उस समय भजन लिखी जा रही थी। 
 
वह मैथिलीशरण से लगायत दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद , पंत, भगवतीचरण वर्मा आदि सभी को भूल गए। ऐसे ही तमाम मौकों पर वह अखबारी सुर्खियां बटोरने वाले बयान दे जाते हैं। भक्ति साहित्य, संस्कृत साहित्य, वेद, उपनिषद, भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, तुलसी आदि से तो उन का बैर भाव जग जाहिर है। स्थापित सत्य है उन का। बहुतों का। पर दिक्कत यह है कि कर्म कांड आदि का विरोध करते-करते वह प्रेमचंद, लोहिया आदि की भी खटिया खड़ी करने में संलग्न हो जाते हैं। विरोध करने के लिए विरोध करने लग जाते हैं। तो बहुत मुश्किल होती है। नहीं सच यह है कि उन के जैसे पढे़ और जानकार बहुत कम लोग रह गए हैं। मैं मानता हूं कि मुद्रा जी का अध्ययन नामवर जी से कम नहीं ज़्यादा ही होगा। पर वह जो बोलने में अतिरेक पर अतिरेक कर जाते हैं वह हम जैसे उन के प्रशंसकों पर कई बार भारी पर जाता है। प्रेमचंद को ले कर तो उठे उन के उबाल को वीरेंद्र यादव ने मानीखेज़ टिप्पणी लिख कर उन्हें शांत कर दिया था। पर भगवती बाबू और अमृतलाल नागर पर उन्हें मकूल जवाब मिलना अभी बाकी है। हां लोहिया पर भी। खास कर इस अर्थ में भी कि जब नामवर जी कह रहे हों कि परंपरा एक वचन नहीं बहुवचन है।
 
जैसे मुद्रा जी जब नागर जी पर बोलने आए तो कहने लगे कि ऐसे समारोहों में दिक्कत यह है कि झूठ बहुत बोलना पड़ता है। सुनने में बात बहुत अच्छी लगी। पर यह क्या वह तो सचमुच झूठ पर झूठ बोलने पर आमादा हो गए। नागर जी के लेखन पर जैसे उन्हों ने फ़तवा ही जारी कर दिया कि वह प्रथम श्रेणी के लेखक नहीं है। और यह बात जब उन्हों ने एकाधिक बार कही तो किसी ने टोकते हुए पूछा भी कि यह प्रथम श्रेणी का लेखन क्या होता है? पर मुद्रा इसे टाल गए। वह दास्तोवस्की और टालस्टाय आदि का नाम उच्चारने लगे। अपने पूरे भा्षण में वह सिर्फ़ फ़तवा ही जारी करते रहे। नागर जी की किसी रचना का नाम लिए बिना उन्हों ने दूसरा फ़तवा जारी किया कि उन का लेखन पुरातात्विक महत्व का है। फिर उन्हों ने एक वाकया बताया कि एक दिन जब वह नागर जी से मिलने गए तो वह लोहे का बक्सा खोले मिले। उन्हों ने पूछा कि यह क्या? तो नागर जी ने कई कागज़ दिखाते हुए कहा कि जब तुम मेरी जीवनी लिखोगे तो यह सब काम आएगा। तो नागर जी की पत्नी जो वहीं बैठी थीं, बोलीं कि सुभाष जो भी लिखना सच-सच लिखना। ज़िक्र ज़रुरी है कि मुद्रा जी का असली नाम सुभाष गुप्ता है। 
 
खैर फिर मुद्रा जी ने इस सच को नागर जी की विपन्नता से जोड़ा। नागर जी के रेडियो की नौकरी छोड़ने का भी व्यौरा बांचा मुद्रा जी ने। फिर उन के व्यक्तित्व पर भी वह ऐसे बोले जैसे नागर जी की सहृदयता या मिलनसारिता आदि भी उन की अपनी नहीं थी। वह बताने लगे कि नागर जी पर वासुदेवशरण अग्रवाल आदि का प्रभाव था। हालां कि यह भी शोध का दिलचस्प विषय होगा कि मुद्राराक्षस के व्यक्तित्व पर आखिर किस का प्रभाव है जो अपनी सारी विद्वता के बावजूद वह बिखर-बिखर जाते हैं। किसी बहस को रचनात्मक बनाने के बजाय विवादित बना कर अधूरा छोड़ देते हैं। और कि बहस के बजाय फ़तवेबाज़ी को तलवार बना लेते हैं। फ़ासिज़्म का विरोध करते-करते खुद अलोकतांत्रिक हो जाते हैं। असहिष्णु हो जाते हैं। फ़ासिस्ट हो जाते हैं। अपनी बात तो वह चाहते हैं कि हर कोई सुने पर वह खुद किसी और की बात सुनने से परहेज़ कर जाते हैं। उन को अगर गुलाब पसंद है तो चाहते हैं कि पूरे बागीचे में सिर्फ़ गुलाब ही हो। यह भला कैसे हो सकता है? वह यह भूल जाते हैं कि किसी और की पसंद कुछ और भी हो सकती है। और कि उस की पसंद को आप भले न पसंद करें, कम से कम सुन तो लें। पर उन को यह सुनना भी गवारा नहीं होता। क्या यह भी एक किस्म का फ़ासिज़्म नहीं है मुद्रा जी? चलिए इस बात को भी दरकिनार कर देते हैं। पर यह तो मुद्रा जी आप भी जानते ही हैं किन मौकों पर क्या बात कहनी चाहिए। तो यह भी जानना क्या अपराध है कि किन मौकों पर क्या बात नहीं कहनी चाहिए? दुर्भाग्य से जानते तो आप यह भी हैं पर अमल में लाते नहीं इन दिनों। अफ़सोस इसी बात का है।
 
सुनता हूं कि मुद्रा जी एक समय नागर जी से बाकायदा और नियमित डिक्टेशन लेते थे। नागर जी की आदत थी बोल कर लिखवाने की। एक समय मुद्राराक्षस और अवध नारायण मुदगल नागर जी का डिक्टेशन लेने के लिए जाने जाते थे। घर में कुमुद नागर, अचला नागर और शरद नागर ने भी उन के डिक्टेशन खूब लिए हैं। खैर इसी कारण से या किसी और कारण से सही मुद्राराक्षस नागर जी के शिष्य कहे जाते रहे हैं। पर आज उन्हों ने अपनी फ़तवेबाज़ी के गुरुर में नागर जी की सारी रोशनाई धो कर बहा दी अफ़सोस इसी बात का है। मुद्रा जी को जाने कोई बताने वाला है कि नहीं कि साहित्य या कोई भी रचना का कोई कैरेट या डिग्री नहीं होती। पसंद या नापसंद होती है। यह कोई इम्तहान नहीं है कि आप किस श्रेणी में पास हुए। रचना को रचना ही रहने दीजिए मुद्रा जी। अध्ययन एक चीज़ है, उस का दुरुपयोग दूसरी चीज़। जीवन में ज़िद चल जाती है आप की तो ज़रुर चलाइए पर यह फ़तवेबाज़ी की ज़िद अब सार्वजनिक मंचों पर ठीक बात नहीं लगती। नागर जी बड़े उपन्यासकार हैं। रहेंगे। किसी मुद्रा की फ़तवेबाज़ी उन्हें खारिज कर फ़ुटपथिया साबित नहीं कर देगी। बूंद और समुद्र से नाच्यो बहुत गोपाल, खंजन-नयन, मानस के हंस, अग्निगर्भा, करवट आदि उन की तमाम-तमाम रचनाएं उन के पाठकों में ऐसे ही हैं जैसे हवा-पानी, धरती-आकाश। 
 
हां फिर भी अगर आप को लगता है कि भगवती चरण वर्मा या अमृतलाल नागर आदि ने इतना खराब लिखा है कि उन्हें खारिज़ कर देना चाहिए तो मुद्रा जी बाकायदा उन की रचनाओं के हवाले से तार्किक ढंग से लिख-पढ़ कर खारिज करिए आप का स्वागत है। पर बार अधकचरे फ़तवे जारी कर गगनविहारी बयान जारी कर यह सब करना आप की विद्वता को शूट नहीं करता। लिखा तो कभी प्रेमचंद को ले कर अलीगढ़ के शैलेष ज़ैदी ने भी था। पर क्या प्रेमचंद की मूर्ति खंडित हो गई? हां शैलेष ज़ैदी अब कहां हैं, कम ही लोग जानते होंगे। माफ़ कीजिएगा मुद्रा जी अगर किन्हीं क्षणों में आप को किसी दिनकर, किसी गिरिजा कुमार माथुर या किसी श्रीलाल शुक्ल या किसी और ने भी बैर भाव में या किसी और भाव में ही सही काट लिया है तो उस का दंश जब-तब जिस-तिस पर बार-बार उतारना आप की सेहत और हिंदी साहित्य की सेहत के लिए ठीक नहीं है। उस दंश को बिसारिए और जानिए कि आप भी हमारी और हिंदी साहित्य की शान हैं, धरोहर हैं हमारी। यही बने रहिए। जैसे नामवर जी के पास भी अंतर्विरोध बहुतेरे हैं। बावजूद इस सब के नामवर जी ने आज अपने गुरुदेव के प्रति उन की रचनाओं को याद कर, उन की तकलीफ़ और उन के संघर्ष को याद कर उन के लिए मन में एक मिठास घोली,मन में और सम्मान बोया। आप भी नागर जी के लिए मिठास भले न घोलते, सम्मान भले न बोते पर बात-बेबात कसैलेपन से तो बच ही सकते थे। माफ़ कीजिए मुद्रा जी आज जो भी कुछ हुआ उसे देखते हुए अपनी बात एक बार फिर से दुहराने को मन कर रहा है कि आज की तारीख में अगर शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा। मुद्राराक्षस जैसा नहीं। आमीन!

 
लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

यशवंत-अनिल की गिरफ्तारी के खिलाफ मुगलसराय में भी हुआ था प्रदर्शन, देखें तस्वीर

मीडिया जगत में व्याप्त अंधेरगर्दी के खिलाफ बेखौफ होकर आवाज उठाने वाले चर्चित पोर्टल भड़ास4मीडिया को बंद कराने की दैनिक जागरण की कुत्सित मंशा के खिलाफ देश के कई कोनों में लोगों ने अपने अपने स्तर पर विरोध का इजहार किया. भड़ास से जुड़े यशवंत और अनिल को जेल में डाले जाने के खिलाफ उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में लोगों ने विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया. उस विरोध प्रदर्शन की खबर दैनिक जागरण समेत अन्य अखबारों में प्रकाशित नहीं की गई. वह खबर भड़ास के पास लोगों ने चित्र के साथ प्रेषित की. उसी खबर व तस्वीर को नीचे प्रकाशित किया जा रहा है…

 
भड़ास4मीडिया.कॉम के संपादक यशवंत की गिरफ्तारी के बाद कंटेंट एडिटर अनिल सिंह की गिरफ़्तारी पर देश भर के कामकाजी पत्रकारों में गहरा आक्रोश था। कई स्‍थानों पर इसको लेकर प्रदर्शन भी हुए। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने इसे न्‍यू मीडिया पर दमन बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की थी कि वो जल्द से जल्द इस मामले में हस्तक्षेप करे। सभी ने अनिल सिंह की गिरफ्तारी करना एक दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई बताया था तथा इसे नोएडा पुलिस की गुंडागर्दी तक कहा था।
 
दूसरी तरफ मुगलसराय में पत्रकारों ने यशवंत तथा अनिल सिंह की गिरफ्तारी के विरोध में जुलूस निकाला और बाद में एक बैठक भी की। उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास इस आशय का ज्ञापन भी भेजा। पत्रकारों का कहना था कि भड़ास4मीडिया पोर्टल की लोकप्रियता और इसकी निष्‍पक्ष बेबाक कार्यशैली को लेकर खिसियाए लोगों की चिढ़ का नतीजा है यशवंत और अनिल सिंह की गिरफ्तारी। उन्होंने इसे निंदनीय कार्य बताया और कहा कि इससे पत्रकारिता पेशे से जुड़े ही लोग नहीं बल्कि अन्य बुद्धिजीवी तबके के लोगों में भी आक्रोश है।
 
मुगलसराय में हुई बैठक में मीडियाकर्मियों ने कहा कि प्रदेश सरकार दैनिक जागरण मैनेजमेंट की शह पर कामकाजी पत्रकारों आवाज़ दबाना चाहती है। बैठक में मौजूद लोगों ने कहा कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की जाए। चेतावनी दी गई कि अगर इस साजिश का पर्दाफाश न किया गया तो आंदोलन शुरू किया जाएगा। जुलूस व बैठक में राजीव गुप्ता, कमलजीत सिंह, संदीप कुमार, मनोहर कुमार, कमलेश तिवारी, दीना नाथ वर्मा, करुणानिधि त्रिपाठी कृष्णा गौड़, भगवान नारायण चौरसिया, फैयाज़ अहमद, समर बहादुर, सुनील सिंह, अखिलेश सिंह, सत्य प्रकाश आदि लोग उपस्थित रहे।
 
 
 

वरिष्‍ठ पत्रकार पदम मेहता को लखोटिया पुरस्‍कार

 

जयपुर : वरिष्ठ पत्रकार पदम मेहता को राजस्थानी साहित्य में श्रेष्ठ योगदान के लिए रामनिवास आशारानी लखोटिया ट्रस्ट द्वारा इस वर्ष का 19वां ‘लखोटिया पुरस्कार’प्रदान किया जाएगा। राजस्थानी अकादमी के अध्यक्ष एवं रामनिवास आशारानी लखोटिया ट्रस्ट के प्रबंध ट्रस्टी रामनिवास लखोटिया ने बताया कि मेहता को पुरस्कार स्वरूप एक लाख रूपये की नकद स्मृति चिन्ह एवं शाल ओढा कर सम्मानित किया जाएगा। (एजेंसी)

एजुकेशन पर आधारित दैनिक ‘शिक्षा न्‍यूज’ लांच

 

नई दिल्‍ली। शिक्षा को सौ प्रतिशत समर्पि‍त देश का पहला और एकमात्र द्विभाषीय (हिन्‍दी और अंग्रेजी) दैनिक समाचार पत्र शिक्षा न्‍यूज बुधवार से प्रकाशित होने लगा है। वेबसाइट www.news4education.com का संचालन करनेवाली कंपनी एडीएस मीडिया ने इसका प्रकाशन आरंभ किया है। 16 पृष्‍ठों का यह समाचार पत्र शि‍क्षा से जुड़ी देशभर की हर तरह की खबरों को ए‍क साथ परोस रहा है। इसके साथ ही इसमें रोजगार से संबंधित अवसरों की भी पर्याप्‍त जानकारी दी जा रही है। 
 
इस समाचार का प्रकाशन 26 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्‍ठ पत्रकार व शिक्षाविद अर्जुन देशप्रेमी की देखरेख में हो रहा है जिन्‍हें देश के अग्रणी समाचारपत्रों का व्‍यापक अनुभव है। कंपनी के अनुसार इस दैनिक समाचार पत्र का मुख्‍य उद्देश्‍य छात्रों, अभिभवाकों, शिक्षकों, नीति निर्धारकों आदि के लिए शिक्षा से जुड़ी हर खबर मुहैया कराना है। कंपनी अपने इस समाचार पत्र के लिए देशभर में पत्रकारों का नेटवर्क स्‍थापित कर रही है। कंपनी जल्‍दी ही दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में भी अपने समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ करेगी। 

आई नेक्‍स्‍ट के रिपोर्टर उज्‍ज्‍वल अध्‍ययन अवकाश पर गए

आई नेक्स्ट, पटना के डिप्टी चीफ़ रिपोर्टर उज्ज्वल ने आगे की पढ़ाई के लिए संस्‍थान से छुट्टी ले ली है. आई नेक्‍स्‍ट प्रबंधन ने उज्‍ज्‍वल की छुट्टी मंजूर कर ली है. उज्ज्वल महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से एमफिल की पढ़ाई कर रहे हैं. उज्ज्वल आई नेक्स्ट, पटना संस्करण में शुरुआती दिनों से हैं. यहाँ उनका पांचवां साल चल रहा था. इसके पहले वे प्रभात खबर में भी उप संपादक के तौर पर काम कर चुके हैं.

सपा नेता ने पत्रकार प्रभात त्रिपाठी को पीटा, मामला दर्ज

 

लखनऊ : यूपी में सपा सरकार आने के बाद से पुलिस और सपा कार्यकर्ताओं का गुंडाराज जारी है. इसमें सबसे ज्‍यादा शिकार पत्रकार बन रहे हैं. लखनऊ में एक बार फिर एक पत्रकार सपा नेता के हमले का शिकार हुआ है. हजरतगंज में मेफेयर तिराहे के पास गाड़ी हटाने को लेकर नोकझोंक में सपा के एक नेता ने इस पत्रकार की पिटाई कर दी. 
 
कैसरबाग की ऑफीसर्स कॉलोनी निवासी पत्रकार प्रभात त्रिपाठी ने आरोप लगाया है कि वह बुधवार दोपहर अपने बच्चों को लेने कैथड्रल स्कूल गए थे. वहां मेफेयर तिराहे पर सड़क किनारे खड़ी उनकी कार के आगे सपा नेता मुकेश शुक्ला उर्फ धीरज शुक्ला ने स्कार्पियो खड़ी कर दी. जब वे बच्चों को लेकर वापस आए तथा कार में बैठाने के बाद उन्होंने हार्न बजाकर सपा नेता से गाड़ी हटाने को कहा. अनसुना करने पर वे कार से उतर कर सपा का झंडा लगी स्कार्पियो में सवार नेता के पास गए. इस पर उसने कार हटाने की बजाय गाली ग्‍लौज शुरू कर दी. विरोध जताने पर पिटाई भी की. इसके बाद प्रभात त्रिपाठी ने हजरंतगंज थाने में घटना की लिखित जानकारी दी. इंस्पेक्टर हजरतगंज अशोक कुमार वर्मा ने बताया कि मामले की रिपोर्ट दर्ज कर ली गई है.

कैमरामैन को थप्‍पड़ मारने के मामले में आसाराम बापू के खिलाफ जांच के आदेश

 

नई दिल्ली। गाजियाबाद की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने आसाराम बापू के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं। आदेश एक न्‍यूज चैनल के कैमरामैन को थप्‍पड़ मारने के प्रकरण में दी गई है। आसाराम बापू पर आरोप है कि उन्‍होंने कवरेज के दौरान न्‍यूज चैनल के कैमरामैन को थप्‍पड़ मारा था। इस आदेश के बाद आसाराम मुश्किल में आ सकते हैं। कैमरामैन ने की याचिका पर अदालत ने मंगलवार को कविनगर थानाध्‍यक्ष को जांच का आदेश दिया है।
 
कैमरामैन सचिन कुमार के वकील अजयवीर सिंह ने बताया कि उन्होंने इस संबंध में छह सितंबर को अदालत में अर्जी दाखिल की गई थी। इस अर्जी में बताया गया था कि दो सितंबर को सचिन कविनगर रामलीला मैदान में संत आसाराम बापू के प्रवचन की कवरेज करने गए थे। आसाराम बापू की मीडिया प्रभारी नीलम उनका साक्षात्कार लेने की बात कर सचिन को मंच पर ले गर्इं थीं। एक सवाल पूछने पर बापू नाराज हो गए और उन्होंने सचिन को थप्पड़ जड़ दिया। इससे उसे आज भी सुनने में परेशानी हो रही है। 
 
अधिवक्ता ने बताया कि पुलिस इस मामले में पहले ही रिपोर्ट दर्ज कर चुकी है। पर जांच में लापरवाही बरती जा रही थी, अब अदालत ने कविनगर थानाध्यक्ष को आदेश दिया कि यदि उक्त प्रकरण में विवेचना न की जा रही हो तो नियमानुसार विवेचना किया जाए। जिससे जल्‍द ही इस मामले में जांच पूरी होने की संभावना बलवती हो गई है। उल्‍लेखनीय है कि इसके पहले भी आसाराम बापू पत्रकारों पर हमला करते रहे हैं। पिछले दिनों भदोही में एक पत्रकार के साथ उनकी बदसलूकी चर्चा में रही थी। 

पीटीआई पटना के ब्‍यूरोचीफ अजय कुमार का निधन

नयी दिल्ली : प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) के पटना में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार तिवारी का आज सुबह संक्षिप्त बीमारी के बाद यहां के एक अस्पताल में निधन हो गया। वह 44 साल के थे। तिवारी 1987 में पीटीआई में आए थे और 2008 में वह विशेष संवाददाता बने। 2009 में उन्होंने पीटीआई के पटना कार्यालय के प्रबंधक के रूप में कार्यभार संभाला। उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटे हैं। (भाषा)

हरियाणा न्‍यूज के मालिक गोपाल कांडा फरार, तलाश में छापेमारी

 

: अरुणा चड्ढा को पुलिस ने गिरफ्तार किया : नई दिल्ली। एयर होस्टेस गीतिका शर्मा खुदकुशी मामले में हरियाणा के पूर्व मंत्री गोपाल गोयल कांडा पुलिस के शिकंजे में फंसते नजर आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस के नोटिस पर कांडा बुधवार को पूछताछ के लिए हाजिर नहीं हुए बल्कि अग्रिम जमानत पाने के लिए रोहिणी की कोर्ट में उनकी अर्जी पहुंच गई। बुधवार शाम पुलिस ने कांडा की गिरफ्तारी के लिए चार टीमें गठित करके उन्हें हरियाणा रवाना कर दिया। कांडा की सहयोगी अरुणा चढ्डा को गिरफ्तार कर लिया गया है।
 
इससे पहले बुधवार को पुलिस ने कांडा की एयरलाइंस कंपनी एमडीएलआर [मुरलीधर लेखराज ग्रुप] की महिला अधिकारी अरुणा चड्ढा, लीगल एडवाइजर अंकित अहलूवालिया समेत दस कर्मियों से घंटों पूछताछ की। डीसीपी नार्थ-वेस्ट पी करुणाकरण ने बताया कि गोपाल कांडा ने अपने वकील के माध्यम से पुलिस के समक्ष पेश होने के लिए तीन दिन की मोहलत मांगी, पर उन्हें बुधवार को ही जांच में शामिल होने को कहा गया था। इसके बाद भी हाजिर न होने पर कांडा को गिरफ्तार करने के लिए गुड़गांव, सिरसा व कैथल पुलिस टीमें भेजी गई हैं। पता चला है कि इन इन टीमों ने बुधवार रात कांडा के कई ठिकानों पर छापेमारी की है। लेकिन कांडा उनकी पकड़ से बाहर हैं।
 
पता चला है कि मंगलवार को पुलिस कांडा की कंपनी के एक्जीक्यूटिव मंदीप सिंह को गुड़गांव से पूछताछ के लिए दिल्ली लाई थी। मंदीप के नाम पर कांडा ने मोबाइल फोन के तीन सिम कार्ड ले रखे थे, जिससे वह गीतिका व उसके परिजनों को धमकी देते थे। सिम कार्ड की जांच की जा रही है। बुधवार को मंदीप को रोहिणी स्थित महानगर दंडाधिकारी की कोर्ट में बयान दर्ज करवा सरकारी गवाह बना लिया गया है। (जागरण)

वरिष्‍ठ फोटो जर्नलिस्‍ट महेंद्र सिंह का निधन

 

जौनपुर। चार दशकों तक जौनपुर समेत पूर्वांचल में छाया पत्रकारिता करने वाला एक सूरज डूब गया। फोटोग्राफर महेन्द्र सिंह ने रविवार की रात ब्रेन हैमरेज के बाद आखिरी सांस ली। उनकी मृत्यु की जानकारी होते ही पत्रकारों में शोक की लहर दौड़ गयी। अलफस्टीनगंज स्थित उनके आवास पर लोगों का तांता लगा हुआ है। महेंद्र सिंह ने 40 वर्षों तक विभिन्न समाचार पत्रों में छाया पत्रकारिता के साथ-साथ संवाददाता के तौर पर काम किया। जिले में उनकी पहचान छाया पत्रकारिता के भीष्म पितामह के तौर पर थी। इंदिरा गांधी और चंद्रशेखर तक उनके खींची फोटो की प्रशंसा की थी। नगर को तबाह करने वाली सन 84 की बाढ़ का कवरेज महेंद्र सिंह की नायाब उपलब्धि रही है।
 
वाराणसी से प्रकाशित आज, दैनिक जागरण, दैनिक गाण्डीव, इलाहाबाद से प्रकाशित अमृत प्रभात, एनआईपी सहित जनपद से प्रकाशित होने वाले दैनिक मान्यवर के अलावा तमाम दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक समाचार पत्रों तथा स्वतंत्र भारत के वाराणसी प्रकाशन के दौरान लम्बे समय तक के लिये अपनी कलात्मक फोटो देकर ख्याति अर्जित करने वाले श्री सिंह के निधन की सूचना मिलते ही पत्रकारिता जगत से जुड़े तथा समाजसेवी, राजनैतिक व्यापारी आदि वर्गों के लोग अलफस्टीनगंज स्थित उनके आवास पर पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया। उनकी शवयात्रा जिस समय उनके आवास से चली, जिस रास्ते से भी गुजरी, लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से पुष्पवर्षा कर उन्हें अंतिम विदाई दिया। 
 
शवयात्रा की समाप्ति आदि गंगा गोमती के पावन तट रामघाट पर हुई जहां मुखाग्नि उनके ज्येष्ठ पुत्र धीरज सिंह गुड्डू ने दिया। जिस समय उनके ज्येष्ठ पुत्र ने उनको मुखाग्नि दी, उपस्थित सभी लोगों की आखें सजल हो गयीं। अपनी वाणी की विनम्रता के चलते वह पूरे जनपद के चहेते बने हुये थे। रामघाट पर ऐसा लग रहा था जैसे पूरा जौनपुर नगर सिमटकर आदि गंगा गोमती के तट पर आ गया है। बताते चलें कि स्व. सिंह के दूसरे नम्बर के पुत्र नीरज सिंह बंटी वर्तमान में अमर उजाला बरेली संस्करण में संवाददाता के तौर पर कार्यरत हैं। बता दें कि स्व. सिंह की कलात्मक फोटो से प्रभावित देश के दो भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी व चन्द्रशेखर सिंह ने इनकी पीठ थपथपायी थी।

भूखंड के लिए पीआरओ की चापलूसी पर उतरे पत्रकार

 

श्रीमान, यशवंत सिंह। संपादक, भड़ास4मीडिया। विषय : राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में भूखंडों से वंचित पत्रकारों ने पिछले काफी समय से आंदोलन किया हुआ है, लेकिन कुछ तथाकथित इलेक्ट्रोनिक मीडियाकर्मियों ने अधिकारियों की चापलूसी करनी शुरू कर दी है।
 
मान्यवर, उपरोक्त विषयांतर्गत निवेदन है कि राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के पात्र पत्रकारों ने पिछले पांच सालों से रियायती दरों पर भूखंड की मांग के लिए आंदोलन किया हुआ है। राज्य सरकार ने लगभग तीन माह पहले पत्रकारों की मांग को जायज मानते हुए 62 भूखंड देने का निर्णय लिया और आवेदन जमा करवाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी। हालांकि पूर्व में भी पात्र पत्रकारों के लिए पत्रकार कॉलोनी काटी गई थी, जिनमें नियम कुछ अलग थे, लेकिन वर्तमान में नए नियमों की वजह से पात्र पत्रकार भी भूखंड लेने से वंचित रह सकते हैं। इसके लिए पत्रकारों ने जयपुर में जाकर मुख्‍यमंत्री शोक गहलोत से लेकर मंत्रियों, विधायकों, नगर विकास न्यास अधिकारी तथा वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर नियमों में शिथिलता की मांग की। 
 
31 जुलाई तक लगभग 120 फार्म जमा भी हो चुके हैं, लेकिन गंगानगर के सूचना एवं जन संपर्क अधिकारी (जो फाइनेंस का काम भी करते हैं, और उन्होंने लगभग अढ़ाई सौ से अधिक मुकदमें भी करवा चुके हैं) ने पत्रकारों की हितों की न सोचकर लगातार पत्रकारों के बारे में नेगेटिव सोच पाले हुए हैं। कल पीआरओ ने नगर विकास न्यास अध्यक्ष ज्योति कांडा के सामने एक नया सगूफा छोड़ा दिया। पीआरओ का कहना था पत्रकार वही होता है, जिसे राज्य सरकार ने अधिस्वीकृत कर रखा है, लेकिन हैरानी वाली बात है कि जिले में लगभग सवा सौ से अधिक पत्रकार हैं, वे अधिस्वीकृत नहीं हैं। वे सालों से श्रमजीवी पत्रकार की हैसियत से निरंतर काम कर रहे हैं।
 
कल पीआरओ से मिलने गए क्षेत्र के पत्रकार पहुंचे और सौहार्दपूर्ण बात की, लेकिन पीआरओ के शब्दबाण ऐसे थे, कि लग रहा था कि जैसे प्लॉट सरकार नहीं, बल्कि उन्होंने अपने घर से देने हों। हैरानी वाली बात है कि पीआरओ के खासमखास माने जाने वाले तथाकथित इलेक्ट्रोनिक मीडिया के चंद पत्रकार पीआरओ के सामने ही घुटने टेक गये और उनके पक्ष में उतर आए। हालंकि ये इलेक्ट्रोनिक मीडियाकर्मियों पर कई बार वसूली के आरोप भी लग चुके हैं। इन पत्रकारों के बारे में यही कहा जाता है कि वे छोटे-मोटे कार्यक्रमों की कवरेज करते हैं और पार्टी से कुछ सैटिंग कर लेते हैं। वो बात अलग है कि टीवी पर कवरेज किया हुए कार्यक्रम का प्रसारण ही नहीं होता। जब उनसे पार्टी पूछती है, तो उनका जवाब होता है 'क्या आपने रात दो बजे देखा नहीं, आपके कार्यक्रम की विशेष रिपोर्ट टीवी में प्रसारित की गई थी।'
 
इस तरह से ऐसे इलेक्ट्रोनिक मीडिया के तथाकथित रिपोर्टरों ने अपना धंधा चमकाने के लिए यह फंडा काफी समय से चलाया हुआ है। कल पीआरओ से बातचीत करते समय एक-दो इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े रिपोर्टरों ने सीधे तौर पर पीआरओ का पक्ष किया। ऐसा लग रहा था कि वे मीडिया से नहीं, बल्कि सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी से जुड़े हैं। तभी तो बार-बार पीआरओ का ही पक्ष ले रहे थे। पीआरओ भी वो, जिसके खिलाफ पूर्व में मुकदमे हो चुके हैं। जैसे-तैसे वे बहाल हुए। बहाली के बाद उन्होंने फाइनेंस का काम शुरू कर दिया। भोले-भाले लोगों को पांच प्रतिशत ब्याज के हिसाब से कर्जा देते हैं। जो नहीं देते, उन्हें मानसिक, आर्थिक रूप से परेशान करने के अलावा उन्होंने लगभग अढ़ाई सौ से अधिक मुकदमे भी दर्ज करवा चुके हैं। ऐसे में एक जिम्‍मेदार पद पर रहते हुए पीआरओ ने एक ऐसा धंधा चला रखा है, जो नियमों के विरुद्ध है। एक तरह से वे रहते तो पीआरओ ऑफिस में हैं, लेकिन काम फाइनेंस का करते हैं। … और उनका साथ देते इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े चंद तथाकथित पत्रकार।
 
जयप्रकाश मील
 
श्रीगंगानगर
'
75978-27692

पति की हत्‍या के आरोप में महिला पत्रकार प्रेमी संग गिरफ्तार

 

राजकोट। शहर में रह रही पूर्व पत्रकार नीलम को प्रेमी राज लखवा के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है। नीलम पर आरोप है कि उसने अपने पति जवेरी महेंद्र सिंह वर्मा की उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में हत्या कर दी थी। पति की हत्या के बाद नीलम राजकोट शहर आकर प्रेमी राज लखवा (मूल निवासी -उज्जैन, मप्र) के साथ पिछले तीन महीनों से यहां रह रही थी। नीलम के माता-पिता भी मीडियाकर्मी हैं।
 
पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार नीलम का जवेरी के साथ लगभग 6 वर्ष पहले विवाह हुआ था। इस दरमियान इनके घर एक बच्ची का जन्म हुआ, जो अब 4 वर्ष की है। महेंद्र सिंह वर्मा को 28 अप्रैल को किसी ने फोन करके कहीं बुलाया था और इसके बाद से ही वर्मा लापता हो गए थे। गुम होने के 2 दिन बाद ही उनकी लाश नदी से मिली थी। इसके अलावा महेंद्र सिंह के घर से उनके हाथों लिखा एक पत्र भी मिला था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि अगर उनकी हत्या होती है तो पत्नी नीलम दुरे उसकी बहन अनिता और प्रेमी राज लखवा इसके जिम्मेदार होंगे।
 
इसी पत्र के आधार पर महेंद्र के भाई राम वर्मा ने सुलतानपुर जिले के गोसाईगंज पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके अलावा हत्या के बाद से ही पत्नी नीलम, साली अनिता और नीलम का प्रेमी राज गायब थे। महेंद्र सिंह की हत्या के कुछ दिनों पहले ही नीलम ने घर से 30 हजार रुपए नगद और गहने चोरी होने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी। 
 
इसीलिए पुलिस को यह भी शक है कि हत्या करने के बाद भागने के लिए चोरी की झूठी शिकायत दर्ज कराई होगी। यूपी पुलिस इनकी तलाश कर रही थी, लेकिन अब तक इनकी भनक नहीं लग पाई थी। हाल ही में यूपी पुलिस को जानकारी मिली कि नीलम अपने प्रेमी राज के साथ गुजरात के जामनगर शहर में रह रही है। यूपी पुलिस ने गुजरात पुलिस से संपर्क किया, लेकिन इससे पहले कि पुलिस इन तक पहुंच पाती, आरोपियों को इसकी भनक लग गई और वे यहां से राजकोट भाग निकले।
 
पुलिस को अब इनकी जानकारी मिलनी शुरू हो गई थी। कुछ दिनों के प्रयासों के बाद ही गुजरात पुलिस को जानकारी मिली कि आरोपी राजकोट में रह रहे हैं। इस जानकारी के बाद राजकोट पुलिस ने इन्हें सोमवार को गिरफ्तार कर लिया। खबर है कि इन्हें यूपी पुलिस के हवाले कर दिया गया है। हालांकि गिरफ्तारी के बाद अब नीलम और राज का कहना है कि जवेरी की हत्या उन्होंने नहीं की, बल्कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया जा रहा है। इसके साथ ही नीलम का तो यहां तक कहना है कि राज के साथ सिर्फ दोस्ती है, उनके बीच पति-पत्नी का रिश्ता नहीं है।
 
फेसबुक से हुआ था परिचय : आरोपी नीलम और राज फेसबुक के माध्यम से एक-दूसरे के परिचय में आए थे। राज के मामा जामनगर में रहते हैं, इसलिए ये दोनों भी जामनगर आ गए थे। यहां इन्होंने 18 अप्रैल 12 को कोर्ट मैरिज कर ली थी।
 
दिल्ली के एक चैनल में पत्रकार थी : नीलम दिल्ली के एक न्यूज चैनल में पत्रकार रह चुकी है। फिलहाल वह सुजुकी कंपनी में सेल्स मैनेजर के रूप में पदस्थ थी। इसके अलावा नीलम के पिता उत्तरप्रदेश में एक न्यूज चैनल के ब्यूरो चीफ हैं तो मां भी एक न्यूज चैनल में कार्यरत है। (भास्‍कर) 

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : संस्‍करणों में रजिस्‍ट्रेशन संख्‍या बदलकर-बदलकर छापा गया

 

मुंगेर। विश्व के सनसनीखेज दैनिक हिन्दुस्तान के 200 करोड़ के विज्ञापन फर्जीवाड़ा में पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देशन में आरक्षी उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर की समर्पित ‘‘पर्यवेक्षण-टिप्पणी‘‘के पृष्ठ -04 पर इस कांड के वादी मंटू शर्मा ने खुलासा किया है कि मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड ने किस प्रकार भागलपुर और मुंगेर के दैनिक हिन्दुस्तान संस्करणों में बार-बार निबंधन संख्या बदलने, फर्जी तरीके से समाचर-पत्रों के मुद्रण, प्रकाशन और वितरण करने और अवैध संस्करणों में सरकारी विज्ञापन छापकर करोड़ों रुपए का फर्जीवाड़ा किया।
 
वादी मंटू शर्मा ने अभियुक्तों के द्वारा किए गए छल, धोखाधड़ी और फर्जीवाड़ा को प्रमाणित करने के लिए डीएवीपी, नई दिल्ली की शर्त्तों का उल्लंघन कर डीएवीपी विज्ञापन दर प्राप्त करने का भी सनसनीखेज खुलासा किया है।
 
हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला के प्रमुख सरकारी गवाह बने श्रीकृष्ण प्रसाद : पर्यवेक्षण टिप्पणी की पृष्ठ संख्या -04 पर मुंगेर के समाजसेवी, पत्रकार और अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद को इस विश्वव्यापी दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले से जुड़े पुलिस कांड में सरकार की ओर से प्रमुख साक्ष्य के रूप में पेश किया गया है। अभियोजन साक्ष्य (प्रथम) श्रीकृष्ण प्रसाद ने इस पृष्ठ में खुलासा किया है कि दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन फर्जीवाड़ा की पुष्टि बिहार सरकार के वित्त विभाग के अंकेक्षण -प्रतिवेदन, जिसकी संख्या- 195/2005-06 है, में भी की गई है। उन्होंने दैनिक हिन्दुस्तान के मुंगेर संस्करण के गलत और अवैध मुद्रण, प्रकाशन और वितरण का भी कानूनी नजर में बारीकियों के साथ खुलासा किया है। खुलासा इतना सरल भाषा में किया गया है कि भारत के किसी कोने के पाठक इसे पढ़कर देश के कारपोरेट प्रिंट मीडिया के सरकारी विज्ञापन घोटाले में अपने स्तर से देश के किसी भी न्यायालय या पुलिस में सीधी कार्रवाई कर सकते हैं।
 
डीएवीपी की भूमिका संदिग्ध : पर्यवेक्षण -टिप्पणी के पृष्ठ-04 के खुलासा से प्रामाणित होता है कि अभियुक्तों ने भागलपुर से अवैध ढंग से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान के लिए डीएवीपी विज्ञापन -दर पाने में या तो डीएवीपी के समक्ष गलत सूचनाएं दीं या डीएवीपी, नई दिल्ली के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मिलीभगत से गैरनिबंधित दैनिक अखबार हिन्दुस्तान (भागलपुर संस्करण) के लिए डीएवीपी ने विज्ञापन-दर जारी कर दिया और उस विज्ञापन-दर की आड़ में अभियुक्तों ने बिहार सरकार से भी सरकारी विज्ञापन प्राप्त करने का लाइसेंस प्राप्त कर लिया। हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला का यहां ही सभी कानूनी पेंच है। अब दायित्व पुलिस जांच एजेंसी पर है कि जांच एजेंसी जांच करे कि डीएवीपी विज्ञापन -दर प्राप्त करने में डीएवीपी कार्यालय, नई दिल्ली की सहभागिता है या नहीं? यदि सहभागिता है, तो किस रूप में है? क्योंकि डीएवीपी विज्ञापन दर पर ही दैनिक हिन्दुस्तान ने विगत ग्यारह वर्षों में बिहार सरकार से अरबों-अरब रूपया का विज्ञापन 38 जिलों से बटोर लिया।
 
विश्व के पाठकों की मांग पर आरक्षी उपाधीक्षक की पर्यवेक्षण-टिप्पणी की पृष्ठ संख्या-04 पाठकों के लिए यहां हू-बहू प्रस्तुत कर रहा हूं-‘‘वादी मंटू शर्मा ने अपने बयान में आगे बताया है कि दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर और मुंगेर संस्करणों में बार-बार निबंधन संख्या बदलते रहने से स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि अभियुक्तों द्वारा गलत एवं फर्जी तरीके से उक्त स्थानों से समाचार-पत्र का मुद्रण/प्रकाशन किया जा रहा है तथा अभियुक्तों को अपने कृत्यों को छिपाने के लिए समाचार -पत्र में बार-बर निबंधन संख्या बदलकर प्रकाशित करना पड़ रहा है। उन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि अभियुक्तों द्वारा किए गए छल/धोखाधड़ी एवं फर्जीवाड़ा को प्रमाणित करने हेतु प्राथमिकी के साथ आवश्यक दस्तावेज संलग्न किया गया है। उन्होंने अपने बयान में यह भी बताया है कि डीएवीपी की विज्ञापन सूची में किसी दैनिक अखबार का नाम तब दर्ज होगा, जब दैनिक अखबार का प्रकाशन 36 माह तक बिना रूके नियमित रूपसे हो चुका होगा अर्थात 36 माह तक किसी भी अखबार को बिना सरकारी विज्ञापन के ही अखबार निकालना होगा, परन्तु उक्त नियमों की अनदेखी की गई। उन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि वे सितम्बर, 2001 से दैनिक हिन्दुस्तान के नियमित पाठक हैं, जिस संबंध में उनके पास दैनिक हिन्दुस्तान के स्थानीय कार्यालय द्वारा निर्गत मासिक ग्राहक विपत्र भी उपलब्ध हैं, जिसे वे आवश्यकता पड़ने पर प्रस्तुत कर सकते हैं।
 
साक्षी श्रीकृष्ण प्रसाद, पे0 काशी प्रसाद, साकीन-मंगल बाजार, थाना-कोतवाली, जिला- मुंगेर का बयान लिया गया। इन्होंने अपने बयान में बताया कि ये एक समाजसेवी हैं तथा वादी के सहयोगी हैं। इन्होंने अपने बयान में प्राथमिकी एवं वादी के बयान का पूर्णरूपेण समर्थन करते हुए आगे बताया कि प्रेस पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम-1867 के तहत किसी भी समाचार पत्र के प्रकाशन हेतु निम्नांकित नियमों का पालन किया जाना आवश्यक है:-
 
(1) प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करने के पूर्व संबंधित जिले के जिला दंडाधिकारी के समक्ष विहित प्रपत्र में घोषणा-पत्र समर्पित करना।
 
(2) तद्नुसार जिला दण्डाधिकारी द्वारा प्रमाणीकरण देना।
 
(3) कंपनी रजिस्ट्रार से अनुमति प्राप्त करना।
 
(4) भारत सरकार के समाचार-पत्र पंजीयक से पंजीयन कराना।
 
इन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि उक्त सम्पूर्ण प्रक्रिया का अनुपालन करने के उपरांत ही नियमतः किसी समाचार पत्र का प्रकाशन किया जा सकेगा, परन्तु अभियुक्तों द्वारा उक्त तथ्यों की अनदेखी करते हुए 03 अगस्त, 2001 से दैनिक हिन्दुतान का भागलपुर संस्करण प्रकाशित किया जाने लगा। उसके बाद मुंगेर से भी दैनिक हिन्दुस्तान का संस्करण का प्रकाशन किया जाने लगा, जिसके लिए भी निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया गया जिसकी पुष्टि बिहार सरकार के वित्त विभाग की अंकेक्षण प्रतिवेदन संख्या-195/2005-06 से भी होती है। इन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि भागलपुर एवं मुंगेर से मुद्रित एवं प्रकाशित होनेवाले दैनिक हिन्दुस्तान में वर्ष 2001 से 30 जून, 2011 तक आरएनआई नं0-44348/86, जो पटना के लिए आवंटित है, का प्रयोग किया गया जबकि 01 जुलाई, 2011 से 16 अप्रैल, 2012 तक आरएनआई नं. के स्थान पर ‘‘आवेदित‘‘छापा जाने लगा। पुनः दिनांक 17 अप्रैल, 2012 को उक्त समाचार पत्र में आरएनआई नं0- बीआईएचएचआईएन/2011/41407 छापा गया।
 
जांच का विषय : प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय, नई दिल्ली ने दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर संस्करण को पहली बार जो निबंधन संख्या -बीआईएचएचआईएन/2011/41407 आवंटित किया, वह भी जांच का विषय है। दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर संस्करण के लिए आवंटित इस निबंधन संख्या का प्रकाशन 17 अप्रैल, 2012 से प्रिंट लाइन में शुरू हुआ। परन्तु, इस निबंधन संख्या में निबंधन का वर्ष 2011 दिखाया गया है जो पुलिस अनुसंधान का अलग ही विषय है। अभी भी दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर से प्रकाशित रविवारीय संस्करण के लिए प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय से निबंधन संख्या प्राप्त नहीं हुआ है। मजे की बात है कि गैर निबंधित दैनिक हिन्दुस्तान के रविवारीय संस्करणों में भी सरकारी विज्ञापन का प्रकाशन और सरकारी विज्ञापन के प्रकाशन के विरूद्ध राशि की वसूली धड़ल्ले से की जा रही है।
 
सभी अभियुक्तों के विरूद्ध प्रथम दृष्टया आरोप प्रमाणित : मुंगेर पुलिस ने कोतवाली कांड संख्या-445/2011 में सभी नामजद अभियुक्त (1) शोभना भरतिया (अध्यक्ष, दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली), (2) शशि शेखर (प्रधान संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली), (3) अकु श्रीवास्तव (कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना संस्करण), (4), बिनोद बंधु (स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, भागलपुर संस्करण) और (5) अमित चोपड़ा (मुद्रक एवं प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली) के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420/471/476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट,1867 की धाराएं 8 (बी),14 एवं 15 के तहत लगाए गए सभी आरोपों को अनुसंधान और पर्यवेक्षण में ‘सत्य‘घोषित कर दिया है।
 
सांसदों से इस विज्ञापन घोटाले को संसद में उठाने की अपील : देश के माननीय सांसदों से इस विज्ञापन घोटाले को आगामी संसद सत्र में उठाने की अपील की गई है। देश की आजादी के बाद यह पहला मौका है कि माननीय सांसद देश के कोरपोरेट मीडिया के अरबों-खरबों के सरकारी विज्ञापन घोटाले को सबूत सदन के पटल पर रख सकेंगे। अब तक अखबार ही देश के भ्रष्टाचारियों को अपने अखबारों में नंगा करता आ रहा है। अब माननीय सांसद भी आर्थिक अपराध में डूबे शक्तिशाली मीडिया हाउस के सरकारी विज्ञापन घोटाले को संसद में पेश कर आर्थिक भ्रष्टाचारियों को नंगा कर सकेंगे।
 
गिरफ्तारी का आदेश और आरोप-पत्र समर्पित होना बाकी है : विश्व के इस सनसनीखेज हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले में पुलिस अधीक्षक के स्तर से पर्यवेक्षण रिपोर्ट -02 जारी होने के बाद अब कानूनतः इस कांड में सभी नामजद अभियुक्तों के विरूद्ध गिरफ्तारी का आदेश और आरोप पत्र न्यायालय में समर्पित करने की प्रक्रिया शेष रह गई है। देखना है कि मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के नेतृत्व में बिहार में आर्थिक अपराधियों के विरूद्ध चले रहे युद्ध में सरकार कब तक इस मामले में गिरफ्तारी का आदेश और आरोप-पत्र न्यायालय में समर्पित करने का आदेश मुंगेर पुलिस को देती है?
 
क्या सरकार अभियुक्तों को सजा दिला पाएगी? : विश्व के पाठक अब प्रश्न कर रहे हैं कि क्या बिहार सरकार दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले में शामिल कंपनी की अध्यक्ष शोभना भरतिया, प्रधान संपादक शशि शेखर और अन्य संपादकों को सजा दिलाने में भविष्य में सफल होगी?
 
मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नं0- 09470400813 के जरिए किया जा सकता है. 


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कपूरथला में दैनिक जागरण के पांचवें कार्यालय का चौथा उद्घाटन

 

कपूरथला : हिंदी समाचार दैनिक जागरण कपूरथला उप कार्यालय के पांचवें दफ्तर का चौथा उदघाटन, वरिष्ठ महिला पत्रकार व जागरण प्रदेश प्रभारी मीनाक्षी शर्मा द्वारा मंगलवार को हुआ। लगभग डेढ़ दशक पहले पंजाब में लांच हुय हिंदी समाचार दैनिक जागरण का कपूरथला में 2002 में आगाज़ हुआ था तब कपूरथला जिले की कमान प्रभारी के तौर पर नरोतिया ने संभाली थी, तथा जटपूरा शेत्र में एक छोटी सी दुकान से कार्य प्रारंभ किया गया। 
 
इसके बाद प्रभारी की कमान जल्द ही लखनऊ से सम्बंधित पत्रकार अशोक सिंह भारत के हाथों में चली गई और शुरू हुई उदघाटन की गाथा। इस उप कार्यालय को बदल कर जल्लोखाना क्षेत्र में ले जाया गया और मार्च 2002 में उदघाटन कर विधिवत कार्य आरम्भ हुआ। लेकिन जल्द ही 2005 में यह दफ्तर बदल कर सुल्तानपुर रोड पर बैंक ऑफ़ बड़ौदा के समक्ष अक्टूबर 2005 में उद्घाटन रस्म पुन: कर लिया गया। उसके बाद 27 जुलाई 2009 को यह उप कार्यलय एक नए उदघाटन कार्यक्रम के तहत जमा मस्जिद काम्प्लेक्स में शिफ्ट हो गया। यह तीन उदघाटन अशोक सिंह भारत के ही नेतृत्‍व में ही हुआ। 
 
तब तक जागरण ने कपूरथला में अपना पूरा अस्तित्व कायम कर लिया था लेकिन 2012 शुरू होते ही जैसे जागरण को ग्रहण लग गया हो, ऐसे हालत बन गये कि शुरू में ही जागरण से जुड़े कुछ पत्रकारों पर जनता से आर्थिक लाभ के आरोप चर्चा में आए और जालंधर जागरण जो कि इस क्षेत्र को देख रहा था, के अधिकारिओं ने अपनी साख बचाते हुए दो-तीन पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। अशोक सिंह का तबादला नवां शहर में कर दिया और प्रभारी के तौर पर एक के बाद एक रविंदर, देविंदर और फिर फ़रवरी में प्रभुदत्त त्रिपाठी को जिम्मेवारी दी गई। काफी उठापटक के बाद अब प्रभुदत्त की देखरेख में बस स्टैंड के नजदीक जागरण उप कार्यलय का विधिवत चौथा उदघाटन मीनाक्षी शर्मा के हाथों हुआ, जिसमे क्षेत्र के कुछ राजनीतिक व धार्मिक लोगों को अपनी साख प्रदेश प्रभारी के समक्ष पेश करने के लिए बुलाया गया। इस उद्घाटन में आने वाले कुछ मेहमानों की मिन्नत भी जागरण से जुड़े पत्रकारों को करनी पड़ी, ऐसी चर्चा क्षेत्र में है। 

बंसल न्‍यूज के हालात बिगड़े, कई अलविदा कहने के मूड में

 

सहारा, ईटीवी, जी२४ के कई नामचीन पत्रकारों को तोड़कर करीब डेढ़ साल पहले लोकल स्टाइल में शुरू हुआ मप्र-छग का बंसल न्यूज़ चैनल अब औंधे मुहं गिर रहा है. चैनल की ओपनिंग करने करने वाले सीईओ अचल मेहरा और न्यूज़ हेड तरुण गुप्ता बंसल न्यूज़ से पहले ही कन्नी काट चुके हैं. चैनल के मालिक सुनील बंसल ने बड़ी ही तरुणाई से तरुण की जगह शरद द्विवेदी को रखा. फिर शरद द्विवेदी अपनी दुकान ज़माने में अचल मेहरा को ही लील गए. 
 
जिस भरोसे से नामचीन चैनलों से पत्रकार यहा आये और हाड़तोड़ मेहनत कर लोकलछाप चलने वाले इस चैनल को बुलंदियों तक पहुँचाया उन पत्रकारों से ज्यादा बंसल ग्रुप के चेयरमेन न्यूज़ हेड शरद द्विवेदी पर भरोसा कर रहे हैं. अपने १८ साल के पत्रकारिता कैरियर का यशगान करने वाले शरद की औकात विधानसभा बीट देखने वाले दूसरे पत्रकार बेहतर ढंग से जानते हैं. अखबार की दुनिया में चापलूसी भरी खबरें छापने का इनका रिकॉर्ड रहा है. नेता मंत्री तक पकड़ बनाने के लिए ऐसे चापलूस की बंसल समूह भी तलाश कर रहा था, लेकिन मीडिया समूह की रीढ़ शुरुआती पत्रकारों की उपेक्षा इस चैनल को सिर के बल गिरने मजबूर कर रही है.
 
न्यूज़ हेड ने अपने साले को तो चिपकाया ही साथ में लोकलछाप दो दलालों को ज्वाइन कराया ताकि शो-रूम का रूप ले चुकी दुकान ठीक ढंग से चल सके. पिछले दो महीनों में करीब आधा सैकड़ा कर्मचारी न्यूज़ हेड के तौर तरीके और चापलूसी भरी ख़बरों का प्रजेन्टेशन देखकर अलविदा कह चुके हैं. इनपुट, आउटपुट और ब्यूरों कार्यालयों के जिम्मेदार पदों पर न्यूज़ हेड अपने लोगों से सौदेबाजी कर रहे हैं. वहीं सैलरी बढ़ने के आश्वासन के घूंट पीपी कर कई कर्मचारी उकता गए हैं. 
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.