65 सालों का दर्द और गुस्‍सा!

‘दिल्ली’ घिर रही है. दिल्ली यानी देश के सत्ता प्रवाह-प्रतिष्ठान का मूल केंद्र- नाभि. ‘दिल्ली’ झुक रही है, अनाम छात्रों (न आंदोलनकारी छात्र अपना नाम बता रहे हैं न देश जानना चाहता है) से गृह मंत्री बात करते हैं. सोनिया जी दो-दो बार बुला कर बात करती हैं, देर रात और अति सुबह. इससे सत्ता प्रतिष्ठान की बेचैनी झलकती है. राहुल जी मौजूद रहते हैं. छोटे-मोटे मंत्रियों की बात छोड़िए. देश की सत्ता की कुंजी जिस नेहरू परिवार के पास है, वह इन अनाम गुमनाम छात्रों को बुला कर पुचकार रहा है, बतिया रहा है, आम बातें सुन रहा है, पर गुस्साये लोग (छात्र, छात्राएं समेत सभी प्रदर्शनकारी) बातचीत के झांसे में नहीं आ रहे. वे देख चुके हैं पिछले 65 वर्षों से ऐसी अनगिनत बातचीत होती रही है, पर परिणाम क्या निकला? बद से बदतर.

जेपी आंदोलन, वीपी सिंह का भ्रष्टाचार के खिलाफ हुंकार, अन्ना का उदय, आजादी के 65 वर्षों बाद के ये तीन मुख्य परिवर्तन के बड़े पड़ाव रहे हैं, भारतीय राजनीति के इस हर पड़ाव का हश्र, पटाक्षेप, इस बार दिल्ली घेर रहे छात्र शायद जान-समझ रहे हैं. हालात सुधरे नहीं, और बिगड़ते गये. इसलिए एक तरफ दिल्ली उन्हें बातचीत के जरिये सहला रही है, तो दूसरी ओर पांच डिग्री की ठंड में पानी की बौछारें, घने कोहरे में पुलिस के डंडे और आंसू गैस के गोले की ताकत भी दिखा रही है. ट्रेनें बंद कर दी गयीं. धारा 144 लगा कर भीड़ जमा न होने देने की कोशिश भी विफल होती दिखायी दी. उधर, देश के सबसे ठंडे दिन और कोहरे में भी आक्रोश की लपटें दिल्ली को जला रही हैं.

एक तरफ सत्ता द्वारा बातचीत का न्योता, दूसरी ओर राजसत्ता का भय! दोनों ध्रुवों के बीच हिंदुस्तान का युवा खून खौल रहा है. बिना राजनेताओं के प्रश्रय के, बगैर राजनीतिक दलों की दुकानदारी के, बिना एनजीओ समूहों के, हिंदुस्तान की यह असल, शुद्ध और बेचैन लोक ताकत करवट ले रही है. पूरी दिल्ली में धारा 144, बाहर की सीमाओं से दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी, फिर भी हिंदुस्तान की बेचैन लोक ताकत, दिल्ली (असल राजसत्ता के केंद्र) पर जोरदार दस्तक दे रही है. धावा बोल रही है.

याद रखिए, विरोध का यह काम तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोधी पक्ष को लोगों ने सौंपा है, पर कानून-व्यवस्था या बढ़ते भ्रष्टाचार या शासक वर्ग की लूट या ‘कोलैप्स होते गवर्नेस’, बढ़ती विषमता जैसे सवाल 65 वर्षों में कहां पहुंच गये हैं? बद से बदतर. इसलिए हिंदुस्तान में यह नया लोक आक्रोश चुकते विपक्ष के खिलाफ भी है. सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. यह लोक बोध, समझ या लोक धारणा है. इन बच्चों (युवक-युवतियों) या दिल्ली में जुटी भारत की बेचैन लोक ताकत का सबसे असरदार नारा और मांग है ‘वी वांट जस्टिस’(हम न्याय चाहते हैं). यह एक पंक्ति ही व्यवस्था की गुत्थी है. इस व्यवस्था में न्याय नहीं मिलता. यह सबसे महंगा है. यह दुर्लभ भी है. इसकी प्रक्रिया जटिल है. एक तरह से यह अलभ्य या अप्राप्त है. बड़े मंत्री, नेता, नौकरशाह बड़े-बड़े घोटालों में फंसते हैं, पर उनका क्या होता है? एक-एक बड़े वकील की फीस करोड़ों में है. यह पूरा देश जानता है.

फिर भी पूरी व्यवस्था मौन है. न्यायपालिका के कामकाज पर कहीं चर्चा होती है? करोड़ों केस लंबित हैं. पर न्यायपालिका में साल में चार-चार माह अवकाश? जघन्य से जघन्य मामले में अपराधी मुक्त. एक सूचना के अनुसार पूरे देश में लगभग सवा लाख रेप (बलात्कार) के मामले पेंडिंग हैं. हत्या, अपराध, भ्रष्टाचार के तो करोड़ों मामले लंबित पड़े हैं. न्यायिक व्यवस्था में- सिस्टम में मौलिक सुधार की जरूरत है. यह काम कौन करेगा? इसका दायित्व भी तो संसद पर ही है! जब न्याय के लिए देश बेचैन है, तब, विलंबित न्यायिक प्रक्रिया को ढोते रहनेवाली व्यवस्था को यह संसद क्यों चला रही है? इसमें नेताओं का ‘इंटरेस्ट’ (निजी लाभ) क्या है?

जिस लड़की के साथ, दिल्ली में यह अकल्पित ‘हादसा’ हुआ, वह अनाम है. ईश्वर या खुदा करें, वह अनाम रहे. पर उस अनाम पीड़िता के लिए देश की अनाम जनता का गुस्सा फूट पड़ा है. यह राजनीतिक दलों का आक्रोश नहीं है. इसमें सत्ता या पद का गणित या खेल नहीं है. मानवता के स्तर पर उस ‘अनाम लड़की’ के साथ देश के करोड़ों अनाम लोगों का ‘आइडेंटिफिकेशन’ है. तादात्म्य बनना है. एक पीड़िता की पीड़ा से आत्मसात हो जाने की प्रक्रिया. इसलिए देश में जो जहां है, बेचैन है. आंदोलित है. गुस्से में है. करोड़ों बेचैन देशवासी यह महसूस करते हैं कि वह लड़की हममें से है, हमारी है, हमारे घर की लड़की है, हमारे परिवार की है, हमारी बेटी या बहन है, यही मनुष्य होने का बोध है. यही एकत्व है.

मानवता के स्तर पर हम सब एक हैं. हमारी न जाति है, न धर्म, न क्षेत्र, न भाषा, हम सब एक स्तर पर ‘एक हैं’. मानव का यह ‘एकत्व’ इस घटना से आहत हुआ है. इसलिए यह पीड़ा है. इस पीड़ा के साथ सत्ता में बैठे लोग छल- छद्म करते हैं, तिजारत करते हैं, तो उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेंगी. देश अब जग रहा है. बहुत पहले राजेंद्र माथुर ने लिखा था, आदमी का सबसे बड़ा स्वार्थ रुपया पैसा, राष्ट्र, समाज या जाति नहीं है. आदमी का सबसे बड़ा निहित स्वार्थ यह है कि वह आदमी के रूप में जिये. यह मुक्त होकर स्वाभिमान से जीने का संघर्ष है. कब तक सड़-गल चुकी व्यवस्था को लोग ढोते रहेंगे? यह व्यवस्था को एकाउंटेबुल बनाने की लड़ाई है? सत्ताधारी चाहे वे केंद्र में हों या राज्यों में यह समझें, तो बेहतर.

यह भी सवाल उठ रहा है कि अमेरिका के कहने पर न्यूक्लियर डील के लिए सदन में खास बहस होती है, एफडीआइ के लिए बहस होती है, पर लोगों की मुकम्मल सुरक्षा की बातचीत के लिए संसद क्यों नहीं बैठ सकती? संसद, समयबद्ध तरीके से व्यवस्था में सुधार के लिए कानून बनाये, यही रास्ता है. यानी संसद या विधायिका या विधानमंडल भी एकाउंटेबुल बनें. जनता के प्रति,जनता के लिए और जनता के हित में.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. प्रभात खबर अखबार के एडिटर इन चीफ हरिवंश के लिखे अन्य विचारोत्तेजक लेखों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं भड़ास पर हरिवंश

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