अब से लगभग ५ साल पहले मैं भी दिल्ली-नोएडा के मीडिया दफ्तरों के दरवाजे खटखटाया करता था। उम्मीद, उर्जा और आत्मबल से लबरेज जब इन दफ्तरों में घुसता था तो लगता था, कभी इसी ऑफिस में काम करूँगा, पत्रकारिता करूँगा, मगर ऑफिस से निकलते वक्त नैसर्गिक गालियां ही जुबान पर होती थी। किसके लिए अभी तक नहीं जान पाया, खुद के लिए थी या उनके लिए जो नौकरी पर नहीं रखते थे।
खैर, संघर्ष, लगन और न हारने की जिद से एक मीडिया संस्थान में जॉब मिल गयी, कुछ सालों तक किया अब स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहा हूँ। जब मैं नया-नया लिखने की कोशिश करता था तो दोस्तों से खूब तारीफ मिलती, उसी वक्त ब्लॉग भी प्रचलन में आ चुके। या यूँ कहें चिट्ठों की भरमार हो रही थी, उसी वक्त भड़ास का भी जन्म हुआ, भड़ास ब्लॉग फिर भड़ास४मीडिया आया। दिनों-दिन भड़ास४मीडिया पॉपुलर होता गया, कारण सिर्फ एक था की भड़ास४ मीडिया उनकी आवाज बन रहा था जो सिर्फ दूसरों के लिए बोलते, लड़ते दीखते हैं।
पत्रकारों, संपादकों और मीडिया संस्थानों के बारे में बेबाक, निर्भीक और सच बोलने का साहस ही भड़ास४ मीडिया को विश्वसनीय बनाता है। यह उन पत्रकारों की कथा-व्यथा का माध्यम बन चुका है जो अपनी नौकरी बचाने के लिए संस्थान या संपादक के खिलाफ नहीं जा पाते। पर भड़ास ने एक स्पेस दिया है, प्लेटफार्म दिया है, जहाँ अपनी आवाज उठाई जा सकती है।
इसीलिए हड़कंप है, भड़ास४ मीडिया के हजारों दुश्मन हैं और इस वेब पोर्टल को बंद करने की हर संभव कोशिश की गयी। मगर, वाह रे यशवंत सिंह, जिगरा रखता है जवान, किसी का डर नहीं, कोई भय नहीं। निर्भीक पत्रकारिता और असली पत्रकारिता का कम से कम एक उदहारण तो बना ही दिया है भड़ास४मीडिया को। ५ वर्षों का यह संघर्षमय सफ़र प्रेरणा है, हम सभी पत्रकारों के लिए। पांचवीं वर्षगांठ की अग्रिम बधाई।
मनोज समदरिया
स्वतंत्र पत्रकार
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