संभव है डीडी मिश्र जो कुछ कह बोल कर गए, उसे अब आगे न बढ़ाएं. संभव है वे चुप हो जाएं. संभव है वे यूपी सरकार व अपने घर-परिवार के दबाव में आकर नौकरी-पेंशन-रिटायरमेंट-सुरक्षा-दुनियादारी आदि के कारण परमानेंट चुप्पी साधे रहें. लेकिन इससे वो कमतर नहीं हो जाता जो डीडी मिश्र के बयान के जरिए सामने आया. एक वरिष्ठ आईपीएस अफसर सिस्टम के परम करप्ट हो जाने और दबावों-अराजकताओं के कारण उबल पड़ता है.
मीडिया बुलाकर सारे भेद खोल डालता है. वो सारी बातें कह डालता है जो उसे परेशान किए हुए थीं. यह डीडी मिश्र की ईमानदारी है. हर आदमी के भीतर एक ईमानदार मनुष्य होता है. वह सामने आने को बेताब रहता है. पर हम उसे चुप कराए रहते हैं, उसे डराए-चुपाए-छुपाए रहते हैं. कई लोग इतने कुशल कारीगर हो जाते हैं कि वे अपने अंदर के झूठे आदमी को ही असली मानकर उसे जिंदगी भर जीते रहते हैं. पर ज्यादातर लोग अपने अंदर के अच्छे-बुरे मनुष्य के झगड़े से जूझते रहते हैं. और कभी न कभी अच्छे मनुष्य को पूरी तरह प्रकट हो जाने देते हैं. अपने झूठे आदमी के कृत्यों पर पश्चाताप करते हैं. डीडी मिश्र इस अंतरद्वंद्व के अनुपम उदाहरण है. एक ऐसे ब्वायलिंग प्वाइंट पर वे पहुंच गए थे जहां उनके सामने वाकई दो विकल्प थे. या तो वे चुपचाप भ्रष्टाचार के पार्ट बन जाते, इसी राह पर आगे बढ़ते.
लेकिन गांधी और अन्ना के इस आदमी ने विद्रोह कर दिया. सामने आ गया पूरा सच लेकर. और, सच सामने आते ही इस पागल समय के पगलेट सिस्टम ने उन्हें पागल करार दिया क्योंकि आजकल टार्च लेकर खोजने पर भी सच बोलने वाले मिलते नहीं. जो सच बोलने वाले होते हैं वो तमाम तरह के दबावों के कारण डरपोक चुप्पी साधे रहते हैं. डीडी मिश्र की राह पर यूपी के कई अफसर चलने वाले हैं. आज नहीं तो कल. संभव है कुछ मायाराज के खात्मे के बाद सामने आएं तो कुछ अगले कुछ महीनों के भीतर. वजह ये है कि मायावती ने जिन पंच प्यारे नौकरशाहों के जरिए यूपी में जंगलराज कायम कर रखा है उन पंच प्यारों से प्रताड़ित-पीड़ित बहुत ढेर सारे अफसर हैं. ये पंच प्यारे नौकरशाह माया सरकार के लोगों को लूटने की खुली छूट देते हैं, बदले में खुद भी जमकर लूट रहे हैं. लूट का इतना जबरदस्त केंद्रीकरण कभी नहीं देखा गया था. सिद्धांत, संविधान, नियम, कानून… इन सबका इतना अनादर कभी नहीं देखा गया.
आईपीएस एसोसिएशन कहां है? किसी की जुबान नहीं खुल रही है. मुश्किल वक्त झेल रहे आईपीएस डीडी मिश्र के लिए क्या कर रहा है आईपीएस एसोसिएशन? उलटे कई आईपीएस अफसर डीडी मिश्र को पागल बताने में लगे हुए हैं. मतलब, यूपी नामर्दगी का वो दौर देख रहा है जिसमें सच बोलने वाला ही पागल करार दिया जाता है. धन्य हैं जनता की सेवा करने के नाम पर नौकरी में आए हमारे नौकरशाह. ये नौकरशाह के खुदा के दूसरे रूप बन गए हैं. ये ऐसे हो गए हैं जैसे इनका जन्म पृथ्वी पर नहीं बल्कि किसी दूसरे ग्रह पर हुआ है.
याद रखिए. सबका हिसाब यहीं होना है. जरूर नहीं कि फांसी ही मिले. फांसी से बड़ी सजाएं यह प्रकृति तय करती है. प्राकृतिक न्याय पर भरोसा इधर मेरा बढ़ता जा रहा है क्योंकि जब आपके मनुष्यों द्वारा निर्मित शासन पद्धति और न्याय प्रणाली निष्पक्ष न रहे तो आम आदमी प्राकृतिक न्याय की तरफ उन्मुख हो जाता है. यूपी में दलितों के उत्थान के नाम पर नंगानाच मचाकर जिन लोगों को पीड़ित बनाया जा रहा है उनकी आह कई सारे नौकरशाहों को लगेगी. देर-सबेर उनकी बीपी बढ़ेगी, हार्ट अटैक के खतरे बढ़ेंगे और सब कुछ चौपट हो जाने की स्थितियां पैदा हो जाएंगी. सुन रहे हो न पंच प्यारों!
डीडी मिश्र का प्रकरण अब पोलिटिकल हो गया है. सारी पार्टियां अपने अपने फायदे के लिए इसे भुनाने में जुट गई हैं. भ्रष्टतम पार्टी कांग्रेस भी ईमानदारी का भाषण दे रही है. बेपेंदी का लोटा उर्फ भाजपा भी बेहद नैतिक बातें कर रही है. अराजकता और लूट का रिकार्ड कायम कर चुकी समाजवादी पार्टी को लगता है कि वो डीडी मिश्र प्रकरण को भुनाकर फिर से यूपी में वापस आ सकती है. पर जान लीजिए, इनमें से कोई पार्टी ऐसी नहीं है जो सच्ची जनपक्षधर हो. ये सब नाटकबाज और धंधेबाज हैं. सत्ता में आते ही सबके सब एक ही राह पर चलने लग जाते हैं. हां, कोई कम लूटता है कोई ज्यादा. और, अफसर उसी तरह परेशान रहते हैं जैसे माया के राज में परेशान हैं.
ऐसे में जरूरत यही है कि ईमानदार अफसर अपनी मजबूत लाबी बनाएं और प्रमुख मुद्दों पर साहस करके सामने आते रहें जिससे भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ठ अफसरों के मन में डर पैदा हो सके और इसी भय के कारण वह निर्भीक तरीके से लूटपाट करने से रुक सकें. आखिर कानून व संविधान ही तो इस लोकतंत्र के प्रमुख कारक तत्व हैं. अगर इन्हीं को हम न मानेंगे तो फिर काहे का लोकतंत्र. हम सभी लोगों को डीडी मिश्र को सपोर्ट करना चाहिए. खासकर न्यू मीडिया के लोगों को डीडी मिश्र के मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहिए.
फेसबुक-ट्विटर आदि पर डीडी मिश्र को सपोर्ट करने संबंधी पेज क्रिएट किए जाने चाहिए. लखनऊ के पत्रकारों को डीडी मिश्र के मुद्दे पर खुलकर सामने आना चाहिए. अगर पागल समय में अच्छे लोग चुप्पी साधे रहेंगे तो अच्छे लोग अकेले अकेले कत्ल किए जाते रहेंगे और किसी को कोई बचाने नहीं आएगा. भय के आगे जीत है, भय के पीछे मौत. लखनऊ के साथियों से अनुरोध करना चाहूंगा कि डीडी मिश्र प्रकरण पर वे ज्यादा से ज्यादा जानकारी व सूचनाएं भड़ास4मीडिया तक पहुंचाएं ताकि इस प्रकरण को दबाने की कोशिशों पर पानी फेरा जा सके.
आखिर में कुछ प्वाइंटवाइज बातें—
-पागल डीडी मिश्र नहीं, यह सिस्टम और समय है. इस कारण अच्छे व ईमानदार लोग कुछ न कर पाने की लाचारी के कारण डिप्रेशन में चले जाते हैं. अपने भीतर के अच्छे और बुरे मनुष्य की लड़ाई में जो व्यक्ति अच्छाई के साथ खुलकर बिना डरे हुए खड़ा होता है, वो हर हाल में स्वस्थ आदमी है.
-पागल आदमी वो होते हैं जो बेइमानी को नियम और चोरी को परंपरा मानकर इसी नियति को प्राप्त होते रहते हैं. ऐसे पागलों से सिस्टम, समाज, धरती, ब्रह्मांड को ज्यादा खतरा है. अगर इन पागलों के अंदर के स्वस्थ आदमी को जगाया जा सके तो ठीक रहेगा पर ऐसे लोगों को जगा पाना नामुमिकन सा होता है. जब ये पृथ्वी से हमेशा के लिए विदा कर दिए जाते हैं तो पृथ्वी ज्यादा राहत महसूस करती है.
-अगर कभी कोई इमानदार व्यक्ति आवाज उठाता है तो उस आदमी का सभी इमानदार व संवेदनशील लोगों को समर्थन करना चाहिए. अगर ऐसा न कर पाएंगे तो ईमानदार आदमी आवाज उठाने से डरेगा और फिर ईमानदार व संवेदनशील लोग एक एक कर बेइमान सिस्टम द्वारा मारे जाते रहेंगे, पीड़ित किए जाते रहेंगे.
-लूटने-खसोटने-अत्याचार करते रहने को जो लोग मूलभूत नियम मानकर संविधान व कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं, उनसे बड़ा पागल शायद ही कोई हो क्योंकि ये दुनिया के बेसिक नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं. ऐसे पागल आजकल भले ही अट्टाहस लगा रहे हों लेकिन उनके रोने के दिन जल्द आने वाले हैं क्योंकि सच में उनकी जगह पागलखाने तय किए जाने की तैयारी चल रही है.
-जो लोग डीडी मिश्र को पागल बता रहे हैं, उन लोगों का नार्को टेस्ट करा दिया जाए तो वे ऐसे ऐसे 'सच' उगलेंगे कि सबकी आंखें खुली की खुली रह जाएंगी. तब सबको लगेगा कि स्वस्थ आदमी तो डीडी मिश्र हैं और पागल वो लोग हैं जो उन्हें पागल बता रहे हैं. हर समाज और समय में सच बोलने वाले की दुर्दशा शासन-सिस्टम ने की है. डीडी मिश्र कोई अपवाद नहीं. हां, इस बहाने आम जनता की आंखें जरूर खुल जाती हैं और इस प्रकार सच बोलने वाले का मकसद भी हल हो जाता है.
-सच बोलने के कारण आने वाली कठिनाइयों को जो लोग इंज्वाय नहीं कर पाते, वे लोग सच बोलने के पहले बार बार सोचते हैं और अक्सर डर जाया करते हैं. जो लोग सच बोलने से आने वाली मुश्किलों को सहज जीवन के रूप में लेते हैं, उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता सिस्टम. ऐसे लोगों को गोली मार दो या जहर का प्याला दे दो, कोई फरक नहीं पड़ता क्योंकि ऐसे लोग अपने नश्वर तन से बहुत पहले उपर उठ गए होते हैं. तो, सच बोलना एक तरह से अध्यात्म और आराधना के चरम पर पहुंचना भी होता है जिसे औसत किस्म के लोग समझ नहीं सकते.
-बड़े पदों पर बैठे छोटे दिल वाले भ्रष्ट लोग दरअसल बेहद डरे हुए बौने किस्म के लोग होते हैं. इनकी ताकत बस इनकी कुर्सी है. जिस दिन कोई ईमानदार दम लगाकर इन्हें डांट दे तो जरूर इनका हार्ट फेल हो जाएगा. कमजोर, पापी और लुटेरे लोगों से जो लोग डरते हैं, वो जीते जी मृत्यु शय्या पर पड़े हुए लोग होते हैं. अगर गलत लोगों को गाली देने में संकोच करते हैं तो फिर आपकी मर्दानगी गई तेल लेने.
-जीवन और मौत बहुत छोटा मुद्दा होता है. बड़ा मुद्दा होता है जीवन जीने का तरीका. एक छोटा सा कीड़ा पैदा होता है और किसी के पैर से कुचलकर मर जाता है. उसे एहसास भी नहीं होता कि वह जन्मा क्यों और मरा क्यों और मरा कब. हम मनुष्य हैं तो दिमाग होने के कारण जन्म मृत्यु का हिसाब लगाते रहते हैं और अधिकतम समय तक जीते रहने की कोशिश करते हैं. पर डर डर कर जीते रहना, मर मर कर जीते रहना कोई जीना नहीं होता. उससे अच्छा होता है एक बार में ही मर जाना. डीडी मिश्र ने डर डर कर जीने से मना कर दिया. वो जबसे सब कुछ बोल गए, तबसे सच्ची में जीना सीख गए. हालांकि तमाम तरह के भय उन्हें घेरे हुए है लेकिन वे अगर अपने दिल का कहा करेंगे तो निश्चित रूप से बेहद सफल होंगे.

यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया
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