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गोरखपुर जर्नलिस्‍ट प्रेस क्‍लब का हाल बेहाल, वेलफेयर फंड के पैसे में भी लूट

एक कहावत है कि जिस खेत को उसकी मेड़ ही खाने लगे, तो उस खेत का भगवान ही मलिक होता है। कुछ ऐसा ही गोरखपुर में गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब नामक संस्था में हो रहा है, जहां और कुछ हो या ना हो, पत्रकारों के हित पर डाका तो जोरदार पड़ रहा है। यहां अभी 16 अक्तूबर को चुनाव हुए हैं, पर नयी कार्यकारिणी अभी नया कुछ कर ही नहीं पायी, उसे तो पिछली कार्यकारिणी के कारनामों को ही भुगतना पड़ रहा है। तीन मामले ही पूरी कहानी बयां करने को काफी हैं।

एक कहावत है कि जिस खेत को उसकी मेड़ ही खाने लगे, तो उस खेत का भगवान ही मलिक होता है। कुछ ऐसा ही गोरखपुर में गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब नामक संस्था में हो रहा है, जहां और कुछ हो या ना हो, पत्रकारों के हित पर डाका तो जोरदार पड़ रहा है। यहां अभी 16 अक्तूबर को चुनाव हुए हैं, पर नयी कार्यकारिणी अभी नया कुछ कर ही नहीं पायी, उसे तो पिछली कार्यकारिणी के कारनामों को ही भुगतना पड़ रहा है। तीन मामले ही पूरी कहानी बयां करने को काफी हैं।

नंबर एक : मामला कुछ यूं है। गोरखपुर में प्रेस क्लब के नाम से पहचानी जाने वाली गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब का चुनाव गत 16 अक्तूबर 2011 को हुआ। इसमें एसपी सिंह अध्यक्ष और अजीत यादव उपाध्यक्ष चुने गये। अघोषित पैनल बना कर लड़े गये इस चुनाव में मंत्री पद पर इनके सहयोगी प्रत्याशी मारकंडेय मणि त्रिपाठी चुनाव हार गये। दैनिक नई दुनिया, लखनऊ और इंडिया टुडे से खुद को फोटोग्राफर के रूप में जुड़ा बताने वाले श्री मारकंडेय मणि पिछली कार्यकारिणी में कोषाध्यक्ष थे। मामला इन्हीं से जुड़ा हुआ है। इस संस्था में सदस्य पत्रकारों के लिये वेलफेयर फंड का भी एक खाता है, हालां कि हर वर्ष लाखों की आमदनी के बाद भी इस फंड में धन के नाम पर कौड़ी भी नहीं होती। पिछली कार्यकारिणी में सदस्य रहे राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार श्री पी.पी.एन. उपाध्याय के पेट का ऑपरेशन हुआ था, जिसकी मदद के नाम पर पिछली कार्यकारिणी ने चुनाव के पूर्व उन्हें 10 हजार का चेक दिया था, साथ ही उनसे यह भी कहा गया कि खाते में पैसा नहीं है, अभी चेक ना लगायें। यह बात श्री उपाध्याय को काफी नागवार गुजरी तो उन्हों ने चुनाव के एक दिन पूर्व 15 अक्तूबर को आन्ध्रा बैंक का चेक संख्या 860326 दिनांक 10.08.11 श्री मणि को वापस कर दिया।

श्री उपाध्याय के अनुसार श्री मणि ने उनसे कहा कि वो उसी दिन शाम तक नगद राशि दे देंगे। मंत्री पद के चुनाव में श्री मणि हार गये और श्री उपाध्याय ने मामला खतम समझ लिया। पर नवंबर में उन्हें वर्तमान कार्यकारिणी के मंत्री से पता चला कि उनके नाम से जारी चेक से पैसा तो 25 अक्तूबर को ही निकाल लिया गया। इस बात से अवाक श्री उपाध्याय ने संस्था को लिख कर जानकारी दी कि उन्हों ने श्री मणि को चेक वापस कर दिया था, पता किया जाये कि उनके नाम पर पैसा कैसे निकला? श्री उपाध्याय के पत्र पर राष्ट्रीय सहारा के ही वरिष्ठ पत्रकार श्री धूर्जटी भूत भावन मिश्र ने गवाही भी किया कि उनके सामने ही श्री उपाध्याय ने श्री मणि को चेक दिया था। मामला यहीं से गरम हो गया। हल्ला मचा तो जांच की प्रक्रिया चली, जिस पर बैंक से चेक की छायाप्रति निकली, तो उस पर हिन्दी में सीधे-सीधे पी.पी.एन. उपाध्याय लिखा था तथा हस्ताक्षर को श्री मणि और तत्कालीन अध्यक्ष श्री अशोक अज्ञात ने प्रमाणित भी किया था। श्री उपाध्याय हस्ताक्षर को सीधे-सीधे फ्राड बता रहे हैं। उधर पहले तो श्री मणि ने कहा कि पैसा श्री उपाध्याय ने ही निकाला है, पर पता चला है कि अब वे कह रहे हैं कि उन्हों ने श्री उपाध्याय के आवेदन को प्रमाणित करने वाले श्री मिश्र को चेक दे दिया था। यानी उनके अनुसार कहीं ना कहीं पैसा निकालने में श्री मिश्र भी जिम्मेदार हैं। तमाम कयासों के बीच यक्ष प्रश्न यह है कि अगर श्री उपाध्याय सच बोल रहे हैं कि उन्हों ने चेक श्री मणि को दिया, तो उसे किसने कैश कराया? साथ ही श्री मणि ने और श्री अज्ञात ने किसके हस्ताक्षर को प्रमाणित किया? 16 अक्तूबर को जब श्री मणि चुनाव हार गये, तो उन्हों ने संस्था को चेक वापस ना कर कथित तौर पर श्री भूत भावन मिश्र को क्यों दिया? फिलहाल यह मामला काफी गरम है, और क्लब ने अपना पल्ला झाड़ते हुए इसकी जांच के लिये 5 सदस्यीय कमेटी बना दी है, विडंबना है कि इस जांच कमेटी के एक सदस्य पर कई वर्ष पूर्व इसी संस्था से 10 हजार लेकर भुगतान ना देने का आरोप अभी भी जिन्दा है। श्री उपाध्याय इस बात पर जिद में हैं, और वे मामले में निष्पक्ष कार्रवाई ना होने पर मामले की प्राथमिकी भी दर्ज कराने पर आमादा हैं, हालांकि उन पर मामला वापस ले लेने का भरपूर दबाव भी पड़ रहा है।

नंबर दो : यह मामला भी पिछली कार्यकारिणी के समय का ही है। गोरखपुर मंडल में बाल जगत की पत्रकारिता के जनक बाल स्वर साप्ताहिक के संपादक श्री राजेश श्रीवास्तव को पिछले दिनों किडनी की परेशानी हो गई थी। मंहगे और काफी दिक्कतों के इस इलाज के लिये गोरखपुर की एक अन्य पत्रकार संस्था ने लगभग ढाई लाख की रकम जुटा कर उसे श्री श्रीवास्तव के स्टेट बैंक के खाते में जमा करा दिया। इसी क्रम में गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब ने भी कुछ धन जमा करने की घोषणा की। सदस्यों से कोषाध्यक्ष श्री मणि और अध्यक्ष श्री अशोक अज्ञात ने सदस्यों और शुभ चिन्तकों से सहयोग मांगा, धन देने वालों को कच्ची रसीद भी दी जा रही थी। कुछ लोगों के अनुसार 50 हजार की रकम एकत्र हुई, कुछ का दावा है कि 75 हजार आये, कौन सच कौन झूठ यह तो पता नहीं, पर कुछ धन तो एकत्र हुआ, और कटु सत्य तो यह है कि जानलेवा बीमारी से जूझ रहे श्री श्रीवास्तव को एक पैसा भी नहीं मिला। उन्हें इस संस्था से मात्र 10 हजार का एक चेक मिला, जिसे श्री श्रीवास्तव के नाम से श्री चित्रगुप्त सभा ने एकाउंट पेयी जारी किया था। चर्चा तो यह भी है कि अगर यह चेक भी बियरर होता, तो श्री श्रीवास्तव इसमें से भी कुछ नहीं पाते। अब पता चला है कि श्री श्रीवास्तव भी संस्था को लिख कर पूछने जा रहे हैं कि उनके नाम पर कितना धन आया, किसने एकत्र किया और वह राशि कहां है, उन्हें दी जाये।

और चलते चलते : गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब की वर्तमान कार्यकारिणी के एक पदाधिकारी पर चुनाव जीतने के बाद शहर के प्रमुख बाजार गोलघर स्थित एक गेस्ट हाउस में शराब पीकर हंगामा मचाने का मामला कैण्ट थाने में दर्ज है, हालांकि यहां भी मामला दबाने का काफी प्रयास हुआ था, दुर्भाग्य से पूरा प्रकरण सीसी टीवी में कैद हो गया था। पर जुगाड़ के माहिर पत्रकारों ने मामले को अखबार मे आने से रोक कर अपनी थोड़ी सी भद तो बचा ही ली। अब देखना है कि संस्था के संविधान के अनुसार किसी आपराधिक मामले में अभियुक्त बनने के बाद यहां ना केवल पद से इस्तीफे का प्रावाधान है, वरन मामला सच पाये जाने पर प्राथमिक सदस्यता से भी हटाये जाने का प्रावधान है। यहां क्या होता है? क्या संविधान का पालन होगा, या संविधान बदला जायेगा? साथ ही अब यह भी देखना है कि इसी संस्था के मंच से बड़ी-बड़ी बातें करने वाले यहां के तमाम दैनिक अखबारों के संपादक अपनी इस संस्था को बेदाग बनायेंगे, या भ्रष्टाचार मिटाने यहां भी किसी अन्ना को आना पड़ेगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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