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डिप्रेशन के शिकार हो चुके हैं राहुल गांधी!

वो सुब्रत राय और अम्बानियों से दूर रहते हैं. राजीव शुक्ल और अहमद पटेल जैसों को वो भीतर से पसंद नहीं करते. उनके दरबार में रसूख और रइसजादों की वाकई अहमियत नहीं. प्रधानमंत्री हो या वित्तमंत्री …हर बड़े को उनसे मिलने या बात करने के लिए समय लेना होता है. और हर बड़ा फैसला उनके बिना लेने की आज देश में किसी की हैसियत नहीं है. वो निहायत शरीफ हैं और चकाचौंध छोड़कर सादगी से जीते हैं. लेकिन वो परेशान हैं. वो सहमे हैं, खुद के भविष्य से. उनका आत्मविश्वास उन्हें छल रहा है. और अगर मेरी खबर सही है तो वो एक तरह के मनोवैज्ञानिक दबाव की स्थिति से गुजर रहे हैं. अगर हिम्मत करके लिखूं तो वो एक तरह के डिप्रेशन से घिरते जा रहे हैं.

वो सुब्रत राय और अम्बानियों से दूर रहते हैं. राजीव शुक्ल और अहमद पटेल जैसों को वो भीतर से पसंद नहीं करते. उनके दरबार में रसूख और रइसजादों की वाकई अहमियत नहीं. प्रधानमंत्री हो या वित्तमंत्री …हर बड़े को उनसे मिलने या बात करने के लिए समय लेना होता है. और हर बड़ा फैसला उनके बिना लेने की आज देश में किसी की हैसियत नहीं है. वो निहायत शरीफ हैं और चकाचौंध छोड़कर सादगी से जीते हैं. लेकिन वो परेशान हैं. वो सहमे हैं, खुद के भविष्य से. उनका आत्मविश्वास उन्हें छल रहा है. और अगर मेरी खबर सही है तो वो एक तरह के मनोवैज्ञानिक दबाव की स्थिति से गुजर रहे हैं. अगर हिम्मत करके लिखूं तो वो एक तरह के डिप्रेशन से घिरते जा रहे हैं.

ये अंतर कथा है कांग्रेस के राजकुमार राहुल गाँधी की जिनके हाथ में अब देश की कमान है. उनके आभामंडल में सक्रिए एक अधिकारी मेरे मित्र हैं और जब उन्होंने ये अनकही दास्ताँ सुनाई तो मुझे छोटी छोटी बातों में सरकार की नाकामियां और खामियों की वजह नज़र आने लगी. इस अधिकारी के मुताबिक मनमोहन सिंह की हिम्मत नहीं है कि वो बिना समय लिए राहुल से बात कर सकें. चिदंबरम को एक एक हफ्ता हो जाता है राजकुमार से अपाइंटमेंट लेने में. कोई अहम बिल या स्कीम बिना राहुल के सहमति के सरकार के फाइल से बाहर नहीं आ सकती. पर विडंबना ये है कि जो देश चला रहा है, वो परदे में है. मुश्किल दौर में वो घर से बाहर नहीं निकलता. वो ज्यादातर खामोश रहता है और हालात बिगड़ने पर खुद को अलग कर लेता है.

राजकुमार के अलग होते ही सरकार के हुक्मरान पसोपेश में पड़ जाते हैं. निर्णय लेने की क्षमता और गति शिथिल पड़ जाती है. हाशिए पर खड़े अहमद पटेल एंड कंपनी तमाशबीन जनर आते हैं और लोगों का गुस्सा देश के सोये हुए उस सरदार पर बरसता है जिसकी हसियत सरकारी फाइल पर दस्तखत करने से ज्यादा की नहीं है.

ज़ाहिर है, असमंजस की ये परिस्तिथि कांग्रेस और सरकार पर भारी पड़ रही हैं क्यूंकि देश डिप्रेशन से नहीं चल सकता. मेरी राहुल से दरख्वास्त है कि वो इस डर से आगे बड़ें. डिप्रेशन से बाहर निकलें. पर्दादारी छोड़कर सामने आयें और सरकार के घोड़े पर सवार हों क्यूंकि लगाम अब उन्हीं के हाथ में है. वंशवाद के दंश में न पड़ें. चापलूसों के जाल में न फंसें. इस बिगड़ते हालात को अहमियत दें. उनकी नीयत और ईमान पर शक नहीं है. वो बहुतों से बेहतर हैं……और अगर अभी भी वो परदे में रहे तो ये भड़कता देश अगली आग लगने पर उनको घेरेगा.

राहुलजी बुरा न मानिये, घोड़े पर खुद बैठिये या फिर लगाम मनमोहन सिंह को दे दीजिए. जल्दी फैसला कीजिये क्यूंकि जन आक्रोश के इस दौर में अगला नंबर आपका है.


लेखक दीपक शर्मा जाने-माने टीवी जर्नलिस्ट हैं. उन्होंने उपरोक्त विचार फेसबुक पर शेयर किया है और साथ ही यह भी आखिर में लिखा है कि उनका ये निजी विचार है, व्यक्तिगत विचार है, इससे उनके संस्थान आजतक का कोई लेना देना नहीं है.

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