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अरे कोई इस राहुल भैया को राजनीति सिखाओ भाई… !

हरीश रावत अचानक बहुत खुश हैं। वैसे तो, रावत जितने बड़े आदमी हैं, उत्तराखंड में उससे भी बड़े नेता हैं। केंद्र में मंत्री भी हैं। राहुल गांधी के करीबी हैं और सोनियाजी भी उनको पसंद करती है। कांग्रेस में उनकी चलती है। रावत की जिंदगी में खुश होने के सारे साधन मौजूद हैं। लेकिन फिर भी आजकल अचानक ज्यादा खुश क्यों?

हरीश रावत अचानक बहुत खुश हैं। वैसे तो, रावत जितने बड़े आदमी हैं, उत्तराखंड में उससे भी बड़े नेता हैं। केंद्र में मंत्री भी हैं। राहुल गांधी के करीबी हैं और सोनियाजी भी उनको पसंद करती है। कांग्रेस में उनकी चलती है। रावत की जिंदगी में खुश होने के सारे साधन मौजूद हैं। लेकिन फिर भी आजकल अचानक ज्यादा खुश क्यों?

बात ऐसी है हुजूर, कि सहज, सामान्य और सरल जीवन में इंसान को अपनी मेहनत, खुद की हिम्मत और स्वयं की क्षमता के बूते पर जो कुछ हासिल होता है, उस पर उसे संतोष जरूर होता है। लेकिन जीवन में जिसे वह बड़ा मानता है, जिसे वह पसंद करता है और जिसके सपनों के साकार होने में अपनी सफलता के स्वर्णिम सपने संजोता है, उसकी तरफ से मिली छोटी सी खुशी भी जिंदगी की सबसे बड़ी सौगात बन जाती है। रावत को यह सौगात दी है राहुल गांधी ने। वैसे देखा जाए, तो दिखनेवाली चीज के रूप में तो उनको नया कुछ भी नहीं मिला। लेकिन राजनीति में ऐसा होता है हुजूर कि विरोधी को कोई फटकार मिले, तो सबसे ज्यादा खुशी हमें ही होती है। रावत इसीलिए ज्यादा खुश हैं, क्योंकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उनके विरोधी और उत्तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा को डांट दिया। डांट बहुगुणा को पड़ी और लाली रावत के चेहरे पर निखर गई।

दरअसल, हुआ यूं कि देश के सारे प्रदेश कांग्रेस प्रमुखों और विधायक दल के नेताओं की दिल्ली में हुई दो दिवसीय बैठक के समापन पर उत्तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा ने राहुल गांधी को पीएम बनाने की मांग की। बहुगुणा के इस सुझाव का अनेक प्रदेश कांग्रेस प्रमुख और विधायक दल के नेताओं ने तत्काल स्वागत किया लेकिन जब सभी ने राहुल गांधी के तेवर देखे, तो सारे के सारे चुप्पी साध गए। गुस्से में राहुल गांधी ने बहुगुणा को झिड़क दिया। राहुल ने याद दिलाया कि समस्या प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर नहीं है बल्कि संगठन से जुड़ी है, जिन्हें पहले निपटाने की जरूरत है। राहुल ने साफ साफ कहा कि वे दोबारा उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने जैसी बातें नहीं सुनना चाहते।

वैसे, संसार का एक नियम है कि जिसे आप पसंद करते हैं, जिसे मन से चाहते हैं और जिसके बारे में आपको पक्का पता है कि उसको तो किसी और का नहीं आपका ही होना है, साथ ही वह फिलहाल अगर किसी और की होकर भी आपकी ही है, फिर भी उसको आपका बनाने की बात जब दूसरे लोग सार्वजनिक रूप से करें, तो किसी को भी इतनी चिढ़ तो मचती ही है। राहुल गांधी इसीलिए चिढ़ गए। वे जानते हैं कि कांग्रेस के राज में जब भी उनको पीएम की कुर्सी पर बैठना होगा, तो सरदारजी को बोलेंगे, कि जरा सरक लो भैया। अपना रास्ता पकड़ो। सरदारजी जाएंगे और राहुल भैया पीएम की कुर्सी पर आएंगे। दुनिया की कोई ताकत उनको रोक नहीं सकती। सो, ऐसे में दूसरे लोग जब उनको वहां बैठने – बिठाने की बात करें, तो उनका गुस्सा जायज माना जा सकता है।  

मगर, राजनीति में ऐसा नहीं होता। कोई दिग्विजय सिंह से कहिए… कि अरे गुरु महाराज हमारे राहुल भैया को थोड़ी राजनीति सिखाओ भाई… ! उनको समझाओ कि राजनीति में कोई कितना भी बड़ा हो, सुनना पड़ता है। यह हमारे बाप दादों की परंपरा है। जवाहर लाल नेहरू के जीते जी, हमारे देश ने इंदिरा गांधी में अपने अगले पीएम की तस्वीर देखी। इंदिराजी के रहते हुए ही लोग राजीव गांधी को उनका उत्तराधिकारी स्वीकार कर चुके थे। राहुल गांधी के बारे में पीएम की बात बहुत साल पहले तब के धुरंधर नेता अर्जुनसिंह ने सबसे पहले कही थी। दिग्विजय सिंह भी सालों से दहाड़ ही रहे हैं। सरदार मनमोहन सिंह भी कह ही चुके हैं। पूरी कांग्रेस और सोनिया गांधी भी चाहती है। नरेंद्र मोदी के मार्केट में आने के बावजूद देश का एक बहुत बड़ा वर्ग भी चाहता है। बहुगुणा को डांटने के दो दिन बाद अजीत जोगी ने भी वही मांग की। इस तरह तो सबको नाराज कर दोगे, राहुल भाई। किस – किस को डांटोगे, चुपचाप सुनते रहो ना…।  

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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