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इलाहाबाद

अखिलेश जी! आवाम के इस गुस्से को समझिए

इलाहाबाद। कुंडा में पुलिस अफसर की हत्या, जिन पर जनता के सुरक्षा की जिम्मेवारी, वे सरेआम मारे जा रहे हैं। डिप्टी एसपी के साथ बलीपुर गांव जा रहे वर्दीधारी सशस्त्र पुलिसकर्मियों का भयवश खेतों में घंटे छिपे रहना। पुलिस अफसर के कत्ल में खून के छींटे सरकार के कैबिनेट मंत्री के दामन पड़ना…आखिर क्या हो रहा है यूपी में। इन घटनाओं से उपजे कई सवाल, जवाब तलाश रहे हैं।

इलाहाबाद। कुंडा में पुलिस अफसर की हत्या, जिन पर जनता के सुरक्षा की जिम्मेवारी, वे सरेआम मारे जा रहे हैं। डिप्टी एसपी के साथ बलीपुर गांव जा रहे वर्दीधारी सशस्त्र पुलिसकर्मियों का भयवश खेतों में घंटे छिपे रहना। पुलिस अफसर के कत्ल में खून के छींटे सरकार के कैबिनेट मंत्री के दामन पड़ना…आखिर क्या हो रहा है यूपी में। इन घटनाओं से उपजे कई सवाल, जवाब तलाश रहे हैं।

मत भूलिए कि राजनीति के पेशेवर ‘घड़ियालों’ से ऊबकर सूबे की आवाम ने युवा, ऊर्जावान और फ्रेश चेहरे यानी अखिलेश को सत्ता सौंपी थी। आवाम ने यह उम्मीद लगा रखी थी कि राजनीतिक धूर्तता और कांइयापन वाले उन चेहरों से निजात मिलेगी। राजनीतिक दलों का नाम भले ही अलग-अलग हो पर कमोबेश एक जैसी ही प्रवृत्ति लगभग सभी दलों में मिलती है, चाहे वह बसपा, हो या कांग्रेस या फिर चाल चरित्र चेहरा के नारे वाली भाजपा। सत्ता में आते ही बिचौलियों की बढ़ती भागीदारी दलों की पहचान ही नहीं बदलतीं, बल्कि उसकी नस्ल तक बदल डालती हैं। सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा में पचास फीसदी से ज्यादा बड़े नेता ऐसे हैं जो संगठन में पद और चुनाव में टिकट न मिलने पर जिंदा ही नहीं रह सकते। बेहयाई की हद पार कर दल बदलने में रंचमात्र संकोच नहीं होता। न दल बदलने वालों को कोई शर्म न दलों में शामिल करने वाले बड़े नेताओं को कोई परहेज।

खैर, अब आइए असल मुद्दे पर। जनता ने सन् 2007 के चुनाव में अनिल अंबानी, अमर सिंह, अमिताभ बच्चन, सुब्रत राय सहारा एंड कंपनियों के बीच ता-ता-थैया करते जिन छद्म समाजवादियों को परे धकेल अफसरों के प्रति कड़ा रूख अपनाने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती को सत्ता सौंपी, उसी जनता ने सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में सत्ता के नए सारथी अखिलेश यादव पर भरोसा जताया। यह केवल बेरोजगारी भत्ता, लैपटाप और टैबलेट देने की घोषणाओं का ही कमाल नहीं था। चुनावी घोषणाओं का अमल कितना होता है, यह आवाम भलीभांति जानता है। अखिलेश यादव को प्रचंड बहुमत मिलने की एक वजह यह भी रही कि चापलूसी संस्कृति वाली कांग्रेस आक्सीजन पर थी तो भाजपा आपसी द्वंद्व से जूझ रही थी। बाकी बची कसर भ्रष्‍टाचार को मुद्दा बनाकर चुनाव में उतरी भाजपा ने भ्रष्‍टाचार के बड़े सरगना बाबूसिंह कुशवाहा को गले लगाकर यह संदेश देने की कोशिश की थी कि भ्रष्‍टाचारी सरकार बसपा को हटाकर सत्ता हमें सौंपो, हमारे पाले में अब भ्रष्‍टाचार का सबसे बड़ा खिलाड़ी आ गया है। इन सब हालात में सूबे की आवाम ने अखिलेश को पसंद कर सत्ता की चाभी सौंप दी।

पर यह क्या? आवाम का इकबाल एक बार फिर से छला जाने लगा है। मंत्रिमंडल विस्तार में जब कई दागियों को लालबत्ती मिली तभी लोगों को चौंकना पड़ा। मंत्री बनने वाले ये बाहुबली और उनके गुर्गे लालबत्ती की आंड़ में सड़क को खून से लाल करने में कितना पीछे रहेंगे? गोंडा में सीएमओ का अपहरण करने वाले मंत्री विनोद सिंह उर्फ विनोद पंडित को पहले मंत्री पद से बर्खास्त किया गया। कुछ समय बीतने पर मामला बासी हो गया समझकर फिर से दुबारा उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया जाता है। अंतरप्रांतीय पशु तस्करी वाले रैकेट के बड़े खिलाड़ी केसी पांडेय को राज्यमंत्री पद का दर्जा देना और स्टिंग आपरेशन कर के उन्हें सुबूत के साथ पकड़ने वाले जाबांज एसपी नवनीत सिंह राणा को पैदल करना आखिर जनता के बीच क्या संदेश दे रहे हैं। कुंडा में आतंक के पर्याय रहे राजा भैया को कैबिनेट मंत्री बनाना, सूबे के सबसे बड़े माफिया डॉन की पहचान रखने वाले विजय मिश्र को टिकट देकर पहले विधानसभा में दाखिल कराया, फिर उनकी बेटी सीमा मिश्रा को लोकसभा का प्रत्याशी बनाना।

इतना ही नहीं, पिछले महीने विजय मिश्र की बेटी की शादी में कुनबे समेत अखिलेश यादव का शामिल होकर ‘हम सब साथ-साथ हैं’ वाले एपिसोड को दुहराया गया। प्रतापगढ़ जिले के कुंडा में ग्रामप्रधान नन्हे यादव, उनके भाई सुरेश यादव की हत्या के बाद मौके पर जा रहे जांबाज पुलिस अफसर जियाउल हक को मौत के घाट उतारने की दुस्साहसिक घटना। एक दिन में तीन कत्ल। कानून व्यवस्था ही नहीं बल्कि लचर पुलिसिया कार्यशैली पर भी लोगों को अंगुलियां उठाने को मजबूर कर दिया है। उधर, देवरिया में मुख्यमंत्री वापस जाओ, डीजीपी चूड़ियां पहनो, डांस करो जैसे नारों के बीच सीएम का कड़ा विरोध। अखिलेश को रास्ता बदल कर जाने को मजबूर होना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, प्रदेश के पुलिस मुखिया से सत्ता के मुखिया के सामने शहीद पुलिस अफसर की पत्नी परवीन के सवालों पर निरूत्तर होकर बगलें झांकना और नजरें चुराना, आखिर क्या संदेश दे रहे हैं? अखिलेश जी मत भूलिए लोकसभा का चुनाव नजदीक है, उसमें ये सब बड़ा पलीता साबित हो रहे हैं। ऐसे में क्या होगा समाजवादियों के ‘मिशन 2012 और लक्ष्य 2014’ वाले नारे का? चेतिए, देखिए, जनता के इस मर्म को कायदे से समझिए।

इलाहाबाद से वरिष्‍ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 09565694757 के जरिए किया जा सकता है.

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