अमिताभ बच्चन ने बिहार पुलिस को धमकाया तो इसका फ़ायदा किसे मिला?

अमिताभ बच्चन अभिनेता हैं.. नूडल्स के जरिये दो मिनट में खुशियां फैलाते हैं। ठंढा तेल हो या मोटरकार, कुछ भी बेचने में पीछे नहीं रहते। टीवी पर सोलह सवालों में आम आदमी को करोड़पति भी बना रहे हैं। यही अमिताभ बढ़-चढ़ कर समाज सुधार की बातें भी करते हैं। पल्स पोलियो अभियान में मुफ्त में संदेश भी दिया था।

शायद बिहार में पुलिस ने उनके इसी चेहरे को सच्चा समझ लिया और कैमूर के नक्सली इलाके अघौरा में शिक्षा और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के संदेश वाले पोस्टर में उनकी तस्वीर लगवा दी। कैमूर पुलिस ने पोस्टर में अमिताभ की तस्वीर और केबीसी के लिए लिखी गई कविता का भी इस्तेमाल कर डाला। बस गलती ये हो गयी कि अमिताभ को या केबीसी का प्रसारण करने वाले चैनल को इस बारे में कुछ बताया नहीं। 

अब अमिताभ ठहरे सुपर स्टार। अपने जमाने के एंग्री यंग मैन। गुस्सा तो आना ही था, सो पुलिस को हड़का लिया। मुंबई पुलिस तो थी नहीं, जिसके ऐनुअल फंक्शन में बिना फीस लिए हाज़िरी बजाने पहुंचना पड़े तो भी कोई अफसोस नहीं। बिहार, वो भी नीतीश कुमार के स्टेट का मामला.. मोदी, अमर सिंह, सोनिया.. किसी से कोई समीकरण नहीं रखने वाले को कैसे अपने ब्रांड बेचने दें? ट्विटर पर धमकी दे डाली, "ये तो मानहानि है, हटा लो वर्ना…"

बिहार पुलिस के मुखिया अभयानन्द। वो भी खुद को कम नहीं समझते थे। एक तो नीतीश कुमार का वरद हस्त, उपर से सुपर-30 नाम के कोचिंग इंस्टीट्यूट के फाउंडर रहने की शोहरत। शायद सोच रहे थे (या हो सकता है, उनके मातहत अधिकारियों ने ही खुशामद के लिए सोचा हो) कि आनंद कुमार ने 30 छात्रों के दम पर कोचिंग का बिजनेस चमका दिया तो उसी ब्रांड को बिग-बी के फोटो से भी एंडोर्स करवा देंगे। सरकार को निःशुल्क कोचिंग का लारा लप्पा दिखा कर मीडिया पब्लिसिटी भी करवा लेंगे सुपर-30 का। लेकिन एक ट्वीट ने रातों-रात सारे किए-कराए पर पानी फेर दिया। 

अमिताभ ने जो कहा कि वे इस बारे में अपने वकीलों से बात कर रहे हैं, तो डीजी साहब ने फौरन कैमूर के पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी किया कि हर जगह से अमिताभ के पोस्टर हटवा दिया जाए। कैमूर जिले के एसपी उमाशंकर सुधांशु ने फौरन आदेश की तामील की। फिर मीडिया को बताया कि अब पोस्टर हटा लिए गए हैं, लेकिन इस नक्सल प्रभावित जिले में युवाओं को माओवादियों के प्रभाव से दूर रखने के लिए ऐसा किया गया था। उन्होंने सारी गलती अपने मत्थे मढ़ ली और माफ़ी भी मांग ली। सुधांशु ने व्यंग्यात्मक माफ़ीनामे में कहा, “मैं अमिताभ बच्चन से माफी मांगता हूं कि उनके पोस्टर युवाओं को शिक्षित और प्रेरित करने के लिए इस्तेमाल किए गए।”

अभयानंद साहब इस मामले को दुर्भाग्यपूर्ण बता रहे हैं। पुलिस अधिकारी बार-बार पत्रकारों को समझा रहे हैं कि उन्होंने अमिताभ बच्चन के फोटो का इस्तेमाल किसी दुर्भावना से नहीं, बल्कि पूरी तरह जनहित में किया। पुलिस यह भी कह रही है कि इसका कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं था। हालांकि सुपर-30 कोई व्यावसायिक उद्यम है या नहीं, इस सवाल को सभी टालने में जुटे है। अमिताभ बच्चन की तस्वीर का अघौरा के लोगों पर कितना असर होता ये तो नहीं पता, लेकिन कोचिंग की ब्रांडिंग तगड़ी हो रही थी ऐसा बिहार के कई दूसरे कोचिंग इंस्टीच्यूट वालों का मानना है। 

ग़ौरतलब है कि पुलिस ने ये पोस्टर ‘अधौरा-30’ नाम के एक अभियान में इस्तेमाल किए थे। अधिकारियों के मुताबिक़ इसका मकसद ‘सुपर-30’ की तर्ज़ पर नक्सल प्रभावित अधौरा खंड के 30 प्रतिभाशाली युवाओं को चुनना है जिन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार किया जाएगा। लेकिन ये अभियान कितना निज़ी होगा और कितना सरकारी ये किसी को नहीं पता। कम ही लोगों को पता है कि सुपर-30 में तीस छात्रों को मुफ़्त कोचिंग देकर आईआईटी में दाख़िला दिलाने की प्रसिद्धि के कारण इंस्टीच्यूट के पास हजारों की संख्या में पेड ऐडमिशन भी आते हैं जिनसे कोचिंग के संचालकों को करोड़ों की आमदनी होती है।

निज़ी कोचिंग वाले बेशक सरकार से 30 युवकों को पढ़ाने का कोई खर्च न लें (जैसा कि वे सुपर-30 में भी करने का दावा करते हैं), लेकिन चुनने और उन्हें ट्रेनिंग के दौरान रखने का खर्च कितना आएगा ये स्पष्ट नहीं है। पोस्टरों को डिज़ाइन करवाने, बनवाने और लगवाने का खर्च कितना आया और उसकी पब्लिसिटी होने से सुपर-30 की ब्रांडिंग कितनी होती ये भी सोचने का विषय है। फिर अघौरा-30 के पोस्टर की कॉपीराइटिंग भी इस स्तर की नहीं थी कि उसे सुपरस्टार के स्तर का कहा जा सके।

बहरहाल, अमिताभ कैमूर में लगे अपने पोस्टर को लेकर कितने संज़ीदा हैं और उन्होंने इसपर ट्वीट क्यों किया ये कइयों की समझ से परे है। क्योंकि अब ये पोस्टर बेशक़ हट गया हो, लेकिन जो इसका मूल मक़सद था, यानी मीडिया की पब्लिसिटी हासिल करना, वो सुपर स्टार की टिप्पणी के बाद कम होने की बज़ाय और भी ज्यादा अच्छी तरह पूरा हो गया।

लेखक धीरज भारद्वाज जाने-माने पत्रकार हैं और प्रिंट, टीवी तथा वेब तीनों माध्यमों पर उनका अच्छा नियंत्रण है।

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