क्या इस बार फूलपुर संसदीय क्षेत्र में कमल खिला पाएगी भाजपा?

इलाहाबाद। काशी, अयोध्या, प्रयाग सरीखी धार्मिक नगरी के बीच स्थित फूलपुर संसदीय क्षेत्र में मतदाताओं ने कभी खुद पर धर्म-मजहब का मुद्दा हावी नहीं होने दिया। देश की अहम संसदीय सीट में शामिल फूलपुर क्षेत्र में आज तक कभी भी कमल नहीं खिल सका। अयोध्या के राममंदिर आंदोलन में देशभर की राजनीति में चाहे जो उबाल आया हो पर यहां भाजपा तापमान काफी कम रहा। भाजपा के थ्री स्टार नेताओं में कभी नाम दर्ज कराने व बगल की सीट इलाहाबाद से लगातार तीन बार जीत दर्ज कराने वाले चाहे डॉ. मुरली मनोहर जोशी रहे हों या विहिप के अंतर्राष्ट्रीय नेता अशोक सिंघल या फिर आरएसएस के सर्वेसर्वा राजेंद्र सिंह रज्जू भइया इन दिग्गजों के घर के बगल की सीट फूलपुर में भाजपा की हालत ज्यादातर चुनावों में पतली ही रही।

एक दो बार को छोड़कर कभी दूसरे नंबर का पायदान हासिल नहीं कर सकी। जानकारों की मानें तो इस बार भी इस सीट से कमल का खिलाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। ‘हमें अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था’ वाली कहावत भाजपा पर पिछले कई बार के चुनावों में लागू होती है। पार्टी प्रत्याशियों को पिछले कई बार से अपनों से ही जूझना पड़ता आ रहा है। कई बार दूसरे नंबर तक पहुंच चुकी भाजपा को यहां पिछले संसदीय चुनाव में चैथे नंबर पर आकर संतोष करना पड़ा। सन् 2007 के संसदीय चुनाव में फूलपुर सीट से भाजपा उम्मीदवार करन सिंह पटेल को जमानत तक गंवानी पड़ गई थी।
 
इस
बार चुनाव का ऐलान होने के बाद से ही सियासत के गलियारों में एक बार फिर अहम सवाल उठाया जाने लगा है कि क्या फूलपुर संसदीय क्षेत्र में इस बार भाजपा कमल खिलाने में कामयाब होगी। क्या इस बार भी जहां प्रत्याशी के लिए जनता के बीच जाकर वोट मांगन का समय काफी कम बचा है, ऐन मौके पर अपने रूठने दुलरूओं को मनाने की लंबी नौटंकी चलेगी। फिलहाल, फूलपुर संसदीय क्षेत्र में भाजपा को दूसरे दल या प्रत्याशियों के बजाय कई बार अपनों के बीच आखिरी समय तक जूझना पड़ा है। यही मौका विरोधियों के लिए संजीवनी और भाजपा के लिए जहर साबित होता आया है।

फूलपुर संसदीय क्षेत्र से बसपा ने अपने निवर्तमान सांसद कपिलमुनि करवरिया, सपा ने पूर्व सांसद धर्मराज पटेल पर दांव लगाया है। आम आदमी पार्टी ने शिमलाश्री को टिकट दिया है। उधर, कांग्रेस ने पहली बार इस महत्वपूर्ण संसदीय क्षेत्र से गैर राजनीतिक चेहरे पर दांव लगाकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को मैदान में उतारकर सारे राजनीतिक कयासों को ध्वस्त कर दिया। याद दिला दें कि सन् 1951 के प्रथम संसदीय चुनाव में वोटरों ने इसी क्षेत्र से पंडित जवाहर लाल नेहरू को यहां से शानदार जीत दिलाकर संसद भेजा। पंडित नेहरू यहां से सांसद रहते हुए देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने। इसके बाद बाद भी सन् 1957 और 1962 में भी यहां के वोटरों ने कांग्रेस पर पूरा भरोसा किया था। पंडित नेहरू यहां से लगातार तीन बार सांसद चुने गए।

भाजपा का कमल यहां से न खिलने के पीछे स्थानीय नेताओं को टिकट न देना प्रमुख वजह रही। पहली बार यहां से सन् 1984 के चुनाव में हंडिया निवासी डॉ. देवराज सिंह बतौर प्रत्याशी मैदान में उतरे और तीसरे नंबर पर रहे। इसके बाद भी सन् 1989 और उसके बाद के चुनाव में भाजपा ने क्षेत्र के बाहरी नेता व यमुनापार निवासी बेनीमाधव बिंद को लगातार दो बार टिकट दिया पर बाद में वे मौका देख सपा में शामिल हो गए। पिछली बार के चुनाव में फतेहपुर जिले के करन सिंह पटेल पर पार्टी ने दांव खेला पर वे चौथे स्थान पर रहे। चुनाव हारने के बाद करन सिंह पटेल ने फूलपुर से किनारा कस लिया। दो साल पहले ही वे फतेहपुर वापस लौट गए हैं। गठबंधन के चलते इस बार यहां से भाजपा को अपनादल भी समर्थन दे रहा है।

 

इलाहाबाद से वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट। लेखक दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान में रह चुके हैं। अब स्वतंत्र लेखन। संपर्कः 09565694757

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