भड़ास4मीडिया फिर टॉप पर, अंग्रेजी की दिग्गज वेबसाइटों को भी पछाड़ा

अपने जन्म के समय से ही देश के मीडिया जगत में हलचल मचाने वाली वेबसाइट भड़ास4मीडिया डाट काम bhadas4media.com ने एक बार फिर हिंदी-अंग्रेजी सभी मीडिया वेबसाइटों में नंबर वन की पदवी हासिल कर ली है. किसी भी हिंदी मीडिया वेबसाइट का भड़ास से कभी मुकाबला नहीं रहा. भड़ास बाकियों से कई गुना आगे रहा है और है. अंग्रेजी की कई स्थापित वेबसाइटों को पहले भी भड़ास ने पछाड़ा और फिर पछाड़ कर नंबर वन मीडिया वेबसाइट का स्थान हासिल कर लिया.

वेबसाइटों की रैंकिंग की आंकलन करने वाले एलेक्सा के आंकड़ों पर गौर करें तो भड़ास4मीडिया इस समय दुनिया भर की वेबसाइटों में पैंतीस हजार की पोजीशन पर है. अंग्रेजी की मीडिया वेबसाइट छत्तीस हजार से लेकर पचास हजार और एक लाख तक की पोजीशन पर हैं. हिंदी की मीडिया वेबसाइट एक लाख से ज्यादा से लेकर दो लाख और तीन लाख तक पर हैं. इस तरह भड़ास सबसे उपर है. जो वेबसाइट जितनी पापुलर होती है और जितनी ज्यादा देखी-पढ़ी व क्लिक की जाती है, उसकी रैंकिंग उतनी ही निखरती जाती है.

भड़ास के जरिए आम मीडियाकर्मी के दुख-दर्द को प्रकाशित करने और मीडिया हाउसों के घपलों-घोटालों का भंडाफोड़ करने के कारण कुछ मीडिया हाउसों ने साजिश रचकर पहले मुझे और फिर बाद में कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को गिरफ्तार कराया और जेल भिजवा दिया था. उन ढाई-तीन महीनों के दौरान भड़ास कुछ एक दिन के लिए बंद भी हुआ. कंटेंट अपडेशन का काम बुरी तरह बाधित हुआ. मीडिया हाउसों का मकसद किसी तरह भड़ास को बंद कराना था, इसलिए इसके संचालकों को प्रताड़ित कराया गया और जेल में लंबे समय तक रखवाया गया. उन दिनों भड़ास की रैंकिंग काफी नीचे गिरी. सत्तर पचहत्तर हजार के आसपास भड़ास की रैंकिंग गिरकर पहुंच गई थी. लेकिन जेल से छूटने के बाद अनिल और मैंने फिर से वही तेवर बरकरार रखा और मीडिया जगत को बता दिया कि बाजार के इस दौर में बिकाऊ लोगों की भीड़ के बीच कुछ ऐसी भी मिट्टी के बने होते हैं जो मुश्किलों से घबराने व टूटने की जगह ज्यादा निखरते हैं और दुगुने उत्साह के साथ अपने मिशन पर जुट जाते हैं.

कंटेंट इज किंग का नारा मीडिया का रहा है लेकिन दुर्भाग्य से मीडिया ही मार्केट इज किंग का अघोषित नारा अपनाकर कंटेंट को बेच खाने पर आमादा है. ऐसे दौर में सरोकारी पत्रकारिता की पताका फहराते हुए अनिल और मैंने हजारों मीडियाकर्मियों और शुभचिंतकों के दम पर भड़ास का झंडा बुलंद किए रखा और ऐसी ऐसी खबरों का प्रकाशन किया जिसका मीडिया हाउसों के अंदरखाने से बाहर आना असंभव था. इन खबरों के जरिए पूरे देश को भड़ास ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र के बाकी स्तंभों जितना ही भ्रष्ट और अनैतिक है चौथा स्तंभ. मीडिया को पवित्र गाय मानने वालों की आंखें खोलने का काम भड़ास ने किया और न्यू मीडिया के आंदोलन को आगे बढ़ाया ताकि असली खबरें कारपोरेट व लुटेरों के हाथों में दम घोटने की बजाय ब्लागों, वेबसाइटों, सोशल मीडिया माध्यमों, मोबाइल आदि के जरिए जन-जन तक पहुंचे.

बाजारवाद के इस दौर में भड़ास ने अपने खर्चे व संसाधन के लिए किसी कारपोरेट के हाथों बिकने की बजाय आम मीडियाकर्मियों के बीच जाना पसंद किया और सौ रुपये से लेकर हजार रुपये, पांच हजार रुपये तक के चंदे इकट्ठे किए. कई शुभचिंतकों के दम पर जिन्होंने यदा-कदा लाख-दो लाख रुपये भी भड़ास को दिए, भड़ास की गाड़ी सरपट दौड़ती रही. निजी जिंदगी में तमाम दुखों और मुश्किलों के बावजूद मेरी और अनिल की जोड़ी ने भड़ास के आगे दुख नहीं आने दिया. रात-दिन, सोते-जागते भड़ास के साथ खुद को जोड़े रखा और पीआर जर्नलिज्म में तब्दील हो चुकी आज की पत्रकारिता को आइना दिखाते हुए ऐसी खबरों को साहस के साथ प्रकाशित किया जिसे मुख्यधारा की मीडिया ने दबा-छिपा रखा था. भड़ास की लोकप्रियता और तेवर का ही कमाल है कि आज यह वेबसाइट ढेर सारे कारपोरेट मीडिया हाउसों में प्रतिबंधित है. जैसे आलोचना से शख्सियत संवरती है, वैसे ही पाबंदी से उत्सुकता बढ़ती है, सो पाठक भी बढ़ते हैं. इसी कारण भड़ास दिनोंदिन लोकप्रिय होता गया.

वेबसाइटों की रैंकिंग का आंकलन करने वाले एलेक्सा के जरिए जो ताजा आंकड़े मिले हैं, वे बताते हैं कि भड़ास इन दिनों अपने चरम पर है. इसके आसपास कोई मीडिया वेबसाइट नहीं है. पीआर करने वाली अंग्रेजी वेबसाइटों, मीडिया मालिकों का गुणगान करने वाली अंग्रेजी वेबसाइटों, मार्केटिंग वालों की जय जय करने वाली और कंटेंट वालों की उपेक्षा करने वाली अंग्रेजी वेबसाइटों के पाठक बहुत तेजी से टूट रहे हैं और वे सभी भड़ास से जुड़ रहे हैं. इससे वाकई साबित होता है कि सच्चा और ओरीजनल कंटेंट ही किंग होता है, मुखौटों का वक्त ज्यादा लंबा नहीं होता.

जहां तक हिंदी मीडिया वेबसाइटों की बात है तो इसमें ज्यादातर निजी प्रयासों द्वारा कुछ पत्रकार साथियों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं. इन प्रयासों का जारी रहना और ऐसे प्रयासों का बढ़ना बेहद जरूरी है क्योंकि अगर भ्रष्ट सत्ता व लुटेरी कारपोरेट मीडिया ने मिलकर कभी भड़ास को नष्ट किया तो दूसरे मौजूद माध्यमों को आगे आने होगा और प्रखर पत्रकारिता की चुनौती को आगे बढ़ाना होगा. लेकिन उन वेबसाइटों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए और निंदा करनी चाहिए जो कारपोरेट जगह की शह पर संचालित है और इनका काम सिर्फ मीडिया हाउसों के मैनेजमेंट का गुणगान छापना होता है. वे अपना कर्तव्य मालिक या उनके गुलाम संपादक को फोन मिलाने और उनके मुखारबिंदु से टपके अनमोल शाश्वत वचन को छाप देना मानते हैं . उनके यहां आम मीडियाकर्मियों का दुख-दर्द, मीडिया में शोषण, मीडिया हाउसों की कुत्सित नीतियों के बारे में कुछ प्रकाशित नहीं होता. पर, बात वही है कि ये बाजार है, यहां हर तरह का माल हर समय उपलब्ध रहेगा. ऐसे में दायित्व ग्राहक का है कि वह अपने बौद्धिकता व चेतना के जरिए आकलन करे कि किसकी पालिटिक्स क्या है.

भड़ास की राजनीति बहुत साफ रही है, विजन स्पष्ट रहा है, शुरू से. बड़े मीडिया हाउसों, जिनका प्रसार व प्रसारण बहुत दूर दूर तक है, से कोई समझौता नहीं. उनके प्रति सख्त आलोचक का भाव भड़ास का हमेशा बना रहेगा. छोटे और नए मीडिया हाउसों को प्रोत्साहन देने का कार्य भड़ास हमेशा करता रहेगा ताकि मीडिया में एकाधिकार के खतरे को कम किया जा सके. इसी कारण भड़ास नई वेबसाइटों, छोटी मैग्जीनों, छोटे प्रयासों से शुरू हो रहे अखबारों आदि की खबरें प्रकाशित करता रहता है. हम आगे भी यही नीति अपनाएंगे.

हां, बस आपसे एक शिकायत जरूर रहेगी कि भड़ास को जिस तरह की मदद आप पाठकों से मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही. अगर चार सौ लोगों ने हजार-हजार रुपये रंगदारी या सब्सक्रिप्शन या चंदा या आर्थिक सपोर्ट के रूप में भड़ास को दे दिए तो यह पर्याप्त नहीं है. भड़ास का बहुत बड़ा पाठक वर्ग है. भड़ास आम मीडियाकर्मियों का पोर्टल है. इसलिए आप चाहें जैसे भी हों, जहां भी हों, जिस स्थिति में भी हों, आपको भड़ास के लिए एक छोटा सा हिस्सा अलग निकाल कर रखना चाहिए. अगर यह जिम्मेदारी आप नहीं निभाएंगे तो इसका असर भड़ास की सेहत पर पड़ेगा.

आप सभी ने देखा ही है कि किस तरह उधार मांगने के मुद्दे को रंगदारी से कनेक्ट कर दिया गया और लंबी चौड़ी फर्जी कहानी बनाकर हम लोगों को जेल भिजवाया गया. मुश्किल पड़ने पर पहले भी हम लोग उधार लेते रहे हैं और अब भी लेते हैं. लेकिन कल को अगर फिर कोई साथी उधार मांगने को रंगदारी मांगना बता दे तो इसे सिर्फ यही समझा जाना चाहिए कि भड़ास व इससे जुड़े लोगों को फंसाने के लिए किस स्तर की व्यूह रचना होने लगी है. इसलिए हम लोग अब निजी तौर पर उधार मांगने और लूज टॉक करने से भी बचने लगे हैं.

अगर भड़ास टीम आत्मिक रूप से भ्रष्ट व अनैतिक होती तो एक तो भड़ास शुरू ही नहीं होता, शुरू होता तो साल-दो साल में धमकियों-मुकदमों से बंद हो गया होता, या फिर अब जेल से लौटने के बाद भड़ास का संचालन हर हाल में बंद हो चुका होता. लेकिन ईमानदारी और संघर्ष के रास्ते तैयार हुए भड़ास को संचालित करने के लिए कभी भी अनैतिक समझौतों में हम लोग नहीं गए. भड़ास शुरू करते वक्त से ही पता था कि हम लोग किससे पंगा लेने जा रहे हैं और इसका अंजाम क्या क्या हो सकता है. इसी कारण पैसे के मामले में कभी भी भड़ास टीम ने अनैतिक रास्ता नहीं अपनाया, किसी भी प्रकार के प्रलोभन को पास फटकने नहीं दिया. कई तरह के आफरों को ठुकराया. जरूरत पड़ने पर इनसे उनसे उधार लेकर हम लोगों ने काम चलाया और ढेरों शुभचिंतक आम पत्रकार से लेकर संपादक स्तर तक के लोगों ने आर्थिक मदद दी. भड़ास के पास ढेरों ऐसे दुर्दिन झेल रहे पत्रकार आए जिन्हें कुछ पैसों की सख्त जरूरत थी, और भड़ास ने इन लोगों को बिना किसी प्रचार के चुपचाप आर्थिक मदद दी, बिना इस उम्मीद के कि वो लौटाएंगे या नहीं.

आखिर में सौ बात की एक बात, वो ये कि अगर जुबां में सच बोलने की ताकत है, कलम में सच लिखने की औकात है, दिल में नैतिक साहस है, दिमाग में भरपूर विचार हैं, विजन में प्रकृति और आम आदमी से प्यार है, आत्मा में अपने को लेकर ईमानदार किस्म का अहंकार और शरीर में रीढ़ सीधी है तो आपको अपना रास्ता बनाने से कोई नहीं रोक सकता. गिरते, पढ़ते, लड़ते, रोते, सीखते आप एक मशाल जला लेंगे जो ढेरों साथियों की राह को रोशनी से प्रशस्त कर देगी.

पैसे, सपोर्ट, संसाधन ये सब बहुत छोटी चीज है और जब आप शुरुआत करते हैं तो इनका बहुत मतलब भी नहीं होता. भड़ास की शुरुआत पहले एक ब्लाग के रूप में हुई और बाद में इसे तीस हजार रुपये में एक लैपटाप, डोमेन नेम, वेब टेंप्लेट, शेयर्ड सर्वर के जरिए भड़ास4मीडिया डाट काम के रूप में शुरू किया गया. अगर पैसा, सपोर्ट और संसाधन बड़ी बात होती तो आज ढेरों ऐसे लोग हैं जिनके पास यह सब कुछ है लेकिन उनका इस समाज, क्षेत्र, देश, दुनिया में कोई नामलेवा नहीं, उनका कहीं कोई योगदान नहीं, उनका कहीं कोई पाजिटिव काम नहीं. उनकी दुनिया सिर्फ खाने-पीने-हगने-मूतने-नाचने-सोने तक सीमित है.

हम देसज लोग, गंवई बैकग्राउंड के लोग, दुखों से भरपूर इश्क लड़ा चुके लोग, बड़े लोगों के दोगलापन से बेजार रह चुके लोग असल में कर्मठ होने के साथ-साथ धैर्यवान भी होते हैं. और, हम लोगों ने आम जन के बीच जीवन जिया होता है, सो आम जनता पर हम लोगों का पूरा भरोसा होता है. लोकतंत्र और इससे संबद्ध स्तंभों के होने का मकसद गांव-समाज-शहर के उस आखिरी आदमी की भलाई है, बेहतरी है, जिसे लोकतंत्र का ककहरा भी नहीं पता. इस कारण हमारे आप पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि हम कुछ ऐसा जरूर करें ताकि उस आम आदमी के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह कर लें जिसे हम हर रोज मुश्किलों में, संकटों में, दुखियारी हालात में देखते-पाते हैं. ऐसा जो कर पाएगा वही मीडिया वाला कहलाएगा वरना दलालों और दरबारियों के चंगुल में आ चुकी इस लोकतांत्रिक मंडी में मीडिया व मीडियावाले अब रंडी से ज्यादा कुछ नहीं हैं.

देर-सबरे, मशालें कई होंगी और एक सामूहिक रोशनी का उदगार होगा, यह भरोसा है. लक्षण दिखने लगे हैं. रास्ता बनने लगा है. बस, हम सबको अपने-अपने हिस्से की दौड़ लगानी है. तकनीक और चेतना के उन्नत होते जाने ने राह-काम आसान कर दिया है. लोगों में सच के प्रति, पारदर्शिता के प्रति, ईमानदारी के प्रति, लोकतांत्रिक होने के प्रति ललक बढ़ी है. इसे हम मीडिया वाले साथियों को और ज्यादा बढ़ाना है, उत्प्रेरित करना है, एक्सीलरेट करना है, गतिमान बनाना है. तभी हम अपने समय के मीडिया के सच्चे सिपाही और असली सारथी कहलाएंगे.

जय भड़ास

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

09999330099


Yashwant Singh Jail

सहारा में सनसनी, विजय राय ने चैनल छोड़ा, मनोज मनु मेट्रो एडिटर बने

सहारा समय चैनल के दिग्गज विजय राय सहारा न्यूज से अलग हो गए हैं। विजय राय चैनल में कद्दावर थे और उनके पास सहारा न्यूज के ब्यूरो हेड की जिम्मेदारी थी। सूत्रों से मिली खबर के मुताबिक विजय राय से इस्तीफा ले लिया गया है। हालांकि अभी तक इसका कारण पता नहीं लग पाया है। सूत्रों का कहना है कि विजय राय का जाना वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा है। राय पिछले काफी वक्त से सहारा में सक्रिय थे। एक अन्य खबर में मनोज मनु को मेट्रो एडिटर बना दिया गया है।

इससे पहले मनोज मनु सहारा नेशनल और एमपी चैनल के हेड थे। बाद में उनसे नेशनल की जिम्मेदारी ले ली गई थी। फिलहाल उनके पास एमपी की ही जिम्मेदारी थी,जिसे बढ़ाते हुए अब उन्हें मेट्रो एडिटर का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया है।

सहाराश्री के सचिवालय से चित्रा का इस्तीफा

चित्रा त्रिपाठी ने सहारा ग्रुप को बॉय बोल दिया है। चित्रा सहाराश्री के सचिवालय का हिस्सा थीं, जहां से वह अलग हो गई हैं। चित्रा पहले सहारा टीवी में एंकर थीं। मगर कुछ समय पहले उन्हें मुंबई में स्थित सहाराश्री के सचिवालय में भेज दिया गया था। तब से वह यहीं काम कर रही थी। सचिवालय में मुख्यधारा की मीडिया जैसा काम नहीं होने के कारण चित्रा ने यह निर्णय लिया है।

हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि चित्रा ने खुद नौकरी से इस्तीफा नहीं दिया है बल्कि उन्हें जाने को कह दिया गया था। सूत्रों के मुताबिक चित्रा अब फिर से मुख्यधारा की पत्रकारिता से जुड़ने की जुगत में हैं।
 

थी..हूं..रहूंगी के लिए वर्तिका नंदा को ऋतुराज सम्मान

डॉ.वर्तिका नंदा को प्रतिष्ठित परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित किया गया है.  वर्तिका जी को यह सम्मान उनके कविता संग्रह 'थी.. हूं… रहूंगी' के लिए मिला। सम्मान समारोह दिल्ली में हुआ। यह कविता संग्रह महिला अपराध पर आधारित है। इस विषय पर लिखा जाने वाले यह अपने तरह का अनूठा कविता संग्रह है। हर साल यह सम्मान दिया जाता है। वर्तिका नंदा को पुरस्कार देने का निर्णय तीन सदस्यी निर्णायक मंडल ने की। इसमें राजनारायण बिसारिया, डा. अजित कुमार और डॉ. कैलाश वाजपेयी शामिल थे।

इससे पहले विजय किशोर मानव, डा. अनामिका, नरेश सक्सेना, बालस्वरूप राही, पवन करण व विष्णु नागर आदि परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं। परंपरा ऋतुराज सम्मान के साथ एक लाख रुपये की राशि भी दी जाती है।  डॉ. वर्तिका नंदा इस कविता संग्रह को लेकर पिछले काफी वक्त से उत्साहित रही हैं. अपने कविता संग्रह के बारे में उन्होंने कहा कि, थी ..हूं..रहूंगी की कहानी अपने आप में एक अलग तरह की रचना है. बतौर वर्तिका, "पिछले साल एक मरजानी मर गई और तब यह लगा कि कई बार मरते-मरते कोई औरत जब बच जाती है, तो बदल जाती है। अपराध की रिपोर्टिंग ने यही सिखाया और बताया। इस लिए इस बार अनायास ही कविताएं एक नए भाव के साथ उग आईं। वर्तिका आईआईएमसी की छात्रा रही हैं। मीडिया में लंबे वक्त तक सक्रिय रहने के बाद उन्होंने पढ़ाने के लिए आईआईएमसी को चुना। यहां वह कई सालों तक विद्यार्थियों को टीवी पत्रकारिता पढ़ाती रही हैं।

पश्चिम भारत में भी पहुंचा सहारा समय

देश के तमाम हिस्सों में अपनी पहुंच बनाने के बाद सहारा समय ने पश्चिम भारत में भी दस्तक दे दी है। सहारा न्यूज़ नेटवर्क ने 15 अगस्त को  महाराष्ट्र और गुजरात से भी चैनल शुरू कर दिया है। सहारा इंडिया परिवार के मुख्य अभिभावक सहाराश्री सुब्रत रॉय सहारा ने राजधानी के एक पांच सितारा होटल में अनेक केन्द्रीय मंत्रियों, पूर्व केंद्रीय मंत्रियों व सैकड़ों अतिथियों की मौजूदगी में चैनल का शुभारंभ किया। इस दौरान, सहाराश्री ने अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

सहारा ने इस क्षेत्र में हिंदी भाषी दर्शकों की आबादी को देखते हुए कदम रखा है। सहारा को इस क्षेत्र में भी अपने चैनल के सफल होने की पूरी उम्मीद है। वरिष्ठ अधिकारियों की रणनीति लोकल विज्ञापनदाताओं के अलावा सरकारी विज्ञापन को भी ट्रार्गेट करने की है। इस दोनों राज्यों में सहारा के ब्यूरो और रिर्पोटर पहले से ही मौजूद हैं. इसको देखते हुए कंटेट के स्तर पर बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। चैनल के लांचिंग समारोह में केन्द्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय, चौ.अजित सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा,सलमान खुर्शीद, हरीश रावत, अजय माकन और राजीव शुक्ला, राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, पूर्व केन्द्रीय मंत्री व लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान, जैसे दिग्गज मौजूद थे।
 
 

हड़ताल के चलते नहीं हुई सुनवाई, अब 25 अगस्त को होगी

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह के मामले की सुनवाई 17 अगस्त को नहीं हो सकी. इस दिन वकीलों की हड़ताल के कारण कोर्ट की कार्यवाही नहीं हो सकी. अब इसकी सुनवाई 25 अगस्त को होगी. इससे पहले विनोद कापड़ी और साक्षी जोशी द्वारा लगाए गए आरोपों पर कोर्ट ने यशवंत सिंह को जमानत दे दी है. फिलहाल दैनिक जागरण द्वारा लगाए गए मामले में जमानत होनी बाकी है. जागरण ने भी यशवंत सिंह पर रंगदारी मांगने का आरोप लगाया था.

देश भर के पत्रकार लगातार यशवंत सिंह से मिलने और भड़ास4मीडिया को अपना समर्थन देने के लिए डासना जेल पहुंच रहे हैं. इधर भड़ास4 मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को भी बीते दिनों गिरफ्तार कर लिया गया है. अनिल भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत  सिंह के मामले की पैरवी करने के लिए कोर्ट गए थे. जहां अदालत परिसर से ही पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. अनिल के मामले पर 28 अगस्त को सुनवाई होनी है.


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Yashwant Singh Jail

पिता को न घसीटें, लिखें कि जांच में कुछ न मिला : स्वतंत्र मिश्रा

सहारा मीडिया के हेड स्वतंत्र मिश्रा ने अपने और अपने पिता के बारे में भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित खबर व दस्तावेजों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराई है. हालांकि स्वतंत्र मिश्रा और उनके कई लोगों ने भड़ास4मीडिया को बार-बार फोन कर इस खबर को रोक दिए जाने की बातें तरह-तरह के तरीकों से कहीं पर भड़ास4मीडिया का सबसे यही कहना था कि खबर नहीं हटाएंगे क्योंकि खबर के नाम पर कुछ लाइनें हैं, बाकी सब दस्तावेज हैं.

इन दस्तावेजों के बारे में जो भी कहना है, जो भी अपना पक्ष रखना है, रखिए, और उसे भड़ास4मीडिया पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा. पर अभी तक स्वतंत्र मिश्रा और उनके लोगों की तरफ से कोई लिखित प्रतिक्रिया नहीं आई है, इसलिए यहां उन लोगों द्वारा कही गई बातों को संक्षेप में रखा जा रहा है ताकि उनका भी पक्ष सामने आ सके. स्वतंत्र मिश्रा का कहना है कि उनके श्रद्धेय पिताजी जो अब इस दुनिया में नहीं है, का नाम किसी भी तरह से किसी विवाद में नहीं घसीटा जाना चाहिए. पिता जी के प्रति श्रद्धास्वरूप ही दुकानों को उनके नाम से हटाकर किसी और के नाम पर हस्तांतरित नहीं कराया गया.

स्वतंत्र मिश्रा के मुताबिक जिस इनकम टैक्स जांच की बात की जा रही है, उसमें कहीं कुछ नहीं मिला, इससे संबंधित बात व दस्तावेज का भी प्रकाशन भड़ास4मीडिया पर किया जाना चाहिए. उनके खिलाफ कई बार कई स्तर पर शिकायतें की गईं लेकिन हर बार जांच के बाद कुछ नहीं मिला और आरोप झूठे साबित हुए. स्वतंत्र मिश्रा ने बताया कि सहारा में कुछ लोग निहित स्वार्थों के तहत उनके खिलाफ सुनियोजित साजिश रच रहे हैं और दुष्प्रचार कर रहे हैं, भड़ास4मीडिया को ऐसे दुष्प्रचार का पार्ट नहीं बनना चाहिए. स्वतंत्र मिश्रा ने कहा कि उन्होंने अपने करियर में एक पैसे की बेइमानी नहीं की है, कोई भी अगर इसे साबित कर दे तो वह कोई भी सजा पाने को तैयार हैं.

स्वतंत्र मिश्रा ने कहा कि उनके परिवार में दर्जनों सदस्य हैं. किसी के काम और विवाद से उनका कोई लेना-देना घोषित नहीं किया जाना चाहिए. अगर पिता जी के नाम पर गन हाउस हैं और उसे उनके परिवार के लोग संचालित कर रहे हैं तो उससे स्वतंत्र मिश्रा का किस तरह लेना-देना हो गया. पत्रकारिता की बुनियादी समझ भी यही बात कहती है कि दूसरों के कामों के आधार पर किसी तीसरे का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए. अगर इसी आधार पर आरोप लगते रहें तो फिर तो देश में कोई भी नहीं बचेगा. स्वर्गीय पिताजी के नाम का आड़ लेकर उन पर जो लोग निशाना साध रहे हैं, वे गलत कर रहे हैं और भड़ास4मीडिया भी उनकी इस साजिश में शामिल दिख रहा है.

तो यह था स्वतंत्र मिश्रा का रिएक्शन. उन्होंने भड़ास4मीडिया से कई दौर की बातचीत के दौरान अपना अभिमत जाहिर किया. कई बार वे तल्ख हुए और कई बार समझाते-बुझाते रहे. लेकिन एक खास चीज जो रही वो ये कि कल तक जो भड़ास4मीडिया स्वतंत्र मिश्रा को सही समझ में आ रहा था, उनसे संबंधित एक खबर छपते ही उन्हें अचानक गलत और खराब दिखने लगा. और, खबर भी क्या, जिसमें सिर्फ दस्तावेज हैं, भड़ास की तरफ से लिखा गया कोई कमेंट नहीं. केवल कुछ लाइनों का इंट्रोडक्ट्री भाषण ताकि पाठक दस्तावेज पढ़ने से पहले माइंड मेकअप कर ले कि ये है क्या व किससे संबंधित. मैं, भड़ास4मीडिया का एडिटर यशवंत, इस बारे में,  अपना भी मत रखना चाहूंगा, अपनी बात कहना चाहूंगा, जो इस प्रकार है….

सबसे पहली बात तो ये कि सहारा मीडिया में आंतरिक राजनीति जमकर हुआ करती है और कई बार चरम पर रहा करती है. वहां हर गुट एक दूसरे के खिलाफ लगा रहता है. जब उपेंद्र राय के खिलाफ खबरें आईं तो दमदारी के साथ छपीं और अब अगर स्वतंत्र मिश्रा से संबंधित दस्तावेज सामने आ रहे हैं तो वे भी प्रमुखता से छप रहे हैं. आगे भी यह क्रम जारी रहेगा. भड़ास4मीडिया किसी का पालतू न है और न रहेगा. जो लोग यह भ्रम पाले रहते हैं कि वे भड़ास4मीडिया को मैनेज कर लेंगे या कर चुके हैं तो उनका यह भ्रम झूठा है. अगर उनके खिलाफ भी ठोस व प्रामाणिक सूचनाएं, दस्तावेज हाथ लग गए तो वे भी प्रकाशित कर दिए जाएंगे.

भड़ास4मीडिया जब खुद मेरा अर्थात यशवंत सिंह का नहीं हुआ, तो दूसरों का क्या होगा. दर्जनों गाली भरी, आरोप भरे लेख, टिप्पणियां, विचार मेरे खिलाफ आए और प्रमुखता से इसी पोर्टल पर प्रकाशित किए गए. आगे भी अगर मेरे खिलाफ कोई खबर, लेख, टिप्पणी आदि भेजता है तो उसे सबसे प्रमुखता से और सबसे पहले मैं खुद प्रकाशित करूंगा क्योंकि मेरा मानना है बौनों की इस दुनिया में किससे क्या चीज छुपाना और बचाना, और किसलिए छुपाना और बचाना. दूसरी बात, हर संपादक को यह आंतरिक साहस रखना चाहिए कि वह अपने दोषों, अपने खिलाफ आ रहे विचारों को भी उतना ही सम्मान दे जितना वह दूसरों के खिलाफ आने वाली सूचनाओं, दस्तावेजों को देता है. स्वतंत्र मिश्रा जी अगर अपने खिलाफ छपी खबर पर जितनी भी लंबी प्रतिक्रिया या जो भी दस्तावेज भेजते उसे उतनी ही प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता, जितनी प्रमुखता से उनके खिलाफ खबर का प्रकाशन किया गया है.

इस बीच, कई तरह की बातें भी सुनने को मिली. स्वतंत्र मिश्रा के कुछ करीबी लोगों ने किसी से कहा कि लगता है कि उपेंद्र राय ने यशवंत को 50 हजार रुपये दिए हैं जिसके बाद यशवंत ने स्वतंत्र मिश्रा के खिलाफ खबर का प्रकाशन किया. यह बयान देने वाले दोस्तों से मेरा कहना है कि भाई, कम से कम रेट तो ठीकठाक लगाया करो. मार्केट इकानोमी के इस दौर में मैं कतई यह नहीं कहूंगा कि भड़ास4मीडिया का संचालन मैं हवा-पानी पी-खा के कर रहा हूं. मुझे और भड़ास को सरवाइव करने के लिए कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं, सहयोग लेने पड़ते हैं लेकिन यह दस फीसदी से कम है.

नब्बे फीसदी हम इमानदार हैं. और, जिस दस फीसदी कथित बेइमानी उर्फ लायजनिंग उर्फ समझौतों की बात मैं कर रहा हूं, उस दस फीसदी को भी उजागर करने का माद्दा रखता हूं. ये समझौते भड़ास की उसी नीति के तहत हैं कि हम नए और जनपक्षधर मीडिया हाउसों को सपोर्ट करेंगे, उनकी ब्रांडिंग में मदद करेंगे, उनके जमने और आगे बढ़ने में यथासंभव मदद करेंगे लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि अगर उस नए मीडिया हाउस में नंगा नाच हुआ तो छापेंगे भी नहीं. प्रभात खबर जैसे जनपक्षधर व बेबाक अखबार के खिलाफ भी खबरें आती हैं तो वो प्रकाशित होती हैं, यह जानते हुए भी कि प्रभात खबर से हम लोगों को विज्ञापन मिलता है और समय-समय पर वैचारिक व नैतिक समर्थन भी मिलता रहता है. पर उनके खिलाफ भी अगर कोई ठोस गासिप आती है तो उसका प्रकाशन किया जाता है. प्रभात खबर की आंतरिक राजनीति को लेकर पिछले कुछ महीनों में कई खबरें हमारे यहां प्रकाशित हुई.

पचास हजार रुपये लेकर खबर छापने की स्थिति कभी नहीं आएगी दोस्तों क्योंकि जब हम लोग खबर छापते हैं तो पैसे की बात नहीं करते और जब पैसे की बात करते हैं तो खबर की बात नहीं करते. यह अदभुत संतुलन और बुनियादी समझ ही हमें बचाए हुए है अन्यथा भड़ास और मेरे दुश्मनों की लंबीचौड़ फौज जाने कबका अपन लोगों की तेरहवीं मना-खा चुकी होती और अमर रहें का नारा लगा चुकी होती.

भड़ास अब अपने शुभचिंतकों की संख्या के मामले में काफी समृद्ध हो गया है. इसके समर्थकों की तादाद बहुत बड़ी हो चुकी है. इसलिए किन्हीं चिरकुटों-हरामखोरों से पैसे लेने की कोई जरूरत नहीं पड़ती. पिछले दिनों भड़ास के एक शुभचिंतक ने, जो मीडिया से नहीं है, भड़ास को डेढ़ लाख रुपये डोनेट किया. मैं अभिभूत हो गया. उनका कोई स्वार्थ नहीं. उन्हें कोई लेख-खबर न छपवाना था और न रुकवाना. बस, उन्हें अच्छा लगता  है भड़ास का काम. और, उन्हें अच्छा लगता हूं मैं और मेरी टीम.

ढेर सारे ऐसे लोग हैं जो भड़ास के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. इसलिए बेइमानों को यह कभी समझ में ही नहीं आएगा कि दुनिया में इमानदारी से भी काम चल सकता है, इमानदारी के साथ भी जिया जा सकता है. जो जैसा होता है, वैसी ही सोच दूसरों के बारे में रखता है. जो अच्छा पत्रकार होता है वह एक संत, फकीर, औघड़ की तरह होता है जिसका पूरा व्यक्तित्व पारदर्शी होता है. उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं होता. उसके पास पाने के लिए कुछ नहीं होता. उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता. इसीलिए हर क्षण निर्भीक और ईमानदार वो रहता है.

फिल्म सिंघम का वो डायलाग पूरी तरह सच है कि अपन लोग की जरूरतें हैं कम, इसलिए सीने में है दम. डरें वे लोग जो पैसा कमाने, बटोरने के लिए हर तरह के कुकर्म दिन रात करते रहते हैं. अपन की जरूरत व जिंदगी आदिवासियों सरीखी है. खाने के लिए पाव भर मांस. पीने के लिए पाव भर देसी या अंग्रेजी का पव्वा. और सुनने के लिए पाव भर आध्यात्मिक आलाप. बस, इन तीनों के मिश्रण से बंदा सुपरमैन बन जाता है. वो काले पाजामे के उपर लाल चड्ढी पहन कर लंगूर की तरह उछल-कूद करने वाला सुपरमैन नहीं बल्कि अतिसंवेदी मनोदशा में पहुंचने की प्रक्रिया में जनरेट होने वाले प्लैटोनिक प्लीजर की अनुभूत से लैस सुपरमैन. वेशभूषा, बोलचाल और दिखावे के आधार पर मनुष्य के बीच भेदभाव करने वाली एलीट किस्म की मानसिकता भी एक तरह का रंगभेद है.

मेरा यह मानना दिन ब दिन पुख्ता होता जा रहा है कि ज्यादातर गंदे लोग बेहद अच्छे कपड़े पहनते हैं और बड़ी शालीन भाषा बोलते हैं. ज्यादातर अच्छे लोग बहुत अनगढ़, देसी और देहाती किस्म के होते हैं. ये मुझे क्यों लगता है, पता नहीं लेकिन यह सब कहते हुए मुझे अपने प्रिय कवि और गुरु समान वीरेन डंगवाल की पीटी उर्षा शीर्षक वाली कविता का एक अंश जरूर याद आता है कि… ''खाते हुए मुँह से चपचप की आवाज़ होती है? / कोई ग़म नहीं / वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता / दुनिया के / सबसे ख़तरनाक खाऊ लोग हैं!'' (पूरी कविता यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं- पीटी ऊषा)

मैं फिर यहां कहना चाहूंगा कि हम लोगों की किसी अखबार या किसी संपादक या किसी मैनेजर या किसी हेड या किसी सीईओ या किसी मालिक या किसी अन्य चिरकुट या महान किस्म के प्राणियों से कोई अदावत नहीं है और न ही किसी से प्यार. इसलिए इस खुले मंच पर वो सब कुछ छपेगा, जो छपने लायक लगता है. कुछ ऐसे स्पेस होने चाहिए जो अनमैनेज्ड हो. इस देश का कबाड़ा मैनेजमेंट और मैनेजरों ने ही तो किया है. और देश को अनमैनेज्ड लोगों और आम आदिवासी किस्म के जन ने बचाकर रखा है. खुद देख लीजिए. जिन लोगों के कंधों पर जिम्मेदारी सौंपते हुए उसे निभाने के लिए उनके हाथ में पावर और सरकारी खजाने से वेतन दिए गए, वे लोग अपनी जिम्मेदारी निभाने की जगह आम लोगों को डराने और खजाने को लूटने लग गए हैं. तो ऐसी व्यवस्था किस काम की जो व्यवस्था बनाने की जगह अव्यवस्था फैलाने में जुटी हुई हो और जिन्हें हम अव्यवस्थित आबादी के रूप में देखते हैं वे अपने भीतर गजब की व्यवस्था बनाकर बचाकर रखे हुए हैं.

वक्त कुछ ऐसा है कि चीजों को अब सिर के बल खड़ा कर देना चाहिए तभी हम लोगों को ठीक ठीक सब कुछ दिखेगा, समझ में आएगा. देखने-समझने के परंपरागत मानदंड भी बहुत घटिया, भोथरा, एकांगी और जनविरोधी हो चुका है क्योंकि इन मानदंडों, इन शब्दों के जरिए ही अब बड़ी बड़ी नौटंकिया हो रही हैं जो अंततः जनता के खिलाफ होकर मैनेजमेंट, कारपोरेट, लुटेरों की पक्षधरता पर द इंड हो जाती हैं. बात कहां से शुरू हुई और कहां पहुंच गई. पर ठीक है, मन की भड़ास तो निकलनी ही चाहिए. फिर लौटते हैं स्वतंत्र मिश्रा पर.

आखिर में स्वतंत्र मिश्रा से इतना जरूर कहना चाहूंगा कि यह कोई आखिरी खबर नहीं है. खबरें अभी और भी होंगी, और आएंगी तो छपेंगी. और, आपके गन हाउसों से डरें वे लोग जिनको लंबा जीना है और जिनको बहुत कुछ बचाना हो, यहां न जीने की तमन्ना है और न कुछ बचा कर रखने के लिए है. इसलिए डर नामक शब्द के आने के लिए कोई दरवाजा इस तरफ नहीं है, हां, आप अपनी तरफ के दरवाजों को जरूर गिन लीजिएगा. कुछ लोग स्वतंत्र मिश्रा से संबंधित खबर पर उनके खिलाफ एकतरफा कमेंटबाजी करने में लगे हैं, और इस बहाने निजी खुन्नस निकाल रहे हैं. फर्जी नामों से कमेंट्स लिखे जा रहे हैं और कमेंट्स में भी कोई नया तथ्य नहीं बल्कि सिर्फ गाली-गलौज है, इसलिए उन सभी कमेंट्स को अनपब्लिश करा दिया है.

बातें चलती रहेगी. आनंद इसी में है कि सब कुछ ट्रांसपैरेंट रहे और साफ-सुथरा रहे. एकांगी न रहे और गंदा न रहे. मुझे भरोसा है कि भड़ास ने मीडिया के लाभों को न लेते हुए और खुद को मीडिया जैसा कुछ न घोषित करते हुए भी मीडिया की,  पत्रकारिता की उच्च परंपराओं का निर्वाह जिस तरह से आजतक किया है, वह आगे भी हम लोग जारी रख पाने में समर्थ होंगे. इतनी ताकत आप सब पाठकों ने हम लोगों को दे दी है.

स्वतंत्र मिश्रा और इन जैसे लोगों से कहना चाहूंगा कि वे दिमाग से यह बिलकुल निकाल दें कि उनके खिलाफ कोई कंपेन जैसा चलाया जा रहा है. अगर उपेंद्र राय के खिलाफ कोई सज्जन कोई भी दस्तावेज भेजेंगे तो उसे भी उतने ही प्यार सम्मान से छापा जाएगा जितने प्यार से फिलहाल सब कुछ छप-छपा रहा है. आमीन.

यशवंत

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