सहारा मीडिया के हेड स्वतंत्र मिश्रा ने अपने और अपने पिता के बारे में भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित खबर व दस्तावेजों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराई है. हालांकि स्वतंत्र मिश्रा और उनके कई लोगों ने भड़ास4मीडिया को बार-बार फोन कर इस खबर को रोक दिए जाने की बातें तरह-तरह के तरीकों से कहीं पर भड़ास4मीडिया का सबसे यही कहना था कि खबर नहीं हटाएंगे क्योंकि खबर के नाम पर कुछ लाइनें हैं, बाकी सब दस्तावेज हैं.
इन दस्तावेजों के बारे में जो भी कहना है, जो भी अपना पक्ष रखना है, रखिए, और उसे भड़ास4मीडिया पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा. पर अभी तक स्वतंत्र मिश्रा और उनके लोगों की तरफ से कोई लिखित प्रतिक्रिया नहीं आई है, इसलिए यहां उन लोगों द्वारा कही गई बातों को संक्षेप में रखा जा रहा है ताकि उनका भी पक्ष सामने आ सके. स्वतंत्र मिश्रा का कहना है कि उनके श्रद्धेय पिताजी जो अब इस दुनिया में नहीं है, का नाम किसी भी तरह से किसी विवाद में नहीं घसीटा जाना चाहिए. पिता जी के प्रति श्रद्धास्वरूप ही दुकानों को उनके नाम से हटाकर किसी और के नाम पर हस्तांतरित नहीं कराया गया.
स्वतंत्र मिश्रा के मुताबिक जिस इनकम टैक्स जांच की बात की जा रही है, उसमें कहीं कुछ नहीं मिला, इससे संबंधित बात व दस्तावेज का भी प्रकाशन भड़ास4मीडिया पर किया जाना चाहिए. उनके खिलाफ कई बार कई स्तर पर शिकायतें की गईं लेकिन हर बार जांच के बाद कुछ नहीं मिला और आरोप झूठे साबित हुए. स्वतंत्र मिश्रा ने बताया कि सहारा में कुछ लोग निहित स्वार्थों के तहत उनके खिलाफ सुनियोजित साजिश रच रहे हैं और दुष्प्रचार कर रहे हैं, भड़ास4मीडिया को ऐसे दुष्प्रचार का पार्ट नहीं बनना चाहिए. स्वतंत्र मिश्रा ने कहा कि उन्होंने अपने करियर में एक पैसे की बेइमानी नहीं की है, कोई भी अगर इसे साबित कर दे तो वह कोई भी सजा पाने को तैयार हैं.
स्वतंत्र मिश्रा ने कहा कि उनके परिवार में दर्जनों सदस्य हैं. किसी के काम और विवाद से उनका कोई लेना-देना घोषित नहीं किया जाना चाहिए. अगर पिता जी के नाम पर गन हाउस हैं और उसे उनके परिवार के लोग संचालित कर रहे हैं तो उससे स्वतंत्र मिश्रा का किस तरह लेना-देना हो गया. पत्रकारिता की बुनियादी समझ भी यही बात कहती है कि दूसरों के कामों के आधार पर किसी तीसरे का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए. अगर इसी आधार पर आरोप लगते रहें तो फिर तो देश में कोई भी नहीं बचेगा. स्वर्गीय पिताजी के नाम का आड़ लेकर उन पर जो लोग निशाना साध रहे हैं, वे गलत कर रहे हैं और भड़ास4मीडिया भी उनकी इस साजिश में शामिल दिख रहा है.
तो यह था स्वतंत्र मिश्रा का रिएक्शन. उन्होंने भड़ास4मीडिया से कई दौर की बातचीत के दौरान अपना अभिमत जाहिर किया. कई बार वे तल्ख हुए और कई बार समझाते-बुझाते रहे. लेकिन एक खास चीज जो रही वो ये कि कल तक जो भड़ास4मीडिया स्वतंत्र मिश्रा को सही समझ में आ रहा था, उनसे संबंधित एक खबर छपते ही उन्हें अचानक गलत और खराब दिखने लगा. और, खबर भी क्या, जिसमें सिर्फ दस्तावेज हैं, भड़ास की तरफ से लिखा गया कोई कमेंट नहीं. केवल कुछ लाइनों का इंट्रोडक्ट्री भाषण ताकि पाठक दस्तावेज पढ़ने से पहले माइंड मेकअप कर ले कि ये है क्या व किससे संबंधित. मैं, भड़ास4मीडिया का एडिटर यशवंत, इस बारे में, अपना भी मत रखना चाहूंगा, अपनी बात कहना चाहूंगा, जो इस प्रकार है….
सबसे पहली बात तो ये कि सहारा मीडिया में आंतरिक राजनीति जमकर हुआ करती है और कई बार चरम पर रहा करती है. वहां हर गुट एक दूसरे के खिलाफ लगा रहता है. जब उपेंद्र राय के खिलाफ खबरें आईं तो दमदारी के साथ छपीं और अब अगर स्वतंत्र मिश्रा से संबंधित दस्तावेज सामने आ रहे हैं तो वे भी प्रमुखता से छप रहे हैं. आगे भी यह क्रम जारी रहेगा. भड़ास4मीडिया किसी का पालतू न है और न रहेगा. जो लोग यह भ्रम पाले रहते हैं कि वे भड़ास4मीडिया को मैनेज कर लेंगे या कर चुके हैं तो उनका यह भ्रम झूठा है. अगर उनके खिलाफ भी ठोस व प्रामाणिक सूचनाएं, दस्तावेज हाथ लग गए तो वे भी प्रकाशित कर दिए जाएंगे.
भड़ास4मीडिया जब खुद मेरा अर्थात यशवंत सिंह का नहीं हुआ, तो दूसरों का क्या होगा. दर्जनों गाली भरी, आरोप भरे लेख, टिप्पणियां, विचार मेरे खिलाफ आए और प्रमुखता से इसी पोर्टल पर प्रकाशित किए गए. आगे भी अगर मेरे खिलाफ कोई खबर, लेख, टिप्पणी आदि भेजता है तो उसे सबसे प्रमुखता से और सबसे पहले मैं खुद प्रकाशित करूंगा क्योंकि मेरा मानना है बौनों की इस दुनिया में किससे क्या चीज छुपाना और बचाना, और किसलिए छुपाना और बचाना. दूसरी बात, हर संपादक को यह आंतरिक साहस रखना चाहिए कि वह अपने दोषों, अपने खिलाफ आ रहे विचारों को भी उतना ही सम्मान दे जितना वह दूसरों के खिलाफ आने वाली सूचनाओं, दस्तावेजों को देता है. स्वतंत्र मिश्रा जी अगर अपने खिलाफ छपी खबर पर जितनी भी लंबी प्रतिक्रिया या जो भी दस्तावेज भेजते उसे उतनी ही प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता, जितनी प्रमुखता से उनके खिलाफ खबर का प्रकाशन किया गया है.
इस बीच, कई तरह की बातें भी सुनने को मिली. स्वतंत्र मिश्रा के कुछ करीबी लोगों ने किसी से कहा कि लगता है कि उपेंद्र राय ने यशवंत को 50 हजार रुपये दिए हैं जिसके बाद यशवंत ने स्वतंत्र मिश्रा के खिलाफ खबर का प्रकाशन किया. यह बयान देने वाले दोस्तों से मेरा कहना है कि भाई, कम से कम रेट तो ठीकठाक लगाया करो. मार्केट इकानोमी के इस दौर में मैं कतई यह नहीं कहूंगा कि भड़ास4मीडिया का संचालन मैं हवा-पानी पी-खा के कर रहा हूं. मुझे और भड़ास को सरवाइव करने के लिए कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं, सहयोग लेने पड़ते हैं लेकिन यह दस फीसदी से कम है.
नब्बे फीसदी हम इमानदार हैं. और, जिस दस फीसदी कथित बेइमानी उर्फ लायजनिंग उर्फ समझौतों की बात मैं कर रहा हूं, उस दस फीसदी को भी उजागर करने का माद्दा रखता हूं. ये समझौते भड़ास की उसी नीति के तहत हैं कि हम नए और जनपक्षधर मीडिया हाउसों को सपोर्ट करेंगे, उनकी ब्रांडिंग में मदद करेंगे, उनके जमने और आगे बढ़ने में यथासंभव मदद करेंगे लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि अगर उस नए मीडिया हाउस में नंगा नाच हुआ तो छापेंगे भी नहीं. प्रभात खबर जैसे जनपक्षधर व बेबाक अखबार के खिलाफ भी खबरें आती हैं तो वो प्रकाशित होती हैं, यह जानते हुए भी कि प्रभात खबर से हम लोगों को विज्ञापन मिलता है और समय-समय पर वैचारिक व नैतिक समर्थन भी मिलता रहता है. पर उनके खिलाफ भी अगर कोई ठोस गासिप आती है तो उसका प्रकाशन किया जाता है. प्रभात खबर की आंतरिक राजनीति को लेकर पिछले कुछ महीनों में कई खबरें हमारे यहां प्रकाशित हुई.
पचास हजार रुपये लेकर खबर छापने की स्थिति कभी नहीं आएगी दोस्तों क्योंकि जब हम लोग खबर छापते हैं तो पैसे की बात नहीं करते और जब पैसे की बात करते हैं तो खबर की बात नहीं करते. यह अदभुत संतुलन और बुनियादी समझ ही हमें बचाए हुए है अन्यथा भड़ास और मेरे दुश्मनों की लंबीचौड़ फौज जाने कबका अपन लोगों की तेरहवीं मना-खा चुकी होती और अमर रहें का नारा लगा चुकी होती.
भड़ास अब अपने शुभचिंतकों की संख्या के मामले में काफी समृद्ध हो गया है. इसके समर्थकों की तादाद बहुत बड़ी हो चुकी है. इसलिए किन्हीं चिरकुटों-हरामखोरों से पैसे लेने की कोई जरूरत नहीं पड़ती. पिछले दिनों भड़ास के एक शुभचिंतक ने, जो मीडिया से नहीं है, भड़ास को डेढ़ लाख रुपये डोनेट किया. मैं अभिभूत हो गया. उनका कोई स्वार्थ नहीं. उन्हें कोई लेख-खबर न छपवाना था और न रुकवाना. बस, उन्हें अच्छा लगता है भड़ास का काम. और, उन्हें अच्छा लगता हूं मैं और मेरी टीम.
ढेर सारे ऐसे लोग हैं जो भड़ास के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. इसलिए बेइमानों को यह कभी समझ में ही नहीं आएगा कि दुनिया में इमानदारी से भी काम चल सकता है, इमानदारी के साथ भी जिया जा सकता है. जो जैसा होता है, वैसी ही सोच दूसरों के बारे में रखता है. जो अच्छा पत्रकार होता है वह एक संत, फकीर, औघड़ की तरह होता है जिसका पूरा व्यक्तित्व पारदर्शी होता है. उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं होता. उसके पास पाने के लिए कुछ नहीं होता. उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता. इसीलिए हर क्षण निर्भीक और ईमानदार वो रहता है.
फिल्म सिंघम का वो डायलाग पूरी तरह सच है कि अपन लोग की जरूरतें हैं कम, इसलिए सीने में है दम. डरें वे लोग जो पैसा कमाने, बटोरने के लिए हर तरह के कुकर्म दिन रात करते रहते हैं. अपन की जरूरत व जिंदगी आदिवासियों सरीखी है. खाने के लिए पाव भर मांस. पीने के लिए पाव भर देसी या अंग्रेजी का पव्वा. और सुनने के लिए पाव भर आध्यात्मिक आलाप. बस, इन तीनों के मिश्रण से बंदा सुपरमैन बन जाता है. वो काले पाजामे के उपर लाल चड्ढी पहन कर लंगूर की तरह उछल-कूद करने वाला सुपरमैन नहीं बल्कि अतिसंवेदी मनोदशा में पहुंचने की प्रक्रिया में जनरेट होने वाले प्लैटोनिक प्लीजर की अनुभूत से लैस सुपरमैन. वेशभूषा, बोलचाल और दिखावे के आधार पर मनुष्य के बीच भेदभाव करने वाली एलीट किस्म की मानसिकता भी एक तरह का रंगभेद है.
मेरा यह मानना दिन ब दिन पुख्ता होता जा रहा है कि ज्यादातर गंदे लोग बेहद अच्छे कपड़े पहनते हैं और बड़ी शालीन भाषा बोलते हैं. ज्यादातर अच्छे लोग बहुत अनगढ़, देसी और देहाती किस्म के होते हैं. ये मुझे क्यों लगता है, पता नहीं लेकिन यह सब कहते हुए मुझे अपने प्रिय कवि और गुरु समान वीरेन डंगवाल की पीटी उर्षा शीर्षक वाली कविता का एक अंश जरूर याद आता है कि… ''खाते हुए मुँह से चपचप की आवाज़ होती है? / कोई ग़म नहीं / वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता / दुनिया के / सबसे ख़तरनाक खाऊ लोग हैं!'' (पूरी कविता यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं- पीटी ऊषा)
मैं फिर यहां कहना चाहूंगा कि हम लोगों की किसी अखबार या किसी संपादक या किसी मैनेजर या किसी हेड या किसी सीईओ या किसी मालिक या किसी अन्य चिरकुट या महान किस्म के प्राणियों से कोई अदावत नहीं है और न ही किसी से प्यार. इसलिए इस खुले मंच पर वो सब कुछ छपेगा, जो छपने लायक लगता है. कुछ ऐसे स्पेस होने चाहिए जो अनमैनेज्ड हो. इस देश का कबाड़ा मैनेजमेंट और मैनेजरों ने ही तो किया है. और देश को अनमैनेज्ड लोगों और आम आदिवासी किस्म के जन ने बचाकर रखा है. खुद देख लीजिए. जिन लोगों के कंधों पर जिम्मेदारी सौंपते हुए उसे निभाने के लिए उनके हाथ में पावर और सरकारी खजाने से वेतन दिए गए, वे लोग अपनी जिम्मेदारी निभाने की जगह आम लोगों को डराने और खजाने को लूटने लग गए हैं. तो ऐसी व्यवस्था किस काम की जो व्यवस्था बनाने की जगह अव्यवस्था फैलाने में जुटी हुई हो और जिन्हें हम अव्यवस्थित आबादी के रूप में देखते हैं वे अपने भीतर गजब की व्यवस्था बनाकर बचाकर रखे हुए हैं.
वक्त कुछ ऐसा है कि चीजों को अब सिर के बल खड़ा कर देना चाहिए तभी हम लोगों को ठीक ठीक सब कुछ दिखेगा, समझ में आएगा. देखने-समझने के परंपरागत मानदंड भी बहुत घटिया, भोथरा, एकांगी और जनविरोधी हो चुका है क्योंकि इन मानदंडों, इन शब्दों के जरिए ही अब बड़ी बड़ी नौटंकिया हो रही हैं जो अंततः जनता के खिलाफ होकर मैनेजमेंट, कारपोरेट, लुटेरों की पक्षधरता पर द इंड हो जाती हैं. बात कहां से शुरू हुई और कहां पहुंच गई. पर ठीक है, मन की भड़ास तो निकलनी ही चाहिए. फिर लौटते हैं स्वतंत्र मिश्रा पर.
आखिर में स्वतंत्र मिश्रा से इतना जरूर कहना चाहूंगा कि यह कोई आखिरी खबर नहीं है. खबरें अभी और भी होंगी, और आएंगी तो छपेंगी. और, आपके गन हाउसों से डरें वे लोग जिनको लंबा जीना है और जिनको बहुत कुछ बचाना हो, यहां न जीने की तमन्ना है और न कुछ बचा कर रखने के लिए है. इसलिए डर नामक शब्द के आने के लिए कोई दरवाजा इस तरफ नहीं है, हां, आप अपनी तरफ के दरवाजों को जरूर गिन लीजिएगा. कुछ लोग स्वतंत्र मिश्रा से संबंधित खबर पर उनके खिलाफ एकतरफा कमेंटबाजी करने में लगे हैं, और इस बहाने निजी खुन्नस निकाल रहे हैं. फर्जी नामों से कमेंट्स लिखे जा रहे हैं और कमेंट्स में भी कोई नया तथ्य नहीं बल्कि सिर्फ गाली-गलौज है, इसलिए उन सभी कमेंट्स को अनपब्लिश करा दिया है.
बातें चलती रहेगी. आनंद इसी में है कि सब कुछ ट्रांसपैरेंट रहे और साफ-सुथरा रहे. एकांगी न रहे और गंदा न रहे. मुझे भरोसा है कि भड़ास ने मीडिया के लाभों को न लेते हुए और खुद को मीडिया जैसा कुछ न घोषित करते हुए भी मीडिया की, पत्रकारिता की उच्च परंपराओं का निर्वाह जिस तरह से आजतक किया है, वह आगे भी हम लोग जारी रख पाने में समर्थ होंगे. इतनी ताकत आप सब पाठकों ने हम लोगों को दे दी है.
स्वतंत्र मिश्रा और इन जैसे लोगों से कहना चाहूंगा कि वे दिमाग से यह बिलकुल निकाल दें कि उनके खिलाफ कोई कंपेन जैसा चलाया जा रहा है. अगर उपेंद्र राय के खिलाफ कोई सज्जन कोई भी दस्तावेज भेजेंगे तो उसे भी उतने ही प्यार सम्मान से छापा जाएगा जितने प्यार से फिलहाल सब कुछ छप-छपा रहा है. आमीन.
यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया
संपर्क –
mail…
mobile…
09999330099






