जेपी समूह को 409 करोड़ माफ (भाग-3)

: सुप्रीम कोर्ट के आदेश बाद भी नहीं मिला आदिवासियों का हक : उच्चतम न्यायालय में उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग के तत्कालीन संयुक्त सचिव बीके सिंह यादव द्वारा पेश दस्तावेजों के अनुसार राज्य सरकार द्वारा गठित महेश्वर प्रसाद कमेटी ने तत्कालीन मिर्जापुर जनपद के कैमूर क्षेत्र के दक्षिण में 433 गांवों को इस मामले से जुड़ा हुआ पाया था, जिनमें शीर्ष अदालत के आदेशों के अनुसार वन बंदोबस्त की प्रक्रिया पूर्ण की जानी थी। इनमें से 299 गांव दुद्धी तहसील में थे जबकि शेष 134 गांव राबर्ट्सगंज तहसील में थे।

विवादित इलाका 9 लाख 23 हजार 293 एकड़ का था, जिसमें से 58 हजार 937.42 एकड़ भूमि भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत संरक्षित वन घोषित हो चुकी थी। शेष 7 लाख 89 हजार 86 एकड़ भूमि भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। इसी इलाके के खम्हरिया, परबतवा, झीलोटोला, डोहडर और जरहा गांवों में नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी) की रिहंद सुपर थर्मल पॉवर प्लांट के राख निष्पादन के लिए जरूरी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया भी उच्चतम न्यायालय के आदेशों के तहत आ गई थी। इस मामले में शीर्ष अदालत ने 8 फरवरी, 1989 को साफ निर्देश दिया कि भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 के तहत अधिसूचित भूमि वन संरक्षण अधिनियम-1980 की धारा-2 के तहत आती है। इसलिए एनटीपीसी के लिए आवश्यक है कि वह उक्त अधिनियम के प्रावधानों के तहत सक्षम अधिकारी से अनापत्ति प्रमाण-पत्र हासिल करे।

उच्चतम न्यायालय के आदेशों के तहत विशेष वन बंदोबस्त अधिकारियों ने स्थानीय लोगों के दावे प्राप्त किये और उन दावों की जांच की। उसके बाद उन्होंने सभी आवश्यक दस्तावेज अपने इलाके के अपीलीय अधिकारी के रूप में तैनात अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के सामने रखे। उन्होंने प्राप्त दावों और आवश्यक दस्तावेजों की जांच की और अपना फैसला सुनाया। समय-समय पर राज्य सरकार ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के आदेशों के अनुरूप वन बंदोबस्त प्रक्रिया पूर्ण होने की अधिसूचना जारी की।

अगर उच्चतम न्यायालय के 16 फरवरी, 1993 के आदेश पर गौर करें तो न्यायमूर्ति बीएल लूम्बा ने अपनी सातवीं रिपोर्ट में 17 वन गांवों में जारी वन बंदोबस्त प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए थे, जिनमें छतरपुर, नगवां, गोइठा, गुलालहरिया, जामपानी, कुदरी, धूमा, घघरी, सुखरा, किरबिल, सुपाचुआं, सांगोबांध, नौडीहा, जरहा, मधुवन, बैलहत्थी और करहिया गांव शामिल थे। इस मामले में उच्चतम न्यायालय के आदेशों पर गौर करें तो साल 1994 में कैमूर सर्वे की वन बंदोबस्त प्रक्रिया के तहत आने वाले 433 गांवों में से 421 गांवों की वन बंदोबस्त प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इन गांवों में कोटा और ओबरा(पनारी) के वे गांव भी शामिल थे, जिनमें यूपीएससीसीएल और उत्तर प्रदेश राज्य खनिज विकास निगम (यूपीएसएमडीसी) की खनन वे लीजें स्थित थीं जो जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को हस्तांतरित की गई हैं। शेष 12 गांवों में स्थित भूमि की बंदोबस्त प्रक्रिया जारी थी।

उच्चतम न्यायालय ने 18 जुलाई, 1994 के आदेश में कहा था, “13 मई, 1994 को इस न्यायालय के आदेश के अनुसार केवल एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश काम कर रहे हैं। हम निर्देश देते हैं कि वे 30 सितंबर, 1994 तक काम करते रहेंगे और उस तिथि तक वे सभी अपीलों और याचिकाओं की सुनवाई संपन्न कर लेंगे। हम समझते हैं कि कैमूर सर्वे एजेंसी की शेष इकाई को बनाए रखने की कोई वजह नहीं है। हम 1 अगस्त, 1994 से उन इकाइयों को बंद करने का निर्देश देते हैं।…न्यायमूर्ति लूम्बा ने अपनी 14वीं रिपोर्ट में उद्धत किया है कि भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित 12 गांवों की लगभग 26,947 एकड़ भूमि उत्तर प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम की धारा-54 के तहत है। हम उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व सचिव को निर्देश देते हैं कि वह ऐसे विशेष अधिकारियों की नियुक्ति करे जो 20 नवंबर, 1986 के आदेश के आलोक में इस विवादित भूमि के विवाद का समाधान करे।…हम राजस्व सचिव को यह भी निर्देश देते हैं कि वह विभिन्न अपीलों में अनुभवी अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के निर्णयों और विचारों को लागू करें।…हम इस केस की प्रक्रिया को बंद करते हैं। हालांकि हम विभिन्न पक्षों को यह अधिकार देते हैं कि जब भी आवश्यक हो, वे जरूरी दिशा-निर्देशों के लिए इस अदालत के पास आ सकते हैं।”

जारी…

शिवदास की यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित हो चुकी है.

जेपी समूह को 409 करोड़ माफ (भाग-2)

: देश आजाद हुआ पर आदिवासी नहीं : उन्नीस सौ सैतालिस में 15 अगस्त को देश अंग्रेजों की गुलामी से भले ही आजाद हो गया हो लेकिन जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए गुलामी का दौर उसी दिन से शुरू हो गया था। उत्तर प्रदेश के जंगली इलाकों में आजाद आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए भी ऐसा ही था। "द पब्लिक लीडर" के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार उत्तर प्रदेश में वर्ष-1950 में जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार कानून अस्तित्व में आया जो कैमूर वन क्षेत्र के दक्षिण में स्थित मिर्जापुर (अब सोनभद्र) जिले की दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों में दो हिस्सों में लागू हुआ। कुछ हिस्सों में यह कानून 30 जून, 1953 को लागू हुआ तो कुछ हिस्सों में 1 जुलाई, 1954 को।

हालांकि राज्य सरकार ने आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों वाले इलाके यानी वन क्षेत्रों को 1952 में ही अपने कब्जे में ले लिया था। इसमें वन ग्राम, पहाड़, नदी, तालाब आदि शामिल थे। राज्य सरकार ने 11 अक्टूबर, 1952 को अधिसूचना जारी कर राज्य की समस्त जंगल भूमि को प्रबंधन के लिए उत्तर प्रदेश वन विभाग को सौंप दिया, जिससे अंग्रेजों के जमाने में जंगलों में आजाद जीवन व्यतीत करने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की जिंदगी पर पहरा लग गया। इसकी जद में दुद्धी क्राउन स्टेट का इलाका भी आ गया, जिसमें तत्कालीन मिर्जापुर जिले की दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों की लाखों एकड़ वन भूमि और इस पर आबाद सैंकड़ों वन ग्राम शामिल थे। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इस इलाके में मौजूद खनिज संपदा को ध्यान में रखते हुए चुर्क और डाला सीमेंट फैक्ट्रियों की स्थापना की। हालांकि यह यहां के मूल बाशिंदों के लिए बहुत ज्यादा लाभकारी साबित नहीं हुआ। 1 जनवरी, 1967 को राज्य की कांग्रेस सरकार ने दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसील की सात लाख नवासी हजार एकड़ वन भूमि भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित कर दी। इससे इस इलाके में आबाद सैकड़ों वन ग्रामों के हजारों आदिवासियों का जमीनी अधिकार छीन गया और लोग अपने हक की मांग को लेकर मुखर होने लगे। अक्सर वन विभाग के अधिकारियों से अनका विवाद होता रहता।
   
दस्तावेजों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल, 1972 को उत्तर प्रदेश राज्य सीमेंट निगम लिमिटेड (यूपीएससीसीएल) नामक कंपनी का निर्माण किया और हस्तांतरण विलेख (ट्रांसफर डीड) के माध्यम से चुर्क और डाला सीमेंट फैक्ट्रियों की समस्त संपत्ती उसे हस्तांतरित कर दी। साथ ही राज्य सरकार ने 24 अक्टूबर, 1973 को यूपीएससीसीएल को कोटा ग्राम की 815.828 हेक्टयर भूमि 20 वर्षों के लिए खनन पट्टे पर दे दिया, जिसमें 380.635 हेक्टयर भूमि भारतीय वन अधिनियम (भा.व.अ.) की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। यह खनन पट्टा 1 मई, 1976 से 30 अप्रैल, 1996 तक दिया गया था। 19 जनवरी, 1973 को राज्य सरकार ने यूपीएससीसीएल को दूसरा खनन पट्टा बीस वर्षों के लिए बिल्ली मारकुंडी और मकरीबारी ग्राम की 1266 हेक्टेयर भूमि पर आबंटित किया, जिसमें 552.603 हेक्टेयर भूमि भा.व.अ. की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। इसकी अवधि 27 सितंबर, 1978 से 26 सितंबर, 1998 तक थी। इसके अलावा सरकार ने 24 अक्टूबर, 1974 को पनारी (निंघा) ग्राम की 87 हेक्टेयर भूमि पर 10 वर्षों के लिए खनन पट्टा कंपनी को आबंचित किया जिसमें 70.328 हेक्टेयर भूमि भा.व.अ. की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। इसकी अवधि 19 अप्रैल, 1982 से 18 अप्रैल, 1992 तक थी। इस तरह राज्य सरकार ने यूपीएससीसीएल को उपरोक्त गांवों में कुल 2168.828 हेक्टेयर भूमि खनन पट्टे के रूप में आवंटित की, जिसमें 1003.566 हेक्टेयर भूमि भा.व.अ. की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी।

जैसे-जैसे राज्य सरकार इस प्रकार की सुधारात्मक कदमों को उठा रही थी, वैसे-वैसे इन इलाकों के आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं। 25 अक्टूबर, 1980 को वन संरक्षण अधिनियम-1980 प्रभाव में आया, जिसके बाद भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 और धारा-20 के तहत अधिसूचित वन भूमि पर खनन अथवा अन्य गैर-वानिकी कार्य के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंतालय से अनुमति लेना अनिवार्य हो गया। भारतीय वन अधिनियम और वन संरक्षण अधिनियम के लागू होने से तत्कालीन मिर्जापुर के दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों के वन क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की मुसीबतें और बढ़ गईं। वन विभाग के नुमाइंदे वन ग्रामों में रहने वाले लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज कर उन्हें उनकी पुस्तैनी जमीनों से बेदखल करने लगे। इलाके के मूल बाशिंदों की समस्याओं से चिंतित म्योरपुर स्थित बनवासी सेवा आश्रम के प्रेम भाई ने 1982 में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई। उच्चतम न्यायालय ने बनवासी सेवा आश्रम के पत्र को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया और मामले पर सुनवाई शुरू की। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर राज्य सरकार ने गठित महेश्वर प्रसाद कमेटी का गठन किया। कमेटी ने विवादित क्षेत्र पर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार और उच्चतम न्यायालय को सौंपी।
    
इस मामले में विभिन्न पक्षों को सुनने के बाद उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीएन भगवती की पीठ ने 20 नवंबर, 1986 को ऐतिहासिक फैसला दिया, जिसके आधार पर मिर्जापुर जनपद के कैमूर वन क्षेत्र के दक्षिण में स्थित दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों की वन भूमि का सर्वे और उसकी बंदोबस्त प्रक्रिया शुरू हुई। उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार, भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत अधिसूचित वन भूमि को जनहित याचिका का अंश नहीं बनाया गया था, जिसके कारण इससे जुड़े मामलों पर कोई सुनवाई नहीं होनी थी। शीर्ष अदालत ने वन अधिकारियों को आदेश दिया था कि वे 1 दिसंबर, 1986 से छह हफ्तों के भीतर भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित भूमि की पहचान कर उसका सीमांकन करें। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी आदेश दिया कि वे अदालत के दिशा-निर्देशों को बड़े पैमाने पर प्रचारित-प्रसारित करें और 15 जनवरी, 1987 से तीन महीनों के अंदर भारतीय वन अधिनियम की धारा-6 (सी) के तहत स्थानीय लोगों के दावे स्वीकार करें। इसके अलावा न्यायालय ने 31 दिसंबर, 1986 तक पर्याप्त संख्या में भूलेख अधिकारियों की नियुक्ति करने का आदेश राज्य सरकार को दिया। शीर्ष अदालत ने यह भी आदेश दिया राज्य सरकार दुद्धी तहसील के दुद्धी, म्योरपुर, किरबिल और राबर्ट्सगंज तहसील के राबर्ट्सगंज तथा तेलगुड़वा स्थानों पर पांच अनुभवी अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति करे जो उच्च न्यायालय इलाहाबाद की ओर से मुहैया कराए जाएंगे।
      
राज्य सरकार उनकी सहायता के लिए पर्याप्त संख्या में उन्हें सहायक और कर्मचारी मुहैया कराएगी। सभी अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों को भारतीय अधिनियम की धारा-17 के तहत प्रदत्त अपीलीय अधिकारी का अधिकार होगा। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी लिखा कि वन बंदोबस्त अधिकारी प्राप्त दावों की जांच करेंगे और उससे संबंधित आवश्यक दस्तावेज इलाके के अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के सामने रखेंगे। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश इन दस्तावेजों की पड़ताल अपीलीय अधिकारी के रूप में करेंगे और उनके द्वारा दिया गया आदेश भारतीय वन अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपेक्षित आदेश होगा। यदि अपीलीय अधिकारी प्राप्त दावे को स्वीकृति प्रदान कर देता है तो राज्य सरकार उस निर्णय का सम्मान करेगी और उसे लागू करेगी।

जारी…

शिवदास की यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित हो चुकी है.

जेपी समूह को 409 करोड़ माफ (भाग-1)

देश में हर तरफ प्राकृतिक संपदा की लूट मची है। कोई जमीन भेद रहा है तो कोई पाताल। आकाश की धूप और हवा भी अछूती नहीं है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, ओडिशा, गोवा आदि राज्यों के विभिन्न इलाकों में जिस तरह से कोयला, लौह अयस्क, डोलो स्टोन, लाइम स्टोन (चूना पत्थर), सैंड स्टोन, बालू, मोरम आदि खनिज पदार्थों के अवैध दोहन का मामला बीते सालों में सामने आया है, उससे लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं। इससे ना केवल भारतीय वन अधिनियम, वन संरक्षण अधिनयम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भारतीय खान ब्यूरो आदि के मानकों का उल्लंघन हुआ है, बल्कि इसने आम आदमी के अधिकारों के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के आदेशों और संविधान के मूल्यों पर भी हमला बोला है।

2जी स्पेक्ट्रम आबंटन, कोयला ब्लॉक आबंटन और केजी बेसीन मामले ने तो देश के शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली पर ही सवाल खड़ा कर दिए। इन हालात में आम आदमी के लिए ईमानदारी से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना किसी जंग जीतने के बराबर है। एक तरफ वह जहां देश के विभिन्न कानूनों के अनुपालन में तिल-तिल मर रहा है, वहीं दूसरी ओर पूंजीपति और उद्योगघराने कानूनों की धज्जियां उड़ाते जा रहे हैं। उनके इस कार्य में सत्ता के गलियारों में बैंठे कुछ सियासतदां और भ्रष्ट नौकरशाह हाथ बंटाते हैं। यहां तक कि वे कानून के विभिन्न प्रावधानों के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के आदेशों और संवैधानिक मूल्यों की अह्वेलना करने से भी बाज नहीं आते। उत्तर प्रदेश में एक उद्योगघराने और सत्ता में काबिज नुमाइंदों की ऐसी ही सांठगांठ की पोल खोलती यह रिपोर्ट-


देश में वनाधिकार कानून-2006 लागू है। फिर भी लाखों आदिवासी एवं वन निवासी भूमि के अधिकार से वंचित हैं। वे सरकारी नुमाइंदों के दरवाजे खटखटा रहे हैं लेकिन उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। वे उन्हें भारतीय वन अधिनियम-1927 और वन संरक्षण अधिनयम-1980 सरीखे कानूनों की अनेक धाराओं में फंसाकर जेलों की कालकोठरी में ठूंस रहे हैं। दूसरी ओर, केंद्र और राज्य की सरकारें पूंजीपतियों और उद्योगघरानों को जंगल और ग्रामसभा की हजारों एकड़ जमीनें खैरात में बांट रही हैं। उत्तर प्रदेश में शासन करने वाली राजनीतिक पार्टियों की सरकारों ने तो एक निजी उद्योगघराने को जंगल और कैमूर वन्यजीव विहार की भूमि देने के लिए भारतीय वन अधिनयम, वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के आदेशों को भी नजरअंदाज कर दिया। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) और विंध्याचल मंडल के तत्कालीन आयुक्त सत्यजीत ठाकुर की ओर से गठित टीम की अलग-अलग जांच रिपोर्टों के दस्तावेजों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव (अब सहायक अभिलेख अधिकारी, मिर्जापुर) ने वर्ष 2007-08 में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में जंगल और कैमूर वन्यजीव विहार की 1083.231 हेक्टेयर (करीब 4283.238 बीघा) भूमि उच्चतम न्यायालय के आदेशों के विपरीत निकाल दी।
 
राज्य की पूर्ववर्ती बहुजन पार्टी की सरकार ने इस पर मुहर लगाते हुए अधिसूचना भी जारी कर दिया और अपनी कारगुजारियों को अमलीजामा पहनाने के लिए उच्चतम न्यायालय में अपील भी दायर की है। उच्चतम न्यायालय में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय (मध्य क्षेत्र), लखनऊ के वन संरक्षक वाईके सिंह चौहान की ओर से दाखिल हलफनामे पर गौर करें तो इससे सरकार को एनपीवी (नेट प्रजेंट वैल्यू) और अन्य मदों के रूप में करीब चार सौ नौ करोड़ नौ लाख रुपये की हानि हुई है। अगर स्थानीय लोगों के लिखित आरोपों पर विश्वास करें तो उत्तर प्रदेश सरकार के नुमाइंदों ने जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में कोटा, पड़रछ, पनारी, मकरीबारी और मारकुंडी वन क्षेत्र की 24,000 हेक्टेयर भूमि निकाल दी है और वह इस पर गैरकानूनी ढंग से अवैध निर्माण और खनन कार्य कर रहा है।

वास्तव में यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश राज्य सीमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीएससीसीएल) के अधीन चुर्क, डाला और चुनार सीमेंट फैक्ट्रियों की बिक्री और उसकी संपत्तियों के अधिग्रहण से जुड़ा हुआ है जो मिर्जापुर-सोनभद्र के जंगली और पहाड़ी इलाकों में स्थित हैं। नब्बे के दशक में कंपनी को करोड़ों रुपये का घाटा हुआ और मामला उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में पहुंच गया। उच्च न्यायालय के आदेश के आदेश पर 8 दिसंबर, 1999 को तीनों फैक्ट्रियों को बंद कर दिया गया और ऑफिसियल लिक्विडेटर की सहायता से इनकी संपत्तियों को वर्ष-2006 में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को चार सौ उनसठ करोड़ रुपये में बेच दिया गया। यूपीएससीसीएल की संपत्तियों की वैश्विक निविदा में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड ने चार सौ उनसठ करोड़ रुपये की सबसे बड़ी बोली लगाई थी। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के वन संरक्षक (मध्य क्षेत्र) वाईके सिंह चौहान, सीईसी के सदस्य सचिव एमके जीवराजका, विंध्याचल मंडल के तत्कालीन आयुक्त सत्यजीत ठाकुर के उपरोक्त दावों और स्थानीय लोगों आरोपों को समझने के लिए मिर्जापुर (अब सोनभद्र) जिले की दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों में स्थित वन क्षेत्रों के संबंध में भारतीय वन अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों की जारी अधिसूचना, उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी विभिन्न आदेशों और संपन्न वन बंदोबस्त प्रक्रिया के संक्षिप्त इतिहास को समझने की जरूरत है।

जारी…

शिवदास की यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित हो चुकी है.