जेपी समूह को 409 करोड़ माफ (भाग-1)

देश में हर तरफ प्राकृतिक संपदा की लूट मची है। कोई जमीन भेद रहा है तो कोई पाताल। आकाश की धूप और हवा भी अछूती नहीं है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, ओडिशा, गोवा आदि राज्यों के विभिन्न इलाकों में जिस तरह से कोयला, लौह अयस्क, डोलो स्टोन, लाइम स्टोन (चूना पत्थर), सैंड स्टोन, बालू, मोरम आदि खनिज पदार्थों के अवैध दोहन का मामला बीते सालों में सामने आया है, उससे लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं। इससे ना केवल भारतीय वन अधिनियम, वन संरक्षण अधिनयम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भारतीय खान ब्यूरो आदि के मानकों का उल्लंघन हुआ है, बल्कि इसने आम आदमी के अधिकारों के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के आदेशों और संविधान के मूल्यों पर भी हमला बोला है।

2जी स्पेक्ट्रम आबंटन, कोयला ब्लॉक आबंटन और केजी बेसीन मामले ने तो देश के शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली पर ही सवाल खड़ा कर दिए। इन हालात में आम आदमी के लिए ईमानदारी से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना किसी जंग जीतने के बराबर है। एक तरफ वह जहां देश के विभिन्न कानूनों के अनुपालन में तिल-तिल मर रहा है, वहीं दूसरी ओर पूंजीपति और उद्योगघराने कानूनों की धज्जियां उड़ाते जा रहे हैं। उनके इस कार्य में सत्ता के गलियारों में बैंठे कुछ सियासतदां और भ्रष्ट नौकरशाह हाथ बंटाते हैं। यहां तक कि वे कानून के विभिन्न प्रावधानों के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के आदेशों और संवैधानिक मूल्यों की अह्वेलना करने से भी बाज नहीं आते। उत्तर प्रदेश में एक उद्योगघराने और सत्ता में काबिज नुमाइंदों की ऐसी ही सांठगांठ की पोल खोलती यह रिपोर्ट-


देश में वनाधिकार कानून-2006 लागू है। फिर भी लाखों आदिवासी एवं वन निवासी भूमि के अधिकार से वंचित हैं। वे सरकारी नुमाइंदों के दरवाजे खटखटा रहे हैं लेकिन उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। वे उन्हें भारतीय वन अधिनियम-1927 और वन संरक्षण अधिनयम-1980 सरीखे कानूनों की अनेक धाराओं में फंसाकर जेलों की कालकोठरी में ठूंस रहे हैं। दूसरी ओर, केंद्र और राज्य की सरकारें पूंजीपतियों और उद्योगघरानों को जंगल और ग्रामसभा की हजारों एकड़ जमीनें खैरात में बांट रही हैं। उत्तर प्रदेश में शासन करने वाली राजनीतिक पार्टियों की सरकारों ने तो एक निजी उद्योगघराने को जंगल और कैमूर वन्यजीव विहार की भूमि देने के लिए भारतीय वन अधिनयम, वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के आदेशों को भी नजरअंदाज कर दिया। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) और विंध्याचल मंडल के तत्कालीन आयुक्त सत्यजीत ठाकुर की ओर से गठित टीम की अलग-अलग जांच रिपोर्टों के दस्तावेजों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव (अब सहायक अभिलेख अधिकारी, मिर्जापुर) ने वर्ष 2007-08 में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में जंगल और कैमूर वन्यजीव विहार की 1083.231 हेक्टेयर (करीब 4283.238 बीघा) भूमि उच्चतम न्यायालय के आदेशों के विपरीत निकाल दी।
 
राज्य की पूर्ववर्ती बहुजन पार्टी की सरकार ने इस पर मुहर लगाते हुए अधिसूचना भी जारी कर दिया और अपनी कारगुजारियों को अमलीजामा पहनाने के लिए उच्चतम न्यायालय में अपील भी दायर की है। उच्चतम न्यायालय में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय (मध्य क्षेत्र), लखनऊ के वन संरक्षक वाईके सिंह चौहान की ओर से दाखिल हलफनामे पर गौर करें तो इससे सरकार को एनपीवी (नेट प्रजेंट वैल्यू) और अन्य मदों के रूप में करीब चार सौ नौ करोड़ नौ लाख रुपये की हानि हुई है। अगर स्थानीय लोगों के लिखित आरोपों पर विश्वास करें तो उत्तर प्रदेश सरकार के नुमाइंदों ने जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में कोटा, पड़रछ, पनारी, मकरीबारी और मारकुंडी वन क्षेत्र की 24,000 हेक्टेयर भूमि निकाल दी है और वह इस पर गैरकानूनी ढंग से अवैध निर्माण और खनन कार्य कर रहा है।

वास्तव में यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश राज्य सीमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीएससीसीएल) के अधीन चुर्क, डाला और चुनार सीमेंट फैक्ट्रियों की बिक्री और उसकी संपत्तियों के अधिग्रहण से जुड़ा हुआ है जो मिर्जापुर-सोनभद्र के जंगली और पहाड़ी इलाकों में स्थित हैं। नब्बे के दशक में कंपनी को करोड़ों रुपये का घाटा हुआ और मामला उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में पहुंच गया। उच्च न्यायालय के आदेश के आदेश पर 8 दिसंबर, 1999 को तीनों फैक्ट्रियों को बंद कर दिया गया और ऑफिसियल लिक्विडेटर की सहायता से इनकी संपत्तियों को वर्ष-2006 में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को चार सौ उनसठ करोड़ रुपये में बेच दिया गया। यूपीएससीसीएल की संपत्तियों की वैश्विक निविदा में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड ने चार सौ उनसठ करोड़ रुपये की सबसे बड़ी बोली लगाई थी। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के वन संरक्षक (मध्य क्षेत्र) वाईके सिंह चौहान, सीईसी के सदस्य सचिव एमके जीवराजका, विंध्याचल मंडल के तत्कालीन आयुक्त सत्यजीत ठाकुर के उपरोक्त दावों और स्थानीय लोगों आरोपों को समझने के लिए मिर्जापुर (अब सोनभद्र) जिले की दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों में स्थित वन क्षेत्रों के संबंध में भारतीय वन अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों की जारी अधिसूचना, उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी विभिन्न आदेशों और संपन्न वन बंदोबस्त प्रक्रिया के संक्षिप्त इतिहास को समझने की जरूरत है।

जारी…

शिवदास की यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित हो चुकी है.

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