जिंदल मामले में जी न्‍यूज की एक और याचिका खारिज

नई दिल्ली : एक स्थानीय अदालत ने ज़ी न्यूज़ लिमिटेड की ओर से दायर वह याचिका खारिज कर दी है जिसमें जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड (जेएसपीएल) की ओर से चैनल के खिलाफ दायर मानहानि के मुकदमे पर रोक की मांग की गई थी। अदालत ने याचिका को प्रीमच्योर करार देते हुए खारिज कर दिया।

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अशोक कुमार ने भी कहा कि यदि चैनल की अर्जी मान ली जाती है तो शिकायतकर्ता (जेएसपीएल) अदालत को किस तरह यह बताएगा कि ट्रायल की विषयवस्तु एवं मामले की जांच एकसमान है। न्यायाधीश ने कहा कि फाइल पर प्रासंगिक दस्तावेजों के अध्ययन और दोनों वकीलों की दलीलें सुनने के बाद मेरा मानना है कि यह अर्जी समय से पहले ही दायर कर दी गई है। मामले में अब तक तो आरोपी को तलब भी नहीं किया गया है।

उन्होंने कहा कि यदि इस चरण में ही अर्जी मान ली जाती है तो शिकायतकर्ता (जेएसपीएल) अदालत को किस तरह यह बताएगा कि ट्रायल की विषयवस्तु एवं मामले की जांच प्राथमिकी में दर्ज विषयवस्तु की जांच के समान ही है। (एजेंसी)

दिल्‍ली सरकार का हलफनामा – ‘संतुष्टि के बाद दर्ज की जी न्‍यूज के खिलाफ एफआईआर’

दिल्ली सरकार ने सर्वोच्च अदालत से मंगलवार को कहा कि जी न्यूज के पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर समुचित संतुष्टि के बाद दर्ज की गई है। पुलिस की ओर से पहले साक्ष्यों और आरोपों पर विचार किया गया। इसके बाद आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्णय लिया गया।

शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली सरकार ने कहा है कि सर्वोच्च अदालत में इस मामले में अभियुक्तों के पक्ष में दायर की गई रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। अपराध प्रक्रिया संहिता के तहत उनके पास वैकल्पिक उपाय थे। इसके बावजूद उनकी ओर से सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। ऐसे में उनकी याचिका खारिज करने योग्य है।

दिल्ली सरकार के अतिरिक्त सचिव (गृह) की ओर से सर्वोच्च अदालत यह हलफनामा उस याचिका के जवाब में दायर किया गया है जिसमें कैग की रिपोर्ट में हेरफेर करने, जिंदल समूह से अवैध वसूली करने और दिल्ली गैंगरेप की शिकार युवती के साथ घटना के वक्त मौजूद रहे मित्र का इंटरव्यू दिखाने के मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है।

हलफनामे में कहा गया है कि इन मामलों में अभी तक जांच पूरी नहीं हुई है। जहां तक मूल अधिकार के प्रयोग का सवाल है। उसके उपयोग में भी कुछ उचित पाबंदियां हैं जो सर्वोच्च अदालत के कुछ फैसलों में स्पष्ट है। इन मामलों में अभियुक्तों के किसी भी मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं होता। अभियुक्तों के खिलाफ अपराध प्रक्रिया संहिता में निर्धारित प्रक्रिया के हिसाब से ही मामला दर्ज किया गया है। आरोप बेबुनियाद हैं, अभियुक्तों के पास इसका कोई आधार नहीं है।

हलफनामे में कहा गया है कि अपराध की संज्ञेयता पर विचार करने के बाद ही मामले दर्ज किए गए और इससे पहले समुचित संतुष्टि की गई। सचिव ने यह स्पष्ट किया है कि मामले की छानबीन से नवीन जिंदल के राजनीतिक स्ततर का कोई लेना-देना नहीं है।

अभियुक्तों को अवैध वसूली के मामले में गिरफ्तार करने के 24 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। मजिस्ट्रेट की ओर से अभियुक्तों की जमानत की मांगों को दो बार खारिज किया गया। इसके बाद उन्हें सेशन कोर्ट से जमानत मिली। अदालतों ने जांच पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया है।

सर्वोच्च अदालत में अभियुक्तों की ओर से जानबूझकर याचिका दायर की गई है। ताकि तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर बचाव किया जा सके। यह आरोप पूरी तरह निराधार है कि सार्वजनिक अवकाश के दिन मामला दर्ज किया गया क्योंकि पुलिस थाने जनता के लिए हमेशा खुले रहते हैं। यह मामले किसी बदनियती से दर्ज किए गए हैं, यह पूरी तरह से गलत है।

सचिव ने याचिका को खारिज करने की मांग सर्वोच्च अदालत से करते हुए कहा है कि अभियुक्तों की ओर से आईपीसी के प्रावधानों की गलत व्याख्या की जा रही है। उनके खिलाफ फर्जीवाड़ा करने के अलावा 228अ, 384, 420, 511, 120ब और 466, 468, 469 व 471 के तहत एफआईआर दर्ज की गई हैं। (अमर उजाला)

कोर्ट ने जी न्‍यूज के मालिक एवं संपादकों की अर्जी खारिज की

नई दिल्ली : कोल ब्लॉक आवंटन मामले में सांसद नवीन जिंदल से संबंधित खबर प्रसारित न करने की एवज में 100 करोड़ रुपये मांगने के आरोप में फंसे जी न्यूज मालिक सुभाष चंद्रा एवं संपादकों सुधीर चौधरी एवं समीर आहलूवालिया की एक अर्जी को पटियाला हाउस कोर्ट ने मंगलवार को खारिज कर दी। जी न्‍यूज के दोनों संपादकों ने कोर्ट में याचिका दायर करके मांग की थी कि उनके खिलाफ की जाने वाली जांच की निगरानी अदालत द्वारा की जाए।

पटियाला कोर्ट के एसीएमएम मुकेश कुमार ने जी न्यूज संपादकों की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि कॉल डिटेल को सुरक्षित रखे जाने की कोई आवश्यकता अदालत को महसूस नहीं हुई है। कोर्ट किसी भी मामले में की जाने वाली जांच को डिक्टेट या डाइवर्ट करने की प्रक्रिया को नहीं अपना सकती। लिहाजा याचिकाकर्ताओं की अर्जी खारिज की जाती है। गौरतलब है कि जी न्यूज संपादकों ने कोर्ट से मांग की थी कि उनके मामले से संबंधित कॉल डिटेल रिकार्ड को अदालत द्वारा संरक्षण में ले लिया जाए और मामले में पुलिस द्वारा की जाने वाली जांच की निगरानी की जाए, क्योंकि उन्हें भय है कि पुलिस कांग्रेस के सांसद नवीन जिंदल के प्रभाव में आकर उनके खिलाफ झूठे साक्ष्य एकत्र कर सकती है।

जी ग्रुप के सुभाष चंद्रा को मिला इंटरनेशनल एम्‍मी अवार्ड

मुंबई : भारत के सौ अमीरों में शामिल ज़ी समूह और देश के प्रथम हिंदी सैटेलाइट चैनल के संस्थापक एवं चेयरमैन श्री सुभाष चंद्रा को 2011 के इंटरनेशनल एम्‍मी डायरेक्टरेट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। भारतीय टेलीविजन उद्योग में सहयोग के लिए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया। भारतीय मूल की अमेरिकी अदाकारा आर्ची पंजाबी और सिटीग्रुप के अध्यक्ष रिचर्ड पार्सन्ज ने सोमवार रात चंद्रा को इस पुरस्कार से सम्मानित किया।

सुभाष चंद्रा भारत के पहले व्यक्ति हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय डायरेक्‍टरेट एम्मी अवॉर्ड सम्मानित किया गया। यह अवार्ड इन्हें 21 नवंबर को न्यूयॉर्क सिटी के हिल्टन न्यूयॉर्क में 39वें अंतरराष्ट्रीय एम्मी अवार्ड समारोह में दिया गया। अवार्ड ग्रहण करने के बाद श्री सुभाष चंद्रा ने कहा कि भारत आज विश्व के आकर्षण का केंद्र है और यह बड़े सौभाग्य की बात है कि पहले भारतीय को इस अवार्ड से सम्मानित किया गया। यह मेरे लिए, ज़ी ग्रुप, भारतीय मीडिया एवं एंटरटेंमेंट इंडस्ट्री के लिए खासा मायने रखता है। ज़ी ग्रुप के चेयरमैन ने यह भी कहा कि तकनीकी और रिटेल के क्षेत्र में भारत की तरफ से कई प्रतिनिधित्व आए, जिससे भारतीय मीडिया इंडस्‍ट्री वैश्विक नक्‍शे पर आ गया। मीडिया और कंटेंट के तौर पर भी भारतीय गरिमा को एक ऊंचाई मिली है।

इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ टेलीविजन आर्ट्स एंड साइंसेज के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी ब्रुस पैसनर ने कहा कि भारत में पहली बार निजी टेलीविजन चैनल की स्थापना कर भारतीय टेलीविजन उद्योग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले सुभाष चंद्रा एक दूरद्रष्‍टा हैं और उन्‍होंने अपनी राह व मुकाम खुद बनाई। उन्हें 2011 का इंटरनेशनल एम्‍मी डायरेक्टरेट पुरस्कार देकर हमें खुशी हो रही है। हम उन्हें साल 2012 में ज़ी इंटरटेंमेंट इंडस्ट्री की स्थापना के 20 साल पूरा करने के लिए शुभकामनाएं देते हैं। साभार : जी न्‍यूज

जी न्‍यूज यूपी से पांच का इस्‍तीफा, नीचे से ऊपर तक हड़कम्‍प

ज़ी न्यूज समूह के चर्चित न्यूज चैनल जी न्यूज उत्तर प्रदेश को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है। यहां आउटपुट डेस्क से 1 दिन के भीतर 5 लोगों ने इस्तीफा दे दिया है। अचानक हुए इन इस्तीफों से जी न्यूज प्रबंधन पूरी तरह हिल गया है। ऊपर से नीचे तक खलबली मची हुई है। हैरत की बात ये है कि इस्तीफा देने वालों में प्रोड्यूसर से लेकर ट्रेनी तक शामिल हैं।

वासिंद्र मिश्रा की मनमानी और पूरी तरह गैर पेशेवर कार्यशैली को इसकी अहम वजह माना जा रहा है। चैनल के भीतर वासिंद्र से जुड़े किस्से इस समूह के दूसरे चैनलों में भी चर्चा का विषय हैं। लेकिन चैनल की झोली में अपनी दलाली कला का इस्तेमाल कर मोटी कमाई डालने की गारंटी के कारण जी न्यूज प्रबंधन ने तमाम आरोपों के बावजूद अब तक वासिंद्र को बरकरार रखा है।

अब चैनल से विधानसभा चुनाव से ऐन पहले एंकर और सीनियर प्रोड्यूसर प्रत्यूष खरे, अनिल कुमार वर्मा और अमित कुमार ने इस्तीफा दे दिया है। ये तीनों डेस्क के सबसे अनुभवी लोगों में थे, कई चैनलों में काम कर चुके ये लोग अब तक वासिंद्र के आतंकराज के बावजूद यहां डटे हुए थे लेकिन आखिरकार इन लोगों ने भी चैनल से किनारा कर लिया। इनके साथ ही इंटरटेनमेंट डेस्क से हेमा पोखरिया और न्यूज डेस्क से शिवम ने इस्तीफा दे दिया है। शिवम ने महज कुछ महीने पहले चैनल ज्वाइन किया था। लेकिन काम के नाम पर लगातार हो रहे शोषण ने इन्हें भी इस्तीफे पर मजबूर कर दिया। ये लोग कहां जाएंगे इसके बारे में कई चर्चा आम है। लेकिन अभी कोई अपने पत्ते नहीं खोल रहा।

एचआर ये जानने की कोशिश में है कि आखिरकार एक साथ इतने लोगों ने इस्तीफे का फैसला क्यों किया। इस लिए सबको बुलाकर उनसे लगातार उनका पक्ष पूछा जा रहा है। लेकिन अंदरुनी सूत्रों के मुताबिक कोई अपना फैसला बदलने को तैयार नहीं। हाल ही में भरे न्यूज रूम में एक प्रोड्यूसर ने वासिंद्र की क्लास लगा दी थी और उसे तमीज से पेश आने को लेकर खुले लहजों में सावधान किया था। इसके बाद से वासिंद्र कई लोगों के पीछे पड़ा हुआ था। चैनल में चल रही चर्चा के मुताबिक अभी दस और लोग अगले महीने भर में चैनल से अलविदा कहने की तैयारी में हैं।

हालात संभालने में अब वासिंद्र से लेकर एचआर डिपार्टमेंट तक के हाथ पांव फूल रहे हैं। हालत ये है कि मीडिया में काम करने वाले अनुभवी लोग वासिंद्र की असलियत जानने के बाद यहां आना नहीं चाहते, ऐसे में चैनल चलाने वाले काबिल लोग जुटाने मे एचआर परेशान है। ऊपर से ये गारंटी भी नहीं कि आखिर नए लोग कब तक वासिंद्र की गालियां बर्दाश्त करेंगे। अप्रैल 2009 में लॉंच किए गए इस चैनल से अब तक 40 से भी ज्यादा लोगों ने सिर्फ आउटपुट से इस्तीफा दिया है। जबकि इस चैनल के आउटपुट में कुल सदस्यों की संख्या भी करीब इतनी ही है। यानी ढाई साल के भीतर करीब-करीब पूरी टीम ही इसे छोड़कर चली गई। इसमें 20 से ज्यादा महिला पत्रकार रही हैं, जिनमें से ज्यादातर गंदी हरकतों को चैनल छोड़ने की वजह बताया। कई ने अपने आरोप लिखित तौर पर एचआर के पास जमा किया था।

हैरत की बात ये रही कि इतना सब होने के बावजूद एचआर डिपार्टमेंट ने इस हालत का नोटिस नहीं लिया। हाल ही में एक निजी संस्थान से बेस्ट एचआर का अवार्ड हासिल करने का जश्न मनाने वाले इस संस्थान के नीतिनियंता वासिंद्र मिश्रा पर कोई कार्रवाई करने से हिचकते हैं। वासिंद्र इसी वजह से कर्मचारियों पर धौंस जमाने में जुटे रहते हैं। मालिकों से अपनी करीबी का बार-बार हवाला देने वाले ज़ी समहू के यूपी के इस क्षेत्रीय चैनल के संपादक ट्रेनी से लेकर आउटपुट हेड तक को अपने जूते के नीचे रखने की कोशिश करता है। हर हफ्ते एक डेस्क को भंग करने वाला यह संपादक पूरे समूह की आंख की किरकिरी है, लेकिन तमाम अराजकता के बावजूद वो अपने पद पर कायम है।

जी समूह के सभी चैनलों में सप्‍ताह में 2 दिन की छुट्टी है लेकिन इस चैनल में ज़ी समूह का कानून नहीं वासिंद्र मिश्रा का कानून चलता है। खबरों को लेकर भी हाल यही है। बंदर और नागिन का खेल नहीं दिखाने का दावा करने वाले जी समूह का नेशनल चैनल जहां मायावती सरकार के खिलाफ खबरें दिखाने में नहीं हिचकता और उसका रवैया आक्रामक है तो वहीं वासिंद्र की अगुवाई वाला इसी समूह का जी यूपी चैनल बीएसपी से जुड़ी हर खबर को सेंसर करता है। यहां पूरी तरह सेंसरशिप लागू है। यहां तक कि पिछले दिनों प्रखंड स्तर के बीएसपी के कुछ नेताओं पर लगे बलात्कार के गंभीर आरोपों की खबर को भी संपादक के आदेश पर दबा दिया गया। लखनऊ में सालों के अपने जी हुजूरी के अनुभव के कारण वासिंद्र एक छोटे से नेता या अधिकारी से भी इस कदर भय खाता है कि वो चल रही खबर को भी उतरवा देता है, चाहे किसी विक्षिप्त नाबालिग के साथ बलात्कार की पुख्ता और संवेदनशील खबर क्यों नहीं हो। 

अहम बात ये भी है कि भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण निशंक के उत्तराखंड के सीएम पद से विदा होने के बाद से वासिंद्र की चैनल के अंदर हैसियत काफी कम हो गई है। वासिंद्र ने निशंक से अपने करीबी संबंधों का फायदा दिलाकर उत्तराखंड में जी ग्रुप के विश्वविद्यालय को हरी झंडी दिलवाई थी, जिसको लेकर निशंक पर कई तरह के आरोप लगे थे। निशंक के जाने के बाद वासिंद्र खंडूरी पर डोरे डाल रहे है, लेकिन फूंक-फूंक कर कदम रख रहे खंडूरी वासिंद्र के एजेंटों को काम से काम रखकर लगातार टरका रहे हैं। हाल ही में चैनल के वरिष्ठ पत्रकार की देहरादून में सरेआम हुई बेइज्जती भी खासी चर्चा में है।

वहीं यूपी में बीएसपी पर तमाम कोशिशों के बाद भी अपना असर डालने में नाकाम वासिंद्र से समाजवादी पार्टी के नेता भी खफा हैं। इसी वजह से वासिंद्र ने कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं के आगे हाजिरी लगाकर अपनी अहमियत कायम रखने की कोशिश की है। पीआर एक्सरसाइज के तहत दोनों दलों के नेताओं के प्रायोजित इंटरव्यू चैनल पर दिन में कई दफा प्रसारित हो रहे हैं। छपास और दिखास रोग के शिकार वासिंद्र इसको लेकर खुद सक्रिय हैं। और वो खुद इन कार्यक्रमों की एंकरिंग में जुटे हैं। इन इंटरव्यू का न्यूजरूम में ही मजाक बन रहा है लेकिन वासिंद्र की धमक के आगे कोई खुलकर इसकी चर्चा नहीं करता।

हालांकि ताजा मामले के बाद चर्चा है कि वासिंद्र के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का मन बनाने को लेकर दबाव झेल रहा जी न्यूज का एचआर डिपार्टमेंट इस्तीफा देनेवालों से अंदर की कहानी को ऑन रिकार्ड दर्ज कर रहा है। कहा ये भी जा रहा है चुनाव से ऐन पहले चैनल की डूबती नैया को संभालने के लिए वासिंद्र पर गाज गिराई जा सकती है। अब तक जी न्यूज समूह के किसी चैनल में कर्मचारियों के इस्तीफे का इतने बड़े पैमाने पर ये अकेला मामला है। अपने कर्मचारियों के साथ घरेलू रिश्ते रखने के लिए जाना जानेवाला यहां का एचआर वासिंद्र के नाम पर हर बार ढीला पड़ता रहा है। लेकिन इस बार पानी सिर से ऊपर जाने की बात कही जा रही है।

हाल ही में चैनल में मालिक के दौरे के दौरान वासिंद्र के खिलाफ शिकायतों का पुलंदा पेश किया गया था। इनमें बिल्डरों से बड़े पैमाने पर दलाली खाने के साथ ही कई नेताओं की तरफ से आई ढेऱों शिकायतें भी शामिल थीं। वहीं पिछले दिनों मुंबई में जी न्यूज समूह के कुछ आलाधिकारियों का पत्ता साफ करने की कार्रवाई के बाद अब वासिंद्र को समूह में अगला निशाना माना जा रहा है। हो सकता है चुनाव से पहले ही इन्हें जी यूपी से किनारे कर दिया जाए।

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