मोदी युग की प्रचंडता : …सुना है, हवाएं तुम्हारे शहर से होकर आ रही हैं!

जैसे- जैसे-जैसे साल 2016 गुजरा, सत्ता के गलियारों में शतरंज की बिसात अपने नए रंग में आ गई| केंद्रीय सत्तासीन दल भाजपा और विपक्ष में कांग्रेस सहित सपा, बसपा आदि के राजनीतिक पंडित अपनी-अपनी गोटियां उत्तरप्रदेश में फिट करने को उतारू हो चले थे| जी हां, साल 2017 देश के सबसे बड़े राज्य के विधानसभा चुनाव का साक्षी बना  और उत्तरप्रदेश की राजनीति के बारे में एक कहावत प्रचलित भी है कि “यूपी की राजनीतिक बिसात ही केन्द्रीय कद का खाका तय करती है|” अक्षरस: सत्य भी है, लोकसभा चुनावों में भी अमित शाह का उत्तरप्रदेश में चुनावी दांव ही आज उनके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कद्दावर कद का कारण बना है और वहीं रंग विधानसभा चुनावों में आए परिणामों में झलक गया | जब बात मुख्यमंत्री चुनने की आई , तब उन्होने चुना पूर्वांचल के तेजतर्रार हिन्दुवादी नेता के तौर पर प्रसिद्ध कद्दावर नेता ‘योगी आदित्यनाथ’ को| जातिगत समीकरणों की गोटियों को फिट करने की कवायद ज़रूर की है , जहाँ दो उपमुख्यमंत्री का चुनाव और मंत्रिमंडल का गठन| इन सब पर हावी रहा रामराज्य की परिकल्पना का दस्ताना|

उत्‍तर प्रदेश में योगी आदित्‍यनाथ ही क्‍यों?

संत परंपरा का निर्वहन करते हुए राजनीति में आए योगी आदित्‍यनाथ पर यह आरोप सदैव से लगते रहे हैं कि वे हिन्‍दुत्‍व की राजनीति करते हैं, चुनावों में एक वर्ग विशेष, धर्म-संप्रदाय से जुड़े वोटों का ध्रुवीकरण करते हैं और जरूरत पड़े तो वे तीन तलाक, लव जिहाद, मदरसा, कब्रिस्‍तान जैसे धर्म आधारित विवादित बयान देने से पीछे नहीं रहते । उनके तमाम पुराने बयानों को एक बार में देखने पर यही लगता है कि वे अल्‍पसंख्‍यक समाज खासकर मुसलमानों के धुरविरोधी हैं। सीधेतौर पर इसका प्रभाव भी समुचे यूपी में योगी के विरोध में देखने को मिलता है तो वहीं प्रशंसकों की कोई कमी भी इसी कारण नहीं है कि वे सीधे-सीधे बोलते हैं। फिर उनके कितने भी विरोधी लोकतंत्र, सेक्‍युलरिज्म और कट्टरता की आड़ लेकर खड़े हों जाए लेकिन योगी अपनी कही बात से पीछे नहीं हटते हैं। अभी हाल ही में यूपी चुनावों के दौरान जब उन्‍होंने कुछ मीडिया संस्‍थानों को अपने साक्षात्‍कार दिए तो उनकी सही में मंशा क्‍या है और वे राष्‍ट्र, राजनीति एवं समाज को लेकर किस प्रकार से सोचते हैं, यह बात व्‍यापक स्‍तर पर उजागर हुई। जिसका निष्‍कर्ष यही है कि यूपी के वर्तमान मुख्‍यमंत्री आदित्‍यनाथ योगी राजनीति को सेवा का मध्‍यम मानते हैं और उत्‍तरप्रदेश को खुशहाल विकसित बनाने का वे स्‍वप्‍न देखते हैं।

गंगा-यमुना को मनुष्य मानने का वैदिक आधार

Mudit Mittal : आज नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा नदी को देश की पहली जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी है और गंगा-यमुना को जीवित मनुष्य के समान अधिकार देने का फैसला किया है। इस फैसले के बाद भारत की दोनों महत्वपूर्ण नदियों गंगा और यमुना को अब एक मानव की तरह संविधान की ओर से मुहैया कराए गए सभी अधिकार मिल सकेंगे। कुछ दिनों पहले ही न्यूजीलैंड ने भी अपनी वांगानुई नदी को एक जीवित संस्था के रूप में मान्यता दी थी।

मैडम जी बोलीं- ‘यू नो, उर्दू इज़ अ वेरी ब्यूटीफुल लैंग्वेज!’

Yashark Pandey : बंगाली फ़िल्मकार सृजित मुखर्जी की एक पिक्चर है: ‘राजकाहिनी’। दो साल पहले इसका ट्रेलर देखा था तो रोंगटे खड़े हो गए थे। टैगोर के गीत ‘भारत भाग्य विधाता’ की उन सभी पंक्तियों को- जो राष्ट्रगान में सम्मिलित नहीं हैं- बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है। ट्रेलर में पूरा गीत किसी एक ने नहीं गाया बल्कि विभिन्न बंगाली गायकों की आवाज में गीत की हर पंक्ति अंदर तक झकझोर देती है। राजकाहिनी की कहानी यही है कि देश विभाजन के समय सरकारी आदेश से एक वेश्यालय को तोड़ा जाना है जो बदकिस्मती से भारत पाकिस्तान के मध्य खींची गयी सीमा रेखा पर स्थित है। उस वेश्यालय की लड़कियाँ किस प्रकार लड़ती हैं यही प्लॉट है। मैंने बहुत खोजा कि राजकाहिनी का कोई डाउनलोड लिंक मिल जाये लेकिन नहीं मिला। डीवीडी भी नहीं मिली।

कोई आश्चर्य नहीं कि यह योगी अयोध्या में राम मंदिर भी खड़ा कर दे : डा. वेद प्रताप वैदिक

एक योगी का मुख्यमंत्री बनना! … योगी आदित्यनाथ को उप्र का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया है, इस तथ्य ने सबको आश्चर्य में डाल दिया है, जैसा कि वहां के चुनाव-परिणामों ने डाल दिया था लेकिन उप्र के चुनाव-परिणाम और योगी की नियुक्ति में सहज-संबंध का एक अदृश्य तार जुड़ा हुआ है। आप पूछें कि उप्र में भाजपा कैसे इतना चमत्कार दिखा सकी तो इसका एक ही बड़ा उत्तर है कि वहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ। हिंदुओं ने नोटबंदी की तकलीफों को भुला दिया। उन पर फर्जीकल स्ट्राइक का भी कोई फर्क नहीं पड़ा। मोदी विकास के नाम पर भी शून्य थे लेकिन फिर भी बाजी मार ले गए।

योगीराज का लागिन ‘विकास’ है तो पासवर्ड ‘हिंदुत्व’!

विक्रमादित्य से योग्यादित्य!

भारतवर्ष के सबसे बड़े प्रान्त उत्तर प्रदेश में अव ‘योगी आदित्य’ यानी
यण् सन्धि करने पर ‘योग्यादित्य’ राज आ गया है। तमाम संदेहों व विभ्रम के
मकड़जाल में नकारात्मक सोच चिन्तनीय है। जबकि वास्तविकता में त्रेतायुग के
रामराज्य के बाद न्यायप्रिय सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन के ही क्रम
में ‘योग्यादित्यराज’ होगा, क्योंकि तीनों कालखण्डों की परिस्थितियां एक
जैसी हैं। कदाचार की पराकाष्टा के बाद सदाचार का प्राकट्य स्वाभाविक
प्रक्रिया प्रतीत होती है।

कांग्रेस की (कु)शिक्षा का भाजपा ने इस्तेमाल कर लिया तो हाय-तौबा क्यों?

नेता भूल जाते अपना इतिहास… भाजपा द्वारा गोवा और मणिपुर में जिस तरस से सरकर बनाने का कदम उठाया उससे कांग्रेस घबरा गई. लगा जैसे वह सोच रही थी कि उनके द्वारा उठाई जाती चालों को कोई दूसरा भला कैसे अपना सकता है। इस पर तो उनका ही सर्वाधिकार है कि गलतफहमी में रहते नेताओं को अपना इतिहास भले ही याद न रहे पर जनता को तो याद रह ही जाता है। जो शिक्षा दी गई आज उसका उपयोग अन्य दल कर रहा है तो जलन किस बात की और अगर वह शिक्षा ही गलत थी तो शर्मिंदगी की जगह अंकड़ क्यों?

APFEJ urges New Delhi to be respectful to media

Guwahati: Asia-Pacific Forum Environmental Journalists (APFEJ), in the
backdrop of Indian government’s recent initiative to ban a British
Broadcasting Corporation (BBC) scribe on filming in its tiger
reserves, has urged New Delhi to be respectful to the global media
outlets respecting the democratic spirit of the country. The Dhaka
(Bangladesh)-based environment media forum also appealed to the Indian
authority not to think of evoking the British scribe’s visa at any
cost.

मोदी और अमित शाह के बाद अब योगी आदित्यनाथ सबसे ताकतवर!

योगी आदित्यनाथ भारतीय राजनीति में अब तीसरे नंबर के सबसे ताकतवर नेता बन गए हैं। पहले नंबर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। उनके बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह। और अब योगी। उत्र प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी को कट्टर हिंदुत्व एवं प्रखर राष्ट्रवाद का प्रतीक माना जाता हैं। मोदी व अमित शाह को और खासकर उनकी बीजेपी व संघ परिवार को ऐसे ही नेता की तलाश थी। गुजरात के सीएम के रूप में मोदी ने भी अपनी कुछ कुछ इसी तरह की छवि के जरिए खुद को और बीजेपी को अधिक मजबूत किया था। राजनीति में मोदी के एजेंडे क आगे बढ़ाने ते लिए इसी तरह के सीएम की जरूरत भी होती है। वैसे भी, यूपी वह प्रदेश हैं, जहां किसी राष्ट्रीय पार्टी के मजबूत सीएम होने का देश भर में इसलिए भी बहुत मजबूत संदेश जाता है, क्योंकि केंद्र में भी उन्हीं की सरकार है। राजनीति बदल रही है और दमदार नेता देश का दारोमदार संभालें, यह पहली दरकार है। क्योंकि अब आगे बदलाव का यह रास्ता सिर्फ विकास या फिर धर्म निरपेक्षता के लबादे को ओढ़कर तय नहीं किया जा सकता।   
जीवन भर मुसलमानों के खिलाफ आग उगलनेवाले योगी आदित्यनाथ मुखिया ने शपथ ले ली है और अब वे यूपी के मुखिया हैं।

कांग्रेस सावधान… कचूमर निकालने निकल पड़े हैं मोदी के ‘हनुमान’!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे मजबूत सेनापति अमित शाह फिर से काम पर लग गए हैं। पांच राज्यों के चुनाव के तत्काल बाद वे अपने नए अभियान पर हैं। इस साल के अंत में और अगले साल होनेवाले करीब 15 विधानसभाओं के चुनाव के साथ सथ नका फोकस उन 200 लोकसभा क्षेत्रों पर है, जहां बीजेपी को मजबूत करके मोदी के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के सपने को साकार किया जा सकता है।

आराम न करना अमित शाह का शगल है और निशाना साधे रखना उनकी फितरत। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अथक सेनापति अमित शाह ने अपने अगले युद्ध की तैयारी शुरू कर दी है। वे लोकसभा चुनाव में अपना रणनीतिक कौशल साबित कर चुके हैं। और अब यूपी और उत्तराखंड में उनकी रणनीतिक सफलता ने बीजेपी को चमत्कृत कर देनेवाली जीत दिला दी है। मणिपुर और गोवा में भी सरकार बनाने का काम पूरा हो गया है। इसीलिए शाह ने अपने अगले अभियान के लिए कमर कस ली है।

अन्ना हजारे बनें देश के अगले राष्ट्रपति

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा विधानसभा चुनाव के बाद अब राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। क्योंकि में केंद्र में भाजपा पूर्ण प्रचंड बहुमत के साथ है तो स्वभाविक है कि भाजपा जिस व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाना चाहेगी वह राष्ट्रपति बन जाएगा। विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जिस पर कृपा होगी। यह है हमारे देश की राष्ट्रपति की हैसियत। राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा के खेवनहार रहे लाल कृष्ण आडवाणी, उनकी ही टक्कर के नेता रहे मुरली मनोहर जोशी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के नामों की चर्चा जोरों पर है। यह अन्य तंत्रों पर विधायिका का वर्चस्व ही माना जाएगा कि राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर राजनीतिक व्यक्ति ही बैठते रहे हैं। वह भी केंद्र सरकार के कृपा पात्र।

शराब इसलिए कम पिएं…

Pankaj Chaturvedi : शराब कम पीनी चाहिए। अधिक-से-अधिक दो प्याले। डोमन साहु ‘समीर’ द्वारा लिखित और संकलित एक संताली लोक-कथा की यह व्यंजना है। एक आदमी ने पीपल के पेड़ के नीचे चूल्हा सुलगाया और उस पर महुए की हाँड़ी चढ़ाकर शराब बनाने की कोशिश की। मगर इसमें उसे ज़रा भी कामयाबी नहीं मिली। एक ओझा ने उसे सलाह दी कि ‘जिस पेड़ के नीचे तुम यह कोशिश कर रहे हो, अगर उसे काटकर चूल्हे की आग में झोंक दो, तो बेहिसाब शराब बनेगी।’

यूपी में मोदी का काम बोला और अखिलेश यादव का कारनामा!

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के नतीजे अप्रत्याशित थे या फिर यह मोदी मैजिक? जिस ‘शख्स को मीडिया से लेकर राजनैतिक पंडित तक कमतर आंक रहे थे उसका क्रेज आज तक बरकरार है। 2014 में बीजेपी गठबंधन ने 73 लोकसभा क्षेत्र में विजय हासिल की थी जबकि विधान सभा बार यह गठबंधन 337 विधान सभा क्षेत्रों में आगे रहा था। यही इतिहास तीन वर्षों के बाद 2017 में भी दोहराया गया। बीजेपी गठबंधन को 325 सीट पर जीत मिली। 2014 में सपा को 05 सीटों पर फतेह हासिल हुई थी और 42 विधान सभा वार 42 सीटों पर उसके प्रत्याशी आगे रहे थे। विधान सभा चुनाव में भी सपा इसी आंकड़े के इर्दगिर्द नजर आई। उसे मात्र 47 सीटें मिली, जबकि बसपा और कांग्रेस की स्थिति 2014 के मुकाबले और भी दयनीय हो गई।

All EVM’s can be easily tampered!

Protect our great Indian democracy from being bulldozed…. In India Don’t allow use of EVM to protect our Democracy. All EVM’s can be easily tampered. So say no to EVM. MCD elections would be won by Aam Admi Party. Reason, is simple, BjB wants to use tampered evm to win big state elections. If BjB uses tampered evm in Mcd elections , chances are that EVM fraud would be exposed. So Bjb wont use tampered Evm in MCd elections, but use them instead in coming state elections, and most importantly for 2019 Lok shabha elections.

संजयलीला भंसाली को इतिहास से खिलवाड़ का हक नहीं

फिल्मकार संजयलीला भंसाली के साथ दुर्व्यवहार निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। किन्तु ऐतिहासिक तथ्यों और लोकमान्य प्रेरणादायक राष्ट्रीय विभूतियों की छवि विकृत करना भी एक सामाजिक अपराध है। यह आवश्यक है कि कवि-कथाकारों और कलाकारों को अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर रचना को अधिक से अधिक कलात्मक बनाने की छूट दी जानी चाहिए किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि रचनाकार इतिहास के तथ्यों और स्वीकृत सत्यों को ही उलट कर रख दे। फिल्म ‘पद्मावती’ में महारानी पद्मावती को अलाउद्दीन खिलजी की प्रेमिका बताया  जाना भी ऐतिहासिक तथ्यों को उलटना और महारानी पद्मावती की आदर्श सती की प्रेरक छवि को कलंकित करना है। यह अक्षम्य अपराध है। इस से केवल राजपूत समाज की ही नहीं बल्कि उस सारे भारतीय समाज की भावनाएं आहत हुई हैं जो अपनी मान-मर्यादा के लिए स्वयं को सहर्ष भस्मसात कर देने वाली महारानी  को अपना आदर्श मानता है ; उनके महान बलिदान पर गर्व का अनुभव करता है।

‘इसरो’ चीफ बोले- प्राचीन ग्रंथों को नजर अंदाज नहीं कर सकते…

इंसान के चांद पर जाने की खबर सुनने के साथ शुरू हुआ स्पेस से मेरा इश्क… यंग साइंटिस्ट कांग्रेस में हिस्सा लेने भिलाई पहुंचे इसरो चीफ डॉ. अल्लुरु सिरीन किरण कुमार ने की दिल की बातें…

(भिलाई में पत्रकार बिरादरी के साथ डॉ. किरण कुमार)

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चेयरमैन डॉ. अल्लुरु सिरीन किरण कुमार 28 फरवरी को भिलाई आए। यहां छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय भिलाई की मेजबानी में छत्तीसगढ़ काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नालॉजी (सी-कॉस्ट) की 15 वीं यंग साइंटिस्ट कांग्रेस में चीफ गेस्ट के तौर पर पहुंचे डॉ. किरण कुमार ने मिशन मंगल पर अपना आधार वक्तव्य (की-नोट एड्रेस) दिया और प्रेस से बातचीत में कई सवालों के जवाब भी दिए। इस दौरान तकनीकी विवि के कुलपति डॉ. मुकेश कुमार वर्मा भी मौजूद थे।

Show cause notice to HSBC

Dear Sir/Madam,

Me and my 17 ex colleagues sent show cause notice ( pleas find the attached file ) date 12 December 2016 but till date didn’t received any reply from them. The present government is concerned about black money then why they are not taking any action against HSBC as please find my RTI to Ministry of Finance and their reply ( RTI to FM ). Similar rti I sent to RBI and IT Dept, RBI replied that ‘We do not have any information regarding the assessment made by Tax aothorities.’ and got more than 200 replies from IT dept stating that this charge don’t have the information.

नरेंद्र मोदी और यूपी का दलित सीएम

यूपी विधानसभा चुनाव परिणाम ने दुनिया भर के राजनीति के पंडितों को चौका दिया है.ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि भाजपा की सफलता अत्यंत अप्रत्याशित व अभूतपूर्व है.यहां मोदी के करिश्मे के बदौलत उसने तीन सौ से अधिक सीटें जीतकर विधानसभा के चुनावी इतिहास के सारे रिकार्ड तोड़ दिया है.ऐसी सफलता वह उस 1991 के राम लहर में भी हासिल नहीं कर पायी थी, जो 2017 में मोदी लहर में अर्जित किया है.राम लहर में उसे 430 में से 221 सीटों पर ही सफलता मिल पाई थी.किन्तु उसने मोदी लहर में 403 में से 325 सीटें जीता है जो तीन चौथाई बहुमत (302) से भी ज्यादा है.सीटों का तीहरा शतक लगाने के क्रम में उसने सपा-कांग्रेस गठबंधन (54 सीटें) से छः गुना और और बसपा (19 सीटें) से 17 गुना अधिक सीटों पर सफलता पाया है.स्वाधीनता के बाद शायद यह पहला अवसर है जब किसी पार्टी को इतनी प्रचंड सफलता मिली है.वैसे 1951-52 के प्रथम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 388 सीटें मिली थीं,किन्तु उस समय यूपी और उत्तराखंड दो अलग राज्य नहीं बने थे एवं सीटों की कुल संख्या 430 थीं.यही नहीं तब एक साथ चार ऐसे दल भी एक साथ चुनाव में नहीं उतरे थे जिन्होंने अलग समय से यहां की सत्ता संभाली.इसी तरह 1977 और 1980 में जनता पार्टी और कांग्रेस ने क्रमशः 352 और 309 सीटें जीता,पर उस समय भी सीटें 430 थीं प्रदेश का विभाजन नहीं हुआ था.ऐसे में कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सफलता विशुद्ध विस्मयकारी है. बहरहाल इस चुनावी विस्मय उबारने के बाद अब पूरी दुनिया की निगाहें उसके द्वारा चुने जाने वाले सीएम चेहरे की ओर टिक गयी है.

बसपा की दुर्दशा का कारण है कांशीराम के ‘भागीदारी दर्शन’ से दूरी बना लेना

मान्यवर कांशीराम की 83 वीं जयंती पर विशेष लेख… आज बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम की 83 वीं जयंती है, किन्तु उनके अनुसरणकारी बहुत उदास मन से इसका जश्न माना रहे हैं.कारण हर कोई जानता है कि साहब कांशीराम ने भारत में समतामूलक समाज निर्माण के लिए 1984 में जिस पार्टी का गठन किया था ,आज उसके वजूद पर संकट खड़ा हो गया है और यह इससे उबार जाएगी, इसकी फिलहाल सम्भावना भी नहीं दिख रही है.हजारों साल के दासों, शुद्रातिशूद्रों में शासक बनने की महत्वाकांक्षा पैदा करने का चमत्कार घटित करने वाले साहब ने बहुजन समाज के जिन लाखों सक्षम लोगों को ‘पे बैक टू द सोसाइटी’के मन्त्र से दीक्षित कर समाज परिवर्तन के मोर्चे पर लगाया,आज वे बसपा की कल्पनातीत हार से खुनके आंसू रो रहे हैं  हैं;उन्हें चारो ओर अँधेरा ही अँधेरा नजर आ रहा है.बहरहाल निराश-हताश बहुजन अगर इस अँधेरे से निकलना चाहते हैं,तो उन्हें कांशीराम साहब के उस दर्शन का नए सिरे से अध्ययन कर लेना चाहिए,जिसमें सिर्फ उनकी ही नहीं,सम्पूर्ण मानवता की मुक्ति के बीज छिपे हैं.     

बस्तर में मानवाधिकार उल्लंघन चिल्लाने वाले अब कहां दुबक गए?

हर हमले से मजबूत होते हैं हम…  जब पांच राज्यों के चुनाव परिणाम यह दर्शा रहे थे कि राजनीति में न हार अटल है और ना जीत, ठीक उसी वक्त बस्तर के सुकमा में आतंक के दहशतगर्द नक्सलियों ने आईईडी ब्लॉस्ट कर 12 जवानों को शहीद कर दिया और कुछ को घायल। नक्सलरोधी-नीति पर सवालिया निशान खड़े करती इस घटना के तत्काल बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जो तत्परता-सह्दयता-उदारता दिखाई, उसने शहीद परिवारों के जख्मों पर मलहम तो जरूर लगाया है लेकिन मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई की दरकार बनी हुई है।

राहुल गांधी में दम है, तो कांग्रेस का दम क्यों निकल रहा है?

-निरंजन परिहार-
कांग्रेस की हालत खराब होती जा रही है। लगातार होती हार पर हार राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। यूपी में कांग्रेस की हाल ही में हुई हालत में राहुल गांधी की जिम्मेदारी क्यों तय नहीं होनी चाहिए। सवाल यह है कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस अब कैसे फिर से पैरों पर खड़ी होगी।  

कांग्रेस के लिए यह विश्लेषण का दौर है। लेकिन कितनी बार, किस किस तरीके से, किसी किस के केंद्र में रखकर आखिर किस दह तक कितने विश्लेषण और किए जाने चाहिए। यह भी तय करना होगा। राहुल गांधी अगर दमदार हैं, तो चुनाव दर चुनाव कांग्रेस का दम क्यों निकलता जा रहा है। वैसे, कांग्रेसियों को तो समझ में आ गया है कि राहुल गांधी में दम नहीं है। लेकिन कांग्रेस को कब समझ में आएगा, यह अब तक साफ नहीं है। हालांकि, यूपी में कांग्रेस के बुरी तरह से साफ हो जाने के बाद यह पूरी तरह से साफ हो गया है कि अगले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के भरोसे कांग्रेस का अब फिर से पैरों पर खड़े होना लगभग असंभव है। कांग्रेस की नैया के खिवैया के रूप में राहुल गांधी सिर्फ बंसी बजैया ही साबित हो रहे हैं।

धर्मनिरपेक्षता का मतलब मुस्लिम परस्ती कतई नहीं

विचारधारा पर मंथन की जरूरत… उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलना सपा, बसपा, कांग्रेस व रालोद के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है। इन पार्टियों के लिए आम चुनाव के बाद यह दूसरा बड़ा झटका है। इस जनादेश ने धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाली इन पार्टियों की विचारधारा और संगठन दोनों पर समीक्षा करने के लिए मजबूर कर दिया है। इन चुनाव में सबसे बड़ी परीक्षा समाजवादी पार्टी के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की थी। तो यह माना जाए कि विकास, संगठन और विचारधारा को लेकर पार्टी के मुखिया अपने पिता मुलायम सिंह यादव से बगावत करने वाले अखिलेश यादव को कांग्रेस से गठबंधन करना भारी पड़ गया। ऐसे अखिलेश यादव को गंभीरता के साथ परिवार विवाद के पूरे प्रकरण, संगठन और विचारधारा पर मंथन करने की जरूरत है।

होली आई रे

फागुन आते ही चहुंओर होली के रंग दिखाई देने लगते हैं. जगह-जगह होली मिलन समारोहों का आयोजन होने लगता है. होली हर्षोल्लास, उमंग और रंगों का पर्व है. यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इससे एक दिन पूर्व होलिका जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है, जिसे धुलेंडी, धुरखेल तथा धूलिवंदन कहा जाता है. लोग एक-दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल लगाते हैं. रंग में भरे लोगों की टोलियां नाचती-गाती गांव-शहर में घूमती रहती हैं. ढोल बजाते और होली के गीत गाते लोग मार्ग में आते-जाते लोगों को रंग लगाते हुए होली को हर्षोल्लास से खेलते हैं.  विदेशी लोग भी होली खेलते हैं. सांध्य काल में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिष्ठान बांटते हैं.

मोदी प्रधानमंत्री हैं, ब्रांड एम्बेस्डर नहीं

रिलायंस जियो और पेटीएम ने अपने विज्ञापनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने ब्रांड एम्बेस्डर की तरह पेश करने पर अंततः सरकार से माफी मांगकर अपना पल्ला इस प्रकरण से झाड़ दिया है। दोनों कंपनियों द्वारा जिस प्रकार अपने उत्पादों व सेवाओं के प्रचार-प्रसार के लिए प्रधानमंत्री के चेहरे का प्रयोग किया गया, उस पर राजनीतिक दलों ने काफी हो हल्ला मचाया था और बौद्धिक जगत में भी खासी बहस शुरू हुई थी। खासकर पत्रकारिता और मीडिया शिक्षा से जुड़े मंचों पर यह प्रकरण कई दिनों तक विमर्श का मुद्दा बना रहा। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या दोनों कंपनियों द्वारा केवल माफी मांग लेने से ही इस प्रकरण का पटाक्षेप हो जाएगा। प्रधानमंत्री को अपने ब्रांड एम्बेस्डर की तरह जनता के सामने पेश करके अपना उल्लू सीधा करने वाली इन कंपनियों को क्या इतने सस्ते में छोड़ दिया जाना चाहिए।

कहर बन टूटने को तैयार है एक और नरमेधी सरकारी सूनामी

लीजिए, कॉर्पोरेट्स के दबाव में देश के गरीब-गुरबों के पेट पर लात मारने को एक और सरकारी सूनामी कहर बन कर टूटने ही वाली है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आने के बाद केन्द्र सरकार आर्थिक सुधारों के बहाने कॉर्पोरेट घरानों की तिजौरियां भरने को कुछ बड़े और कड़े फैसले लेने जा रही है। इनके जरिये सरकार श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर कंपनियों को उत्पादन लागत घटाने तथा निर्यात-प्रोत्साहन के हिसाब से कर्मचारियों की मनमानी छंटनी करने की छूट देने जा रही है। नोटबंदी से तो देशभर में लगभग डेढ़ सौ ही अकाल मौत की नींद सो गये थे, लेकिन इस सूनामी की भेंट कितने बेकसूर चढ़ेंगे इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

पहिया वाले भइया गिरे धड़ाम… जय जय श्री राम….

होली अंक के लिए व्यंग्य  …

एक भइया था । उसकी एक मइया थी, इसीलिए सब लोग उसे मइया वाला भइया पुकारते थे । मइया को अपना भइया बहुत प्यारा था । उसे सदैव अपने आंचल में छुपाये रखना चाहती थी । मगर भइया था बहुत चंचल । घर में तनिक टिकता ही न था । जब मर्जी आती फॉरेन ट्रिप मार आता । मइया वाला भइया था नटखट । साइकिल देख उसका मन मचल उठा । बोला- मइया, साइकिल चाहिये । मैं भी गद्दी पर बैठूंगा । बेटा लॉलीपॉप मांगता तो मां दिला भी देती, साइकिल कहां से  दिलाती । मइया समझाती रही मगर वो न माना । बालहठ … मइया हो गई मजबूर।

कांग्रेस नहीं, अमरिंदर जीते पंजाब में!

-निरंजन परिहार-

क्या यूपी में नरेंद्र मोदी ने खुद आगे बढ़कर चुनाव लड़ा, वैसे अगर कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी इज्जत दांव पर लगाकर नहीं लड़ते, तो क्या पंजाब में कांग्रेस जीत पाती ? अगर पंजाब में भी राहुल गांधी और प्रशांत किशोर को खुली छूट मिल जाती, तो क्या इतना बहुमत मिल पाता ?  

जो लोग यह मान रहे हैं कि पंजाब में कांग्रेस की जीत हुई है, वे जरा अपना राजनीतिक ज्ञान सुधार लें। और वे भी, जो यह मान रहे हैं कि राहुल गांधी के युवा नेतृत्व की वजह से पंजाब का युवा कांग्रेस से जुड़ गया। दरअसल, पंजाब के पूरे चुनाव में न तो कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के परंपरागत ढांचे के मुताबिक चुनाव लड़ा और न ही वे राहुल गांधी की मेहरबानियों के मोहताज रहे। दिखने में भले ही यह कांग्रेस की जीत है, और कैप्टन भी इसे पंजाब की जनता की जीत बताकर धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं।

Destroying Kirana merchants the Bjp way

CAG, Enforcement directorate investigate this case. Destroying Kirana merchants the Bjp way. Bjp gov is deliberately not printing  RS 1000 notes. One for vastu and another for destroying kirana merchants all over india. Suppose you are going to buy a Cfl  bulb  with mrp 200 and u have rs 2000 note only. U will go to kirana merchant and He will give your cfl bulb  to you. But he has no change for rs 2000 note. So you will leave that shop and go go reliance or more or bigbazar( who fund BJP gov ), who have change for your rs 2000 note.

जबलपुर में वकालत मंदी है, गुंडे बनकर घूम रहे कुछ वकील…

अपराधिक प्रवत्ति के बाप-बेटी के कारनामों की मोटी फाइल मेरे हाथ लग गई है। अब वो हर पैंतरा अपना रहे ताकि मैं FIR न करुं। कल थाने बुलाया आपस में मामला समझने। अच्छा मजे की बात यह कि फोन उन्होंने थाने के हवलदार से करवाया। मैं पहुंचा तो उनका वकील बाहर ही बात करने लगा। सुलह कर लीजिये। यहीँ मामला देख लेते हैं। और भी कई तरह के लुभावने ऑफर। मैंने बोला विचार करके बताऊंगा और मैं गाड़ी चालू करने लगा। तो उनका वकील बोला चलिये घर में बैठकर बात करेंगे। हवलदार साहब को भी ले चलते हैं। मेरे घर से चंद कदमों की दूरी पर है थाना लेकिन बदनीयत का मुझे पूरा अंदाजा था। फिर भी मेरी आदत है पहला वार दुश्मन को ही करने देता हूं।