चर्चित गजलकार राजेंद्र राज की पुस्तक ‘तड़प कम तो नहीं’ का लोकापर्ण

लाला जगत ज्योति प्रसाद सम्मान से सम्मानित हुए आकाशवाणी के केंद्र निदेशक डॉ. किशोर सिन्हा और अरविंद कुमार श्रीवास्तव

मुंगेर । साहित्यिक पत्रिका नईधारा के संपादक डॉ शिवनारायण ने कहा है कि संवेदना, न्याय और चेतना पत्रकारिता व साहित्य की जरूरी शर्तें हैं. इन शर्तों को न सिर्फ पत्रकारिता व साहित्य के क्षेत्र में बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में आत्मसात किया जाना चाहिए. तभी हम बेहतर समाज की परिकल्पना को साकार कर पायेंगे. वे मुंगेर सूचना भवन के सभागार में समकालीन साहित्य मंच के तत्वावधान आयोजित चर्चित पत्रकार स्व. लाला जगत ज्योति प्रसाद की पुण्यतिथि पर आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे.

दिल्ली की जनता के लिए केजरीवाल जैसा सीएम पालना मुश्किल होता जा रहा है

अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं । इसके साथ साथ वे आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष भी हैं । राजनैतिक दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते हैं । इन आरोपों के दो वर्ग हैं । पहले वर्ग में वे आरोप आते हैं जो किसी भी राजनैतिक दल की नीतियों और उसकी विचारधारा को लेकर लगते हों । मसलन भारतीय जनता पार्टी कहती है कि सोनिया गान्धी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा हैं और उनकी पार्टी की सरकार जो नीतियाँ लागू कर रही हैं उससे देश रसातल में चला जाएगा । इस प्रकार के आरोपों का फ़ैसला देश की जनता चुनावों में कर देती है । लेकिन आरोपों का दूसरा वर्ग व्यक्तिगत आरोपों की श्रेणी में आता है।

चप्पलमारों से पूछो ये सवाल- कब मिलेगा वापस बुलाने का अधिकार

जनाब, चप्पलमार सांसद प्रकरण अभी खत्म नहीं हुआ है । कभी किसी नेता या किसी वीआईपी पर को आम व्यक्ति जब जूता-चप्पल या स्याही फेंक कर किसी मुद्दे पर अपना विरोध जताता है तो उस व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होने में जरा भी देर नहीं लगती, उसको गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे डालने में पुलिस भी पूरी मुस्तैदी दिखाती है । हालांकि इस तरह की घटनाएं हमला या मारपीट नहीं होतीं। भले ही ये तरीका गलत हो, मगर ये तो एक तरह की अभिव्यक्ति ही है। यह आक्रोश जताने का एक तरीका है।

चल चमेली बाग में ‘कमल’ खिलाएंगे…!

ईवीएम से छेड़छाड़ करने में हमें महारत हासिल है। लड़कियों पर फब्तियां कसने में महारत हासिल है। ट्रैफिक कानून की धज्जियां उड़ाने में महारत हासिल है। इश्क और मुश्क छिपाने में महारत हासिल है। दूरदर्शी को लगता है कि सब कुछ छिप सकता है पर ईवीएम का खेल नहीं छिप सकता। उसमें छेड़छाड़ का कारनामा नहीं छिप सकता। एमपी के भिंड में डमी ईवीएम का ट्रायल हुआ तो बड़ा राज खुल गया। बटन तो अलग-अलग दबे, पर निकलीं सिर्फ कमल की पर्चियां। चुनाव आयोग का भी जवाब नहीं। नौ अफसरों को नापकर छेड़छाड़ की पटकथा मिटा दी।

AAP का मतलब है अवैध आमदनी पार्टी!

शुंगलू कमेटी ने जब शीला सरकार पर 75 हजार करोड़ के भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप लगाया तब केजरीवाल जी ने शीला दीक्षित से इस्तीफ़ा मांगा था. अब उसी शुंगलू कमेटी ने केजरीवाल सरकार पर गंभीर आरोप लगाया है तब 10 साल में 12 लाख करोड़ का घोटाला करने वाली कांग्रेस पार्टी अब केजरीवाल से इस्तीफ़ा मांग रही है. लेकिन मजे की बात यह है कि नैतिकता के आधार पर न तो शीलाजी ने इस्तीफ़ा दिया और न तो केजरीवाल जी इस्तीफ़ा दे रहे हैं.

महाराष्ट्र की तरह उत्तर प्रदेश में भी पत्रकारों पर हमला गैर-जमानती हो : उपजा

लखनऊ। महाराष्ट की तरह उत्तर प्रदेश में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर हमला गैर जमानती अपराध हो। यह मांग उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की है। उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) के प्रान्तीय महामंत्री रमेश चन्द जैन और लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ला ने कहा कि उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन व इसकी राष्ट्रीय इकाई नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स एनयूजे (आई) पिछले काफी समय से पत्रकार एवं पत्रकार संगठनों पर हो रहे हमलों से आहत होकर पत्रकार सुरक्षा कानून बनाये जाने की मांग कर रहा था और संगठन ने पत्रकार सुरक्षा कानून बनाये जाने की मांग को लेकर गत् 7 दिसम्बर 2015 को संसद का घेराव भी किया था गत् 7 दिसम्बर 2016 को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल महोदय को इसी आशय का ज्ञापन भी सौंपा था।

यूपी में बदनाम सड़कों पर खामोशी का पहरा

21 वीं सदी के शुरुआती वर्ष 2002 में विक्रम भट्ट निर्देशित हिन्दी फीचर फिल्म ‘राज’ के एक गीत, ‘यह शहर है अमन का, यहां की फिजा है निराली, यहां पर सब शांति-शांति है,यहां पर सब शांति-शांति है’ ने खूब शोहरत बटोरी थी। यह गीत आजकल उत्तर प्रदेश पर काफी फिट बैठ रहा है। यूपी में सत्ता परिवर्तन होते ही एक गजब तरह की खामोशी ने पूरे राज्य को अपने आगोश में ले लिया है। इसका कारण है योगी सरकार का अपराधियों पर कसता शिकंजा, जिसके कारण यूपी में योगी सरकार का इकबाल बुलंद है। पूरे प्रदेश में जिस तेजी के साथ माहौल बदल रहा है, उसने प्रदेश की अमन प्रिय जनता काफी सुकून महसूस कर रही है। शहर की सड़के और चौराहे इस बात के गवाह हैं। बात-बात पर मारपीट पर उतारू दबंग किस्म के लोग अब कहीं नहीं दिखाई देते हैं। बड़े-बड़े मॉल और पार्कों में अब शोहदे लफंगई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

आदित्यनाथ ने सचमुच ‘योगी’ की तरह सरकार चला दी तो?

ये प्रश्न आज बहुत से लोगों के मन में उठ रहा है और कईंयों के दिलो दिमाग में तूफ़ान पैदा कर रहा है! तथाकथित ‘सेक्युलरिस्टों’ की जमात ने अल्पसंख्यक समुदाय, खासकर मुसलमानों के मन में भगवा रंग और भाजपा के प्रति जैसी धारणा बनादी है,उससे उस समुदाय में यूपी की सरकार और खासकर उसके मुखिया योगी आदित्यनाथ को लेकर आशंकाओं का पैदा होना लाज़मी ही है.हालांकि इस बार के यूपी चुनावों ने अल्पसंख्यकों की इस अवधारणा को ध्वस्त किया है,क्योंकि उन्होंने  भी इस बार भाजपा को वोट किया है,फिर भी ‘छद्म सेक्युलरिस्टों’की जमात मीडिया में अपनी छाती कूट कर भाजपा के खिलाफ एक भय वाला माहोल बनाने में सक्रीय है.

Joke : लखनवी अदब और तमीज़ पर एक चुटकुला

लखनऊ का एक जोड़ा जब उम्मीद से हुआ तो बड़े हकीम से पूछा कि ‘हज़रत, हम बच्चा बा अदब तमीज़ दार चाहते है कोई दवा हो तो दीजिये जिस से बच्चा बा अदब पैदा हो।’

हकीम साहब ने दवा दी।

औरत ने पाबन्दी से इस्तेमाल किया जन्म हुआ तो बच्चे ने बाहर आते ही झुक कर सब बड़े बुजुर्गों को कहा…. 

‘आदाब’

सब ख़ुशी से झूम उठे कि वाह! क्या अदबदार औलाद हुई है।

सालिक और पहलू की हत्या पर शर्मिंदा है मुल्क!

मोदी-योगी बताएं देश मनुस्मृति से चलेगा या फिर बाबा साहेब के संविधान से… भाजपा शासित राज्यों में हिंदुत्ववादी संगठन चला रहे हैं समानांतर सरकार… गौ हत्या के नाम पर देश की संसद को गुमराह कर रही है मोदी सरकार
 
लखनऊ : रिहाई मंच ने झारखण्ड के गुमला में मुहम्मद सालिक और राजस्थान के अलवर में गौ रक्षकों द्वारा पहलू खान की निर्मम हत्या की निंदा करते हुए कहा है कि भाजपा शासित राज्यों में हिंदुत्ववादी संगठन समानांतर सरकार चला रहे हैं, जो कि मानवता को भी शर्मसार कर देने वाला है। मंच ने कहा कि झारखण्ड में जिस तरह से पहलू खान की हत्या के बाद मुहम्मद सालिक को गौ रक्षकों ने पीट -पीटकर मार डाला उसने यह साबित कर दिया है कि भाजपा शासित राज्यों में कानून-व्यवस्था का क्या हाल है।

बेटी की भावना का मजाक ना बनाएं

जिस समय देश में मां की आराधना का पर्व नवरात्र मनाते हुए देवी की पूजा-अर्चना हो रही है, उन्हीं दिनों में विडियो वायरल कर एक बेटी का मजाक बनाया जा रहा है। हैरत है कि विडियो में बोलने वाली बिटिया के भाव समझे बिना लोग बड़े चाव से इस विडियो को वायरल कर आग की तरह फैलाने की अपील कर रहे हैं। गायत्री मंत्र का उच्चारण भी जिन्हें ठीक से याद नहीं होगा, ऐसे लोग धर्म और आस्था की बड़ी-बड़ी बातें करते हुए खुद को समाज में श्रेष्ठ बताने के लिए इस विडियो के साथ मनगढ़ंत बातें लिखकर वाहवाही लूटने का प्रयास कर रहे हैं।

कभी रहा होगा एजुकेशन हब, अब तो सेक्स हब ही लग रहा है इंदौर…

इंदौर: इन दिनों जिहालत के दिन इंदौर में कट रहे हैं। पर अपन भी पक्के पत्रकार हैं, कुत्ते घाई। जहां रहेंगे खबर सूंघना और खोदना न छोड़ेंगे। जिस अपार्टमेंट में रह रहा हूं वहां से आने जाने के कई रास्ते है। और उन्हीं रास्तों में हर दूसरे दिन कोई न कोई लड़का-लड़की गुजरते हैं। चंद दिनों में मुझे रेड लाईट एरिया के रहवासी वाली फिलिंग आने लगी है। शुरुआत कुछ ऐसी होती है कि पहले लड़का आयेगा क्योंकि फ़्लैट उसके दोस्त का है। फिर आयेगी लड़की… मुंह ढाँककर बिलकुल प्रोफेशन स्कॉट जैसे।

क्या कानून एवं संविधान की सही परिभाषा यही है?

क्या भारत का संविधान किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह दूसरे व्यक्ति पर अपना रोब झाड़ सके एवं दूसरे व्यक्ति कि हत्या भी कर सके। इसको बड़ी गम्भीरता से सोचना पड़ेगा। यह अत्यंत गम्भीर एवं संवेदनशील विषय है। इसपर चिंतन एवं मनन करने की अतिशीघ्र आवश्यक्ता है। यह हमारे देश की एकता और अखंडता पर बहुत बड़ा प्रश्न है। जिससे देश को क्षति हो रही है। मात्र कुछ व्यक्तियों की ऐसी मानसिकताओं से पूरा देश आहत है। ऐसी मानसिकताएँ क्या देश को विकास कि गति दे रहीं हैं। अथवा देश के विकास कि गति में सहायक हैं। सोचिए, समझिए। क्या कारण है। यह उग्रता, यह संविधान के साथ खिलवाड़, यह कानून एवं संविधान का अपमान, यह हमारी एकता को दूषित करने का प्रयास, क्या कारण है। क्या ऐसी मानसिकताओं पर शीघ्र अंकुश लगाने कि आवश्यक्ता है अथवा नहीं?……

दारू चीज़ ही ऐसी है!

नदी के किनारे पहुंचने के बाद मछली पकड़ने गये आदमी को मालूम पड़ा कि वो मछलियों के लिए चारा लाना तो भूल ही गया। तभी उसने एक छोटे से सांप को वहां से गुज़रते देखा जो अपने मुंह में एक कीड़ा पकड़े हुआ था। आदमी ने सांप को पकड़ा और उसके मुंह से वह कीड़ा छीन लिया।

मोदी के दलित या दलितों के मोदी

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में जाति-राजनीति की भूलभलैया को कैसे पछाड़ा

सत्याकी राय तथा पंकज सिंह

(अनुवादकीय नोट: इस लेख में बहुत अच्छी तरह से बताया गया है कि इस चुनाव में भाजपा ने किस तरह से जाति की राजनीति का इस्तेमाल अपने पक्ष में किया है. दरअसल जाति की राजनीति ने हिंदुत्व की ताकतों को ही मज़बूत किया है. इसका मुकाबला केवल जाति की राजनीति को छोड़ कर वर्गहित आधारित जनवादी राजनीति से ही किया जा सकता है.)

उत्तर और पच्छिम भारत में अपने वर्चस्व को मज़बूत करने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उसके रणनीतिकार दलित जनसख्या के बड़े हिस्से को जीतना चाहते हैं. अब तक यह प्रक्रिया बहुत आसान नहीं रही है. उत्तर प्रदेश की दलित आबादी का एक बड़ा हिस्सा बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती का नियमित वोटर रहा है जिस कारण पिछले कुछ चुनावों में उसके वोट बैंक में बहुत गिरावट नहीं आई है.

रामोत्सव का क्या हो विकल्प!

आज के दैनिक जागरण में छपी खबर के अनुसार अयोध्या में भगवान श्रीराम की जन्मस्थली पर सोमनाथ की तर्ज पर भव्य राम मंदिर बनवाने के लिए विश्व हिन्दू परिषद् ने निर्णायक लड़ाई लड़ने का मन बनाया है.इसके तहत उसने नवरात्रि के पहले दिन से पूरे देश में रामोत्सव मनाने की घोषणा कर दिया है.इसके तहत यह पुरे देश में 5000 स्थानों पर रामोत्सव मनायेगा..विहिप के काशी प्रान्त के प्रमुख के मुताबिक पूरे देश में राम-महोत्सव 11 अप्रैल तक मनाया जायेगा.वहां के विहिप जिला प्रवक्ता के मुताबिक़ राम मंदिर बहुसंख्य समाज की आस्था ,सम्मान और अस्मिता का सवाल है.इस मसले पर पूरे देश में निर्णायक माहौल बनाएगा .

कांशीरामवाद पर हेडगेवारवाद की निर्णायक विजय

एच.एल.दुसाध

यूपी विधानसभा चुनाव की विस्मयकारी  विजय के बाद नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व और अमित शाह की रणनीति की भूरि-भूरि चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है.लोग अब मोदी की तुलना इंदिरा गाँधी से करने लगे हैं.आज उनके करिश्मे से अभिभूत ढेरों लोग अभी से ही उन्हें 2019 लोकसभा चुनाव का विजेता घोषित करने लगे हैं.लेकिन भारी अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि मोदी की प्रशंसा में पंचमुख राजनीति के पंडितों में कोई भी भाजपा की चौकाने वाली सफलता के पृष्ठ में हेडगेवार की चर्चा नहीं कर रहा है.,जबकि ऐसा किया जाना जरुरी था. .कारण,भाजपा की वर्तमान सफलता मोदी –शाह से बढ़कर हेडगेवारवाद की विजय है.कैसे!इसे जानने के 1925 के दिनों के पन्ने पलटने पड़ेंगे.     

बेटी ही हो, इसके लिए मन्नते मांगते हैं अरुणाचल के लोग

अरुणाचल के लोगों को चाइनीज़ बताकर अपमानित करने की बढ़ रही घटना पर घोर नाराजगी है यहाँ के लोगों में… 26 जनजातियां आपस में संवाद करने के लिए हिंदी भाषा का करती हैं प्रयोग… अरुणाचल के लोग जय हिन्द बोलकर करते हैं अभिवादन

ईटानगर : ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ का सन्देश लेकर पहुचे स्वस्थ भारत यात्री दल का ईटानगर में नेशनल यूथ प्रोजेक्ट ने जोरदार तरीके से किया स्वागत. यात्री दल ने एनयूपी द्वारा चलाये जा रहे महिला उद्यमिता कार्यक्रम से जुडी महिलाओं से स्वास्थ्य चर्चा की. इस अवसर पर आशुतोष कुमार सिंह, प्रसून लतांत और एनयूपी के अध्यक्ष एच पी विश्वास ने अपनी बात रखी. अरुणाचल की महिलाओं की तारीफ करते हुए स्वस्थ भारत के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि यहाँ आकर मालूम चला कि यहाँ की महिलाएं कितनी सशक्त हैं…यहाँ पर बेटियां दहेज़ लेकर शादी करती हैं. बरात लेकर बेटियां शान से लड़के के घर जाती हैं. उनके जन्म होने पर खुशियाँ मनाई जाती हैं.

मोदी-योगी युग में किसानों की बल्ले-बल्ले

अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में सत्ता परिर्वतन किसानों के लिये खुशियों की सौगात ले कर आई है। चुनावी प्रचार के दौरान पीएम मोदी के किसानों से किये गये वायदे के अनुसार लघु और सीमांत किसानों का कर्जा माफ होने के साथ यूपी के नये सीएम योगी आदित्य राज ने किसानो का सौ फीसदी गेहूं खरीदने की घोषणा कर दी है। गेहूं खरीद का पैसा सीधे किसानों के खाते में जायेगा। योगी सरकार के द्वारा गन्ना किसानों को उनका भुगतान जल्द से जल्द दिलाये जाने की कोशिश हो रही है। योगी सरकार केन्द्र की उन योजनाओं को भी जल्द से जल्द जमीनी हकीकत में बदलेगी जिससे किसानों का भला हो सकता है। सीएम योगी का तो ध्यान किसानों की समस्याओं पर है ही इसके अलावा किसानों के लिए केन्द्र सरकार ने भी इस बजट में कई अहम घोषणाएं की हैं। जैसे मनरेगा के लिए 48,000 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है। योजना के तहत गांवों में 10 लाख तालाब बनेंगे. ई-नैम के तहत एपीएसी के लिए 75 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान और को-ऑपरेटिव बैंकों में सेवाओं को डिजिटल बनाने के लिए 3 साल में 1900 करोड़ रुपये का प्रस्ताव. इसके अलावा नाबार्ड के अंतर्गत डेयरी प्रोसेसिंग इंफ्रा फंड के तहत 8000 करोड़ रुपये का प्रावधान और फसल बीमा योजना की रकम 5500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 13 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया है।

UGC की अनुदान कटौती है बहाना, JNU और TISS है निशाना

देश की चौथे नम्बर की सबसे बढ़िया जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की रिसर्च की सीटों में भारी कटौती के बाद अब TISS (Tata Institute of Social Sciences) पर सरकार हमला कर रही है। इस संस्थान के 25 टीचर्स को यूजीसी द्वारा अनुदान कटौती के कारण नौकरी से हाथ धोना पड़ रहा है। TISS के शिक्षकों और छात्रों द्वारा सरकार की कई नीतियों की आलोचना होती रही है। मुम्बई में कुछ महीने पहले आयोजित ‘मुम्बई कलेक्टिव’ कार्यक्रम के आयोजन में TISS के छात्रों और कुछ शिक्षकों का बड़ा हाथ था। JNU और रोहित वेमुल्ला की आत्महत्या पर हुए विरोध प्रदर्शन में यहाँ के छात्रों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। अब पर कतरने के लिए इस संस्थान के 4 केंद्रों- 1.सेंटर फॉर एक्सेलेंस ऑफ़ ह्यूमन राइट्स एजुकेशन, 2.स्कुल ऑफ़ लॉ, राइट्स एंड कांस्टीट्यूशनल गवर्नेंस, 3. एडवांस्ड सेंटर फॉर वुमन्स स्टडीज, और 4. सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोशल एक्सकलुशन एंड इंकलुसिव पॉलिसीज को निशाना बनाया गया है।

यूं ही नहीं हुई सहारा में क्रांति!

लखनऊ में सहारा कर्मियों ने जिस जज्बे के साथ अपने हक की आवाज उठाई है, वह काबिलेतारीफ है। कर्मचारियों का हक मारकर गरीब जनता की खून-पसीने की कमाई पर बाबा रामदेव के साथ मिलकर धंधा कर रहे ओपी श्रीवास्तव के घर का घेराव कर उसे भी तेवर दिखा दिये गए। नोएडा परिसर से उठी बगावत की चिंगारी अब पूरे देश में आग का रूप ले चुकी है। यह वही संस्था है जिसमें डंडे के जोर पर कर्मचारियों से जहां चाहे हस्ताक्षर करा लिए जाते रहे हैं। चाटुकारिता की सभी हदें पार की जाती रही हैं। हक की आवाज को दमन के बल पर दबा दिया जाता रहा है। चेयरमैन (सुब्रत राय) को भगवान की तरह पूजा जाता रहा है।

दलित राजनीति की विफलता और विकल्प

हाल में उत्तर प्रदेश के चुनाव ने दर्शाया है कि दलित राजनीति एक बार फिर बुरी तरह से विफल हुयी है. इस चुनाव में बहुमत से सरकार बनाने का दावा करने वाली दलितों की तथाकथित बहुजन समाज पार्टी (बसपा) 403 में से केवल 19 सीटें ले कर तीसरे नंबर पर रही है. यद्यपि 2009 (लोक सभा) और 2012 (विधान सभा) चुनाव में इस पार्टी का अवसान बराबर दिखाई दे रहा था परन्तु 2014 के लोक सभा चुनाव में इसका पूरी तरह से सफाया हो गया था और इसे एक भी सीट नहीं मिली थी. इसी तरह 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में भी लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 23% पर पहुँच गया है। यद्यपि बसपा सुप्रीमो मायावती ने बड़ी चतुराई से इस विफलता  का मुख्य कारण ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी बता कर अपनी जुम्मेदारी पर पर्दा डालने की कोशिश की है परन्तु उसकी अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, तानाशाही, दलित हितों की अनदेखी और जोड़तोड़ की राजनीति के हथकंडे  किसी से छिपे नहीं हैं. बसपा के पतन के लिए आज नहीं तो कल उसे अपने ऊपर जिम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी.

शिक्षा का गिरता स्तर, नैतिक पतन पैदा कर रहा ‘रोमियो’

सुमंगल दीप त्रिवेदी

यूपी में सरकार बदलने के बाद से एक शब्द लगभग हर एक सख्श की जुबान पर आ रहा है, वह है ‘रोमियो’। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्कूली छात्राओं, बालिकाओं एवं युवतियों से आये दिन होने वाली बदसलूकी, छींटाकशी पर विराम लगाने के उद्देश्य एवं महिलाओं के प्रति बढ़ रही आपराधिक वारदातों पर विराम लगाने की मंशा से सूबे के नये मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने पुलिस विभाग को निर्देशित किया। फलस्वरूप, गठन हुआ ‘एंटी रोमियो स्क्वैड’।

मनुवाद के उग्र व रक्तरंजित विरोध पर मायावती को सोचना होगा

सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का सिद्धांत ही मायावती के लिए सुखमयकारी, राजनीतिक शक्ति हासिल करने क लिए अच्छा रहेगा। मनुवाद का अत्यधिक रक्तरंजित विरोध नुकसानकुन है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि रक्तरंजित हिन्दू विरोध से भी मायावती नुकसान में ही रहेगी। इसलिए कि दलित और पिछडों की अधिकतर जातियां और लोग हिन्दुत्व से आज भी जुडे हुए हैं। अत्यधिक और रक्तरंजित हिन्दू विरोध से अगडी और वैश्य जातियां ऐसे भी मायावती के विरोधी रही हैं। मायावती को अब हिन्दुत्व आधारित रक्तरंजित विरोध की राजनीति छोडनी चाहिए।

विष्णुगुप्त

पत्रकार सईद खान की याद में कार्यक्रम की रिपोर्ट : हमसईद, सईद की याद, सईद के सरोकार

इंदौर : दिल्ली से शुरुआत कर भोपाल में पत्रकारिता कर चुके और इन्दौर के पत्रकारिता जगत में बहुत कम समय में ही काफ़ी लोगों का प्यार और इज्जत हासिल कर लेनेवाले, भाषा पर अच्छी पकड़ रखनेवाले, देश दुनिया से लेकर शहर-मोहल्ले की दुरुस्त जानकारी रखनेवाले, पायनियर, डेकन क्रॉनिकल, हिन्दुस्तान टाइम्स आदि में अनेक वर्षों तक जनपक्षधर, हस्तक्षेपकारी पत्रकारिता करनेवाले पत्रकार सईद खान को विगत 13 मार्च को गुज़रे हुए एक साल पूरा हुआ। सईद की स्मृति को ज़िंदा रखने, यादों को ताज़ा रखने, खुशी-खुशी याद करने के लिए 19 मार्च 2017 को इन्दौर के प्रेस क्लब में ‘सईद की याद…सईद के सरोकार..: हमसईद’ कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य कोरी श्रद्धान्जलि के स्थान पर सईद को ऐसे याद करना था कि उन सरोकारों को अपने भीतर फिर से जीवित महसूस करना जिन्होंने सईद को ईमानदार, विश्वसनीय एवं सबका चहेता बनाया। दुखद है कि आम लोगों के जीवन को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले सईद का 46-47 वर्ष की आयु में पिछले वर्ष कैंसर से जूझते हुए असमय निधन हुआ। जब सईद लिवर कैंसर से जीवन की लड़ाई लड़ रहे थे तब उनके चाहने वालों और दोस्तों ने ‘हमसईद’ सहायता समूह बनाया था।

डॉ आंबेडकर की राजनीति, राजनैतिक पार्टी एवं सत्ता की अवधारणा

साथियो!

जैसा कि आप अवगत हैं कि वर्तमान दलित राजनीति एक बहुत बड़े संकट में से गुज़र रही है. हम लोगों ने देखा है कि पहले बाबासाहेब द्वारा स्थापित रेडिकल रिपब्लिकन पार्टी कैसे व्यक्तिवाद, सिद्धांतहीनता और अवसरवाद का शिकार हो कर बिखर चुकी है. इसके बाद बहुजन के नाम पर शुरू हुयी दलित राजनीति कैसे सर्वजन के गर्त में समा गयी है.  इस समय दलितों के सामने एक राजनीतिक शून्यता की स्थिति पैदा हो गयी है. मेरे विचार में इस संकट के समय में सबसे पहले हमें डॉ. आंबेडकर के राजनीति, राजनेता, राजनैतिक सत्ता और राजनीतिक पार्टी के सम्बन्ध में विचारों का पुनर अध्ययन करना चाहिए और उसे वर्तमान परिपेक्ष्य में समझ कर एक नए रेडिकल विकल्प का निर्माण करना चाहिए. इसी ध्येय से इस लेख में डॉ. आंबेडकर के राजनैतिक पार्टी, राजनेता और सत्ता की अवधारणा के बारे में विचारों को संकलित कर प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि इन माप-दंडों पर वर्तमान दलित राजनीति और राजनेताओं का आंकलन करके एक नया विकल्प खड़ा किया जा सके. 

क्रांति अभी कोसों दूर है

(अनुवादकीय नोट : यद्यपि मीरा नंदा ने यह लेख 2007 में मायावती के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के समय तहलका मैगज़ीन में अंग्रेजी में लिखा था परन्तु इसमें उसने मायावती की सर्वजन की राजनीति से उपजे जिन खतरों और कमजोरियों को डॉ. आंबेडकर के माध्यम से इंगित किया था, आज वे सभी सही साबित हुयी हैं. मायावती हिंदुत्व को रोकने में सफल होने की बजाये स्वयम उसमें समा गयी है. मीरा नंदा की अम्बेडकरवाद की समझ बहुत गहरी और व्यापक है.- एस.आर. दारापुरी)

मायावती के चुनाव अभियान में भीम राव आंबेडकर का नाम बार बार आता है . परन्तु क्या संविधान निर्माता उसकी राजनीति की तारीफ करते? मीरा नंदा ने चुनाव उपरांत इन दोनों के बीच वार्तालाप की कल्पना की है.

गाय से प्रेम, हूरों के सपने और सुसाइड बॉम्बर

Tabish Siddiqui : कामसूत्र भारत में लगभग 300 BC में लिखी गयी.. उस समय ये किताब लिखी गयी थी प्रेम और कामवासना को समझने के लिए.. कामसूत्र में सिर्फ बीस प्रतिशत ही भाव भंगिमा कि बातें हैं बाक़ी अस्सी प्रतिशत शुद्ध प्रेम है.. प्रेम के स्वरुप का वर्णन है.. वात्सायन जानते थे कि बिना काम और प्रेम को समझे आत्मिक उंचाईयों को समझा ही नहीं जा सकता है कभी.. ये आज भी दुनिया में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली किताबों में से एक है

डॉ. राम मनोहर लोहिया, शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को याद किया

फाइट फॉर राइट ने मनाए शहादत दिवस व लोहिया जयंती

नोएडा। देश को चलाने वाले आजादी की कीमत को भूल गए हैं। देश को आजाद कराने में सब कुछ न्यौछावर करने वाले क्रांतिकारियों के परिजन फटे हाल में में हैं और देश से गद्दारी करने वाले लोकतंत्र की मलाई चाट रहे हैं। यह फाइट फॉर राइट के राष्ट्रीय अध्यक्ष चरण सिंह राजपूत ने सेक्टर 12 स्थित शिमला पार्क में आयोजित शहादत दिवस व लोहिया जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में कही। उन्होंने कहा कि आज जिस तरह से किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। मजदूर का जमकर शोषण हो रहा है। गरीब की कोई सुनने वाला नहीं है। मीडिया पूंजपीतियों की रखैल बनकर रह गया है। उससे तो यह ही लग रहा है कि देश आज भी गुलाम है। स्वाभिमानी खुद्दार व निर्भीक आदमी का आज भी दमन हो रहा है।