खबरों से ‘खेलते’ आज के खबरची

[caption id="attachment_2129" align="alignleft"]अमरेंन्द्र किशोरअमरेंन्द्र किशोर[/caption]एक टेलीविजन पत्रकार ने दरियागंज, दिल्ली के सर्वोदय कन्या विद्यालय की एक शिक्षिका उमा खुराना के खिलाफ वे तमाम सबूत जुटाये थे जिसमें वह साबित करने में सफल रहा कि वह अपनी छात्राओं को बहला फुसलाकर उनके अश्लील एमएमएस बना लेती थी। बाद में वह छात्राओं को वेश्यावृत्ति में शामिल होने को बाध्य करती थी। इस खुलासे से भड़की हिंसा को शांत करना दिल्ली पुलिस के लिए बेहद मुश्किल साबित हुआ। बाद में उस शातिर खबरची की कारगुजारी सामने आयी। पूरा स्टिंग ऑपरेशन उस पत्रकार के खुराफाती दिमाग की उपज थी, जो खबरों से खेलने का शौकीन रहा है। इस सच को आज पूरी दुनिया जानती है।

बच्चों को न बचाने का दंड सभ्यता को भुगतना होगा

विभिन्न हिस्सों में मासूमों को जानवरों से भी कम कीमत पर खरीदा-बेचा जाता है। बच्चों को एक चीज बना दिया गया [caption id="attachment_2156" align="alignright"]बच्चे मजदूरबच्चे मजदूर[/caption]है। बचपन बचाओ आंदोलन ने पिछले दो वर्षों में ट्रैफिकिंग कर लाए गए करीब पौने दो हजार बच्चों को अलग-अलग उद्योगों की मजदूरी से मुक्त कराया। ये वे बच्चे हैं जो भाग्यशाली हैं, जिन्हें मुक्त करा लिया गया। लेकिन लाखों बच्चों दुनिया भर में विभिन्न तरह के उद्योगों में शोषण के शिकार हैं।

माया नगरी का राक्षस- पायरेसी का धंधा

[caption id="attachment_2161" align="alignleft"]ब्रजेश निगमब्रजेश निगम[/caption]मायानगरी  यानी  मुंबई  जहाँ  बसा  है  बॉलीवुड  जो  आम  लोगों के  मनोरंजन  के लिए रात-दिन काम करता रहता है। पर  कुछ  वक्त  से  मायानगरी  को  पायरेसी   नामक  “‘नाग”  डस  रहा  था,  जिसने  अब  अजगर  का  रूप  ले  लिया है  और  मायानगरी  को  निगलता  जा  रहा  है। यह पायरेसी का धंधा न सिर्फ बड़े-बड़े शहरों में होता है बल्कि छोटे शहरों में भी इसका जाल फैल गया है। ये जाल ऐसा नहीं कि इसकी जानकारी लोकल पुलिस प्रशासन को नहीं होती। जी हां,  ये धंधा पुलिसिया संरक्षण में चलता है और पायरेसी माफिया प्रशासन की मदद से खुद तो करोड़पति बन जाते हैं मगर देश को कितना चूना लगाते हैं, ये उनको भी शायद अंदाजा नहीं।

‘समर 2007’ : कराहते विदर्भ की पीर रुपहले पर्दे पर

शिरीष खरेएक तरफ बिजली से रोशन शहर का भारत है, दूसरी तरफ खेती के खस्ताहाल से ढंका देहाती भारत. एक भारत को दूसरे भारत के बारे में कम ही पता है. फिल्म ‘समर 2007’ शहर और देहात के बीच की इसी खाई को भरने का काम करती है. यह पांच डाक्टरों को विदर्भ में किसानों की समस्याओं से जोड़ती है. इन दिनों बालीबुड से गांव गायब हो गए हैं. ऐसे में एक फिल्म देश के मौजूदा संकट को मुख्यधारा के करीब लाती है. लेकिन अब तक किसानों को सरकार की ठोस पहल का इंतजार है और फिल्म को दर्शकों के जरिए प्रचार का. यह फिल्म पूरे देश में नहीं दिखायी जा सकी है और बाहर भी कुल 338 शोज ही हुए.

नेताजी! वोटर सब देख रहा है, कितना पागल बनायेंगे आप

[caption id="attachment_2185" align="alignleft"]सुरेन्द्र अग्निहोत्रीसुरेन्द्र अग्निहोत्री[/caption]लोकसभा चुनाव के शंखनाद के साथ उत्तर प्रदेश में सियासी कुरूक्षेत्र के लिए सेना सज गयी है। सेनाओं के सेनापतियों द्वारा पाला बदलने के बाद राजनैतिक समीकरण बीते विधानसभा चुनावी संग्राम के सियासी गणित से उलट गये है। कल तक मुलायम सिंह यादव पानी-पी-पी कर मैडम सोनिया गांधी को कोसते नहीं थकते थे। आज वे ही सोनिया गांधी की शरण में पहुंच चुके हैं। सोनिया गांधी के रथ के आगे से कंकड़ पत्थर अलग करने को आतुर मायावती आज दो-दो हाथ आजमाने को तैयार हैं। मुस्लिम और ब्राह्मण एक बार फिर संग्राम के सबसे बड़े वोटों के मददगार बनकर उभरे हैं जिन्हें लपकने के लिए राजनैतिक दल अनेक प्रकार के लालीपाल देकर उन्हें अपने खेमे में करने की पुरजोर कोशिश में लग गये हैं। ब्राह्मण समीकरण के बल पर 16 वर्ष बाद उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनीं बसपा सुप्रीमो मायावती इसी गणित के आधार पर देशव्यापी ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही हैं तो मुलायम सिंह भी पीछे नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के ऊपर होने वाले अत्याचारों को मुद्दा बनाकर माया को मात देने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या मैं कहीं किसी कोने से पत्रकार रह गया हूं !

मैं और वेश्या

थोड़ा सा भ्रमित हूं। आज से नहीं बल्कि उसी दिन से जब से अखबार की नौकरी शुरू की। अब इससे पहले की पूरी तरह[caption id="attachment_2167" align="alignright"]नीलेश कुमारनीलेश कुमार[/caption] भ्रमित हो जाऊं, सोचा अपने खयालों को सबके साथ बांट लूं। भ्रम मेरे पत्रकार होने को लेकर है। दरअसल, मुझे जानने वाले सभी लोग मुझे पत्रकार ही मानते हैं। एक बड़े अखबार में काम करता हूं और मेरे पदनाम के साथ संपादक जैसा विशेषण लगता है, शायद इसलिए। लेकिन जिसे ठीक कहा जा सकता है, वह बस इतना ही है। इसके आगे-पीछे, अगल-बगल, ऊपर-नीचे जो कुछ भी है, वह सब गड्मड् हो चुका है। कैसे, अभी बता देता हूं।

करियर बनाने के नाम पर खुल रही हैं जिस्मफरोशी की दुकानें!

[caption id="attachment_2162" align="alignleft"]इरशाद अलीइरशाद अली[/caption]नेशनल ज्योग्राफिक चैनल पर एक कार्यक्रम देख रहा था- ‘द लार्ज प्लेन क्रैश’। इसमें दिखा रहे थे कि एवीयेशन कैरियर कितना जोखिम भरा है किसी पायलट के उपर प्लेन उड़ाते हुए कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है। एक जरा सी चूक बड़े हादसे का कारण बन सकती है। यहां केवल उन्हीं लोगों को रखा जाता है जो इसके लिये डिजर्व करते हैं, और इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने का साहस, समझदारी, योग्यता रखते हैं। इस इण्डस्ट्री के लिये योग्य पात्रों का चयन कई फिल्टर प्रक्रियाओं के बाद ही हो पाता है। कुल मिलाकर यह एक शानदार प्रक्रिया है जो जरूरी भी है।

भोले-शंकर : बिहार के बाद मुंबई की बारी

[caption id="attachment_2116" align="alignleft"]भोलेभोले[/caption]बिहार में शानदार कामयाबी के बाद पत्रकार से फिल्म निर्देशक बने पंकज शुक्ल की फिल्म भोले शंकर अब 20 फरवरी को मुंबई में रिलीज़ होने जा रही है। सुपर स्टार मिथुन चक्रवर्ती की ये पहली भोजपुरी फिल्म बिहार, नेपाल और दूसरे भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में पहले ही कामयाबी के सौ दिन पूरे कर चुकी है। मुंबई में ये फिल्म दस सिनेमाघरों में एक साथ रिलीज़ होने जा रही है और इसकी एडवांस बुकिंग को लेकर दर्शकों की उत्सुकता को देखते हुए लग रहा है कि ये फिल्म मुंबई में भी कामयाबी का इतिहास दोहराएगी।

दम तोड़ती गांवों-छोटे शहरों की पत्रकारिता

[caption id="attachment_2144" align="alignleft"]शिव दासशिव दास[/caption]आप हर रोज अपने बेडरूम में खिड़कियों और दरवाजों के झरोखों से आती सूरज की किरणों के बीच आंखें खोलते हैं, तो पहले आपको दरवाजे पर पड़े 12 से 42 पेज के अखबारों की याद आती है। हल्की कंपकपी के बीच आप झट से अपने बिस्तर को छोड़ अखबार को उठाकर बड़े शहरों से लेकर गांवों-मुहल्लों तक की खबरों को जानने की कोशिश करते हैं। आप ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं कि हमारे आस-पास में क्या घटा है और हमारे लिए क्या फायदेमंद है।

पत्रकारिता

पत्रकारिता

सेवा है, संस्कार है, समाधि है,

वतन की महकती,

सोंधी सी माटी है,

मुन्ने के दूध की कटोरी है,

नानी की लोरी है,

सांझ में नुक्कड़ पर,

तैरती हँसी है, ठिठोली है।

अखबारों में पांच किमी बाद की खबर नहीं मिलती

अखबार सुबह हाथ में आता है और हमें पता चलता है कि मेरे पड़ोस में क्या हुआ लेकिन सिर्फ पांच किलोमीटर के [caption id="attachment_2171" align="alignright"]न्यूज पेपरन्यूज पेपर[/caption]दायरे में। इसके बाद की खबर का तो अखबार में पता ही नहीं होता है कि वहां क्या हुआ होगा। मै देहरादून मे रहता हूं और मूल रूप से पहाड़ का रहने वाला हूं। इसलिए मै पहाड़ के बारे में जानने की अधिक इच्छा रखता हूं लेकिन इस इच्छा को हमेशा मन में ही मारना पड़ता है। जी हां, यह सच है मेरे जैसा हाल यहां रहने वाले हर उस पहाड़ी नागरिक का है जो अपने परिवार से दूर यहां नौकरी करने आया है। यह सब हो रहा है अखबारों की पन्ना बदलाऊ संस्कृति के चलते।

व्यक्तित्व : इनसाइड स्टोरी के संपादक सुभाष सिंह

[caption id="attachment_2165" align="alignleft"]सुभाष सिंहसुभाष सिंह[/caption]पटना विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद मैं 2003 में दिल्ली आया। पिताजी चाहते थे कि मैं सिविल सेवा में जाऊं। मेरी इच्छा थी कि मैं वकालत करूं या पत्रकार बनूं। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में लॉ के लिए प्रवेश परीक्षा दी परंतु एक नंबर से पीछे रह गया। हालांकि इसी वर्ष भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढाई के लिए प्रवेश परीक्षा पास करने में सफल हो गया। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान ही ‘देवभूमि संवाद’ ज्वाइन किया। वहां छ: महीने इंटर्नशिप पर काम करता रहा।

फिजा के घर के बाहर खड़ी मीडिया की मजबूरी

[caption id="attachment_2172" align="alignleft"]आदित्य चौधरीआदित्य चौधरी[/caption]पिछले 14 दिनों से न्यूज चैनलों ने सबसे ज्यादा किस खबर को तवज्जो दी है? बता पाएंगे?  चलिए बता देते हैं. पाकिस्तान, तालिबान और फिजा-चांद की कहानी. जी हां. देश-दुनिया की दूसरी खबरों के साथ फिजा और चांद की कहानी सारे न्यूज चैनलों पर छाई रही. शायद ही ऐसा कोई चैनल होगा जिसने इस खबर पर लगभग हर रोजा आधा या एक घंटा अपने प्राइम टाइम पर न दिया हो. ये अलग बात है कि न ये इतनी बड़ी खबर थी  और न ही इसको इतना टाइम देने का कोई तुक समझ में आता है. सबसे बड़ी बात ये है कि चांद ने तो भले ही मीडिया से रूबरू होकर कम बात की हो लेकिन फिजा हर रोज मीडिया से रूबरू थी। वे मीडिया को रिपोर्टिंग के तरीके के  बता रही थीं।

लोकतंत्र को गर्त में ले जाएगा ‘स्टार युद्ध’

भारतीय राजनैतिक आंगन में देश की सबसे बड़ी पंचायत है लोकसभा। लोकसभा में 80 सदस्य भेजता है उत्तर प्रदेश। [caption id="attachment_2195" align="alignright"]समाजवादी पार्टीसमाजवादी पार्टी[/caption]कभी केंद्रीय सत्ता में केंद्रीय दखल रखने वाला उत्तर प्रदेश इन दिनों हाशिए पर पहुंच चुका है। यूपी के वाशिंदे सत्ता आतंक से भयभीत होकर सच सामने लाने से डरने लगे हैं। यह सब देख के लगने लगा है कि क्या देश में लोकतंत्र के दिन गिने-चुने रह गए हैं? स्थिति यहां तक पहुंचाने के लिए दोषी कौन है? इसके लिए मैं कहीं न कहीं बड़े दलों के कमजोर होने और छोटे-छोटे दलों के पैदा होने को जिम्मेदार मानता हूं। आइए थोड़ा अतीत में झांकें। राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पहचानी जाने वाली कांग्रेस उत्तर प्रदेश के राजनैतिक धरातल से रातोंरात गायब हो गई।

मंदी और मीडिया : कब तक तोड़े जाएंगे सपने?

साल 2008 की दूसरी तिमाही से चली विश्व आर्थिक मंदी का दौर थमने का नाम नही ले रहा है. मंदी की सुरसा अभी [caption id="attachment_2174" align="alignright"]मंदीमंदी[/caption]कितनो घरों के चूल्हों की आग ठंडी कर देगी, यह कोई नहीं जानता। देश और दुनिया के बड़े बड़े कोरपोरेट हाउस को अपनी साख बचाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने को मजबूर होना पड़ रहा है. अगर हम मंदी के कारण प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात करें तो हालात बद से बदतर हो चुकें हैं.  बीते कुछ सालों में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में समाचार पत्रों और चैनलों की बाढ़ सी आ गई है. मंदी से पहले पैसे और रुतबे की चाहत ने कई ऐसे गैर-पेशेवर जाने-माने लोगों ने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया उद्योग में दस्तक दी व न्यूज चैनलों को खड़ा कर दिया.

कमजोर इच्छाशक्ति वाले चंद्रमोहन

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हरियाणा के पूर्व डिप्टी सीएम को चन्द्रमोहन कहें या चांद मौहम्मद। उनकी लगभग पूर्व [caption id="attachment_2107" align="alignright"]सलीम अख्तर सिद्दीकीसलीम अख्तर सिद्दीकी[/caption]पत्नि हो चुकीं अनुराधा को भी अनुराधा या फिजा कहने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। इन दोनों के साथ वही कहावत चरितार्थ हो गयी है कि ‘धोबी का कुत्ता घर का रहा न घाट का’। चन्द्रमोहन हरियाणा के डिप्टी सीएम थे। उन्हें हरियाणा के बाहर कम लोग ही जानते होंगे। प्रेम प्रकरण ने उन्हें अंतररष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कर दिया, इस कहवात की तरह- ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’। दो महीने बाद ही चन्द्रमोहन के प्रेम का खुमार भी उतर गया और यह कहने वाले कि उन्हें बचपन से इस्लाम आकृषित करता रहा है, इस्लाम से प्रेम की कलई भी खुल गयी।

डा. शरद जोशी लिखित ‘एक था गधा’

[caption id="attachment_2117" align="alignleft"]फोटोफोटो[/caption]PRESENTATION: A HINDI COMEDY PLAY “Ek Tha Gadha”, WRITTEN BY:  Dr. SHARAD JOSHI, DIRECTED BY:  YASIN KHAN, DATE: 13TH FEB.2009, Time: 7:00 PM, ORGANIZED BY:  INDU ART THEATRE AND FILM SOCIETY, VENUE:  L.T.G. AUDITORIUM, COPERNICUS MARG, MANDI HOUSE, LEADING ARTISTS: AHMED, RAJA CHOUDHARY, RITAMBHARA MITTAL, RAJ, SHAFIQ, VINOD SINGH, BHAJAN PRAKSH AND OTHERS, Tickets: Rs.100, 200 & 300 only.

चौथा पाया भी पंगु हो जाएगा?

[caption id="attachment_2144" align="alignleft"]शिव दासशिव दास[/caption]क्रांति के दीवानों ने जिस कलम की धार से अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत पैदा करके देश को आजाद कराया था, वही कलम आज कारपोरेट घरानों के लिए मोटी कमाई का जरिया बन गई है। दबे-कुचलों और शोषितों की आवाज को जन-जन तक पहुंचाने के लक्ष्य को लेकर शुरू हुई मिशन पत्रकारिता वर्तमान परिवेश में माफियाओं, नेताओं, अपराधियों और फिल्मी सितारों की पब्लिसिटी का जरिया बन कर पीत पत्रकारिता में तब्दील हो गई है।

फिजा-चांद की कहानी और मीडिया

[caption id="attachment_2172" align="alignleft"]आदित्य चौधरीआदित्य चौधरी[/caption]पिछले कई दिन से मसालेदार फिल्मी ड्रामे के लिए तरस रहे मीडिया के लिए सोमवार का दिन “राहत ” लेकर आया. पूर्व में न्यूज चैनेल्स  के लिए सबसे बड़ी खबर बन चुकी चांद और फिजा की जोड़ी एक बार फिर से नया ड्रामा लेकर मीडिया के सामने थी. एक न्यूज चैनल पर खबर आते ही चंडीगढ़ में हड़कंप मच गया।

72% लोगों की राय मानिए

                            आतंकवादी घटनाओं के दौरान लाईव प्रसारण कितना सही –                                                        कितना गलत?                          (मीडिया मंत्र और मीडिया खबर.कॉम का संयुक्त सर्वे) मुंबई में हुई आतंकवादी घटनाओं ने देश को स्तब्ध कर दिया। इस घटना के बाद देश की सुरक्षा व्यवस्था और उससे जुड़ी एजेंसियों पर भी सवालिया निशान खड़े किए गए। इन सबके बीच मीडिया …

‘हमें नाम नहीं चाहिए, बस अपमानित न करो’

[caption id="attachment_2177" align="alignleft"]आवेश तिवारीआवेश तिवारी[/caption]आपने संजय यादव का नाम नहीं सुना होगा। उनकी लिखी खबरें अक्सर सुर्खियाँ बनती रही हैं। आप उनका नाम कभी सुन भी नहीं पाएंगे! संजय की कहानी उन जैसे उन हजारों नवयुवकों की कहानी है जिन्हें न सिर्फ बिग बिजनेस कर रहे मीडिया हाउस बल्कि खुद को मीडिया का प्रतीक मानने वाला तथाकथित पत्रकारों का एक वर्ग न सिर्फ लगातार इस्तेमाल करता है बल्कि उनकी अंगुलियों का एक एक बूंद खून चूस कर उनकी संवेदनशीलता का निरंतर रेप कर रहा है। अखबारों को इनका नाम छापने से गुरेज तो है ही, वे इन्हें अपना हिस्सा भी नहीं मानते।

यह कैसा भारत ‘उदय’ और ‘निर्माण’!

[caption id="attachment_2144" align="alignleft"]शिव दासशिव दास[/caption]लोकसभा चुनाव नजदीक देख कांग्रेस की अगुवाई वाली सत्ताधारी यूपीए की चुनावी बयार इन दिनों विभिन्न विभागों की उपलब्धियों के रूप में टीवी चैनलों, रेडियो एवं पत्रिकाओं में बह रही है। विगत साढ़े चार वर्षों में नौकरशाहों द्वारा तैयार किए गए कागज के पुलिंदों के जरिए ‘भारत निर्माण’ का पाठ लोगों को पढ़ाया जा रहा है। सरकारी टीवी चैनलों और रेडियो पर ‘भारत निर्माण’ के सपने को यूपीए सरकार उसी तरह दिखा रही है जिस तरह पिछले लोस चुनाव में एनडीए ने ‘भारत उदय’ अथवा ‘इंडिया साइनिंग’ का दिखाया था। ‘भारत उदय’  का हश्र क्या हुआ, ये सबको पता है।

दो नम्बर के बही-खाते

[caption id="attachment_2145" align="alignleft"]गोपाल अग्रवालगोपाल अग्रवाल[/caption]मेरठ कभी फाइनेंस कम्पनियों का हब बन गया था। रोज नई खुलने वाली फाइनेंस कंपनियां अपनी तड़क-भड़क दिखाकर जनता के धन को अपने यहां जमा कराने के लिए आकर्षित करती थीं जो कारोबार में लगाये जाने के बजाय कम्पनी स्वामियों की निजी वैभव में खर्च कर लिया जाता था। फलस्वरूप जल्दी ही अधिकांश कम्पनियां डूब गईं। शेयर मार्केट में भी धन लगाने वाले व्यक्ति बिना पुरुषार्थ किए,  आंकलन व अपेक्षाओ के सहारे धन निवेश कर अधिक लाभ प्राप्त करना चाहता है।

रियलिटी शो या टीवी का इमोशनल अत्याचार

[caption id="attachment_2180" align="alignleft"]विशाल शुक्लविशाल शुक्ल[/caption]अगर आप मुंबई महाराष्ट्र की वैशाली को बनाना चाहते हैं संगीत के विश्वयुद्ध का विजेता, तो उन्हें वोट देने के लिए टाइप करें…कोलकाता वेस्ट बंगाल की तोरषा सरकार को इंडियन आइडल बनाने के लिए वोट दें, टाइप करें…और ऐसे ही न जाने कितनी वोट अपील. अब तो आप लोग समझ ही गये होंगे, बात हो रही है आजकल टीवी पर चल रहे रियलिटी शोज की. इनमें डांस और गानों के शो की भरमार है.

बराक ओबामा कहां के राष्ट्रपति हैं !

[caption id="attachment_2108" align="alignleft"]विजय प्रतापविजय प्रताप[/caption]बराक ओबामा कहां के राष्ट्रपति हैं, यह पूछा जाए तो थोड़ा अजीब जरुर लगेगा। लेकिन पिछले कुछ दिनों से संशय की स्थिति बनी हुई थी। पहले तो पता था कि वह अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए हैं, लेकिन 20 जनवरी को जब वह राष्ट्रपति पद की शपथ ले रहे थे, तो भारत में मीडिया के व्यवहार को देख यह संशय की स्थिति वाजिब ही थी। लगा कि ओबामा भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ ले रहे हैं या शायद भारत कुछ समय के लिए अमेरिका बन गया है।

टीवी को सब कुछ का लाइसेंस तो नहीं

[caption id="attachment_2181" align="alignleft"]संतोष भारतीयसंतोष भारतीय[/caption]सरकार ने टेलीविजन चैनलों पर शिकंजा कसने के लिए एक नया कानून बनाने या पुराने केबल कानून मे संशोधन करने की तैयारी शुरू की। जैसे ही यह खबर बाहर आई, समाचार चैनलों के हाथ-पांव फूल गए और उनमें आपस में बैठकों का दौर शुरू हो गया। सवाल उठता है कि न्यूज चैनल के लोग घबराए क्यों ? दरअसल यह घबराहट न्यूज चैनलों के बीच बढ़ती जा रही साख की कमी की वजह से पैदा हुई। समाचार चैनलों मे अपवादों को छोड़ दें, तो अधिकतर मे समाचार कम होते जा रहे हैं।

पाक का वजूद खत्म होना भारत के लिए खतरा

[caption id="attachment_2107" align="alignleft"]सलीम अख्तर सिद्दीकीसलीम अख्तर सिद्दीकी[/caption]यह कबूल करने के बाद कि 26/11 की साजिश पाकिस्तान की सरजमीं पर रची गयी थी, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने यह माना कि पाकिस्तान को तालिबान से खतरा है और पाकिस्तान अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। अमेरिका और पाकिस्तान ने 1979 में रुस के कब्जे के बाद रुसी फौजों से लड़ने के लिए तालिबान का जो भस्मासुर पाला-पोसा था, वह भस्मासुर पाकिस्तान के वजूद के लिए ही खतरा बन गया है।