: हिंदी पत्रकारिता का यह कैसा चेहरा है : हिन्दी पत्रकारिता के चरित्र पर अनेक बातें होती रहती हैं. बिकाऊपन हो या नंगई हो. इन सब पर लिखा जाता रहा है, लेकिन अभी बिलासपुर में एक अखबार के असंवेदशील व्यवहार पर खासी चर्चा हो रही है. दो दिन पहले बिलासपुर प्रेस क्लब के सचिव और दैनिक भास्कर, बिलासपुर में कार्यरत पत्रकार सुशील पाठक की गोली मार कर हत्या कर दी गई.
सभी अखबारों में यह खबर प्रमुखता के साथ छपी, मगर रायपुर से प्रकाशित ”पत्रिका” में समाचार कुछ इस तरह छपा- ”बिलासपुर में एक युवक की हत्या”, पूरे समाचार में कहीं भी यह नहीं लिखा गया कि पाठक पत्रकार था. अंत में एक पंक्ति है- ”बताया जाता है कि युवक प्रेस क्लब का सचिव था.” ‘यहाँ ”बताया जाता है” पर ध्यान देने की ज़रुरत है. ‘पत्रिका” में खबर बनाने वाले को यह भी पता नहीं था कि पाठक प्रेस क्लब के सचिव थे, इसलिये वह लिखता है- ”बताया जाता है”. बताया जाता है शब्द का इस्तेमाल तो वहां किया जाता है, जहाँ रिपोर्टर को किसी व्यक्ति विशेष के बारे में ठीक-ठाक न पता हो कि वह क्या है.
पत्रिका और भास्कर के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा है, यह सब देख ही रहे हैं. मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम अपनी संवेदना को भी बेच खाएं? जीते-जी किसी से बैर पलना है, पाल लीजिये, मगर जो मर गया, उससे कैसा बैर. फिर झगड़े मालिकों के होते हैं. पत्रकारों को आपस में एक रहना चाहिये, लेकिन पत्रकार भी मालिक के दलाल के रूप में कार्य करने लगता है. वैसे यह दृश्य केवल छत्तीसगढ़ का नहीं है. कमोबेश हर तरफ यही नजारा है. हिन्दी पत्रकारिता का यह चरित्र-सा बन गया है. आपस में लोग एक-दूसरे अखबार से ही द्वेष नहीं पालते, आपस मे भी एक-दूसरे से घृणा करते हैं.
इसकी ताज़ा मिसाल है बिलासपुर के पत्रकार सुशील पाठक की हत्या की खबर. एक पत्रकार कि हत्या को एक युवक की हत्या के रूप में ट्विस्ट करके छापने से पत्रिका की सामाजिक छवि पर ही उल्टा असर हुआ है. मीडिया जगत में एक अखबार के असंवेदनशील व्यवहार की खासी चर्चा है. किसी ने इस हरकत की सराहना नहीं की है.
लेखक गिरीश पंकज छत्तीगढ़ के रायपुर से प्रकाशित सद्भावना दर्पण के संपादक हैं.












Ghanshyam Maurya
December 22, 2010 at 11:44 am
yah darasal ek tar ka vargeey pakshapaat hai. sabhi apne apne vargon ya samuhon ke hit ko maanavata se oopar rakhte hain.
mohammad zakir hussain
December 22, 2010 at 2:57 pm
comptetion kisi akhbaar ke sath to samajh aata hai lekin yahan pratidwandi akhbaar ke employee ko “bataya jata hai ki” likhna nihayat hi sharmnaak hai.kya is khabar ko likhne wale aur likhwane wale sajjan “amaratva” lekar aayein hain…?
raja jani
December 22, 2010 at 4:18 pm
partisparda to rakhe bt virodhabhas nahi hona chahiye….patrkaro ko aapas m samman ki bhawana honi chahiye……….
hariom dwivedi
December 23, 2010 at 4:29 am
पत्रकारों को आपस में एक रहना चाहिये, लेकिन पत्रकार भी मालिक के दलाल के रूप में कार्य करने लगता है. sochneey vishay hai…
gaurav gupta
December 24, 2010 at 3:54 pm
agar patrkar malik ke kahane per nhi chalega to pese kha se kamayega yha per mujhe lagta hai patrkaro ka dos nhi h dos h to un maliko ka hai koi bhi patr kar ni jalta sab kerna maliko ka hota hai ……..jiske karn patrkar dosi ho jate hai…
deepakdevmishra photojournalist...
December 26, 2010 at 5:16 pm
ye bahut hi dukh ki baat hai ki jab bhai hi bhai ka dusman ban jaye to isse jada dukh kuch ho hi nahi sakata hai … kripya ham sab ek ho tabhi ham aage jaa skate hai…
ramesh chand
December 28, 2010 at 6:34 am
aise khabar sun mujhe bhartiye patrakarita se aur apne bhartiye hone per sarm aati hai wahi is maltisamaj jo sunre bharat ke sapne dekhta hai iske mho per thokne ka man karta hai ye bhagawan mujhe kisi khote ka dalal bana diya hoota to acha tha patrakar bankar sayad mene koi deshdroh jaisa jaganye apraad kar diya har bhartiye media