”अपनी जान लेने के लिए मैं और सिर्फ मैं जिम्मेदार हूं। इसके लिए कोई और किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है। दूर-दूर तक नहीं। कतई नहीं। मैं यह इसलिए कर रहा हूं कि इंसानी जिंदगी को लेकर मैं पूरी तरह हिकारत से भर गया हूं और इसकी अब्सर्डिटी को, जिससे बच पाना किसी भी तरह मुमकिन नहीं है। अब और बर्दाश्त करना मेरे बस का नहीं है। काश! मैं खुद को इससे आजाद हुआ देख पाता, अपनी मौत का जश्न मना पाता।
जहां तक मेरी याददाश्त काम कर पा रही है, अपनी जिंदगी में मैं ऐसे किसी को नहीं जानता जिनके लिए मेरे मन में कभी भी कोई बुरा खयाल घर किया हो। फिर भी मेरी वजह से अगर किसी का कभी किसी किस्म का नुकसान हो पाया है, तो उसके लिए मैं उनसे माफी मांग रहा हूं और मैं जा रहा हूं। आभार के एक बेहद गहरे अहसास के साथ, उन सभी के लिए, जिन्होंने मुझे सहारा दिया, मेरी मदद की।”
ये पंक्तियां उस स्यूसाइड नोट की हैं जो अभय सिन्हा ने गत तीस जुलाई को मौत का फंदा गले में डालने से पूर्व लिखा और जिनकी मौत पर सिर्फ एक हिन्दी अखबार ने समाचार प्रकाशित किया कि नोएडा के अमुक मकान में एक व्यक्ति ने जिंदगी से निराश होकर आत्महत्या कर ली, जिसकी पहचान बाद में पत्रकार अभय सिन्हा के रूप में हुई। यह समाचार आत्महत्या कर लेने वाले एक व्यक्ति के बारे में था, अभय सिन्हा के बारे में नहीं। अभय सिन्हा की सूचना तो मुझे मेरे और अभय के उभय मित्र भोला शंकर शर्मा ने दी थी। मैं लखनऊ में था।
मेरे आगे अतीत के वे दिन उमड़-घुमड़ रहे थे जिनमें मैं और अभय एक-दूसरे की जिंदगी की बहुत-सी अच्छी-बुरी घटनाओं के साक्षी रहे थे। अभय जेएनयू के छात्र रहे थे और मैंने जेएनयू के प्रथम दर्शन अभय के सौजन्य से ही किये थे। वह उम्र में मुझसे छोटे थे लेकिन समझ और जानकारी की दृष्टि से मुझसे बहुत आगे। जब मैंने पूरी तरह दिल्ली आकर रहने का निर्णय लिया था। तब अभय का घर ही मेरी शरणगाह बना था। अभय चाहे पूर्वी दिल्ली में रहे हों या दक्षिणी दिल्ली में उनका आवास प्राय: बाहर से काम की तलाश में आये लड़कों का आश्रयस्थल बना रहता था।
मुझे आश्चर्य होता था कि यह व्यक्ति अपना समय, श्रम और धन इतनी उदारता से दूसरों के लिए कैसे खर्च कर पाता है। मेरे संस्थान में बहुत कम ऐसे लोग हैं जिन्होंने संघषर्रत व्यक्तियों की इतनी मदद की हो जितनी कि अभय ने की। अभय का हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं पर समान अधिकार था लेकिन आजीविका के लिए उन्होंने अंग्रेजी पत्रकारिता को ही चुना था। कई अंग्रेजी अखबारों पत्रिकाओं में कार्य करने के बाद वह अंतत: गैर सरकारी संगठनों के लिए कार्य करने लगे थे और उनसे मिलने वाले पारिश्रमिक से ही अपना काम चलाते थे।
लंबे समय से वह अकेले ही रह रहे थे। बहुत पहले उन्होंने जो विवाह किया था वह विफल हो गया था। उस वैवाहिक विफलता की अभय की पीड़ा को मैंने बहुत करीब से देखा और महसूस किया था। उस दौर में अभय की टूटन हम सब मित्रों के लिए दुखदायी रही थी। अभय ने फिर कभी किसी लड़की को अपनी जिंदगी में नहीं आने दिया। लेकिन उनके भीतर का अति उदार व्यक्ति कभी शिथिल नहीं हुआ। उनका बौद्धिक कर्म भी कभी शिथिल नहीं हुआ। आलेख के साथ कविताएं भी लिखते थे। उनकी कई कविताएं हंस में प्रकाशित भी हुई। निजी अनुभवों और अध्ययन के आधार पर उन्होंने जनम-जनम के बंदी नाम से एक किताब भी लिखी थी जिसमें गीता से लेकर गांधी तक के मिथकों का तार्किक खंडन किया था लेकिन इस किताब को वह प्रकाशक के पास नहीं ले गये।
यहां यह उल्लेख भी कर दूं कि राष्ट्रीय सहारा के विषय केंद्रित वैचारिक परिशिष्ट हस्तक्षेप की अवधारणा के पीछे हिन्दी पत्रकारिता में अभय सिन्हा द्वारा किया गया एक प्रयोग भी था। उस समय चौ. चरण सिंह के किसान ट्रस्ट से असली भारत नाम से एक हिन्दी पत्रिका निकलती थी, जिसके संपादक अजय सिंह थे। इस पत्रिका को अभय सिन्हा और भोला शंकर शर्मा ने अंग्रेजी की सेमिनार की तर्ज पर विषय केंद्रित करके निकालना शुरू किया था। एक लेखक बतौर मैं भी इससे जुड़ा था, जिसे हिन्दी के बुद्धिजीवी वर्ग से भरपूर सराहना मिली थी। राष्ट्रीय सहारा शुरू हुआ तो इसकी संपादकीय टीम में मैं भी शामिल था। सहारा श्री हर सप्ताह एक विशिष्ट परिशिष्ट निकालना चाहते थे। तब मैंने असली भारत जैसा वैचारिक परिशिष्ट निकालने का प्रस्ताव रखा था, जिसे उन्होंने उपयोगी सुझावों के साथ स्वीकार कर लिया और इसे निकालने की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी थी।
अभय सिन्हा को देखकर मुझे हैरत होती थी कि कोई इंसान, एक इंसान के तौर पर इतना अच्छा कैसे हो सकता है- इतना प्रखर, इतना उदार, इतना संवेदनशील और इतना मानवीय। तब ऐसे इंसान ने ऐसा क्यों किया? आम तौर पर अपनी जान लेने का काम वह व्यक्ति करता है जो किसी संबंध को लेकर निराश हुआ हो या जो अपमानित हुआ हो, या जिसके जीने के रास्ते बंद हो गये हों। अभय के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं था। यहां तक कि जिंदगी को अलविदा कहते वक्त भी उन्होंने 46,500 रुपये गद्दे के नीचे छोड़े थे, जिससे उन्होंने अपना विद्युत दाह संस्कार करने और अगर कोई लेनदारी हो तो उसे चुकाने की बात लिखी थी।
अभय सिन्हा अपनी व्यक्तिगत जिंदगी से निराश नहीं हुए थे। उन्होंने लिखा है कि इंसानी जिंदगी की अब्सर्डिटी को और अधिक बर्दाश्त करना, उनके बस के बाहर हो गया था। विगत वर्षो में उनसे मेरी मुलाकातें न के बराबर हुई थीं और जो एकाध मुलाकातें हुई उनमें मैंने इस अब्सर्डिटी की झलक देखी थी। धार्मिक व्यवस्थाओं का भयावह पाखंड, राजनीतिक व्यवस्थाओं की डरावनी दलाल प्रवृत्ति, अर्थव्यवस्थाओं में अंतर्निहित लूट और शोषण की अमानवीय वैधता, सामाजिक व्यवस्थाओं का क्रूर छद्म, हर जगह मानवीय संबंधों में झूठ, घृणा और एक-दूसरे को पटकनी देकर बेहूदा व्यक्ति वर्चस्व स्थापित करने की अश्लील दौड़ जैसी चीजों ने समूचे मनुष्य जीवन को उनके लिए अब्र्सड यानी बेहूदा और बेतुका बना दिया था, जिससे न तो बच पाना संभव था, न जिसे सुधारना। यही अभय सिन्हा की निराशा थी। क्या गलत थी उनकी यह निराशा?
राष्ट्रीय सहारा अखबार के संपादकीय पेज पर प्रकाशित विभांशु दिव्याल का आलेख.












DEVANG RATHORE
August 7, 2011 at 11:32 am
kafi dukhad khabar hai main Abhay ji ki aatama ki shanti ke liye prathana karunga.jahaan tak media ka sawaal hai wo toi nangi heroin aur kameni logon ke liye hain.aam janta se wase koi matlab nahi hai.dalaalo aur laundiyabaji karte hain ye media ke bade aur kamine logun hain.
Devang Rathore
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